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टपक सिंचाई पद्धति से टमाटर की खेती

सेवन दास खुंटे, डॉ. जी.डी. साहू , कुमुदनी साहू एवं ईश्वर साहू

भूमि की तैयारी
टमाटर के लिए अच्छी उपजाऊ दोमट भूमि का प्रयोग करना चाहिए। खेत की तैयारी के लिये 2-3 बार जुताई करके पाटा चलायें व खेत में 10 टन गोबर की खाद/सड़ी खाद या कम्पोस्ट खाद पौध रोपण के लगभग तीन सप्ताह पहले भली प्रकार मिटटी में मिला लें।

नर्सरी तैयारी करना
टमाटर की नर्सरी जून-जुलाई में सर्दी की फसल के लिए तथा नवम्बर, दिसम्बर माह में बसन्तकालीन फसल के लिए नसर्री तैयारी की जाती है। टमाटर की पौध तैयार करने के लिए नर्सरी में कुछ सावधानियों की आवष्यकता होती है, खास तौर से वर्षा ऋतु में, क्योंकि इस मौसम में आर्द्रगलन की समस्या अधिक मात्रा देखने में आती है।
वर्षा में नर्सरी की क्यारी उठी हुई बनायें ताकि पौध को अधिक वर्षा के कारण नुकसान न हों। इस प्रकार एक एकड़ में पौध रोपन के लिए 3.0 x 1.0 मी. क्यारी बनाये व बीज का र®पण करें।

बीज शोधन
टमाटर के बीज को बिजाई के पहले 2.5 ग्राम बाविस्टीन या एमीसान या कैप्टान या थिराम नामक दवा प्रति किलो बीज में मिलाकर बोयें। आर्द्रगलन की समस्या होने पर बीज के उगने के बाद 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में) कैप्टॉन से नर्सरी की क्यारियों को उपचारित करें। नर्सरी की क्यारियों में बिजाई करने के बाद सड़ी हुई गोबर की खाद से क्यारियों को ढक दें तथा बीजों के अंकुरण के बाद उन्हें क्यारियों के ऊपर से हटा दें। ऐसा करने से नर्सरी की सतह पर उचित नमी बनी रहती है। जो कि उगने में मदद होती है। गर्मी के दिनों में आमतौर पर 4 सप्ताह में टमाटर की पौध तैयार हो जाती है। जबकि सर्दी के मौसम में लगभग 8-10 सप्ताह का समय लग जाता है। नर्सरी में समय पर सिंचाई करना, खरपतवार निकालना तथा कीट प्रकोप होने पर कीटनाशक दवा का छिड़काव करना भी आवश्यक है।

बीज की मात्रा
टमाटर फसल की रोपाई के लिए लगभग 400-500 ग्राम देशी बीज तथा 200 ग्राम हाइब्रीड बीज प्रति एकड़ हेतु पर्याप्त होगा।

रोपाई
सर्दी की फसल की रोपाई जुलाई-अगस्त में तथा बसन्तकालीन फसल की रोपाई मध्य-जनवरी से मध्य फरवरी में करे। आमतौर पर नर्सरी की पौध में 5-6 सच्ची पत्तियां होनी चाहिए। क्यारियों में लाईन से लाईन की दूरी लगभग 60 से.मी. तथा पौधों की बीच 45 से.मी. रखें। दो पौध रोपने पर टमाटर की उपज में वृद्धि पाई गई है।

खाद एवं उर्वरक
खेत की तैयारी के समय गोबर या कम्पोस्ट की खाद देने के अलावा एक एकड़ में लगभग 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस तथा पोटाष की कमी वाले क्षेत्र में 20 किलोग्राम पोटाश की पूरी मात्रा व नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा दें। नाइट्रोजन बाद की बाकी बची हुई मात्रा क्रमषः पौध रोपण के चार सप्ताह बाद व दूसरी मात्रा पहली मात्रा के एक माह बाद बराबर-बराबर दें। नाइट्रोजन खाद देने के बाद सिंचाई करना आवष्यक है। टमाटर की फटने की समस्या रोकने के लिए 0.3 प्रतिषत बोरेक्स का छिड़काव फल लगने के समय व इसके 15 दिनों बाद करे तथा तीसरा छिड़काव जब फल पकने शुरु हो तब करें।

सिंचाई
पहली सिंचाई पौध रोपण के तुरन्त बाद तथा इसके पश्चात् आवश्यकतानुसार 8-10 दिनों के अंतर पर करें। टमाटर में सिंचाई मुख्यतः टपक विधि से की जाती है परन्तु ग्रीष्मकाल में सप्ताह में द® बार सिंचाई देना आवष्यक है।

खरपतवार नियंत्रण
साधारणतयाः दो निदाई-गुड़ाई की आवष्यकता पड़ती है। पहली लगभग 20-25 दिनों बाद तथा दूसरी पौध रोपण के 40-45 दिनों के बाद। इसी समय मिट्टी चढ़ाने का काम भी करना चाहिए। टमाटर की फसल में रासायनिक खरपतवार नियंत्रण भी संभव है। खडी फसल में यदि खरपतवार अध्ािक ह® त® रासायनिक खरपतवार नियंत्रक मेट्रीब्यूजीन 350 ग्राम से 500 प्रति हे. की दर से छिड़काव करें।

वृद्धि नियामक का प्रयोग
टमाटर के फलों के कम व अधिक तापमान में सुचारु रुप से पकने के लिए पैराक्लोरोफिनाग्जी-एसिटिक एसिड (पी.सी.पी.ए.) के 50 पी.पी.एम. (10 ग्राम पी.सी.पी.ए.) को थोडे़ से अल्कोहॉल में घोलकर फिर 200 लीटर पानी में मिलाकर टमाटर के पौधों पर फूल आने की अवस्था में छिड़काव करना चाहिए।

कटाई
टमाटर के फलों को जब उनकी बढ़वार पूरी हो जाये तथा लाल व पीले रंग की धारियां दिखने लगें उस अवस्था में तोड़ लेना चाहिए व कमरें मे रख कर पकाना चाहिए। टमाटर को पौधे पर पकने की अवस्था में चिडि़यों से नुकसान होने की सम्भावना रहती है, तथा साथ ही साथ टमाटर को लंबे दूरियाँ तक भेजा जा सकता है।

हानिकारक कीड़े
1. सफेद मक्खी- यह सफेद मटमैले रंग की अंडे के आकार की छोटी मक्खी होती है। इसके सफेद पंखों पर मोम की तह होती है। षिषु व प्रौढ़ पत्तों की निचली सतह से रस चूसते हैं। जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं। यह मक्खी मरोडि़या (विषाणु) रोग फैलाती है। प्रकोप बरसात की फसल में अधिक होता है।
रोकथाम
इस कीट के नियंत्रण के लिए 400 मिली. दैहिक किटनाषक जैसे साइन®सेड को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ 15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें।

2. फल छेदक सूण्डी (हेलिकोवरपा आरमीगेरा)- यह हरे या पीले भूरे रंग की सूण्डी है। इसके शरीर के ऊपरी भाग पर तीन लम्बी कटवां सलेटी रंग की दोनों ओर सफेद धारियां होती है। ये सुण्डियां कोमल पत्तियों को खाती है। कलियों, फूलों व फलों में सुराख कर देती है। ग्रसित फल बाद में सड़ जाती है। ये टमाटर के अलावा चना, अरहर, कपास और मक्का को भी नुकसान पहुंचाती है।
रोकथाम
इस कीट का प्रकोप होने पर नीचे लिखी किसी एक कीटनाषी का छिड़काव (250 लीटर पानी में) प्रति एकड़ करें। आवष्यकतानुसार छिड़काव 15 दिनों के अन्दर पर दोहरायेंः
क. 1. 75 मिली. फैन्वेलरेट 20 ई.सी.।
2. 200 मिली. डेल्टामेथ्रिन 2.8 ई.सी.।
3. 60 मिली. साइपरमेथ्रिन 25 ई.सी./150 मिली. साइपरमेथ्रिन 10 ई.सी.
ख. 1. 500 मिली. इमिडाक्ल®प्रिड 35 ई.सी.।
2. 500 ग्राम कार्बेटिल 50 घुलनशील पावडर।
नोट
1. छिड़काव से पहले खाने योग्य तोड़ लें।
2. कीटग्रसित फल तोड़कर मिट्टी में दबा दें।
3. जरुरत पड़ने पर बारी-बारी से उपर्युक्त में दी गई कीटनाषियों को छिड़कें।

बिमारियां एवं उनकी रोकथाम
1. आर्द्रगलन रोगः- इस रोग से पौधे उगने के कुछ दिन बाद मर जाते हैं।

रोकथाम

  • बिजाई से पहले बीज का उपचार ढाई ग्राम बाविस्टीन या कैप्टॉन या थीरम दवाई एक किलोग्राम बीज में मिलाकर करें।
  • उगने के बाद पौधों को गिरने से बचाने के लिए 0.2 प्रतिषत (2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में) कैप्टॉन के छिड़काव से नर्सरी की सिंचाई करें।

2. अगेती झुलसाः- गोल और तिकोने-गहरे-भूरे या काले दाग पत्तों और फलों पर पड़ जाते है। तने पर पहले अंडाकार और फिर बेलनाकार से घाव बन जाते हैं। जिससे पौधे सूखकर भर जाते हैं। फलों पर धब्बे टहनी वाली तरफ से आरंभ होते हैं।
रोकथाम
क. अधिक सिंचाई न करें।
ख. खूब गहरी सड़ी खाद डालें।
ग. आर्द्रगलन बीमारी के लिए बनाई गई दवाई के बीज का उपचार करें।
घ. फसल पर जीनेव/मिनेव/इण्डोफिल एम-45 का 400 ग्राम प्रति एकड़ (200 लीटर पानी में) के हिसाब से 10-15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।

3. पत्ती मरोड़ व काली धारियों वाला मोजैक आदि विषाणु रोगः- पौधों की बढ़वार रुक जाती है, पत्तियां मोटी, भद्दी, मुड़ी हुई और गल जाती है। तने पर मुड़ी हुई और गल जाती है, जो मरा हुआ सा दिखाई देता है।
रोकथाम
क. स्वस्थ और रोगरहित बीज लेना चाहिए।
ख. बिमारी फैलाने वाले कीड़ों का नर्सरी व खेतों में इलाज करें।
ग. 10-15 दिन के अन्तर पर कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करें। जैसा कि सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए बताया गया।
घ. रोगी पौधों को आरंभ से ही निकाल कर नष्ट कर दें।

4. जड़ गॉठ रोगः- जड़ों की गाठों वाले सूत्रकृमि से ग्रस्त पौधे पीले पड़ जाते हैं तथा उनकी बढ़वार रुक जाती है। पौधों की जड़ों में गांठे बन जाती है या वे फूल जाती है।
रोकथाम
इसकी रोकथाम के लिए नर्सरी में कार्बोप्यूरॉन (फ्यूराजन-3 दानेदान) 7 ग्राम प्रति वर्ग मीटर भूमि में मिलाये। मई व जून में खेत की 2 से 3 गहरी जुताइयां (10 से 15 दिन के अंतर से) करने से सूत्रकृमियों की संख्या बहुत घट जाती है। सूत्रकृमि ग्रसित खेतों में टमाटर की हिसार ललित किस्म लगायें व टमाटर खेत के परिध्ाि में गेंदा लगाने से सूत्रकृमिय®ं से टमाटर क® बचाया जा सकता है।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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