कृषि

सोयाबीन की उन्नत कृषि यंत्रों से उत्पादन तकनीक

इं. मनीषा साहू , डॉ. अजय वर्मा एवं डॉ. सुनील अग्रवाल

कृषकों का सोयाबीन खेती के प्रति झुकाव, तेल उद्योग की स्थापना एवं सरकार द्वारा तैयार वातावरण ने सोयाबीन खेती के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वर्तमान में सोयाबीन देश में तिलहनी फसलों में प्रथम स्थान पर स्थापित हो गयी है। इसमें प्रचुर मात्रा में उच्च कोटि का प्रोटीन 43.2 प्रतिशत एवं तेल 20 प्रतिशत पाया जाता है। इसके अलावा इसमें विटामिन एवं खनिज लवण की मात्रा भी अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक पायी जाती है।सोयाबीन छत्तीसगढ़ प्रदेश में खरीफ मौसम में उगाई जाती है। खरीफ फसल के रुप में इसकी उपयुक्तता एवं आर्थिक लाभ ने किसानों को आकर्षित किया है।

जलवायु एवं उपयुक्त क्षेत्र – सोयाबीन खरीफ फसल है जिसकी खेती जून से अक्टूबर के बीच की जाती है। इसकी खेती प्रदेश में ओैसतन 750-800 मि.मी. कृषि जलवायु क्षेत्र में भी की जा सकती है । फसल की उत्पादकता को वर्षा की कुल मात्रा एवं वितरण, तापक्रम एवं आद्रता अत्याधिक प्रभावित करते हैं।

भूमि का चयन एवं तैयारी – सोयाबीन, अम्लीय क्षारीय तथा रेतीली भूमि को छोड़कर हर प्रकार की मिट्टी में पैदा होती है। सोयाबीन की खेती उन खेतों में ही करें जहाँ जलभराव एवं मृदाजनित बिमारियों की समस्या न हो। रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद गर्मी में गहरी जुताई करें। ग्रीष्म कालीन जुताई माउल्ड बोर्ड प्लाउ से करने पर जमीन के नीचे आश्रय पाने वाले कीटों एवं बीमारियों के अवशेष नष्ट हो जाते हैं तथा भूमि की जलधारण क्षमता एवं दशा में सुधार होता है । गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट तथा सिंगल सुपर फॉस्फेट को खेत में समान रूप से छिड़कने के बाद बोनी के लिए कल्टीवेटर से जुताई करें । खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाये एवं खरपतवार नष्ट हो जायें इस प्रकार जुताई करें। बुवाई के पूर्व खेत के निचले हिस्से में जल निकास नाली का निर्माण अवश्य करें ।

बुवाई का समय – सोयाबीन की बुवाई 20 जून से 30 जुलाई (जे.एस. 95-60), २0 जून से 5 जुलाई तथा ( जेएस 335 (जौहर सोइबियन 335), एमएसीएस -124 जे.एस. 80-21, इंदिरा सोया -9) के बीच उत्तम परिणाम देती है। इसमें परिस्थितिवश बुवाई कुछ दिन आगे पीछे होना कोई विशेष प्रभाव नहीं डालता । मानसून में देर होने पर जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हों, बुवाई समय से ही करें ।

उत्तम बीज व बीज दर – सोयाबीन की बीज दर 60 से 75 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई कर सकते है। सोयाबीन बीज की अंकुरण क्षमता 70 प्रतिशत से अधिक हो एवं अनुवांशिक रूप से पूर्णत: शुद्ध हो वही बीज प्रयोग करें ।

बीजोपचार – बीज को फफूँदनाशक दवा थायरम एवं कार्बेन्डाजिम को 2:1 के अनुपात में मिलाकर 3 ग्राम प्रति किलो बीज अथवा ट्राईकोडर्मा नामक जैविक फफूँदनाशक की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें । जहाँ पर तना मक्खी, सफेद मक्खी एवं पीला मोजैक की समस्या अधिक हो वहाँ पर थायोमेथोक्जाम 70 डब्ल्यू. एस. नामक कीटनाशक से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज उपचारित कर सकते हैं । फफूँदनाशक एवं कीटनाशक दवा के उपचार के पश्चात् 5 ग्राम राइजोबियम कल्चर एवं 5 ग्राम पी.एस.बी. कल्चर से प्रति किलो बीज उपचारित करने से सोयाबीन में जड़ ग्रन्थियों का उचित विकास होता है ।

उर्वरक एवं खाद – भूमि की भौतिक दशा एवं गुणों को बनाये रखने के लिए 10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट अथवा 5 टन फसलों का बारीक किया हुआ भूसा और 5 टन कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर का उपयोग अच्छा परिणाम देता है । जहाँ पर मृदा परीक्षण के उपरान्त जिंक एवं बोरॉन तत्व की कमी पाई जाये, वहाँ 5कि.ग्रा जिंक (25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट) एवं 1 कि.ग्रा. बोरॉन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना लाभकारी है । गंधक की कमी होने पर फॉस्फोरस की पूरी मात्रा सिंगल सुपर फॉस्फेट के रूप में देने पर यह कमी पूरी हो जाती है या जिप्सम 2-2.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपयोग करने से भी गंधक की कमी पूरी हो जाती है। इसके अलावा सामान्यतयाः 20-30 कि. ग्रा. नत्रजन, 60-80 कि. ग्रा. फॉस्फोरस एवं 20 कि.ग्रा. पोटाश की मात्रा आवश्यक रूप से उपयोग करें ।

बुवाई का तरीका – कतार से कतार की दूरी 45 से.मी. होना चाहिए। बुवाई का कार्य बैल चलित या चलित इंदिरा सोया सीड ड्रिल से ही करें । बुवाई के समय जमीन में उचित नमी आवश्यक है । बीज को जमीन में 2.5 से 3 से. मी. गहराई पर बोयें। मेंढ़ – नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी – नाली विधि से बुवाई करनें से सोयाबीन की पैदावार में वृद्धि होगी एवं नमी संरक्षण जल निकास में लाभ होगा।

अंकुरण के बाद फसल की सुरक्षा – बुवाई के तीसरे दिन से एक सप्ताह तक अंकुरित नये पौधों को पक्षी नुकसान पहुँचा सकते हैं. इन पौधों की सुरक्षा करें.

पौधों की प्रति हेक्टेयर संख्या – सोयाबीन में अधिक फैलने वाली जातियों की 3 से 4 लाख के आसपास पौध संख्या एवं कम फैलने वाली जातियों की 4 से 6 लाख पौध संख्या प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। वांछित पौध संख्या अधिक होने पर फसल के ढहने की सम्भावना रहती है एवं फूल तथा फलियाँ प्रकाश के आभाव में सड़ जाती हैं तथा कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों का छिड़काव भी असरकारक नहीं होता है।

जल प्रबंध – सोयाबीन की फसल में यदि उचित जल प्रबंध नही है, तो जो भी आदान दिया जाता है उसका समुचित उपयोग पौधों द्वारा नहीं हो पाता है । इसके साथ ही जड़ सड़न जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है एवं नींदा नियंत्रण कठिन हो जाता है जिसके फलस्वरूप, पौधों का विकास सीमित हो जाता है एवं उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। अतः सामान्य तरीके से बुवाई के बाद 20-20 मीटर की दूरी पर ढाल के अनुरूप जल निकास नालियाँ अवश्य बनायें, जिससे अधिक वर्षा की स्थिति में जलभराव न हो। मेढ़ – नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी – नाली विधि से बुवाई करें एवं जल भराव की समस्या का निराकरण करें। यदि एक सप्ताह से अधिक वर्षा का अन्तराल हो जाये तो सिंचाई की सुविधा होने पर हल्की सिंचाई इन्हीं नालियों के माध्यम से करें। उचित जल प्रबंध से सोयाबीन की पैदावार में वृद्धि होगी।

खरपतवार नियंत्रण – सोयाबीन में विभिन्न प्रकार के घास कुल के एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार फसल के साथ जल एवं पोषक तत्वों के लिए स्पर्धा करते हैं जिससे पैदावार में कमी आ जाती है। अतः 20-25 दिन में फसल से हाथ से निन्दाई करें । मजदूरों की कमी, वर्षा का अंतराल एवं जमीन की स्थिति से, खरीफ के मौसम में हाथ की निंदाई कभी कभी कठिन हो जाती है अतः यांत्रिक विधियों में पंक्तियों के बीच उन्नत हैन्ड हो, बैल चलित वीडर या पावर वीडरों का निंदाई हेतु उप्योग करें। आवश्यकतानुसार रासायनिक नींदानाशकों का उपयोग भी कर सकते हैं।


कटाई, गहाई एवं भंडारण – सोयाबीन की कटाई हँसिया, वर्टिकल कन्वेयर रीपर या कम्बाइन मशीन से की जाती है। फसल की कटाई तब करें जब 95 फलियाँ भूरी पड़ जायें और पत्तियाँ झड़ जायें । अधिक देरी से कटाई करने पर चटकने की संभावना रहती है। बीज वाली फसल की कटाई कम्बाईन हार्वैस्टरसे न करें। यदि कटाई के समय वर्षा की संभावना हो तो कटाई रोक दें। फसल के गट्ठों को दो तीन दिन तक खेत में सूखने के बाद खलिहान में ले जायें । गहाई थ्रेशर मशीन से करने के लिये सूखी हुई फसल की गंजियाँ बना लें। थ्रेशर की की गति 300-500 आर.पी.एम. एवं पंखे की गति 1400-1500 आर.पी.एम. रखें। ट्रैक्टर से गहाई के लिए खलिहान में फसल की मोटी पर्त बिछा दें और सूखने के लिए छोड़ दें। जब फल्लियाँ चटकने लगें तब नये टायर वाले ट्रैक्टर से धीमी गति से गहाई करें। गहाई हो जाने पर तेज हवा में या पंखों से उड़ावनी कर बीजों को डंठल एवं भूसा से अलग करें। बीज को पुनः धूप में 2 से 3 दिनों तक सुखाकर एवं छानकर भंडारण सूखे एवं ठंडे स्थानों में कोठियों एवं बोरों में करें। भण्डारण के लिए बीज में 9 प्रतिशत के आस-पास नमी सर्वथा उपयुक्त होती है । बीजों को साफ सुथरी बोरियों में भरें । बोरियों की सिलाई के बाद उन्हें 6 बोरियों तक की छल्ली लगायें । भण्डार गृह में ताप और नमी का प्रभाव न पड़े ऐसी व्यवस्था रखें । भण्डार में अन्य जाति के बीज पास में न हों ऐसा प्रबन्ध करें ।

सोयाबीन की उन्नत खेती हेतु महत्वपूर्ण सुझाव
1. सोयाबीन की खेती उपयुक्त जमीन में ही करें ।
2. ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करें ।
3. मृदा परीक्षण कर प्रमुख एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा का पता लगायें तदानुसार उर्वरक डालें।
4. दस टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से गोबर खाद कम्पोस्ट या 5 टन बारीक भूसा और 5 टन कम्पोस्ट का उपयोग करें । गंधक एवं जस्ते की कमी को पूरा करें।
5. खेत में जल निकास एवं सिंचाई की समुचित व्यवस्था करें ।
6. बुवाई 25 जून से 7 जुलाई के मध्य करें ।
7. हल्की से मध्यम भूमि में कम अवधि की तथा मध्यम से भारी भूमि में मध्यम अवधि की किस्में लगायें। एक से अधिक किस्मों को लगायें ।
8. बोनी हेतु स्वस्थ, सुडौल, साफ एवं 70 प्रतिशत से अधिक अंकुरण क्षमता वाला बीज प्रयोग करें ।
9. बीज दर 60 – 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपयोग करें ।
10. आवश्यक पौध संख्या 4-6 लाख प्रति हेक्टेयर के मध्य रखें।
11. नींदा, रोग एवं कीट व्याधियों का सही समय पर, सही दवा तथा सही विधि द्वारा नियंत्रण करें। फसल कटाई समय से करें।
12. सोयाबीन के साथ अरहर, मक्का, ज्वार, कोदो, कुटकी की अंर्तरवर्तीय फसल लगायें। उचित फसल चक्र अपनायें। कृषक स्वयं अपना उन्नत बीज उत्पादित करें।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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