

परिचय
प्राचीन काल से ही विश्व में भारत देश को मसालों की भूमि के नाम से जाना जाता है। धनिया के बीज एवं पत्तियां भोजन को सुगंधित एवं स्वादिष्ट बनाने के काम आते हैं। ज्यादातर लोग अपने भोजन में धनिया पत्ती का इस्तेमाल सब्जी बनाने में करते हैं। तो वहीं इसका इस्तेमाल खाने को सजाने में भी किया जाता है। लोग धनिया की पत्ती को चटनी भी काफी पसंद करते है। धनिया बीज में बहुत अधिक औषधीय गुण होने के कारण कुलिनरी के रूप में, कार्मिनेटीव और डायरेटिक के रूप में उपयोग में आते हैं। धनिया अम्बेलीफेरी या गाजर कुल का एकवर्षीय मसाला फसल है। इसका हरा धनिया सिलेन्ट्रो या चाइनीज पर्सले कहलाता है। इसके पत्तों में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होता है। घरेलू नूस्खों में इसका प्रयोग दवाई के तौर पर किया जाता है। इसे पेट की बिमारियों, मौसमी बुखार, उल्टी, खांसी और चमड़ी के रोगों को ठीक करने के लिए प्रयोग किया जाता है। धनिया एक ऐसी फसल होती है, जिसे किसान मसालों के रूप में तो बेचता ही है, साथ ही हरे धनिया से भी अच्छा मुनाफा कमा सकता है, ये धनिया बुवाई का सही समय होता है। देशभर में धनिया की मांग होती है। इसकी सब से ज्यादा पैदावार तथा खपत भारत में ही होती है। इसकी खेती उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कनार्टक में ज्यादा की जाती है। भारत धनिया का प्रमुख निर्यातक देश है। धनिया के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है।
पोषक तत्व
धनिया की छोटी-छोटी पत्तियों और बीजों में पोषक तत्वों का खजाना छिपा है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, सोडियम, पोटैशियम और विटामिन ए, बी1, बी2 और सी होते हैं। धनिया डाइट्री फाइबर्स का भी एक प्रमुख सोर्स है। इसके अलावा इसमें मैगनीज, आयरन, मैग्नशियम भी भरपूर मात्रा में होता है। ये प्रोटीन का भी अच्छा सोर्स है। इसमें बहुत कम मात्रा में फॉस्फोरस, थायमिन और कैरोटीन भी पाया जाता है।
| पोषक तत्व | मात्रा प्रति 100 ग्राम |
| प्रोटीन | 12.37 ग्राम |
| कार्बोहाइड्रेट | 54.99 ग्राम |
| फाइबर | 41.9 ग्राम |
| कैल्शियम | 709 मि.ग्राम |
| आयरन | 16.32 मि.ग्राम |
| मैग्नीशियम | 330 मि.ग्राम |
| फास्फोरस | 409 मि.ग्राम |
| पोटेशियम | 1267 मि.ग्राम |
| सोडियम | 35 मि.ग्राम |
| जिंक | 4.70 मि.ग्राम |
| विटामिन सी | 21.0 मि.ग्राम |
| थियामिन | 0.239 मि.ग्राम |
| राइबोफ्लेविन | 0.290 मि.ग्राम |
| नियासिन | 2.130 मि.ग्राम |
| सैचुरेटेड फैटी एसिड | 0.990 ग्राम |
| मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड | 13.580 ग्राम |
| पॉली अनसेचुरेटेड फैटी एसिड | 1.750 ग्राम |
धनिया खाने के फायदें
शरीर के लिए धनिया बहुत ही लाभकारी होता है। इससे कई रोगों का निदान होता है।
- ये स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले कोलेस्ट्रॉल को कम करने और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है।
- पाचन तंत्र के लिए भी यह विशेष रूप से फायदेमंद है। ये लीवर की सक्रियता को बढ़ाने में मदद करता है।
- डायबिटीज के मरीजों के लिए भी ये काफी फायदेमंद होता है। ये ब्लड शुगर के लेवल को नियंत्रित करने का काम करता है। इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
- इसमें मिलने वाले फाइटोन्यूट्रिएंट्स रेडिकल डैमेज में सुरक्षा प्रदान करने का काम करते हैं.
- इसमें मौजूद विटामिन के अल्जाइमर की बीमारी में फायदेमंद होता है।
- धनिया पत्ती में एंटीइम्फलामेटरी गुण पाया जाता है। जिसकी वजह से ये अर्थराइटिस में भी बहुत उपयोगी होता है।
- मुंह के घाव को ठीक करने में भी ये काफी कारगर होता है। इसमें मौजूद एंटीसेप्टिक गुण मुंह के घाव को जल्दी भरने का काम करता है।
- नर्वस सिस्टम को सक्रिय बनाए रखने में भी धनिया की पत्ती काफी फायदेमंद होती है।
- हरी धनिया को सुबह के वक्त पानी में उबालकर, छान लें। इस पानी को सुबह खाली पेट पीने से पेट की पथरी यूरीन के माध्यम से निकल जाती है।
उपयोग
- इसके साबूत दाने या पीस कर अचार, सास और मिठाईयों आदि खाद्य पदार्थों को सुगन्धित करने के काम में लेते हैं।
- वाष्पशील तेल से सुगन्धित द्रव्य व खुशबूदार साबुन बनाये जाते हैं।
- इसके अलावा यह तेल, चॉकलेट, कैण्डी, सीलबन्द भोज्य पदार्थों, सूप व मदिरा को सुगन्धित करने में प्रयुक्त होता हैं।
- इसकी पत्तियाँ एवं मुलायम तने चटनी बनाने तथा शाक-भाजी व सूप सलाद को स्वादिष्ट में सहायक हैं।
- इसका इस्तेमाल खड़े मसाले के रूप में कर सकते हैं।
- आप धनिये के बीज को उबालकर बतौर चाय भी पी सकते हैं।
धनिया की उन्नत खेती के लिए आवश्यकताएँ-
जलवायु
शुष्क व ठंडा मौसम अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिये अनुकूल होता है। बीजों के अंकुरण के लिये 25 से 26 से.ग्रे. तापमान अच्छा होता है। धनिया शीतोष्ण जलवायु की फसल होने के कारण फूल एवं दाना बनने की अवस्था पर पाला रहित मौसम की आवश्यकता होती है। धनिया को पाले से बहुत नुकसान होता है। धनिया को पाला रहित मौसम की जरुररत होती है। इसलिए धनिया को खुली धूप की आवश्यकता होती है। धनिया बीज की उच्च गुणवत्ता एवं अधिक वाष्पशील तेल के लिये ठंडी जलवायु, अधिक समय के लिये तेज धूप, समुद्र से अधिक ऊंचाई एवं ऊंचहन भूमि की आवश्यकता होती है ।
मिट्टी
धनिया की सिंचित फसल के लिये अच्छे जल निकास वाली अच्छी दोमट भूमि सबसे अधिक उपयुक्त होती है तथा असिंचित फसल के लिये काली भारी भूमि जिसकी अच्छी जल धारण की क्षमता हो, उपयुक्त होती है। धनिया क्षारीय एवं लवणीय भूमि को सहन नही करता है अर्थात अच्छे जल निकास एवं उर्वरा शक्ति वाली दोमट, मटियार या कछारी भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश हो उपयुक्त होती है। मिट्टी का पी एच मान 6.5 से 7.5 होना चाहिए। धनिया के लिए दोमट, मटियार या कछारी भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश और खेत में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।
भूमि की तैयारी
सिंचित क्षेत्र में अगर जुताई के समय भूमि में पर्याप्त जल न हो तो भूमि की तैयारी पलेवा देकर करनी चाहिए। जिससे जमीन में जुताई के समय ढेले भी नही बनेंगे तथा खरपतवार के बीज अंकुरित होने के बाद जुताई के समय नष्ट हो जाएंगे। बारानी फसल के लिये खरीफ फसल की कटाई के बाद दो बार आड़ी-खड़ी जुताई करके तुरन्त पाटा लगा देना चाहिए। जुताई से पहले 5-10 टन प्रति हेक्टेयर पक्की हुई गोबर की खाद मिलाएं। धनिया की सिंचित फसल के लिए 5-5 मीटर की क्यारियां बना लें, जिससे पानी देने में और निराई-गुड़ाई का काम करने में आसानी होती है।
किस्में
हमारे देश में उपलब्ध धनिया की किस्मों को तीन प्रकार में बांटा जा सकता है, जैसे-
बीज वाली किस्में- इन किस्मों का उपयोग बीज मसाले में किया जाता है। इनके बीज अधिक सुगन्धित होते है, क्योंकि इनमें तेल की मात्रा भी अधिक होती है, जैसे- आर सी आर- 20, स्वाति, साधना, राजेन्द्र और सी एस- 287 आदि प्रमुख हैै।
पत्ते वाली किस्में- इन किस्मों के हरे पत्ते काटकर उपयोग में लाए जाते है, जैसे- आर सी आर- 41 और गुजरात धनिया- 2 आदि, ये किस्में पत्तों से सुगन्ध देती है।
दोहरे उपभोग की किस्में- इस प्रकार की किस्में दाने और पत्ते दोनों के लिए उगाई जाती है, जैसे- को-02, को-03 और पूसा चयन-360 आदि। यह किस्में लम्बी अवधि की होती हैं। पत्तों की तीन कटाई के बाद इन्हें बीज पकने के लिए छोड़ दिया जाता है।
बीज दर
सिंचित अवस्था में 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा असिंचित अवस्था में 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती हैं।
बुवाई का समय
धनिया की फसल रबी मौसम में बोई जाती है। धनिया बोने का सबसे उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर है। धनिया की सामयिक बोनी लाभदायक है। दानों के लिये धनिया की बुआई का उपयुक्त समय नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा हैं । हरे पत्तों की फसल के लिये अक्टूबर से दिसम्बर का समय बिजाई के लिये उपयुक्त हैं। पाले से बचाव के लिये धनिया को नवम्बर के द्वितीय सप्ताह मे बोना उपयुक्त होता है। बुवाई के समय अधिक तापमान रहने पर अंकुरण कम हो सकता है। बुवाई का निर्णय तापमान देख कर ले। जिन क्षेत्रों में पाला अधिक पड़ता है वहां धनिया की बुवाई ऐसे समय में न करें, जिस समय फसल को अधिक नुकसान हो।
बीजोपचार
भूमि एवं बीज जनित रोगो से बचाव के लिये बीज को कार्बेंन्डाजिम़ + थाइरम (2:1) 3 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. या कार्बोक्जिन 37.5 प्रतिशत + थाइरम 37.5 प्रतिशत 3 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. व ट्राइकोडर्मा विरिडी 5 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। बीज जनित रोगों से बचाव के लिये बीज को स्ट्रेप्टोमाईसिन 500 पी. पी. एम. से उपचारित करना लाभदायक है। बुवाई से पहले दाने को दो भागों में तोड़ देना चाहिए। ऐसा करते समय ध्यान दे अंकुरण भाग नष्ट न होने पाए और अच्छे अंकुरण के लिए बीज को 12 से 24 घंटे पानी में भिगो कर हल्का सूखने पर बीज उपचार करके बोए।
बुवाई की विधि
धनिया की बोनी सीड ड्रील से कतारों में करें, कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 7 से 10 सेंटीमीटर रखें। भारी भूमि या अधिक उर्वरा भूमि में कतारों की दूरी 40 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। धनिया की बुवाई पंक्तियों में करना अधिक लाभदायक है। कूड में बीज की गहराई 2 से 4 सेंटीमीटर तक होनी चाहिए। बीज को अधिक गहराई पर बोने से अंकुरण कम होता हैं।
सिंचाई
धनिया में पहली सिंचाई 30 से 35 दिन बाद (पत्ति बनने की अवस्था) दूसरी सिंचाई 50 से 60 दिन बाद (शाखा निकलने की अवस्था), तीसरी सिंचाई 70 से 80 दिन बाद (फूल आने की अवस्था) तथा चौथी सिंचाई 90 से 100 दिन बाद (बीज बनने की अवस्था ) करना चाहिए। हल्की जमीन में पांचवी सिंचाई 105 से 110 दिन बाद (दाना पकने की अवस्था) करना लाभदायक रहता हैं।
खाद व उर्वरक
असिंचित धनिया की अच्छी पैदावार लेने के लिए गोबर खाद 20 टनध्हे. के साथ 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से तथा 60 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचित फसल के लिये उपयोग करें ।
असिंचित अवस्था में उर्वरको की संपूर्ण मात्रा आधार रूप में देना चाहिए। सिंचित अवस्था में नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस, पोटाश एवं जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बोने के पहले अंतिम जुताई के समय देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा खड़ी फसल में टाप ड्रेसिंग के रूप में प्रथम सिंचाई के बाद देना चाहिए। खाद हमेशा बीज के नीचे देवें। खाद और बीज को मिलाकर नही देवें। धनिया की फसल में एजेटोबेक्टर एवं पी. एस. बी. कल्चर का उपयोग 5 कि.ग्रा. प्रति हे. के हिसाब से 50 कि.ग्रा. गोबर खाद मे मिलाकर बोने के पहले डालना लाभदायक हैं।
अंतर्वर्तीय फसलें
चना धनिया, (10:2), अलसी धनिया (6:2), कुसुम धनिया (6ः2), धनिया गेहूँ (8:3) आदि अंतर्वर्तीय फसल पद्धतियां उपयुक्त पाई गई है। गन्ना धनिया (1:3) अंतर्वर्तीय फसल पद्धति भी लाभदायक पाई गई है।
फसल चक्र
धनिया-मूग, धनिया-भिण्डी, धनिया-सोयाबीन, धनिया-मक्का आदि, फसल चक्र लाभ दायक पाये गये हैं।
खरपतवार नियंत्रण
धनिये में शुरूआती बढ़वार धीमी गति से होती हैं इसलिए निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को निकलना चाहिए। सामान्यतः धनिये में दो निराई-गुड़ाई पर्याप्त होती हैं। पहली निराई-गुड़ाई के 30-35 दिन पर अवश्य कर देना चाहिए। दूसरी निराई-गुड़ाई 60 दिन बाद करें। इससे पौधों में बढ़वार अच्छी होने के साथ-साथ बचे हुए खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं और उपज पर अच्छा प्रभाव पड़ता हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथालीन 1 लीटर प्रति हेक्टेयर 600 लीटर पानी में मिलाकर अंकुरण से पहले छिड़काव करें पर ध्यान रखें की छिड़काव के समय भूमि में पर्याप्त नमी होनी चाहिए और छिड़काव शाम के समय करें तो उचित रहता हैं।
हानिकारक कीट व नियंत्रण
माहु या चेपा (एफिड) – धनिया में मुख्यतः माहू रस चूसक कीट का प्रकोप होता है। इस कीट के हल्के हरे रंग वाले शिश व प्रौढ़ दोनो ही पौधे के तनों, फूलों एवं बनते हुए बीजों जैसे कोमल अंगो का रस चूसते हैं।
नियंत्रण – रोकथाम के लिए मिथाइल आक्सीडेमेटान 25 ई.सी. 1.5 मिलीलीटर प्रति लिटर पानी या डायमेथियोट 35 ई.सी. 2 मिलीलीटर प्रति लिटर पानी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 ई.सी. 0.25 मिलीलीटर प्रति लिटर पानी की दर से छिडकाव करें।
रोग व नियंत्रण
1. उकठा (विल्ट) – उकठा रोग फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम एवं फ्यूजेरियम कोरिएनड्री कवक के द्वारा फैलता हैं। इस रोग के कारण पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं।
नियंत्रण-
- ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं।
- बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें।
- बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बोन्डिजम 50 डब्ल्यू. पी. 3 ग्राम प्रति किलोग्राम या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।
- उकठा के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू. पी. 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी या हेक्जाकोनोजॉल 5 ईसी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या मेटालेक्जिल 35 प्रतिशत 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या मेटालेक्जिल मेंकोजेब-72 एम जेड 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
2. तनाव्रण या तना सूजन या तना पिटिका (स्टेमगॉल) – यह रोग प्रोटामाइसेस मेक्रोस्पोरस कवक के द्वारा फैलता है। रोग के कारण फसल को अत्यधिक क्षति होती है। पौधो के तनों पर सूजन हो जाती है। तनों, फूल वाली टहनियों एवं अन्य भागों पर गांठे बन जाती है। बीजों में भी विकृतिया आ जाती है।
नियंत्रण –
- ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाए।
- बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें।
- बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी. 3 ग्राम प्रति किलोग्राम या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।
- रोग के लक्षण दिखाई देने पर स्ट्रेप्टोमाइसिन 0.04 प्रतिशत 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी का 20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
3. चूर्णिल आसिता या भभूतिया रोग – यह रोग इरीसिफी पॉलीगॉनी कवक के द्वारा फैलता है। इससे फल रोग की प्रारंभिक अवस्था में पत्तियों एवं शाखा सफेद चूर्ण की परत जम जाती है। अधिक प्रभाव होने पर पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती है।
नियंत्रण –
- ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाए।
- बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें।
- बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू. पी. 3 ग्राम प्रति किलोग्राम या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।
- कार्बेन्डाजिम 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या एजॉक्सिस्ट्रोबिन 23 एस सी 1.0 ग्राम प्रति लीटर पानी या हेक्जाकोनोजॉल 5 ईसी 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या मेटालेक्जिल मेंकोजेब-72 एम. जेड. 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
4. पत्तों पर सफेद धब्बे – इसका प्रकोप होने पर धनिये के पत्तों के ऊपर की तरफ सफेद रंग के धब्बे पड़ने शुरू हो जाते हैं।
नियंत्रण – इसके लक्ष्ण दिखाई देने पर 20 ग्राम घुलनशील सलफेट को प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर 10 दिनों के फासले पर फिर छिड़काव करना चाहिए या 100 मि.ली. प्रोपीकोनाजोल 10 ई.सी. का प्रति 200 लीटर पानी में घोल तैयार करके छिड़काव करना चाहिए।
5. दानों का गलना – बीजों को लगने वाली फफूंदी से बचाने के लिए बिजाई के 20 दिनों बाद 200 ग्राम कार्बेनडाजिम की प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
6. जड़ गलन – फसल की जड़ को गलने से बचाने के लिए 60 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से नीम का पेस्ट मिट्टी में मिलाना चाहिए। इसके इलावा 4 ग्राम टराईकोडरमा विराइड से प्रति किलो बीज का उपचार करें। जड़ गलन के लक्षण दिखाई देने पर मिट्टी में कार्बेन्डाजिम 5 ग्राम या 2 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को प्रति लीटर पानी में मिलाकर मिट्टी में छिड़कें।
पाले से बचाव
सर्दी के मौसम में जब ताममान शून्य डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे गिर जाता है। तो हवा में उपस्थित नमी ओस की छोटी-छोटी बूंदें बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदल जाती है तथा ये कण पौधों पर जम जाते है। इसे ही पाला कहते है। पाला ज्यादातर दिसम्बर या जनवरी माह में पड़ता है। पाले से बचाव के उपाय इस प्रकार अपनायें, जैसे-
- पाला अधिकतर दिसम्बर से जनवरी माह में पड़ता है, इसलिये फसल की बुवाई 10 से 20 नवंबर के बीच में करें।
- यदि पाला पड़ने की संभावना हो तो फसल की सिंचाई करें।
- जब भी पाला पड़ने की संभावना दिखाई दे, तो आधी रात के बाद खेत के चारो ओर कूड़ा-करकट जलाकर धुआँ कर देना चाहिए।
- पाला पड़ने की संभावना होने पर फसल पर गंधक अम्ल 0.1 प्रतिशत (1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव शाम को करें।
- जब पाला पड़ने की पूरी संभावना दिखाई दे तो डाइमिथाइल सल्फोआक्साईड (डीएमएसओ) नामक रसायन 75 ग्राम प्रति 1000 लीटर पानी का 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिडकाव करने से फसल पर पाले का प्रभाव नही पड़ता है।
- व्यापारिक गंधक 15 ग्राम बोरेक्स 10 ग्राम प्रति पम्प की दर से छिड़काव करें।
फसल कटाई
हरी पत्तियो के लिए फसल का कद 20 से 25 सैं.मी. होने पर हरे पत्तों को काटना शुरू कर देना चाहिए। एक फसल को तीन से चार बार काटा जा सकता है।
फसल की कटाई उपयुक्त समय पर करनी चाहिए। बीज की पैदावार के लिए बीजी गई फसल अप्रैल महीने में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। धनिया दाना दबाने पर मध्यम कठोर तथा पत्तिया पीली पड़ने लगे, धनिया डोड़ी का रंग हरे से चमकीला भूरा या पीला होने पर तथा दानों में 18 प्रतिशत नमी रहने पर कटाई करनी चाहिए। कटाई में देरी करने से दानों का रंग खराब हो जाता है। जिससे बाजार में उचित कीमत नही मिल पाती है। अच्छी गुणवत्तायुक्त उपज प्राप्त करने के लिए 50 प्रतिशत धनिया डोड़ी का हरा से चमकीला भूरा कलर होने पर कटाई करना चाहिए।
गहाई
धनिया का हरा-पीला कलर और सुगंध प्राप्त करने के लिए धनिया की कटाई के बाद छोटे-छोटे बण्डल बनाकर 1 से 2 दिन तक खेत में खुली धूप में सूखाना चाहिए। बण्डलों को 3 से 4 दिन तक छाया में सूखाये या खेत मे सूखाने के लिए सीधे खड़े बण्डलों के ऊपर उल्टे बण्डल रख कर ढेरी बनावें। ढेरी को 4 से 5 दिन तक खेत में सूखने देवें। सीधे-उल्टे बण्डलों की ढेरी बनाकर सूखाने से धनिया बीजों पर तेज धूप नही लगने के कारण वाष्पशील तेल उड़ता नही है।
उपज
धनिया की उपज किस्म, मौसम और फसल की देखभाल आदि पर निर्भर करती है, परन्तु उपरोक्त वैज्ञानिक तकनीक से खेती करने पर सिंचित फसल से 15 से 20 क्विंटल बीज तथा 100 से 125 क्विंटल पत्तियों की उपज तथा असिंचित फसल की 7 से 9 क्विंटल उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती हैं।
भण्डारण
भण्डारण के समय धनिया बीज में 9-10 प्रतिशत नमी रहना चाहिए। धनिया बीज का भण्डारण पतले जूट के बोरों में करना चाहिए। बोरा को जमीन पर तथा दिवार से सटे हुए नही रखना चाहिए। जमीन पर लकड़ी के गट्टों पर बोरांे को रखना चाहिए। बीज के 4-5 बोरों से ज्याद एक के ऊपर नही रखना चाहिए। बीज के बोरों को ऊंचाई से नही फटकना चाहिए। बीज के बोरें न सीधे जमीन पर रखें और न ही दीवार पर सटाकर रखें। बोरियों मे भरकर रखा जा सकता है। बोरियों को ठण्डे किन्तु सूखे स्थानो पर भण्डारित करना चाहिए। भण्डारण में 6 माह बाद धनिया की सुगन्ध में कमी आने लगती है।
फसल की उत्पादकता बढाने हेतु निम्न बातों का ध्यान रखें –
- पाले से बचाव के लिए बुआई नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में करें तथा गंधक अम्ल 0.1 प्रतिशत का छिड़काव शाम को करें।
- धनिया की खेती उपजाऊ भूमि में करे।
- तनाव्रण एवं चूर्णिल आसिता प्रतिरोधी उन्नत किस्मों का उपयोग करें।
- उकठा, तनाव्रण, चूर्णिल आसिता जैसे रोगों का समेकित नियंत्रण करें।
- खरपतवार का प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रण करें।
- भूमि में आवश्यक एवं सूक्ष्म तत्वो की पूर्ति करें।
- चार सिंचाई क्रांतिक अवस्थाओं पर करें।
- कटाई उपयुक्त अवस्था पर करंे एवं छाया में सुखायें। कटाई के उपरांत प्रौद्योगिकी को अपनावंे।










