उद्यानिकीकृषि एवम संबद्ध क्षेत्रराज्य

चमेली (Jasmine) की उपयोगिता एवं व्यवसायिक खेती

मनोज कुमार बेक, संतोष कुमार बेक, सूर्यमणी साहनी, प्रदीप कुमार कुजूर

आज का दौर कृषि विविधिकरण का है, देश के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिये उद्यानिकी फसलें सबसे उपयुक्त हैं। उद्यानिकी फसले विशेषकर पुष्पों की खेती देश के विभिन्न हिस्सों में की जाती है भारत की नीतियाँ भी इसे प्रोत्साहित कर रही हैं ऐसे में आवश्यक है कि विश्वविद्यालयों में भी इस पर गहन अनुसंधान कर किसानों के लिये पुष्पिए फसलों द्वारा आमदनी बढ़ाने की तकनीकी का प्रसार किया जाय।

भारत मे पुष्पों का लगभग 400 करोड़ का व्यवसाय हो रहा है। जिसमें लगभग 125 करोड़ के फूलों का निर्यात भारत से ही हो रहा है। लगभग 40 करोड़ का व्यवसाय कट फ्लावर्स से मिल रहा है। सबसे अधिक तमिलनाडु में 32 हजार हेक्टेयर फूलों की खेती की जा रही है, द्वितीय स्थान पर कर्नाटक में 27 हजार हेक्टेयर फूलों की खेती की जा रही है। उत्पादन के आधार पर तमिलनाडु का इस देश में पहला स्थान है। शहरिकरण विकास के साथ तकी प्रबल संभावना है। ऐसे में किसान भाइयों को चाहिये कि पुष्पों की खेती का वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर उससे अधिक उत्पादन कर लाभ कमाएं।

चमेली एक महत्वपूर्ण व्यवसायिक पुष्पों है जिसका उपयोग माला बनाने धार्मिक अनुष्ठानों में, शादी विवाह में, खासकर महिलायें सौन्दर्य प्रसाधन जैसे बालों का श्रंृगार करने के लिये बालों में गजरा के रूप में लगाती है तथा अन्य कार्यक्रमों में सजावट के उपयोग में लगाया जाता है।

यद्यपि चमेली के पुष्पों का अपना महत्व है चमेली के फूलों का इत्र व खुशबुदार तेल व अगरबत्ती के साथ ही साथ इसका औषधीय गुणों का उपयोग भी बहुतायत मात्रा में भारत में प्राचीन काल से किया जाता रहा है।

चमेली का उपयोगी भागः- सम्पूर्ण पौधा उपयोगी है।
चमेली की आयुर्वेदिक उपयोगिताएंः-
चमेली का अपना एक अलग आयुर्वेदिक उपयोेगिता है जिसमें जड़ पत्तियों और फूलों का उपयोग किया जाता है एशिया महाद्वीप व हिन्दमहासागर के तटीय भाग में लोक पौराणिक आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार चमेली को लीवर में तकलीफ की शिाकायत को दूर करने मे,ं पेचिश व विभिन्न प्रकार के दर्द निवारण जैसे मासिक धर्म, त्वचा रोग, कुष्ठ रोग, तथा चमेली का तेल त्वचा को मुलायम बनाने, हृदय रोग व कैंसर रोग आदि के निवारण के लिये अत्यन्त लाभकारी है। चमेली का तेल सुगन्ध चिकित्सा विज्ञान के अनुसार तनाव से मुक्ति, सर दर्द व मानसिक चिन्ता से मुक्त करता है चमेली के इत्र की खुशबु मस्तिष्क के बीटा तरंग को बढ़ाता है जो कि मस्तिष्क की सतर्कता क्षेत्र से जुड़ा होता है जिससे मस्तिष्क की गतिशीलता बनी रहती है।

जड़ का आयुर्वेदिक उपयोगः-
चमेली का जड़ पेशाब में जलन की शिकायत के लिये चमेली की जड़ को बकरी के दूघ के साथ उबाल कर उसमें शक्कर मिला कर पीने से राहत मिलता है और पथरी रोग के लिये भी लाभदायक होता है (राजामारदण्डा) और साथ ही साथ लकवा, मंद बुद्वि, पाचन शक्ति में कमी, प्रजनन क्षमता में कमी, दाद खाज खुजली, कुष्ठ रोग एवं त्वचा संबंधी रोगों में चमेली की जड़ें अत्यन्त लाभकारी होती है।

पत्तियों का आयुर्वेदिक उपयोगः-
चमेली की पत्तियों को चबानें से दांत का दर्द, मुंह का छाला एवं आमाशय संबंधी रोग, चमेली की पत्तियों का जूस पीने से राहत मिलता है और साथ ही साथ त्वचा संबंधी रोग एवं जले कटे स्थान पर इनकी पत्तियों का उपयोग लाभदायक होता है।

चमेली के तेल का आयुर्वेदिक उपयोगः-
चमेली के तेल का उपयोग से बालों का झड़ना रूकता है एवं आंखों की रोशनी बढा़ने में सहायक होता है। कान का पकना रोकने के लिये चमेली के पत्तियों का जूस को चमेली के तेल में पका कर कान में डालने से कान का पकना ठीक होता है। (बरिन्दामाधव एवं बांगासेना)।

चमेली के फूलों का उपयोगः-
चमेली का सूखा पुष्प नसिका से रक्त स्त्राव को रोकता है और त्वचा संबंधी रोगों के लिये उपयोगी होता है और महिलाओं में स्तन कैंसर की रोकथाम के लिये चमेली का फूल अत्यन्त लाभकारी होता है।

मृदा एवं जलवायुः-
गर्म ग्रीष्म ऋतु मध्यम शरद ऋतु एवं मध्यम वर्षा ऋतु सर्वोत्तम जलवायु है। जिन स्थानों पर पानी लम्बे समय से ठहरा हुआ हो वहां चमेली के फसल को नहीं उगाना चाहिये क्योंकि इससे जड़तंत्र बुरी तरह प्रभावित होता है इसके फलस्वरूप उपज में भारी कमी हो जाती है।
चमेली पुष्पों के लिये उपजाऊ दोमट अथवा बलुई दोमट मिट्टी जिसका चभ् मान 6.5 से 7.5 के बीच हो तो उपयुक्त रहता है।

चमेली की प्रजातियां:-
कोयम्बटूर -1, कोयम्बटूर -2, अर्का सुरभि।

कोयम्बटूर -1: लूज फ्लावर उत्पादन और तेल उत्पादन के लिये बहुत उपयुक्त है इसके फूलों का औसत उत्पादन 10 टन प्रति हेक्टेयर होता है और इसका कांक्रीट प्राप्ति 0.29ः होता है।
कोयम्बटूर -2 : यह किस्म कोयम्बटूर -1 किस्म से प्रेरित उत्परिवर्तित (म्यूटेंट) किस्म है इसका औसत उत्पादन 11.68 प्रति हेक्टेयर होता है।
प्रवर्धन: टर्मिनल कटिंग छोटी टहनियों की कटिंग (12 से 15 सेमी) अत्यधिक उपयुक्त मानी जाती है टहनियों के अन्तिम कटे सिरा, को तुरंत IAA या IBA 1000 PPM घोल में डुबो कर लगाने से जड़ें अच्छी आती हैं।
अच्छी जड़े लाने के लिये केचुआ खाद, काई, और बालू का समान अनुपात 1:1:1 का माध्यम बेहतर होता है।

भूमि की तैयारी:-
भूमि अच्छी जल निकास वाली होनी चाहिये और साथ ही साथ सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिये सूर्य के प्रकाश की व्यवस्था भी पर्याप्त होना चाहिये पौधे लगाने से एक माह पूर्व गड्ढ़े की खुदाई कर लेनी चाहिये पौधा लगाने से पूर्व अच्छे से सड़े हुये गोबर की खाद 10 किग्रा0 प्रति पौधा और बालू, मिट्टी समान अनुपात में मिलाकर पौधे की रोपाई कर देना चाहिये।

रोपड़ दूरी:-
विभिन्न शोधों से पता चलता है कि अधिक पादप घनत्व से अधिक पुष्प उत्पादन नहीं लिया जा सकता अतः पौधे से पौधे की दूरी 2.0 मी॰ और कतार से कतार की दूरी 1.5 मी होना चाहिये ( 2.0 x 1.5 )जिससे पौध सधनता 3350 पौधा प्रति हेक्टेयर होता है और जिससे पुष्प उत्पादन अधिक होता है।

रोपड़ समय:-
चमेली के फूलों को लगाने का सबसे उत्तम समय भारत के अधिकतम हिस्सों में मानसून का समय अधिक उपयुक्त होता है पर फिर भी जून से नवम्बर तक का समय अच्छा होता है।

खाद व उर्वरक:-
चमेली के पौधों को दो खुराक में उर्वरक डालना चाहिये पहला जून-जुलाई और दूसरा छटाई के बाद दिसम्बर में उर्वरक डालना चाहिये अत्यधिक उर्वरक डालने से शाख का विकास अधिक होता है जिससे गुणवत्ता में कमी आती है और फूलों की संख्या में भी कमी आती है फूलों की अधिक उत्पादन के लिये जिंक 0.25% और मैग्निशियम 0.5% फूल आने से पहले छिड़काव करना चाहिये।
सिंचाई:- रोपण के तुरंत बाद पहला सिंचाई करना आवश्यक होता है सामान्यतः सप्ताह में एक बार और 10 दिन में एक बार सिंचाई करना उपयुक्त होता है।

कटाई-छटाई:-
चमेली के फूलों की अच्छी पैदावार के लिये पौधों के कटाई छटाई पर बहुत निर्भर करती है इसलिये दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में पौधों को भूमि की सतह से 45सेमी की ऊचाई से काट देना चाहिये कटाई छटाई के साथ ही पौधे के किनारे की मिट्टी को हटाकर 10 से 12 दिनों के लिये खुला छोड़ देना चाहिये तत्पश्चात 10 किग्रा सड़ी हुई गोबर या कम्पोस्ट खाद मिलाकर गड्ढ़े भरने के बाद सिंचाई कर देना चाहिये।

खरपतवार नियंत्रण:-
सामान्यतः खरपतवार नियंत्रण हाथों से किया जाता है किन्तु यह खर्चीला होता है रासायनिक खरपतवार नियंत्रण प्रभावी एवं सस्ती होती है ओराईजा-लाइन का छिड़काव 1 या 2 बार करना चाहिये मलचिंग भी खरपतवार की अधिकता को कम करती है।

चमेली के फूलों का उपज:-
चमेली के फूलों से आर्थिक उपज पौधे लगाने के तीन वर्ष बाद से 15 वर्ष तक आर्थिक उत्पादन होता है उसके पशचात उत्पादन मे ंकमी आने लगती है। फूलों की तुड़ाई कब करें उसके उद्देश्य पर निर्भर करता है पूरी तरह खिले हुये फूल या फूलों के कलियों की तुड़ाई सुबह जल्दी कर लेना चाहिये जबकि चमेली के तेल उत्पादन के लिये पूरी तरह से खिले हुए फूल अधिक उपयुक्त होते हैं। और फूलों की तुड़ाई सुबह 11 बजे के बाद करने से उपज व गुणवत्ता में भारी कमी आती है और फूलों की तुड़ाई का समय ताजे फूलों का जीवनावधि को प्रभावित करती हैं चमेली के फूलों का उत्पादन 4329 से 10144 किग्रा प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त किया जा सकता है।

पौध सुरक्षाः-
चमेली के फूलों को रोग व कीड़ों से बचाव यदि समय पर न की गई तो उत्पादन में 40 से 45% की कमी आ जाती है।
बड़ वर्म:- बड़़ वर्म हरे रंग का लार्वा होता है और काले रंग की सुड़ी होती है जो अपरिपक्व फूलों की कलियों को बेधकर कुतर जाता है।
नियंत्रण:-
मोनोक्रोटोफॅास 2 मिली प्रति लीटर का छिड़काव करने से बड वर्म का रोकथाम किया जा सकता है।
लाल मकड़ी:- इसका प्रकोप गर्म और सूखे मौसम में विशेषकर ग्रीष्म ऋतु में इसकी अधिकता पाई जाती है लाल मकड़ी चमेली के पत्तियों के नीचले सतह को खाते हुये देखी जाती है। जिससे पत्तियां पीली पड़ कर गिर जाती है।
नियंत्रण:- थाईमेट 2 ग्रा प्रति लीटर का छिड़काव 5 बार दस दस दिन के अन्तराल में करना चाहिये जिससे लाल मकड़ी से निजात पाया जा सकता है।
पत्ति झुलसा:- लालभूरा धब्बा पत्ति के ऊपरी सतह में दिखाई देता हैं
नियंत्रण:-
बेनलेट 0.4% , बेबिस्टीन 0.1%, बोर्डेक्स मिक्सर 1% जो कि समान प्रभाव दर्शाती है।
विल्ट:- पौधे के नीचली पत्तियां पीली पड़ते हुये ऊपर की ओर बढ़ने लगती है और अन्ततः मरने लगती है।
नियंत्रण:-
पौधे की गोलाई में हल्की खुदाई करके बोर्डेक्स मिक्सर 1% का छिड़काव करने से इसका नियंत्रण किया जा सकता है।
निमेटोडः- मृदा परीक्षण कर 10 ग्रा टेमिक-जी पौधे के जड़ क्षेत्र में डालना चाहिये तत्पश्चात सिंचाई कर देना चाहिये।

पैकिंग:-

  • तोड़े हुये चमेली के फूलों को पैकिंग के पूर्व शीतल उपचार किया जाना चाहिJaये।
  • पैकिंग आर्थिक दृष्टि से सस्ती-परिवहन में सुविधा जनक और पैंकिंग टिकाऊ व आकर्षक होना चाहिये। ये लम्बी दूरी के बाजार के लिये अच्छी होती है।
  • थोक विक्रेता फूलों को बास्केट में रखते है ये नमी नियंत्रण करने के लिये हवा के आवागमन युक्त पैकिंग करते हैं।
  • बास्केट के अन्दर अखबार/पेपर से लपेटा हुआ फूल के ऊपर पानी का हल्का बौछार करते हैं।
  • तोड़े हुये फूलों की जीवनावधि बढ़ाने के लिये बोरिक एसिड 0.5% , सुक्रोज 1% , एल्युमिनियम 0 सल्फेट 1% और सिल्वर नाइट्रेट 0.01% से उपचार करने से फूल 75 घंटे तक ताजा रहता है।

व्यापार वितरण और परिवहनः-
चमेली के फूलों का परिवहन वातानुकूलित ट्रक, शिप अथवा वाहन में करना चाहिये लम्बी दूरी की परिवहन से पूर्व बांस के बास्केट में नम मलमल के कपड़े में फूलों को रखना चाहिये इससे फुलों को ताजा व सुरक्षित रखा जा सकता है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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