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कैंसे करें आँवला की खेती

संगीता, हेमंत पाणिग्रही एवं युगल किशोर लोधी

आँवला भारतीय मूल का एक महत्वपूर्ण फल है। यह युफोरबिएसी परिवार का पौधा है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे विभिन्न नामों जैसे, हिंदी में ‘आँवला’, संस्कृत में ‘धात्री’ या ‘आमलकी’, बंगाली एवं उड़ीया में, ‘अमला’ या ‘आमलकी’ तथा अंग्रेजी में ‘ऐम्बलिक’, ‘माइरोबालान’ या इंडियन गूजबेरी के नाम से जाना जाता है। अपने अद्वितीय औषधीय एवं पोषक गुणों के कारण इसे अमृत फल तथा कल्प वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। आँवले की विशेषतायें अनेक हैं, जैसे कि प्रति इकाई उच्च उत्पादकता (15-20 टन प्रति हेक्टेयर), विभिन्न प्रकार की भूमि (ऊसर, बीहड़, खादर, शुष्क, अर्धशुष्क, कांडी, घाड़) हेतु उपयुक्तता, पोषण एवं औषधीय (विटामिन सी, खनिज, फिनॉल, टैनिन) गुणों से भरपूर तथा विभिन्न रूपों में (खाद्य, प्रसाधन, आयुर्वेदिक) उपयोग इत्यादि के कारण आँवला आँवला की खेती काफी लाभदायक हो सकती है।

उपयोग एवं पोषकमूल्य
आँवले के पौधों के प्रत्येक भाग का आर्थिक महत्व है। इसके फलों में विटामिन ‘सी’ की अत्यधिक मात्रा पायी जाती है। इसके अतिरिक्त इसके फल लवण, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, कैल्शियम, लोहा, रेशा एवं अन्य विटामिनों के भी धनी होते हैं। इसमें पानी 81.2 प्रतिशत, प्रोटीन 0.50 प्रतिशत, वसा 0.10 प्रतिशत, रेशा 3.40 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 14.00 प्रतिशत, कैल्शियम 0.05 प्रतिशत, फोस्फोरस 0.02 प्रतिशत, लोहा 1.20 (मिली ग्रा. प्रति 100 ग्रा.), विटामिन ‘सी’ 400-1300 (मिली ग्रा. प्रति 100 ग्रा.), विटामिन ‘बी’ 30.00 (माइक्रो ग्रा. प्रति 100 ग्रा.) पाये जाते है। भारत में औषधीय गुणों से युक्त फलों में आँवले का अत्यंत महत्व है।

इसका फल तीक्ष्ण शीतलता दायक एवं मूत्रक और मृदुरेचक होता है। एक चम्मच आँवले के रस को यदि शहद के साथ मिला कर सेवन किया जाय तो इससे कई प्रकार के विकार जैसे क्षय रोग, दमा, खून का बहना, स्कर्वी, मधुमेह, खून की कमी, स्मरण शक्ति की दुर्बलता, कैंसर अवसाद एवं अन्य मस्तिष्क विकार एन्फ्जलुएन्जा, ठंडक, समय से पहले बुढ़ापा एवं बालों का झड़ना एवं सफेद होने से बचा जा सकता है। साथ ही रक्त की कमी, सामान्य दुर्बलता तथा अन्य कई परेशानियों से मुक्ति दिलाता है। त्रिफला, च्यवनप्राश, अमृतकलश ख्याति प्राप्त स्वदेशी आयुर्वेदिक औषधियाँ हैं, जो मुख्यतरू आँवले के फलों से बनायी जाती हैं।

भूमि
आँवला एक सहिष्णु फल है और बलुई भूमि से लेकर चिकनी मिट्टी तक में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। गहरी उर्वर बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती हेतु सर्वोत्तम पायी जाती है। बंजर, कम अम्लीय एवं ऊसर भूमि (पी.एच. मान 6.5-9.5, विनियम शील सोडियम 30-35 प्रतिशत एवं विद्युत् चालकता 9.0 म्होज प्रति सें.मी. तक) में भी इसकी खेती सम्भव है। भारी मृदायें तथा ऐसी मृदायें जिनमें पानी का स्तर काफी ऊँचा हो, इसकी खेती हेतु अनुपयुक्त पायी गई हैं।

प्रमुख किस्में
कंचन (एन.ए.-4) – इस किस्म में मादा फूलों की संख्या अधिक (4-7 मादा फूल प्रति शाखा) होने के कारण यह अधिक फलत नियमित रूप से देती है। फल मध्यम आकार के गोल एवं हल्के पीले रंग के व अधिक गुदायुक्त होते हैं। रेशेयुक्त होने के कारण यह किस्म गूदा निकालने हेतु एवं अन्य परिरक्षित पदार्थ बनने हेतु औद्योगिक इकाईयों द्वारा पसंद की जाती है। यह मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) में परिपक्व होने वाले किस्म हैं ।
कृष्णा (एन.ए.-5) – यह एक अगेती किस्म है जो अक्टूबर से मध्य नवम्बर में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म के फल बड़े ऊपर से तिकोने, फल की सतह चिकनी, सफेद हरी पीली तथा लाल धब्बेदार होती है। फल का गूदा गुलाबी हरे रंग का, कम रेशायुक्त तथा अत्यधिक कसैला होता है। फल मध्यम भंडारण क्षमता वाले होते हैं। अपेक्षाकृत अधिक मादा फूल आने के कारण, इस किस्म की उत्पादन क्षमता बनारसी किस्म की अपेक्षा अधिक होती है। यह किस्म मुरब्बा, कैन्डी एवं जूस बनाने हेतु अत्यंत उपयुक्त पायी गयी है।
नरेन्द्र आँवला-6 – यह मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) में पककर तैयार हो जाती हैं। पेड़ फैलाव लिए अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। (फलों का आकार मध्यम से बड़ा गोल, सतह चिकनी, हरी पीली, चमकदार, आकर्षक) गूदा रेशाहीन एवं मुलायम होता हैं। यह किस्म मुरब्बा, जैम एवं कैन्डी बनाने हेतु उपयुक्त पायी जाती हैं।
नरेन्द्र आँवला-7 -यह शीघ्र फलने वाली, नियमित एवं अत्यधिक फलन देने वाली किस्म है। यह मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) तक पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म उत्तक क्षय रोग से मुक्त है। फल मध्यम से बड़े आकार, के ऊपर तिकोने, चिकनी सतह तथा हल्के पीले रंग वाले होते हैं। गूदे में रेशे की मात्रा एन ए-6 किस्म से थोड़ी अधिक होती है। इस किस्म की प्रमुख समस्या अधिक फलत के कारण इसकी शाखाओं को टूटना है। अतरू फल वृद्धि के समय शाखाओं में सहारा देना उचित होता है यह किस्म च्यवनप्राश, चटनी, अचार, जैम एवं स्क्वैश बनाने हेतु अच्छी पायी गयी है।
नरेन्द्र आँवला-10 – इसके फल देखने में आकर्षक, मध्यम से बड़े आकार वाले, चपटे गोल होते हैं। सतह कम चिकनी, हल्के पीले रंग वाली गुलाबी रंग लिए होती है। फलों का गूदा सफेद हरा, रेशे की मात्रा अधिक एवं फिनाल की मात्रा कम होती है। अधिक उत्पादन क्षमता, शीघ्र पकने के कारण एवं सुखाने एवं अचार बनाने हेतु उपयुक्तता के कारण यह व्यवसायिक खेती हेतु उपयुक्त किस्म हैं, परन्तु इस किस्म में एकान्तर फलन की समस्या पायी जाती है।

प्रवर्धन
आँवले के प्रवर्धन हेतु कई कायिक विधियों का मानकीकरण किया गया है। इसका सफल प्रवर्धन पैबंदी चश्मा, विरूपित छल्ला विधि, विनियर कलम एवं कोमल शाखा बंधन द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

बीज को बोने से 12 घंटे पहले पानी में भिगो देना चाहिए। जो बीज पानी में तैरने लगे उन बीजों को फेंक देना चाहिए। मार्च-अप्रैल के महीने में बीजों को जमीन की सतह से थोड़ी उठी हुई क्यारियों में बोना चाहिए। पाली हाउस में बीजों को जल्दी (फरवरी माह में) भी बोया जा सकता है। देर (मई एवं जून माह में) से बोये गये बीजों से उत्पन्न पौधे कलिकायन हेतु उपयुक्त होते हैं। मार्च-अप्रैल में बोये गये बीजों का जमाव करीब दो सप्ताह में हो जाता है तथा बुवाई के बाद 10 से.मी. ऊँची पौध करीब 35-40 दिनों में तैयार हो जाती है। इस प्रकार की पौध को खोद कर तीन दिनों तक छाया में रख कर पुनरू लगाने से अधिकांश पौधे स्थापित हो जाते हैं।

छह मास से एक वर्ष तक की पौध (मूलवृंत) कलिकायन के लिए उपयुक्त होती हैं। शाँकुर शाखा का चुनाव ऐसे मातृवृक्ष से करना चाहिए जो अधिक फलत देने वाला हो तथा कीड़ों एवं व्याधियों के प्रकोप से मुक्त हो। उत्तर भारतीय दशाओं में पैबंदी चश्मा तथा विरूपित छल्ला विधि से मई से सितम्बर माह तक चश्मा करने से 60 से 90 प्रतिशत तक सफलता प्राप्त होती है, जबकि दक्षिण भारतीय दशाओं में ग्रीन हाउस एवं नेट हाउस की सहायता से आँवले का प्रवर्धन साल के आठ से दस माह तक किया जा रहा है। कलिकायन के अतिरिक्त आँवला का प्रवर्धन विनियर कलम, कोमल शाखा बंधन के द्वारा 70 प्रतिशत सफलता के साथ किया जा सकता है, लेकिन कलिकायन की सफलता एवं क्षमता को देखते हुए आँवला प्रवर्धन हेतु यह विधि सर्वोत्तम पायी गयी है।

खाद और उर्वरक
गोबर की खाद की सम्पूर्ण मात्रा, नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा जनवरी-फरवरी माह में फूल आने से पहले डाल देनी चाहिए। शेष नत्रजन की आधी मात्रा जुलाई-अगस्त के महीने में डालनी चाहिए। गोबर की खाद एवं अन्य खादों के मिश्रण को पेड़ की छाया के बराबर बने थालों में फैला कर हल्की गुड़ाई एवं सिंचाई कर देनी चाहिए। क्षारीय मृदाओं में उपरोक्त खाद के मिश्रण के अतिरिक्त 100 ग्राम बोरेक्स (सुहागा), जिंक सल्फेट एवं कॉपर सल्फेट (100 ग्राम प्रत्येक का) प्रति पेड़ पौधों की आयु एवं ओज का ध्यान में रखते हुए डालना चाहिए। इसके अलावा सूक्ष्म तत्वों, जैसे बोरान, जिंक, कॉपर (0.4 प्रतिशत) का पर्णीय छिड़काव बुझे हुए चुने के साथ मिला कर करने से फलों का गिरना कम हो जाता है तथा फलों की गुणवत्ता में सुधार होता है।

आँवले के बाग स्थापन में जैविक पदार्थो द्वारा अवरोध पर्त् करने से अच्छे परिणाम मिले हैं। विभिन्न प्रकार के पदार्थो, जैसे पुवाल, केले के पत्ते, ईख की पत्ती एवं गोबर की खाद से मल्विंग करने पर अच्छी सफलता प्राप्त हुई है। जैविक पदार्थ से कई वर्षो तक मल्चिंग करने से खरपतवार नियंत्रित रहते है, जड़ों का तापमान नियंत्रित रहता है, जैविक पदार्थ सड़ कर भूमि की उर्वराशक्ति तथा जल धारण करने की क्षमता को बढ़ाते हैं। इसके अतिरिक्त ये हानिकारक लवणों को जमीन की सतह पर आने से भी रोकता है। इस प्रकार, यह ऊसर भूमि में हानिकारक लवणों के प्रभाव को कम करते हैं, साथ ही मल्चिंग करने से पौधों की जड़ों के पास केंचुओं एवं लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि भी होती है।

पुष्पन
आँवले में फूल बसंत ऋतु में आते हैं। फूलों का खिलना मार्च के अंतिम सप्ताह से शुरू होता है तथा तीन सप्ताह तक चलता है। बीजू किस्मों में पुष्पन की क्रिया पहले प्रारम्भ होती है, जबकि व्यवसायिक किस्मों में पुष्पन बाद में होता हैं। दक्षिण भारत में पुष्पन साल में दो बार होता है। पहली बार फरवरी-मार्च में और दूसरी बार जून-जुलाई में। पहली बार वाले पुष्प अच्छी फलत देते हैं परन्तु दूसरी बार के पुष्प कम फलत देते हैं।

परिपक्वता
आँवला के फलों की परिपक्वता कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे, स्थिति, जलवायु, मृदा प्रकार, नमी, इत्यादि। आँवले में परिपक्वता निर्धारण का सबसे अच्छा तरीका फलों के रंग में परिवर्तन (हरे से चमकदार सफेद हरा या पीला हरा) एवं बीज के रंग में परिवर्तन (हल्के पीले सफेद से भूरे रंग में) को देखकर किया जा सकता है।

तुड़ाई
आँवले के फलों की तुड़ाई हाथ से करते हैं परन्तु यह क्रिया बड़े वृक्षों में सम्भव न होने के कारण, बांस से बनी सीढि़यों पर चढ़ कर तुड़ाई की जाती है। फलों को प्रातरू काल में तोड़ना चाहिए एवं प्लास्टिक के क्रेट्स में रखना चाहिए। फलों को तोड़ते समय जमीन में नहीं गिरने देना चाहिए अन्यथा चोटिल फल पैकिंग एवं भंडारण के समय सड़ कर अन्य फलों को भी नुकसान पहुँचाते हैं।

फलत
आँवले का कलमी पौधा रोपण से तीसरे साल तथा बीजू पौधा 6-8 साल बाद फलत देना प्रारम्भ कर देता है। कलमी पौधा 10-12 साल बाद पूर्ण फलत देने लगता है तथा अच्छे प्रकार से रख-रखाव के द्वारा 60-75 साल तक फलत देता रहता है। आँवले की विभिन्न किस्मों की उपज में भिन्नता पायी जात है। बनारसी कम फलत देने वाली, फ्रांसिस एवं नरेन्द्र आँवला-6 औसत फलत देने वाली, कंचन एवं नरेन्द्र आँवला-7 अत्यधिक फलत देने वाली किस्में हैं। आँवले की फलत को कई कारक प्रभावित करते है जैसे किस्म की आंतरिक क्षमता, वातावरणीय कारक एवं प्रबंधन तकनीकें इत्यादि। एक पूर्ण विकसित आँवले का वृक्ष एक से तीन क्विंटल फल देता है। इस प्रकार से 15-20 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।

श्रेणीकरण
आँवले के फलों को तीन श्रेणियों में उनके आकार, भार, रंग एवं पकने के समय के आधार पर बांटा जा सकता है। बड़े आकार के फल (व्यास 4 सें.मी. से अधिक) को मुरब्बा बनाने हेतु प्रयोग किया जाता है। मध्यम आकार के फलों को अन्य परिरक्षित पदार्थ बनाने में एवं छोटे आकार के फलों को औषधीय उत्पाद जैसे च्यवनप्राश, त्रिफला इत्यादि बनाने में प्रयोग किया जाता है। अपरिपक्व, चोटिल एवं व्याधिग्रस्त फलों को फेंक देना चाहिए।
भंडारण
आँवले के भंडारण का मुख्य उद्देश्य संसाधन हेतु उसकी उपलब्धता को बढ़ाना है। किस्मों के अनुसार परिपक्व फलों को 6 से 9 दिनों तक कम ऊर्जा वाले शीतकक्षों में रख कर बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त आँवले के फलों को शीत तापक्रम (5-70 सेंटीग्रेट) पर दो माह तक रखा जा सकता है। फलों को 15 प्रतिशत नमक के घोल में रख कर 75 दिनों तक सामान्य तापक्रम पर भंडारित किया जा सकता है।

आय
आँवले का विक्रय मूल्य 400 रूपये से लेकर 4000 रूपये प्रति कुंतल तक रहता है। अतरू प्रति हेक्टेयर क्षेत्र से 40,000 रूपये से लेकर दो लाख रूपये प्राप्त किये जा सकते हैं।

आँवले के रोग
आँवले की खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में की जाती है। यह एक ऐसी फसल है। जिसमें रोगों का प्रकोप कम होता है किन्तु आँवले के कुछ रोग महत्वपूर्ण है तथा आँवले की फसल के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। आँवले के कुछ रोगों का विवरण निम्नवत है:
रस्ट (रेवेलिया इम्बलिकी)
आँवले का रस्ट रोग आँवले की एक महत्वपूर्ण समस्या है। फलों पर आरंभ में काले छोटे उभार दिखाई देते हैं जो बाद में एक दूसरे से मिल कर घेरे के रूप में विकसित हो जाते हैं। धब्बे एक दूसरे से जुड़ कर फल का काफी क्षेत्र घेर लेते हैं। इन धब्बों के कारण फल खराब दिखते हैं तथा बाजार में इनकी कीमत नहीं मिलता है। घुलनशील गंधक (0.4 प्रतिशत) या क्लोरथैलोनिल (0.2 प्रतिशत) का तीन छिड़काव एक माह के अंतराल पर जुलाई से करने पर रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
उकठा (विल्ट)
इसके कारण आँवले के पौधों में छालों का फटना, पत्तियों का झड़ा तथा पौधों के सूखने की समस्या देखी गई है। पेड़ के सूखने की समस्या ऐसे तो मुख्य रूप से पाले के कारण भी हो सकती है किन्तु ऐसे पौधों में युजेरियम जाति की फफूंद भी संबंधित पाई गई है। नियंत्रण के लिए पाले के समय छोटे पौधों को ढकना चाहिए तथा सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे पाले का असर न हो। थालों में घास-फूस या काली पालीथीन बिछाने तथा तने पर गाय के गोबर का लेप लगाने से रोग में कमी पाई गई। चूँकि पाले से रोग बढ़ता है, अतरू पौधों को पाले से बचाने की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए।
काली फफूंद
ऐसे आँवले के पौधों जिनमें स्केल कीट का प्रकोप होता है उनमें काली फफूंद का भी प्रकोप होता है। आँवले की काली फफूंदी रोग में कई प्रकार की फफूंदी देखी गई है। काली फफूंद रोग (सूटी मोल्ड) में पत्तियों टहनियों तथा फूलों पर मखमली काली फफूंदी विकसित होती है। जो कीट द्वारा चिपचिपे पदार्थ के ऊपर विकसित होती है। यह फफूंदी सतह तक ही सीमित रहती है तथा पत्तियों टहनियों, फूल आदि में अंदर इसका प्रकोप नहीं होता है। काली फफूंद के प्रकोप को 2 प्रतिशत स्टार्च के छिड़काव के द्वारा रोका जा सकता है। यदि प्रकोप अधिक हो तो स्टार्च में 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस तथा 0.2 प्रतिशत घुलनशील गंधक मिला कर छिड़काव करना चाहिए।
एन्थ्रेकनोज (कालिटोट्राइकम ग्लीयोस्पोराइडिस)
एन्थ्रेकनोज, आँवले की पत्तियों व फलों पर अगस्त-सितम्बर माह में दिखाई देता है। पत्तियों पर पहले छोटे, गोल, भूरे, पीले किनारों वाली धब्बे नजर आते हैं। धब्बों का मध्य भाग हल्का भूरा तथा काले पिन के सिरे से उभार सहित दिखाई देता है। धब्बे विभिन्न आकार एवं साइज के बनते हैं। अधिक नमी होने पर धब्बे से बीजाणु अधिक मात्रा में निकलते हैं, साथ ही फल सिकुड़े से नजर आते हैं और फिर सड़ जाते हैं।

मृदु सड़न (फोमोप्सिस फाइलेन्थाई)
आँवले की मृदु सड़न दिसम्बर से फरवरी के मध्य अधिक देखी जा सकती है। धुएं से भूरे काले, गोल धब्बे फलों पर 2-3 दिनों में विकसित होते हैं। संक्रमित भाग पर जलसिक्त भूरे रंग का धब्बा बनाता है, जो पूरे फल को करीब 8 दिनों में आच्छादित कर फल के आकार को विकृत कर देता है। ऐसे तो रोग छोटे तथा परिपक्व फल, दोनों को प्रभावित करता है, किन्तु परिपक्व फलों में इसका प्रकोप अधिक होता है। इस रोग के बढ़ने के लिए फलों में इसका प्रकोप अधिक होता है। इस रोग के बढ़ने के लिए फलों में चोट आवश्यक होती है। तुड़ाई उपरांत फलों को डाइफोलेटान (0.15 प्रतिशत), डाइथेन एम-45 या बैवेस्टीन (0.1 प्रतिशत) से उपचारित करके भंडारित करने से रोग की रोक थाम की जा सकती है।

फल सड़न (पेस्टेलोशिया क्रुएंटा)
यह रोग नवम्बर माह में आमतौर पर देखा जाता है। इस रोग में धब्बे अधिकतर अनियमिताकार तथा भूरे रंग के होते हैं। आरम्भ में भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जो धीरे-धीरे बढ़ते हैं। बाद में ये धब्बे सूखे भूरे हो जाते है जिनके किनारे हल्के भूरे होते हैं तथा ग्रसित भाग पर रुई की तरह सफेद फफूंद दिखाई देती है। संक्रामित फल का अंदर का हिस्सा सूखा, गहरा भूरा नजर आता है।
फल सड़न (अल्टरनेरिया अल्टरनेटा)
गिरे हुए फलों में अल्टरनेरिया अल्टरनेटा द्वारा सड़न पैदा होती है। फल सड़न को रोकने के सामान्य तरीकों में फल तोड़ने के 15 दिनों पूर्व 0.1 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करना चाहिए। फल तुड़ाई पूरी सावधानी से करनी चाहिए, जिससे फलों में किसी प्रकार का चोट न लगे। फलों को स्वच्छ पात्रों में भंडारित करना चाहिए। फलों के भंडारण तथा परिवहन के समय पूर्ण स्वच्छता बरतनी चाहिए। भंडारण स्थान स्वच्छ होना चाहिए तथा उसे ओजोन से उपचारित किया जाना चाहिए। फलों का उपचार बोरेक्स या नमक से करना चाहिए जिससे रोग का प्रकोप न हो।

आँवले के विकार
आंतरिक सड़न
आंतरिक सड़न आँवले के फलों में देखी गयी है। जब अंतरू उतक कड़ी लगती है तब यह सबसे पहले अंदर की ओर से भूरा होना आरम्भ करती है। बाद में मध्य उत्तक तथा अंत में बाहरी भूरी काली नजर आती है। आमतौर पर सितम्बर के दूसरे तथा तीसरे सप्ताह में यह दिखाई देती है। रोग के बढ़ने पर ये भाग कार्कनुमा कड़ा हो जाता है तथा रिक्त स्थान बनते हैं, जो गोंद से भरे होते हैं। चकइया, एन.ए.-6 तथा एन.ए.-7 में यह रोग नहीं देखा गया है। अतरू इन प्रजातियों को लगाने हेतु बढ़ावा देना चाहिए। प्रबंधन के लिए जिंक सल्फेट (0.4%) कॉपर सल्फेट (0.4%) तथा बोरेक्स (0.4%) का छिड़काव सितम्बर-अक्टूबर माह में करना लाभप्रद होता है।

आँवले के नाशीकीट
छालभक्षी कीट (इन्डरबेला टेट्राओनिस)
यह कीट पूरे देश में पाया जाता है और बहुत से फल, फूलों वाले एवं वन वृक्षों को क्षति पहुँचाता है। आँवले के बागों में यह सामान्यतरू पाया जाता है। साधारणतरू जिन बागों की ठीक से देख-भाल नहीं होती, उनमें इस कीट का प्रकोप अधिक होता है। कीट का प्रकोप अप्रैल महीने से माथ निकलने के साथ प्रारम्भ होता है। इसके लार्वे प्ररोहों, शाखाओं एवं मुख्य तने की छाल को खाते एवं उनमें छेद करते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पेड़ों की वृद्धि रुक जाती है एवं पुष्पन और फलत प्रभावित होती है। प्रबंधन के लिए

  • बाग को साफ-सुथरा और स्वस्थ रखना चाहिए।
  • समय-समय पर बागों में जाकर नये सूखे प्ररोहों की जाँच करनी चाहिए ताकि समय रहते ही इस कीट का पता लग जाए।
  • प्रकोप के शुरुआत में ही, आवासीय छिद्रों को साफ कर, उनमें तार डाल कर लार्वे को नष्ट कर देना चाहिए।
  • अधिक प्रकोप होने पर सुरंगों एवं आवासीय छिद्रों को साफ कर रुई के फाये को 0.025 प्रतिशत डाइक्लोरवाँल के घोल में भिगो कर छिद्रों में रख कर, गीली मिट्टी से बंद कर देना चाहिए।
  • इसके लार्वे बेवेरिया बैसिआना नामक फफूंद से प्राकृतिक रूप से ग्रासित होते हैं। इसका प्रयोग जैविक नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।

अनार तितली (ड्यूडोरिक्स (वाइरेकोला) आइसोक्रेट्स)
यह अनार का प्रमुख कीट है, किन्तु आँवले और अन्य दूसरे फलों को भी हानि पहुँचाता है। इस कीट का प्रकोप सितम्बर-अक्टूबर माह में फलों के मौसम में होता है। बैंगनी-भूरी सी मादा तितली एक-एक करके छोटे, चमकदार, सफेद अंडे फलों पर देती है। इनमें से लार्वे निकल कर फल को छेद कर अंदर चले जाते हैं एवं गुठली वाले भाग को खाकर, खोखला कर देते हैं। यह फल के अंदर ही या बाहर आ कर प्यूपा में परिवर्तित हो जाता है। कैटरपिलर के अंदर घसने एवं बाहर आने वाले छिद्रों के द्वारा अन्य विभिन्न जीवाणुओं का भी फल पर प्रकोप हो जाता है। आमतौर पर कीट द्वारा ग्रसित फल कैटरपिलर के अंदर जाने वाले छिद्रों के पास विकृत हो जाते है, और ऐसे फल कमजोर होकर सड़ जाते हैं, तथा पकने से पहले ही गिर जाते है। ग्रसित फलों में छेद से बुरादा निकलता हुआ भी दिखाई पड़ता है। अधिक प्रकोप होने पर फलों को काफी हानि हो सकती है। प्रबंधन के लिए

  • आँवला के बाग के साथ, अनार का बाग नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि यह इन फलों का मुख्य नाशीकीट है।
  • ग्रसित फलों तथा जमीन पर गिरे हुए सभी फलों को एकत्र कर, कीड़ों सहित नष्ट कर देना चाहिए ताकि इनके प्रकोप दुबारा होने से रोका जा सके।
  • इस कीट की रोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत कार्बेरिल या 0.04 प्रतिशत मोनोक्रोटाफॉस कीटनाशी का छिड़काव फल के मटर के दाने के बराबर होने की अवस्था में करना चाहिए। दूसरा छिड़काव प्रकोप की तीव्रता पर निर्भर करता है, जिसे 15 दिनों के अंतराल पर किया जा सकता है।

मिली बग या चूर्णी बग (नाइलीकॉकस वाइरीडिस)
इनका प्रकोप मार्च से जुलाई के मध्य होता है और अप्रैल-मई में इनकी संख्या अधिक होती है। निम्फ पत्तियों, प्ररोहों एवं पुष्प मंजरियों पर स्थापित हो जाते हैं और इनका रस चूसते है। निम्फ 15-20 दिनों में वयस्क हो जाते हैं। अधिक रस चूस जाने के कारण पत्तियाँ और फूल सूख-सूख कर गिर जाते हैं। इसका प्रभाव पेड़ की बढ़वार, पुष्पन और फलत पर पड़ता है। ग्रसित नये प्ररोह झुके, मुड़े हुए से प्रतीत होते हैं एवं पत्तियाँ पीली पद जाती है। अधिक प्रकोप होने पर टहनियाँ पत्ती रहित होकर सूखने लगती हैं। इसके द्वारा काफी मात्रा में विसर्जित मधु भी देखा जा सकता है। इससे फूल सूख कर गिर जाते हैं। नियंत्रण के लिए

  • बाग को साफ-सुथरा और स्वस्थ रखना चाहिए।
  • प्रभावित पत्तियों एवं प्ररोहों को शुरुआत में ही काट कर कीड़ों सहित नष्ट कर देना चाहिए जिससे वे आगे और फैलने न पायें।
  • अधिक प्रकोप होने पर 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस या 0.05 प्रतिशत क्वीनलफॉस का छिड़काव करना चाहिए।

 

संगीता, हेमंत पाणिग्रही एवं युगल किशोर लोधी

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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