ग्रीष्म कालीन सूरजमुखी की वै़ज्ञानिक खेतीे
सुमित एवं डॉ सुनील कुमार


सूरजमुखी भारत की महत्वपुर्ण तिलहनी फसल है सूरजमुखी की खेती खरीफ रबी एवं जायद तीनो ही मौसम में की जा सकती है लेकिन खरीफ में इस पर अनेक रोगों एवं कीटो का प्रकोप होने के कारण फूल छोटे होते है तथा दाना कम पड़ता है । जायद में सूरजमुखी की अच्छी उपज प्राप्त होती है इस कारण जायद में ही इसकी खेती ज्यादातर की जाती है। सूरजमुखी मे 40-50 प्रतिशत तेल तथा 20-25 प्रोटीन होती है इसका तेल स्वादिष्ट एवं विटतिन एए डी और ई से परपूर्ण होता है। इसका तेल हल्के पीले रंग स्निग्ध गंध वाला होता है इसिलिये यह स्वास्थय के दृष्टि से लाभदायक है। छत्तीसगढ़ मे सूरजमुखी की खेती सभी जिलो मे की जाती हैं। रायगढ़ राजनांदगाव दुर्ग महासमंुद एवं बिलासपुर मे इसे बडे़ पैमाने पर उगाया जाता है।
जलवायु
सूरजमुखी की खेती खरीफ रबी जायद तीनो मौसम में की जा सकती है जहा औसत वार्षिक वर्षा 500-700 मि मी हो। फसल पकते समय शुष्क जलवायु की अति आवश्यकता पड़ती है सूरजमुखी की खेती अम्लीय एवम क्षारीय भूमि को छोड़कर सिंचित दशा वाली सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है लेकिन दोमट भूमि सर्वोतम मानी जाती है जिसका पी एच 6.5 से 8 हो बीज अंकुरण के समय 25-30 डि़ से तापक्रम उपयुक्त होती है तापक्रम 15 डि़ से कम होने पर अंकुरण कम हो जाता है तथा अधिक होने पर बीज की उपज एंव तेल की मात्रा मे गिरावट आती है।
भुमि की तैयारी
खेत की तयारी में जायद के मौसम में प्राप्त नमी न होने पर खेत को पलेवा करके जुताई करनी चाहिएप् एक जुताई मिटटी पलटने वाले हल से तथा बाद में 2 से 3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए मिटटी भुरभुरी कर लेना चाहिएए जिससे की नमी सुरक्षित बनी रह सके आखिरी जुताई में खेत तैयार करते समय 250 से 300 कुंतल सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद लाभदायक पाया गया हैप्
उन्नत किस्मे
| किस्म का नाम | अवधि | तेल की मात्रा | उपज |
| मार्डन | 80-85 | 38-39 | 7-8 |
| विनियमन | 115-120 | 41-43 | 15-25 |
| ज्वालामुखी | 95-115 | 39-40 | 25-28 |
| एमएसएफएच-8 | 90-95 | 42-44 | 25-28 |
| एमएसएफएच-17 | 100-105 | 42-44 | 10-15 |
| केबीएसएच-1 | 90-95 | 41-42 | 18-20 |
| केबीएसएच-44 | 105-110 | 42-44 | 20-25 |
बुवाई का समय तथा विधि
जायद में सूरजमुखी की बुवाई का उपयुक्त समय 15 जनवरी से 20 फरवरी तक है जिससे फसल मई के अन्त या जून के प्रथम सप्ताह तक पक जायें। बुवाई में देर करने से वर्ष शुरू हो जाने के बाद फूलों को नुकसान पहुंचता है। बुवाई कतारों मे हल के पीछे 2-4 से0 मी0 की गहराई पर करनी चाहियें। संकुल किस्मो मे लाइन से लाइन की दूरी 45 से0 मी0 होनी चाहियें और पौध से पौध की दुरी 15-20 से0 मी0 रखना चाहिेए तथा संकर किस्मो मे लाइन की दूरी 60-75 से0 मी0 होनी चाहियें और पौध से पौध की दुरी 20-25 से0 मी0 रखना चाहिेए। बुवाई के 15.20 दिन बाद सिंचाई से पूर्व थिनिंग ;विरलीकरणद्ध द्वारा पौधे से पौधे की आपसी दूरी 15 से0 मी0 कर देनी चाहियें।
बीज दर
एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 8 से 10 किग्रा० स्वस्थ संकुल प्रजाति का प्रमाणित बीज पर्याप्त होता हैए जब कि संकर प्रजाति का 5.6 किग्राण् बीज प्रति हेक्टेयर उपयुक्त रहता है। यदि बीज का जमाव 70 प्रतिशत से कम हो तो तद्नुसार बीज की मात्रा बढ़ा देना चाहिये।
बीज शोधन
बीज को 24 घण्टे पानी में भिगोकर साये में 3-4 घण्टे सुखाकर बोने से जमाव शीघ्री होता है। बोने से पहले प्रति किलोग्राम बीज को कार्बेन्डाजिम की 2 ग्राम मात्रा या थीरम की 2.5 ग्राम मात्रा में से किसी एक रसायन से शोधित करके बुवाई करनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
सामान्यतः उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। मिट्टी परीक्षण न होने की दशा में संकुल में 80 किग्रा० संकर में 100 किग्रा० नत्रजनए 60 किग्रा० फास्फेारस एवं 40 किग्रा० पोटाश प्रति हेक्टर पर्याप्त होता है।नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय कूंडों में प्रयोग करना चाहिये। नत्रजन की शेष मात्रा बुवाई एंव पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय कूडो में प्रयोग करना चाहियें। नत्रजन की शेष मात्रा बुवाई के 25-30 दिन बाद टाप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहियें। अगर आलू के बाद बुवाई की जा रही है। तो उर्वरको की मात्रा 25 प्रतिशत तक कम की जा सकती हैं सूरजमुखी की खेती में 20-25 किग्रा जिप्सम प्रति हेक्टर का प्रयोग बुवाई के समय अवश्य करना चाहियें।
सिंचाई
हल्की भूमि में जायद मे सूरजमुखी की अच्छी फसल के लिए 4-5 सिचांईयो की आवश्यकता पडती है। तथा भारी भूमि में 3-4 सिंचाइयां क्यारियों बनाकर करनी चाहिेयें पहली सिंचाई बोने के 20-25 दिन बाद आवश्यक है। फूल निकलते समय तथा दाना भरते समय भूमि में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। इस अवस्था में सिंचाई बहुत सावधानी पूर्वक करनी चाहिए ताकि पौधे न गिरने पायें। सामान्यतः 10-15 दिनों के अन्तर पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। प्रारम्भिक अवस्था की सिंचाई स्प्रिकलर द्वारा किया जायें। तो लाभप्रद होती है।
खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के बाद जब पौधे 20 से0 मी0 के हो जाने पर 2 बार हाथ से निदाई करनी चाहिए प्रथम निदाई बुवाई के 20-25 दिन बाद तथा दुसरी निदाई 40-45 दिन बाद करना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण करने के लिए रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु पेन्डिमैथेलिन 30 प्रतिशत की 3.3 लीटर या फलुक्लोरिन 1 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टर के हिसाब से 800.1000 लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के बाद 2-3 दिन के अन्दर छिड़काव करना चाहिए। इस रसायन के प्रयोग से खरपतवार नियंत्रण हो जाता है।
मिट्टी चढ़ाना
सूरजमुखी का फूल काफी बड़ा होता है जिससे पौधों के गिरने का भय रहता है। अतः नत्रजन की टाप ड्रेसिंग के बाद एक बाद एक बार पौधों पर 10-15 सेमी0 मिट्टी चढ़ा देना अच्छा होता है।
परसेचन क्रिया
सूरजमुखी का परसेचित फसल है। इसमें अच्छे बीज पड़ने हेतु परसेचन क्रिया नितान्त आवश्यक है। यह क्रिया भौरों एवं मधुदृमक्खियों के माध्यम से होती है। जहां इनकी कमी हो हाथ द्वारा परसेंचन की क्रिया अधिक प्रभावकारी है। अच्छी तरह फूल आ जाने पर हाथ में दस्ताने पहनकर या किसी मुलायम रोंयेदार कपड़े को लेकर सूरजमुखी के मुंडकों पर चारों ओर धीरे से घुमा दें। पहले फूल के किनारे वाले भाग परए फिर बीच के भाग पर यह क्रिया प्रातःकाल 7से 10 बजे तक एक दिन के अन्तराल पर तक करनी चाहिए।
फसल पद्धति
सूरजमुखी एक प्रकाश उदासीन फसल होने के कारण सभी प्रकार के फाल चक्रो मे सम्मिलित किया जा सकता है।
सूरजमुखी – मुगफली 2:4
सूरजमुखी – सोयाबीन 3:3
सूरजमुखी – उड़द 1:1
मुगफली – सूरजमुखी 6:2
कटाई और मड़ाई
जब सूरजमुखी के बीज कड़े हो जाए तो मुन्डको की कटाई करके या फूलो के कटाई करके एकत्र कर लेना चाहिए तथा इनको छाया में सुख लेना चाहिए इनको ढेर बनाकर नहीं रखना चाहिए इसके बाद डंडे से पिटाई करके बीज निकल लेना चाहिए साथ ही सूरजमुखी थ्रेशर का प्रयोग करना उपयुक्त होता है । सकुल प्रजातियों की पैदावार 12 से 15 कुन्तल प्रति हैक्टर तथा संकर प्रजातियों की पैदावार 25 से 30 कुन्तल प्रति हैक्टर है ।
भण्डारण
बीज निकलने के बाद अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए बीज में 8 से 10 % नमी से आधिक नहीं रहनी चाहिएप् बीजो से 3 महीने के अन्दर तेल निकल लेना चाहिए अन्यथा तेल में कड़वाहट आ जाती है
सुमित एवं डॉ सुनील कुमार
शस्य विज्ञान विभाग, इं.गां.कृ.वि.वि, रायपुर (छत्तीसगढ़)










