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सरसों की अधिक उपज के लिए सस्य प्रबंधन के साथ पौध सरंक्षण भी आवश्यक

डॉ.पी.के.भगत और अखिलेश लकड़ा

सरसों एक शीतकालीन फसल है,जिसकी खेती बिभिन जलवायु में असिंचित एवं सिंचित दोनों अवस्थाओ में की जा सकती है ! छत्तीसगढ़ में धान के बाद सरसों की खेती की अपार संभावनाय हैं, जिससे अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है ! यह एक कम लागत एवं उच्च आय वाली तिलहनी फसल हैं, जिसमें ३० – ४० % तक तेल की  मात्रा होती हैं ! सरसों एक ऐसी फसल हैं, जिसे मिश्रित फसल या अंतर्वार्तीय फसलों के रूप में लेकर अधिक  मुनाफा ले सकते हैं !

इसके हरे पौधों का प्रयोग जानवरों के हरे चारे के रूप में लिया जा सकता है ! साथ में पशु आहार के रूप में बीज, तेल, खली को को भी लिया जा सकता है, इसकी खली में लगभग ५ से ९% नत्रजन, २से २.५% फास्फोरस एवं १ से १.५% पोटाश होता है !

भूमि का चुनाव: सरसों की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती हैं, किंतु उतम जल निकास वाली भूमि अच्छी मानी जाती हैं ! सरसों की खेती हेतु बलुई दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है! यह फसल हल्की क्षारीयता को सहन कर सकती है लेकिन अम्लीय नहीं होनी चाहिए !

भूमि की तैयारी: खरीफ में धान वाले खेतों में धान की कटाई जमीन के अधिकतम नीचे से काटे ताकि धान के खेत में न बचने पायें ! सरसों के बीज का आकर बहुत छोटा हैं, अतः बीज शय्या का भुरभुरा एवं बारीक़ होना आवश्यक हैं ! इसके लिए दो गहरी जुताई करके, पाटा चला कर ढेले फोड़ ले और खेत समतल कर बुआई संपन्न करे !

उन्नत किस्मों का चुनाव:-

किस्में अवधि (दिन) उत्पादकता (कि.ग्रा. / हेक्ट.) तेल की मात्रा (%)
पूसा बोल्ड १४०-१४५ १८००-२००० ३८-४०
पूसा जयकिसन १६०-१८० १८००-२२०० ३८-४०
क्रांति ११०-११५ १४००-१६०० ३८-४०
वरुणा १२५-१४० १८००-२००० ३५-३७

अंतर्वार्तीय फसलेरबी मौसम में लगाई जाने वाली फसले जैसे गेहू , चना , मसूर , गन्ना एवं आलू के साथ अन्त्वार्तीय फसल के रूप में सरसों लगाई जा सकती हैं !सरसों की एक कतार के बाद गेहू की दो , चने की दो से पांच , मसूर की एक , गन्ने की एक एवं आलू की तीन कतार सफलतापूर्वक लगाई जा सरती हैं ! चना एवं सरसों की अंतर्वार्तीय फसल में चना या सरसों की शुद्ध फसल से ज्यादा आमदनी होती हैं !

बुआई का समय: सरसों की बुआई नवम्बर अंत तक हो जानी चाहिए ! देरी से बुआई करने पर सरसों की फसल में कीट व्याधि का प्रकोप अधिक होता हैं !

बीज दर: अच्छा उत्पाद प्राप्त करने हेतु प्रति इकाई पौधे संख्या पर्याप्त होना चाहिए ! साधारतः २ किलो ग्राम बीज एक एकड़ के लिए पर्याप्त होता हैं ! अंतर्वार्तीय फसल लेने पर बीज की मात्रा कतारों के अनुपात पर निर्भर करती हैं !

बीजोपचार: बीजो के स्वस्थ वृद्धि एवं रोगों से बचाओ के लिए बीजो का उपचार करना चाहिए ! बीजो के बुआई के पूर्व कार्बेन्डाजिम या थीरम का प्रयोग २-३ ग्राम प्रति किलो बीज में करना चाहिए !

बुआई: सरसों की बुआई हेतु 2४-२६ *C तक का तापमान बहुत उपयोगी होता है! इसकी बुआई सिंचित क्षेत्रो में १५ अक्टूबर से १५ नवम्बर तक कर देनी चाहिए! सरसों की बुआई कतारों मे करनी चाहिए! बीजों को कतार मे निर्धारित दुरी पर बोने से उत्पादन में वृद्धि होती है! कतार से कतार की दुरी ३० सें. मी. और पौध से पौध की दुरी १० सें. मी. रखनी चाहिए! सरसों के बीज का चिकता और छोटा होने के कारण इसे बुआई पूर्व बीज का एक भाग और 20 भाग रेट या राख या गोबर खाद के साथ मिला कर देशी हल के पीछे कतार मे कर देनी चाहिए! सिंचित क्षेत्र में बीज की गहराई ५ सें. मी. और असिंचित क्षेत्र में नमी के अनुसार रखनी चाहिए !

आवश्यक सिंचाई : सरसों से अधिक उपज प्राप्त करने हेतु उसे सही समय पैर सिंचाई देना आवश्यक होता है ! सरसों में फूल आने एवं दाना भरने की अवस्था को क्रांतिक अवस्था माना जाता है, जिसमें सिंचाई की व्यवस्था करना आवश्यक होता है !

खाद उर्वरक प्रबंधन: सरसों की बुआई के ३ से ४ सप्ताह पूर्व खेतों मे ८ से १० टन सड़ी गोबर की खाद दाल कर खेत की तैयारी करनी चाहिए ! अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए उर्वरक की सही मात्रा, सही समय में देना अवश्यक है ! सरसों हेतु पोषक तत्व नत्रजन 20 से 25 कि.ग्रा./एकड़, फास्फोरस १० से १२ कि.ग्रा./एकड़, पोटाश ८ से १२ कि.ग्रा./एकड़ और सल्फर १० से १२ कि.ग्रा./एकड़ की दर से देनी चाहिए ! इन पोषक तत्वों की पूर्ति हेतु यूरिया ५० कि.ग्रा., सि. सुपर फास्फेट ७५ कि.ग्रा. एवं पोटाश १५ कि.ग्रा. का प्रयोग प्रति एकड़ करना चाहिए !

निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण: सरसों की निराई उत्पादन बढाने हेतु आवश्यक हैं पौधों की संख्या अधिक हो तो बोआई के 20 से 25 दिन बाद निराई के साथ छटाई कर पौधे निकालने चाहिए ! खरपतवार नियंत्रण हेतु बुआई के पूर्व फ्लुक्लोरेलीन रसायन ३०० -४०० ग्राम सक्रिय तत्व के प्रति एकड़ छिडकाव करके मिटटी में अच्छे से मिला देना चाहिए एवं बुआई के ३० दिनों बाद हाथो से निदाई करने से सर्वोत्तम नींदा नियंत्रण होता हैं एवं अधिकतम उत्पादन प्राप्त होती  हैं !

कटाई: सरसों की फसल १२०-१५० दिन में तैयार हो जाती है! इस फसल को उचित समय पर कटाई करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यदि समय पे कटाई नहीं की गई तो फलियां चटकने लगती है जिससे ५ से १०% उपज में कमी अ जाती है ! जैसे ही पौधे की पत्तियों और फलियों का रंग पीला पड़ने लगें कटाई कर लेनी चाहिए !

रोग प्रबंधन:

पर्ण पीती , श्वेत किटट व चूर्णिल असिता के प्रमुख रोग हैं ! सरसों में लगने वाले प्रमुख रोगों का प्रबंधन निम्न हैं-

  • पर्ण चित्ती या अल्टरनेरया अंगमारी:- इस रोग में पत्तियों पर गहरे भूरे धब्बे पड़ जाते हैं जो गोलाकार होते हैं ! इस रोग के लिए समय पर बुआई एवं बीजोपचार जरुरी हैं ! रोग के लक्षण दिखाई देने पर मेन्कोजेब २.५ ग्राम का प्रयोग प्रति लीटर पानी के हिसाब से करना चाहिए !
  • सफ़ेद धब्बा या रस्ट:- रस्ट रोग में पत्तियों पर सफ़ेद या भूरे धब्बे दिखाई देते हैं जो फैलते जाते हैं ! इस रोग के नियंत्रण के लिए मैन्कोजेब का २.५ प्रति घोल छिडकाव १५-१५ दिनों के अन्तराल करने से रोग पर प्रभावी नियंत्रण होता हैं !

सरसों की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट एवं उनका नियंत्रण निम्न हैं  –

  • सरसों का एफिड (चेंपा):- यह हल्के पीले रंग का होता है इसकी लम्बाई १.० से १.५ मि.ली. होती है ! इसके प्रौढ़ एवं शिशु पतियों की निचली सतह और फूलों की टहनियों पर समूह में रहते हैं और ये पौधों के बिभिन्न भागो से रस चूसकर नुकसान पहुचाते हैं ! एफिड के प्रकोप से उत्पादन में बहुत कमी आती हैं ! इसके नियंत्रण के लिए समय पर बुआई , संतुलित उर्वरक एवं उन्नतशील जातियों का प्रयोग सबसे सस्ती विधि हैं ! रासायनिक नियन्त्रण हेतु डाईमिथोएट ३० इसी. का १ प्रति घोल बना कर दोपहर में १५ – १५ दिनों के अन्तराल से छिडकाव करना चाहिए !
  • सरसों आरा मक्खी:- इस कीड़े की मक्खी का रंग धड़ नारंगी, सिर व पैर काले तथा पंख धुएं जैसा होता है इस कीड़े की सुंडियां फसल के उगते ही पत्तों को काट- काट कर खा जाती है और अधिक आक्रमण होने पे ये तने की छाल तक खा जाती है ! अतः इस कीट का आक्रमण होने पर कार्बारिलरसायन का १० कि.ग्रा. छिडकाव प्रति एकड़ करना चाहिए !
  • चितकबरा कीड़ा (पेंटेड बग):– यह कीड़ा काले रंग का होता है, जिस पर लाल पीले और नारंगी धब्बे होते हैं ! प्रौढ़ व शिशु सरसों की फसल को दो बार नुकसान पहुंचाते हैं पहली बार सरसों की फसल उगने के तुरंत बाद फिर दूसरी बार सरसों की फसल की कटाई के समय पौधों के बिभिन्न भागों से रस चूसते है !इसके नियंत्रण हेतु बीज को ५ ग्राम एमिडाक्लोप्रिड ७० w.s. प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें !

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