उद्यानिकी

भिन्डी उत्पादन की उन्नत तकनीक

युगल किशोर लोधी, जितेन्द्र त्रिवेदी, प्रवीण शर्मा, अरविंद कुमार जंघेल एवं संगीता

परिचय
सब्जियों में भिन्डी (एबोलमास्कस एस्कुलेन्टसद्) का प्रमुख स्थान है। इसे लेडीज फिंगर या ओकरा के नाम से भी जानते हैं। यह एक वर्षाकालीन फसल है, हालाकि इसकी खेती ग्रीष्म तथा खरीफ दोनो मौसमो में की जा सकती हैं। भिंडी की अगेती फसल लगाकर किसान अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। भिन्डी का जन्म स्थान अफ्रीका माना जाता है। इसका दूसरा जन्म स्थान भारत भी माना जाता है। भिन्डी के ताजे फलों की सब्जी बनाई जाती है। कुछ लोग इसे काटकर सूखा लेते है और बाद में इसकी सब्जी बनाकर खाते है। भिन्डी स्वास्थ्य व पोषक दोनों में उच्च है। यह विटामिन, फाइबर, एंटीऑक्सिडेंट एवं खनिज का अच्छा स्रोत है। भिन्डी में कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, आयरन जैसे मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाया जाते हैं। भिन्डी में विटामिन ए, बी, सी बहुत ही प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह प्रोटीन और खनिज लवणों का एक अच्छा स्रोत है। भिंडी के फल में आयोडीन की मात्रा अधिक होती है। भिन्डी में फ्रक्टोस होने की वजह से यह क्षारीय होती है और जिलेटिन की वजह से एसीडिटी व अपच के शिकार लोगों को ठंडक पहुंचाती है।

भिन्डी की खेती के लिए आवश्यकताए ‒
जलवायु
भिंडी के लिये दीर्घ अवधि का गर्म व नम वातावरण श्रेष्ठ माना जाता है। बीज उगने के लिये 27-30 डिग्री सेग्रे तापमान उपयुक्त होता है तथा 17 डिग्री सें.ग्रे से कम पर बीज अंकुरित नहीं होता। यह फसल ग्रीष्म तथा खरीफ, दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है।

भूमि
भिन्डी विभिन्न प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है, परंतु अधिक उत्पादन के लिए जीवाश्म युक्त अधिक जल धारण क्षमता वाली दोमट मृदा अधिक उपयुक्त होती है। दो बार गहरी जुताई करने के बाद दो या तीन बार बखर से भूमि को भुरभुरी एवं आवश्यकतानुसार पाटा चलाकर समतल बना लेना चाहिए।

उन्नत प्रजातियॉ
1. पंजाब पदमिनी ‒ यह किस्म पीला मोजेक वायरस रोग अवरोधी है। यह किस्म पूसा सावनी की अपेक्षा 40 प्रतिशत अधिक पैदावार देती है। फल जल्दी बढने वाली, गहरे हरे रंग के लम्बे लंबे, पतले, पॉच धारियों वाली, कोमल होते है। पूसा सावनी के अपेक्षा, फल छेदक कीट अवरोधी किस्म है।
2. परभनी क्र्र्र्रांति ‒ यह किस्म पीतशिरा रोग निरोधक है। इसके फल हरे रंग के होते है। पैदावार पूसा सावनी की अपेक्षा 25 प्रतिशत अधिक होती है।
3. पी‐7 ‒ यह किस्म पीतशिरा रोग निरोधक है, इसके फल 15‐16 सेमी. लंबे, हरे पॉच धारियों युक्त आकर्षक होते है। औसतन उपज 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
4. अर्का अनामिका ‒ इस किस्म के पौधे लम्बे 100 सेमी. सीधे एवं शाखायुक्त होते है। फल कोमल,लम्बे रोग विहीन गहरे हरे रंग के होते है। डंढल लम्बे रोग रोग विहीन गहरे हरे रंग के होते है। डंढल लम्बा होने से फल सफलतापूर्वक तोडे जा सकते है।यह पीतशीरा अवरोधी किस्म है।
5. अर्का अभय‒ पौधे लम्बे 170 सेमी. सीधे होते है। दूसरी बार फल आने पर अच्छी शाखाएं निकलती है। फल मध्यम लम्बे 18 सेमी. मोटे 6‐8 सेमी. 5‐6 धारियों वाले होते है। फल रोयें रहित, गहरे हरे, कोमल होते है, यह पीतशीरा रोग अवरोधी हैं। उपज 170‐200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
6. कांशी प्रगति ‒ पीतशीरा विषाणु रोग अवरोधी किस्म है। पौधे की उंचाई बरसात में 175 सेमी. एवं ग्रीष्म ऋतु में 130 सेमी. होती है। गांठे पौधे मे नजदीक मे होती है। प्रथम फूल औसतन 38 दिनों मे आते है। गर्मियों में औसतन उपज 135 क्विं/हें. होती है।
7. काशी विभूति ‒ यह किस्म भी पीतशीरा विषाणु रोग अवरोधी है। इसके पौधे 60 से 70 सेमी. के होते हैं। यह बौने किस्म है। बरसात में 150 क्विंटल एवं गर्मियों में 120 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पैदावार होती है एवं बरसात में 180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
8. पुसा ए 4 ‒ यह भिंडी की एक उन्नत किस्म है। यह प्रजाति भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,नई दिल्ली द्वारा निकाली गई है। यह एफिड तथा जैसिड के प्रति सहनशील है। यह पीतरोग यैलो वेन मोजैक विषाणु रोधी है। फल मध्यम आकार के गहरे, कम लस वाले, 12-15 सेमी लंबे तथा आकर्षक होते हैं। बोने के लगभग 15 दिन बाद से फल आना शुरू हो जाते है तथा पहली तुड़ाई 45 दिनों बाद शुरु हो जाती है। इसकी औसत पैदावार ग्रीष्म में 10 टन व खरीफ में 15 टन प्रति है।

संकर किस्में
1. वर्षा ‒ यह संकर किस्म जल्दी बढ़ने वाली तथा लगभग 1.8 से 2.0 मीटर लम्बे होते है। पत्तियॉ गहरे कटाव वाली होती है। फल पॉच धारियों वाली, मध्यम आकार के चमकदार हरे रंग के होते हैं। बुआई के 6 सें 8 सप्ताह बाद उपज लगभग 130 से 150 क्विंटल/हे. प्राप्त होती है। यह किस्म पीतशीरा रोग अवरोधी है।
2. विशाल ‒ इस किस्म के पौधे लम्बे होते है। फल मध्यम आकार के पांच धारियों वालें चिकने और हरे रंग के होते है। यह किस्म पीतशीरा रोग अवरोधी है। उपज लगभग 130 संे 150 क्विंटल/हे. प्राप्त होती है।
3. विजय ‒ इस संकर किस्म के पौधे, वर्षा एवं विशाल की अपेक्षा छोटे होते है। इसके फल पतले, धारियों वाले चिकने और हरे रंग के होते है। उपज लगभग 130 संे 150 क्विंटल/हे. प्राप्त होती है। यह किस्म पीतशीरा रोग अवरोधी है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार
ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 12 से 15 किलो तथा वर्षाकालीन फसल के लिए 8 से 10 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बोना चाहिए। अधिक उत्पादन एवं अच्छे अंकुरण के लिए बीज को बुआई के पूर्व 24 घण्टे पानी में भिगोकर रखना चाहिए, फिर छाया मे सूखाने के बाद फूले हुए बीज को 2 से 3 ग्राम थायरम नामक कवकनाशी दवा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुआई करना चाहिए। सिंचित अवस्था में 2.5 से 3 किग्रा तथा असिंचित दशा में 5-7 किग्रा प्रति हेक्टेअर की आवश्यकता होती है। संकर किस्मों के लिए 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर की बीजदर पर्याप्त होती है।

बोने का समय एवं विधि
भिंडी के बीज सीधे खेत में ही बोये जाते हैं। बीज बोने से पहले खेत को तैयार करने के लिये 2-3 बार जुताई करनी चाहिए। वर्षाकालीन भिंडी के लिए कतार से कतार दूरी 40-45 सें.मी. एवं कतारों में पौधे की बीच 25-30 सें.मी. का अंतर रखना उचित रहता है। ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुवाई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 25-30 सें.मी. एवं कतार में पौधे से पौधे के मध्य दूरी 15-20 से.मी. रखनी चाहिए। बीज की 2 से 3 से.मी. गहरी बुवाई करनी चाहिए। बुवाई के पूर्व भिंडी के बीजों को 3 ग्राम मेन्कोजेब कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। पूरे खेत को उचित आकार की पट्टियों में बांट लें जिससे कि सिंचाई करने में सुविधा हो। वर्षा ऋतु में जल भराव से बचाव हेतु उठी हुई क्यारियों में भिण्डी की बुवाई करना उचित रहता है।

खाद एवं उर्वरक
20 से 25 टन अच्छी तरह सडी हुई गोबर की खाद, 80 सें 100 किलो नत्रजन, 60 किलो स्फूर तथा 60 किलो पोटाश प्रति हक्टेयर के हिसाब से देना चाहिए। गोबर की खाद, स्फुर एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा तथा नत्रजन की एक तिहाई मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के समय मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। नत्रजन की एक तिहाई मात्रा बीज बोने के 25 दिन बाद तथा शेष एक तिहाई बुआई के 40 दिन बाद कतारो में देना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण
फसल की प्रारंभिक अवस्था 30 से 45 दिन में फसल को खरपतवारों से अत्यंत संघर्ष करना पडता है। अतः इस अवधि में 2 से 3 बार निंदाई गुडाई करके क्षेत्र को साफ रखना अति लाभकारी होता है। नींदानाशक रसायन लासो 50 ई.सी. को 4 लीटर दवा को बुआई उपरांत तथा बीज अंकुरण के पूर्व 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करने पर 45 दिनों तक खरपतवार नियंत्रित रहता है। इसके बाद तक निंदाई गुडाई करने पर अच्छे परिणाम मिलते है जिससे अधिक उत्पादन होता है।

सिंचाई
ग्रीष्मकालीन फसल में 4 से 5 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए और वर्षा कालीन फसल की आवश्यकतानुसार सिंचाई करना चाहिए।

कीट
1. हरा फुदका (जेसीड)‒ ये कीट पत्तियों का रस चुस कर नुकसान पहुंचाते है जिससे पत्तियां पीली पड कर सिकुड जाती है।
रोकथाम ‒ एमीडाक्लोपिरिड 0.06 प्रतिशत या रोगोर 30 ईसी. 0.06 प्रतिशत या मेटासिस्टॅाक्स 0.02 प्रतिशत का फसल की प्रारंभिक अवस्था से 15 संे 20 दिन के अंतराल में छिडकाव करना चाहिए।

2. तना व फल छेदक ‒ इल्लियां तनों एवं फलों के अंदर घुसकर नुकसान पहुंचाते है जिससे पौधा मुरझाकर सूख जाता है व फलों को छेद कर खराब करती है।
रोकथाम‒ खराब तनों एव फलों को तोडकर नष्ट कर दें। मेटासिस्टॅाक्स 25 र्इ्रसी. 0.05 प्रतिशत या कार्बोरील 0.02 प्रतिशत या फोसेलान 0.07 प्रतिशत दवा का 15 दिन के अंतराल में छिडकाव करना चाहिए।

3. माहू(एफिड) ‒ इनके शीशु एवं वयस्क पत्तियो का रस चूषकर नुकसाान पहुंचातें है।
रोकथाम‒ मेलाथियान 50 ईसी. 750 मिली. दवा या एमीडाक्लोपिरिड 150 मिली. दवा प्रति एकड छिडकाव करना चाहिए।

4. माइट्स ‒ ये पत्तियां की रस चूषती है जिससे पत्तियां सिकुड कर पीली पड़ कर पौधे से झडने लगती है।
रोकथाम‒ मेटासिस्टॅाक्स 25 र्इ्रसी या रोगर 30 ईसी. का 1000 मिली. दवा को 500 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें या वेटेवल सल्फर 20 किलो प्रति हेक्टेयर छिडकाव करना चाहिए।

बीमारियां
1. आद्रगलन ‒ पौधे की प्रारंभिक अवस्था में सतह के उपर तनों में सड़न गलन होने लगती हैं, जिससे पौधे मर जाते है।
रोकथाम ‒
1. बुआई के पूर्व बीजोपचार जरूर करें।
2. खेत में उचित जल निकास का प्रबंध करें।

2. पीतशीरा रोग‒ यह विषाणु जनक रोग है जो कि सफेद मक्खी से फैलता है। इसके कारण पौधे की पत्तियां एवं तने पीले पड जाते है और पौधो की बढवार रूक जाती है।
रोकथाम‒
1. बीमारी फैलाने वाले कीट जैसे सफेद मक्खी एवं लीफ हाफर की रोकथाम करें।
2. रोग ग्रस्त पौधे उखाड कर नष्ट करें।
3. रोग अवरोधक किस्म जैसे पंजाब पदमिनी, परभनी क्रांति एवं पी 7 लगाएं।

3. पावडरी मिल्ड्यू ‒ पत्तियो पर सफेद पाउडर से जम जता है धीरे धीरे पूरे पौधे में फैल जाता है।
रोकथाम
1. सल्फर डस्ट का 12 से 15 किलो / हे. के हिसाब से छिडकाव करे।
2. एक किलो बॅाविस्टीन दवा को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हे. के हिसाब से छिडकाव करे।
3. केराथेन 0.05 प्रतिशत का छिडकाव करें।

पैदावार ‒ ग्रीष्मकालीन भिन्डी का औसत पैदावार 80 से 100 तथा वर्षाकालीन में 120 से 150 क्विंटल उपज मिल जाती है।

संकर भिन्डी उत्पादन हेतु विशेष ध्यान देने योग्य बातें
बीज की मात्रा‒ 4 से 5 किलो प्रति हेक्टेयर बुआई करें।
उर्वरक‒ 150 किलो नत्रजन, 120 किलो स्फूर तथा 75 किलो पोटाश प्रति हक्टेयर के हिसाब से देना चाहिए।
पौध अंतराल
कतार से कतार 60 सेमी. एवं पौध से पौध कतार में 30 सेमी. की दूरी रखते हुए बुआई करें।
पौध संरक्षण
बुआई के पहले क्यारियों में फ्यूराडान 20 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें।
अंकुरण के 1 सप्ताह बाद मेलाथियान या नुवाक्र्रान और डायथेन एम 45 का छिडकाव 7 दिन के अंतराल पर दो बार करें।
संकर भिन्डी में पीतशीरा रोग को प्रतिकार करने की क्षमता अधिक होती है, किन्तु अगर इससे प्रभावित पौधे दिखाई दें, तो तुरंत उखाड कर फेंक दें।

युगल किशोर लोधी, जितेन्द्र त्रिवेदी, प्रवीण शर्मा, अरविंद कुमार जंघेल एवं संगीता
सब्जी विज्ञान विभाग,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर ;छ.ग.द्ध

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