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फल बागवानी में पादप हार्मोन्स का उपयोग

संगीता, हेमंत पाणिग्रही एवं युगल किशोर लोधी

पौधों में पाए जाने वाले हार्मोन को वनस्पति हार्मोन, पादप हार्मोन या फाइटोहार्मोन भी कहते हैं। यह रसायन होते पौधों के विकास को विनियमित करते हैं। ये जटिल कार्बनिक यौगिक पौधों के एक भाग में निर्मित होकर अन्य भागों में स्थानान्तरित हो जाते हैं तथा उन अंगों की वृद्धि, जैविक क्रियाओं पर नियन्त्रण एवं उनके बीच समन्वय स्थापित करते हैं। वनस्पित हार्मोन वृद्धि, विकास, कोशिका-विभाजन, बीजों के अंकुरण, कलिका निर्माण, अपस्थानिक जड़ों की वृद्धि, फलों के निर्माण, अपरिपक्व फलों एवं पत्तियों को गिरने से रोकने, कैम्बियम की सक्रियता एवं पौधों में होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं के नियन्त्रण में सहायता करते हैं।

हार्मोन, पादप के विकास के लिए महत्वपूर्ण है और इनके अभाव में पादप का विकास नामुमकिन है। पादप हार्मोन पौधें के विकास के किसी एक अथवा दूसरे पहलू को नियंत्रित करके पौधें के क्रियाकलापों को समन्वित करते है। पौधों में पाए जाने वाले प्राकृतिक हार्मोन के समान ही कृत्रिम पादप हार्मोन्स बनाए गए है जो कि पौधों के विकास को विनियमित एवं नियंत्रित करते है। पादप हार्मोन्स की विभिन्न जैविक क्रियाकलापों को समन्वित करने की क्षमता के कारण आज फल बागवानी में कृत्रिम पादप हार्मोन्स का उपयोग एक महत्वपूर्ण अंग बन गया है।

पॉच प्रकार के पादप हार्मोन –
ऑक्सिन्स – यह कोशिका वृद्धि,कोशिका विभाजन एवं फल वृद्धि को प्रोत्साहित करता है। तने का प्रकाश की ओर मुड़ना या प्रतान (टेंड्रिल) आधार के चारों ओर वृद्धि करना इसी हार्मोन की वजह से होता है। आई.बी.ए., नेफ्थलीन एसिटिक एसिड, 2,4-डी (कृत्रिम ऑक्सिन्स हार्मोन्स)
जिबरेलिन्स – यह तने की वृद्धि तथा बीजों व कलिकाओं की प्रसुप्ति को तोड़ने में सहायता करता है। जिब्रेलिक एसिड (कृत्रिम हार्मोन्स)
साइटोकाइनिन – यह हार्मोन पादप में कोशिका विभाजन को प्रोत्साहित करता है।
एब्सिसिक अम्ल – यह वृद्धिरोधी हार्मोन है जो बीजों व कलिकाओं में प्रसुप्ति को बढ़ाता है। यह पत्तियों के मुरझाने व गिरने को बढ़ाता है साथ ही पादप से फूलों व फलों के पृथक्करण का भी कारण बनता है।
एथिलीन – यह पादप हार्मोन फलों को पकाने में सहायक होता है । इथ्रेल (कृत्रिम एथिलीन हार्मोन्स)

फल बागवानी में हार्मोन्स (पादप नियंत्रकों) का बहुत महत्व है । फल वृक्षों में कई बार विकास की वृद्धि दर रुकने, फल एवं फूल झड़ने एवं वृद्धि कम होने की समस्या आ जाती है । ऐसी स्थिति में कृत्रिम हार्मोन्स का उपयोग लाभकारी सिद्ध होता है। हार्मोन्स का उपयोग जड़ों को विकसित करने, कलिकाओं की निष्क्रियता खत्म करने, वृद्धि जनकवृद्धि अवरोधक, पुष्पांकन का नियमितिकरण एवं नियंत्रण, बीजरहित फल प्राप्त करने, फूलों एवं फलों को झड़ने से रोकने, नर-मादा अनुपात नियंत्रण करने तथा फलों को पकाने आदि में सहायक होता है ।

फल बागवानी में पादप हार्मोन्स का उपयोग
1. फल गिरने की समस्या में

  • निम्बूवर्गीय वृक्षों में फल गिरने की समस्या रहती है । इसे रोकने के लिए 2,4-डी 10 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।
  • नागपूरी संतरे में परिपक्व फलों को गिरने से बचाने के लिए प्रति लीटर पानी में 200 मिलीग्राम नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.) का छिड़काव करना चाहिए ।
  • बेर की गोला किस्म में जिब्रेलिक एसिड के 30 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करने से फल गिरने की समस्या कम होती है ।
  • आम में फल गिरने की समस्या रहती है । इसे रोकने के लिए 2,4-डी 10-20 मिलीग्राम या नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.) 50 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।

2. फलों का आकार बढ़ाने के लिए

  • अंगूर के फलों का आकार बढ़ाने के लिए 80 प्रतिशत फूलों के खिलने पर जिब्रेलिक एसिड 45 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।
  • खजूर के फलों पर डोका अवस्था में 1 ग्राम इथ्रेल एक लीटर पानी के घोल का छिड़काव करने से फलों के आकार और वजन में सुधार होता है ।

3. फलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए

  • फालसा की झाड़ी से प्राय कम फल मिलते हैं । परन्तु जिब्रेलिक एसिड की 60 मिलीग्राम मात्रा एक लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से फलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है ।
  • अमरुद के वृक्ष पर लगे फूलों पर नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.) के 600 पी.पी.एम. सांद्रता वाले घोल का छिडकाव फल बनने के लिये प्रभावी होता है ।
  • सपोटा के फूलों पर नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.) के 100-300 पी.पी.एम. सांद्रता वाले घोल का छिडकाव प्रभावी होता है ।

4. फल को एक समान पकाने के लिए

  • फलदार पौधों को पकाने के लिए इथेफोन 500 पी.पी.एम. घोल का छिडकाव करना चाहिए ।
  • अंगूर में गुच्छों को एक समान पकाने के लिए 250-500 पी.पी.एम. इथ्रेल घोल का छिडकाव करना चाहिए ।
  • सपोटा के फलो को पकाने के लिए पर इथ्रेल के 1000 पी.पी.एम. सांद्रता वाले घोल से उपचार प्रभावी होता है ।

5. जड़ों के विकास के लिए

  • पौधों की कटिंग में जड़ों के विकास के लिए 500 मिलीग्राम आई.बी.ए. हार्मोन का उपयोग करना चाहिए ।

6. मादा फूलों की संख्या बढ़ाने के लिए

  • फल वृक्षों में मादा फूलों की संख्या बढ़ाने के लिए जिब्रेलिक एसिड 10 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए ।
  • पपीते में मादा फूलों की संख्या बढ़ाने के लिए जिब्रेलिक एसिड 50 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए ।

7. पुष्पन के लिये

  • अनन्नास में नेफ्थीलीन एसिटीक अम्ल 5-10 पी.पी.एम. का छिडकाव करना फूलों के लिये प्रभावी साबित होता है ।

कुछ महत्वपूर्ण फलो में पादप हार्मोन्स के उपयोग की उचित मात्रा, समय एवं प्रभाव

 क्रं. फल वृक्ष पादप हार्मोन्स उचित मात्रा समय प्रभाव
1 आम एन.ए.ए.  या 50 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल की मटर अवस्था में फल गिरने की समस्या रोकने के लिए
2,4-डी 10-20 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी
एन.ए.ए. 200 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी अक्टूबर-नवम्बर मालफॉरमेशन (गुच्छा विकार) की समस्या को रोकने के लिए
2 निम्बुवर्गीय फल 2,4-डी 20 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में फल गिरने की समस्या रोकने के लिए
एन.ए.ए. 200 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी
3 एवोकेडो 2,4-डी 20-25 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में फल गिरने की समस्या रोकने के लिए
4 अंगूर जिब्रेलिक एसिड 50 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी 50 प्रतिशत फूलों के खिलने पर गुच्छों का विरलीकरण करने के लिये
45 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी 80 प्रतिशत फूलों के खिलने पर फलों का आकार बढ़ाने के लिए
30-40 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी बाजरा दाने की अवस्था में फलों का आकार बढ़ाने के लिए
एन.ए.ए. 20-50 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में फल गिरने की समस्या रोकने के लिए
5 केला 2,4-डी 20 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में बीजहीन फलो के उत्पादन के लिए ( पूवन प्रजाति में )
इथ्रेल 500-1000 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल की पूर्ण परिपक्व अवस्था में फूलो को पकाने के लिए
6 अनानास एन.ए.ए. 5-10 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी पुष्पन के पूर्व की अवस्था में प्रभावी पुष्पन के लिए
एन.ए.ए. 200-300 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में फल का आकार बढ़ाने के लिए
इथेफोन 200-300 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी (2ः यूरिया ़ ब्ंब्व्3 के साथ) प्रभावी पुष्पन के लिए
7 सेब एन.ए.ए. 2-10 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल की छोटी अवस्था में फलों के विरलीकरण के लिये
एन.ए.ए. 20 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में फल गिरने की समस्या रोकने के लिए
8 आडू इथेफोन 100-300 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में फलों के विरलीकरण के लिये
9 आलु बुखारा इथेफोन 10-100 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल विकास की अवस्था में फलों के विरलीकरण के लिये
10 सपोटा इथ्रेल 1000 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फल की पूर्ण परिपक्व अवस्था में फलो को पकाने के लिए
एन.ए.ए. 200 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी फूलों पर अधिक उपज के लिए

 

8. गुच्छों का विरलीकरण करने के लिये

  • अंगूर में गुच्छों का विरलीकरण करने के लिये 50 पी.पी.एम. जिब्रेलिन का इस्तेमाल किया जाता है ।
  • अमरूद के फूलों का विरलीकरण करने के लिये 80-100 पी.पी.एम. नेफ्थीलीन एसिटीक अम्ल का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए ।

9. बीजों के सही अंकुरण

  • पपीते के बीजों के सही अंकुरण के लिये बीजों को 200 पी.पी.एम जिब्रेलिन से उपचारित करना चाहिये ।

10. कार्यिकी विकृति को रोकने के लिए

  • आम में मालफॉरमेशन (गुच्छा विकार) की समस्या को रोकने के लिए नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.) को 200 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से इस समस्या की रोकथाम की जा सकती है ।
  • केला में अपरिपक्व फलों के फटने की समस्या पूवन प्रजाति में पायी जाती है। इसे रोकने के लिए 2,4-डी 120 पी.पी.एम. के घोल का छिड़काव करना चाहिए ।
  • निम्बूवर्गीय फलो में ग्रेनुलेशन की समस्या रहती है । इसे रोकने के लिए 2,4-डी 12 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।
  • निम्बूवर्गीय फलो में डिग्रीनिंग की समस्या रहती है । इसे रोकने के लिए इथ्रेल 2000-4000 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।

11. फूल गिरने की समस्या में

  • अनेक फल वृक्षों में फूल गिरने की समस्या रहती है । इसे रोकने के लिए 2,4-डी 10 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।

पादप नियंत्रकों के प्रयोग करने की विधि
1. पादप नियंत्रकों का पाउडर के रूप में प्रयोग
पादप नियंत्रकों का पाउडर के रूप में अधिकतर कर्तनों को उपचारित करने में किया जाता है । रासायनिक यौगिक की निश्चित मात्रा सैरेड़ेक्स पाउडर में मिश्रित करके पादप नियंत्रकों का यह रूप तैयार किया जाता है। जैसे सैरेड़ेक्स ए तथा सैरेड़ेक्स बी मुख्य हैं । कर्तनों के निचले सिरे को लगभग एक या दो सेंटीमीटर लम्बाई मे गीला करके हार्मोन पाऊडर मे डुबोकर घुमा दिया जाता है, जिससे पाउडर बर्तन के निचले सिरे पर चारों तरफ लग जाता है । इसके पश्चात् तैयार किये गए माध्यम में छिद्र बनाकर कर्तनों को लगा दिया जाता है ।
2. पादप नियंत्रकों का द्रव के रूप मे प्रयोग
इस रूप मे पादप नियंत्रकों का प्रयोग दस पी.पी.एम. से दो हजार पी.पी.एम. तक किया जाता है । इनको द्रवित अवस्था मे बदलने के लिए 50 प्रतिशत वाष्प पानी तथा 50 प्रतिशत शुद्ध एल्कोहल कि मिश्रित मात्रा मे घोला जाता है । जब ये ठीक प्रकार से घुलकर मिल जाएँ तो इनका प्रयोग पौधों कि वृद्धि के लिए छिडकाव के रूप मे कर्तनों को उपचारित करने मे किया जाता है ।
3. पादप नियंत्रकों का लेई के रूप मे प्रयोग
पादप नियंत्रकों को इस रूप में बनाने के लिए इनकी निश्चित मात्रा एक लेई लिनोलिन में मिलाई जाती है । इस प्रकार से इसी रूप मे इनका प्रयोग कर्तनों, गुट्टी तथा अन्य वानस्पतिक प्रसारण के तरीकों में किया जाता है । लेई कि निश्चित मात्रा कर्तनों के निचले सिरों पर तथा गुट्टी कि वलय के उपरी भाग पर चाकू या स्पेचुला से लेप कर की जाती है ।
4. हार्मोन्स का वाष्प के रूप मे प्रयोग
पादप नियंत्रकों क यह रूप ग्रीनहाउस में पौधों को उपचारित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है । इसमें रासायनिक यौगिक को गर्म प्लेट के ऊपर रखा जाता है । जिससे यह वाष्प के रूप मे बदलकर समस्त पौधों को उपचारित कर देता है। इसको प्रयोग करते समय यह ध्यान रहे कि ग्रीनहाउस कि खिड़कियाँ एवं किवाड़ बंद होने चाहिए ।
5. एरोसोल के रूप मे पादप नियंत्रकों का प्रयोग
इसमें घोल को एक सिलेण्डर में भर लिया जाता है । तथा उसका सूक्ष्म छिद्र वाले नोजल से अधिक दबाव के साथ छिडकाव करते हैं । जिससे द्रवीय गैस वाष्प के रूप मे बदलकर कोहरे के रूप मे छा जाती है । फलस्वरूप ग्रीनहॉउस के सभी पौधे इसके द्वारा उपचारित हो जाते हैं ।

हार्मोन्स (पादप नियंत्रकों) के उपयोग में सावधानियाँ

  • कलमों से जड़ों के शीघ्र विकास के लिए आई.बी.ए. या आई.ए.ए. रसायन को साधारण पाऊडर के साथ मिलाकर सूखी अवस्था में ही कलमों के निचले भाग को उपचारित कर लगाना चाहिए ।
  • पादप नियंत्रकों का उपयोग बहुत ही कम मात्रा में किया जाता है । एक पी.पी.एम. बनाने के लिये एक मिलीग्राम मात्रा प्रति लीटर में डालनी चाहिये ।
  • हार्मोन्स का उपयोग पूर्ण जानकारी एवं अनुभव के आधार पर सावधानी से किया जाये अन्यथा असावधानी के कारण तथा निर्धारित मात्रा से अधिक उपयोग करने पर नुकसानदायक भी हो सकता है ।
  • सीधे जल में हार्मोन्स की घुलनशीलता कम होती है । अतः इसका घोल परिशुद्ध जल या सोडियम हाइड्रोक्साइड विलयन की अल्पमात्रा में घोलने के बाद जल में मिलाना चाहिए ।
  • छिड़काव दोपहर में न करके सुबह या सांयकाल ही किया जाना चाहिए ।
  • कम व ज्यादा मात्रा गलत परिणाम दे सकती है । अतः सही मात्रा का उपयोग करना चाहिये ।

संगीता, हेमंत पाणिग्रही
एवं युगल किशोर लोधी
फल विज्ञान विभाग,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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