वैज्ञानिक विधि से रबी सब्जियों की पौधशाला तैयार करें और अधिक लाभ कमाए
विवेक कुमार कुर्रे, डॉ जीतेन्द्र सिंह, डॉ राजश्री गायन


सब्जियों की स्वस्थ एवं निरोगी पोेैध तैयार करना एक अत्यन्त ही आवश्यक एवं सूझ बूझ वाला कार्य हैै, लेकिन किसान भाई इस पर ध्यान कम देते हैं। पौध तैयार करना यो तो बहुत ही आसान कार्य लगता है वास्तव में यह बहुत ही कठिन कार्य है। इसका आभास हमें तब होता है जब पौधशाला में मंहगें बीजों की बुवाई के बाद जब पौध गलने लगती है या मरने लगती है।
इस समय भारत वर्ष के 113.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 60 प्रकार की सब्जियों की खेती की जाती है जिसमें टमाटर, बैगन, मिर्च, शिमलामिर्च, पत्तागोभी, फूलगोभी, गांठगोभी, चाइनीज गोभी, ब्रुसेल्स स्प्राउट, ब्रोकली, सलाद पत्ता, सेलरी, पार्सले, प्याज आदि कि सर्वप्रथम पौध तैयार करते हैं। इसके बाद इसका रोपाई मुख्य खेत में किया जाता है। स्वस्थ एवं निरोगी पोेैध तैयार करने के लिए हमंे बीज का चुनाव, स्थान का चुनाव, भूमि शोधन, पलवार, बीज शोधन, सिंचाई आदि सभी आवश्यक बिन्दुओ पर गम्भीरता से विचार के बाद ही बीजो की बुआई करनी चाहिए तभी हमें अच्छी पौध प्राप्त होगी।

सब्जियों कि पौध तैयार करने से लाभ
- सब्जियों कि छोटे बीजो कि बुआई लम्बे क्षेत्रों में करने पर देखभाल संभव नही है जो छोटे स्थानों पर आसानी से किया जा सकता है।
- पौधशाला में पौध तैयार करना आसान है इससे मेहनत, लागत, व्यय आदि की बचत होती है।
- खेत की तैयारी हेतु पर्याप्त समय मिल जाता है।
- उपयुक्त वातावरण प्रदान कर प्रतिकुल मौसम में पौध तैयार की जा सकती है।
- पौध को बेच कर धन अर्जित किया जा सकता है।
(1) पौघशाला हेतु स्थान का चुनावः
- पौधशाला के चयनित स्थान कि मिट्टी हल्की हो जैसे बलुई दोमट अथवा दोमट जिसका पी.एच. मान 7 के आसपास होना चाहिए जिससे बीज का जमाव सुचारू रूप से हो सके।
- पौधशाला में उचित सिंचाई कि व्यवस्था होनी चाहिए।
- पौधशाला का निर्माण जिस स्थान पर किया जा रहा है वहां सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता दिन भर बनी रहे इसका ध्यान देनाा चाहिए।
- पौधशाला को आस-पास की जमीन से थोडा़ ऊॅंचा बनाना चाहिए ताकि जल निकास या जल भराव की समस्या से बचा जा सके।
- पौधशाला का स्थान इस जगह सुनिश्चित करना चाहिए जहां देखरेख व निरीक्षण में आसानी हो।
(2) पौधशाला की तैयारीः
- पौधशाला बनाने वाली जगह की एक बार गहरी जुताई अवश्य करें।
- पौधशाला वाले स्थल से सभी खरपतवारों को निकाल दें।
- क्यारी में प्रति वर्ग मीटर की दर से 2 किलोग्राम गोबर कि सड़ी खाद या कम्पोस्ट या 500 ग्राम कंेचुएं की खाद मिलायें।
- पौध की मिट्टी सख्त होने कि दशा में प्रतिवर्ग की दर से 2-3 किलोग्राम रेत अवश्य मिलायें इससे बीज के जमाव में सुगमता होती है।
(3) भूमि शोधनः हानिकारक जीवाणुओं से बचाव के लिए भूमि शोधन अत्यन्त आवश्यक है। यह कई प्रकार से किया जाता है-
(अ) मृदा सोलेराइजेशन (मृदा सौर्यीकरण):
पौधशाला की मृदा को सूर्य के प्रकाश में शोधन करने की प्रक्रिया को मृदा सोलेराइजेशन कहते हैं। इसके लिए सर्वप्रथम पौधशाला वाली जगह में क्यारी बना कर जुताई करें तथा सिंचाई कर मिट्टी को नम कर ले। अब क्यारी को 200 गेज वाली पारदर्शी पॉलीथीन की चादर से इस प्रकार ढकते हैं कि अन्दर की हवा बाहर न निकले। यह कार्य ग्रीष्मकाल में करते हैं। ऐसा करने से क्यारी का तापमान 48-52 डिग्री से.ग्रे. तक पहुॅंच जाता है जिससे हानिकारक कीट जीवाणुओं का नाश होता है। 2-3 सप्ताह बाद इन चादरों को हटाकर बीज की बुवाई करते हैं। यदि मृदा सोलेराइजेशन के समय पॉलीथीन ढकने से पहले मिट्टी में सरसों कुल के पौधे को काट कर मिला दिया जाये तो फ्यूजेरियम, पीथियम तथा स्कलेरोसियम रोग का प्रभाव कम होता है। साथ ही मृदा में उपस्थित फॉस्फोरस, पोटाश व अन्य सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता पौधे हेतु बढ़ जाती है।
(ब) जैविक विधिः
पौधशाला में डैम्पिंग ऑफ बीमारी से बचाव के लिए यदि मृदा सोलेराइजेशन के बाद ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियॉं, सुडोमोनास तथा एस्परजिलस नाइजर आदि प्रयोग भूमि शोधन में करें तो फायदा प्राप्त होता है लेकिन इनके प्रयोग में कुछ सावधनियॉं बरतनी पड़ती हैः-
- पौध में कार्बनिक खाद की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए ताकि बढ़वार (जैव पदार्थ) अधिक हो सके।
- जिस भी जैविक पदार्थ का उपयोग करने से पहले सुनिश्चित करें कि इसमें पर्याप्त नमी हो।
- जैव पदार्थों को मिलाते समय यह ध्यान देना चाहिए कि मृदा में पर्याप्त नमी हो।
- जैव पदार्थों के प्रयोग के बाद पौधशाला को वर्षा व धूप से बचाना चाहिए।
- इन पदार्थों का प्रयोग 10-25 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से करना चाहिए।
(स) रासायनिक विधिः
यदि पौधशाला की उपरोक्त विधियों से शोधन नहीे किया गया है तो कीट नियंत्रण हेतु फ्यूराडान या क्लोरोपायरिफास दवा 5 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से पौधशाला में मिलाना चाहिए साथ ही फफंूद जनित रोगों से बचाने हेतु कैप्टान या थीरम 5 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से पौधशाला में मिलायें।
(4) बीज शोधनः
बीज शोधन कैप्टान या थीरम से 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करें। मिर्च व बैंगन के बीज का शोधन बावस्टिन 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से करना लाभदायक है।सब्जियों के बीज जिनके छिल्के कठोर हो जैसे टिण्डा, करेला, तरबूज आदि को कैप्टान के 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में भिगोकर बुवाई करें। भिगोने की अवधि करेले में 24-36 घण्टे, चिचिण्डा, तरबूज व टिण्डा में 10-12 घण्टे तक रखते हैं। बीज का शोधन ट्राइकोडरमा से भी कर सकते हैं। इसके लिए 6-10 ग्राम जैव पदार्थ बीज में इस प्रकार मिलावें कि यह बीज पर चिपक जाये इसके उपरान्त छाया में सुखा लें फिर बुवाई करें।
(5) क्यारियॉं बनानाः
पौधशाला में क्यारियॉं मौसम के अनुसार अलग-अलग प्रकार से बनानी चाहिए। वर्षाकाल में क्यारियॉं जमीन से 15-20 से.मी. ऊपर रखनी चाहिए जबकि रबी मौसम में पौध समतल क्यारियों में उगा सकते हैं। क्यारियों की चौड़ाई 1 मीटर और लम्बाई आवश्यकतानुसार 3-5 मीटर रखते हैं।
(6) बीज की मात्रा व क्षेत्र की आवश्यकताः बीज की मात्रा उनकी आकार, उनकी गुणवत्ता, जमाव की क्षमता तथा बीज बोने के समय पर निर्भर करती है जो निम्नवत् हैः-
| क्र. | सब्जी का नाम | बीज की मात्रा (ग्राम/हे.) | क्षेत्र की आवश्यकता (वर्ग मी.) |
| 1 | टमाटर (हाइब्रिड) | 300 | 75-100 |
| 2 | टमाटर (मुक्त परागित) | 500-700 | 100-125 |
| 3 | बैंगन | 400-700 | 100-125 |
| 4 | मिर्च | 500-600 | 100-150 |
| 5 | शिमला मिर्च | 500-1000 | 100-150 |
| 6 | फूलगोभी (अगेती) | 700-900 | 100-150 |
| 7 | फूलगोभी (मध्यम) | 400-500 | 100-150 |
| 8 | पत्तागोभी | 400-800 | 100-150 |
| 9 | गांठगोभी | 750-1000 | 150-200 |
| 10 | प्याज | 8000-10000 | 400-500 |
(7) पौध कि आवश्यकता प्रति हेक्टेयरः प्रति हेक्टेयर पौध की संख्या उनकी बुआई की दूरी पर निभर््ार होती है। निम्न सारणी में रोपाई दूरी के आधार पौध की संख्या निश्चित की गयी हैः-
| क्र. | सब्जी का नाम | रोपाई की दुरी (से.मी.) | पौध की आवश्यकता (प्रति हे.) |
| 1 | टमाटर (डिटरमिनेट) | 60 × 45 | 33333 |
| 2 | टमाटर (इनडिटरमिनेट) | 90 × 45 | 22222 |
| 3 | बैंगन | 60 × 45 | 33333 |
| 4 | मिर्च | 90 × 60 | 16667 |
| 5 | शिमला मिर्च | 45 × 45 | 45000 |
| 6 | फूलगोभी (अगेती) | 60 × 45 | 33333 |
| 7 | फूलगोभी (मध्यम) | 60 × 60 | 25000 |
| 8 | पत्तागोभी | 45 × 45 | 45000 |
| 9 | गांठ गोभी | 30 × 25 | 120000 |
| 10 | चीनी पत्ता गोभी | 45 × 30 | 66669 |
| 11 | प्याज | 15 × 10 | 600000 |
(8) बीज की बुवाईः बीज की बुवाई प्रमुख रूप से दो प्रकार से की जाती हैः-
(अ) छिटकवा विधिः
क्यारियों में बीज की बुवाई किसान भाई ज्यादातर छिटक कर करते हैं जिससे बीज एक समान क्यारी में नही गिरते। जमाव होने पर किसी स्थान पर घना तो किसी स्थान पर विरल रूप में पौधे दिखते हैं। घना होने के कारण तने पतले व लम्बे हो जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप पत्तियों के ज्यादा वजन होने पर पौधे गिरने लगते हैं। यदि छिटकवा विधि से ही बुवाई करनी हो तो जमाव के बाद इनका विरलीकरण करना लाभप्रद होता है।
(ब) पंक्तियों में बुवाई करनाः
यह विधि सर्वोत्तम मानी जाती है। पौधे एक समान दूरी पर होने के कारण स्वस्थ होते हैं। इस विधि से बुवाई करते समय क्यारी के चौड़ाई के समान्तर 5 से.मी. दूरी पर 0.5 से.मी. गहरी पंक्तियां बना लेते हैं। बीज डालने के बाद इसको मिट्टी से ढक देते हैं। यदि पौधे सघन हो तो विरलीकरण करना चाहिए।
(9) क्यारी को पलवार से ढकनाः
क्यारियों में बीजों के बोने के बाद उपलब्ध पलवार जैसे पुआल, सरकण्डा, सरपत, गन्ने के सुखे पत्ते, अन्य घास फूस की पतली तह से ढक देते हैं ताकि नमी बनी रहे, साथ ही पानी सीधे बीजों पर न पड़े। प्रारम्भ के 5-6 दिन हजारे कि सहायता से हल्की सिंचाई करें ताकि क्यारी की मिट्टी बैठ न जाये। यदि वर्षा का मौसम है तो इसको बरसात के समय क्यारियो को ढक दें। जैसे ही अंकुरण दिखाई दे इन पलवारो को बाहर निकाल देना चाहिए। यदि ऐसा न करेंगे तो पौध पलवार में फसेंगी, निकलते समय टूट जायेगी।
(10) सिंचाईः
क्यारियों कि सिंचाई प्रारम्भ के 5-6 दिन हजारे से नियमित करें इसके बाद आवश्यकतानुसार पौधे निकलने से 4-5 दिन पूर्व सिंचाई बन्द कर दे ताकि पौधों में प्रतिकूल वातावरण सहन करने की क्षमता विकसित हो जाये व पौधे कठोर हो जाये। पौधे उखाड़ने से पहले हल्की सिंचाई कर लें इससे पौधे आसानी से बाहर निकल आते हैं। यदि खेत बहुत उपजाऊ है जिससे पौधा बहुत तेज विकास करता है तो सिंचाई कम करनी चाहिए।
(11) खरपतवार नियन्त्रण व पोषक तत्व प्रबन्धनः
क्यारियों से खरपतवारों को हाथ से निकालते रहना चाहिए। यदि व्यावसायिक स्तर पर पौधशाला तैयार कर रहें हो तो पेन्डीमीथेलीन की 5 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर बीज में बुवाई के 48 घण्टे के अन्दर करें।
सामान्य रूप से पौध तैयार करते समय उर्वरकों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा प्रतीत हो कि तैयारी के समय खादों के प्रयोग के बाद भी पौध बढ़वार नही ले रहा है घुलनशील उर्वरक एन.पी.के. की 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से घोलकर एक सप्ताह के अन्दर पर पर्णीय छिड़काव करें।
विवेक कुमार कुर्रे, डॉ जीतेन्द्र सिंह, डॉ राजश्री गायन
सब्जी विज्ञान विभाग
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़









