

परिचय
आलू को सब्जियों का राजा कहा जाता है। वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से यह एक तना है। इसकी उद्गम स्थान दक्षिण अमेरिका का पेरू माना जाता है। यह गेहूं, धान तथा मक्का के बाद सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है। इसकी खेती रबी मौसम या शरद ऋतु में की जाती है। इसकी उपज क्षमता समय के अनुसार सभी फसलों से ज्यादा है इसलिए इसको अकालनाशक फसल भी कहते हैं। भारत में आलू का उत्पादन मुख्यतः सब्जी के लिए किया जाता है। यहाँ कुल उत्पादन का करीब नब्बे प्रतिशत सब्जी के रूप् में प्रयोग किया जाता है। सब्जी के अलावा इसका उपयोग प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार करने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त इससे अच्छे प्रकार का स्टार्च, अल्कोहल और प्रोटीन भी मिलता है। यह जमीन के नीचे पैदा होता है। इसका पौधा लगभग 2 फिट तक बड़ा होता हैं।

उपयोग एवं पोषक मूल्य
आलू कार्बोहाइड्रेट का सर्वोत्तम स्त्रोत है जो शरीर को ऊर्जा पहुँचाने का एक सबसे अच्छा माध्यम है। आलू में रेशा उच्च मात्रा में पाया जाता है जो पाचन तंत्र के लिए अच्छा होता है तथा संतुष्टि प्रदान करता है खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा आलू में पोटैशियम, फॉस्फोरस, लोहा और कैल्शियम आदि तत्व भी अधिक मात्रा में पाये जाते है । जन्तु प्रोटीन (मीट, चिकन, बीफ, एवं दूध) की तुलना में आलू सर्वोतम वानस्पतिक प्रोटीन का स्रोतहै । आलू प्रति इकाई क्षेत्रफल एवं समय मेंअन्य सभी फसलों की तुलना में अधिक खाद्य पैदा करने की क्षमता रखता है । आलू से महंगी चिप्स, भुजिया, बेबी, फुड, सूप, सोंस, आलूआटा, ग्रेनूलस आदि प्रमुख प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार किये जातेहै । आलू के आटे का उपयोग बड़ी मात्रा में बिस्कुट बनाने के प्रयोग में लाया जाता है । इसके अतिरिक्त आलू का बड़ी मात्रा में प्रयोग समोसा, पेटीज और डोसा आदि फास्ट फूड बनाने में उपयोग किया जाता है ।
मिट्टी औरजलवायु
दोमट तथा बलुई दोमट मिट्टियाँ जिसमें जैविक पदार्थ की बहुलता हो आलू की खेती के लिए उपयुक्त है। अच्छी जल निकासवाली, समतल और उपजाऊ जमीन आलू की खेती के लिए उत्तम मानी जाती है तथा पीएच 5-5.5 सबसे अच्छा माना जाता है। आलू की खेती में तापमान का अधिक महत्त्व है। आलू की अच्छी उपज के लिए औसत तापमान कंद बनने के समय 17 से 21 डिग्री सेंटी ग्रेड उपयुक्त माना जाताहै।
खेती की तैयारी
सितम्बर माह के अंतिम सप्ताह में हल से चार से पाँच बार जोताई कर देनी चाहिये, जिससे 25 सेंटी मीटर गहराई तक खेत तैयार हो जाए हल्की तथा अच्छी जुती मिट्टी में आलू कंद अधिक बैठते हैं। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा दे देने से मिट्टी समतल तथा भुरभूरी हो जाती है एवं खेत में नमी का संरक्षण भी होता है। अंतिम जुताई के साथ हीं 20 टन प्रति हेक्टर सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में देकर बराबर मिला देने से पैदावार में काफी वृद्धि हो जाती है। दीमक के प्रकोप से बचने के लिए अंतिम जोताई के समय ही 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से लिन्डेन मिट्टी में मिला देना चाहिये।
फसल-चक्र
प्रतिवर्ष एक ही खेत में आलू की खेती करने से मिट्टी कीड़े तथा रोगों का घर बन जाती है। इसलिए उचित फसल-चक्र अपनाकर खेत बदलते रहना चाहिये। आलू दो फसली और तीन फसली सघन खेती प्रणाली में साधारणतः अच्छी पैदावार देता है। कम दिनों में तैयार होने वाली किस्में जैसे कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी कुबेर इत्यादि बहुफसली सघन खेती में उपयुक्त पायी गयी है। आलू के साथ कुछ उपयुक्त फसल-चक्र इस प्रकार है, जैसे-मक्का-आलू-गेहूं, मक्का-आलू-प्याज, मक्का-आलू-भिंडी और मक्का-गेहूं-मूंग आलू के साथ कुछ फसलों की मिश्रित खेती भी की जाती है। आलू के दो मेडों के बीच गेहूं फसल सफलतापूर्वक उगायी जा सकती है।
आलू की उन्नत किस्में
अगेती किस्में : कुफऱी चंदरमुखी, कुफरी अलंकार, कुफरी पुखराज, कुफरी ख्याती, कुफरी सूर्या, कुफरी अशोका, कुफरी जवाहर, जिनकी पकने की अवधि 80 से 100 दिन है।
मध्यम समय वाली किस्में : कुफरी बादशाह, कुफरी ज्योति, कुफरी बहार ,कुफरी लालिमा, कुफरी सतलुज, कुफरी चिप्सोना- 1, कुफरी चिप्सोना- 3, कुफरी सदाबहार, कुफरी चिप्सोना- 4, कुफरी पुष्कर जिनकी पकने की अवधि 90 से 110 दिन है।
देर से पकने वाली किस्में : कुफरी सिंधुरी कुफरी फ़्राई सोना और कुफरी बादशाह जिनकी पकने की अवधि 110 से 120 दिन है।
संकर किस्में : कुफरी जवाहर (जे एच- 222), 4486- ई, जे एफ- 5106, कुफरी सतुलज (जे आई 5857) और कुफरी अशोक (पी जे- 376) आदि है।
विदेशी किस्में : कुछ विदेशी किस्मोें को या तो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल पाया गया है या अनुकूल ढाला गया है, जो इस प्रकार है, जैसे-अपटूडेट, क्रेग्स डिफाइन्स और प्रेसिडेंट आदि है।
बीज उपचार
ओगरा, दीमक, फंफूद और जमीन, जनित बीमारी से बचाव के लिए बीज को उपचारित कर लेना चाहिए। 5 लीटर देसी गाय का मट्ठा लेकर 15 ग्राम बराबर हींग लेकर अच्छी तरह से बारीक़ पीसकर घोल बनाकर उसमे बीज को उपचारित करे घंटे सुखाने पर बुवाई करंे। 5 देसी गाय के गोमूत्र में बीज को उपचारित 2-3 घंटे सूखने के बाद बुवाई करें।
बुआई
आलू की बोआई करने से पहले बीज को कोल्ड स्टोरेज से निकालकर 10-15 दिनोेें तक छायादार जगह में रखें. सड़े और अंकुरित नहीं हुए कंदों को अलग कर लें. बोने के लिए 30-55 मिमी. व्यास का अंकुरित (चिटिंग) आलू बीज का प्रयोग करना चाहिए। बीज कंदों को इन्डोफिल एम- 45 दवा के 0.2 प्रतिशत घोल में 10 मिनट तक डुबाकर उसे उपचारित कर लेना चाहिये। एक हेक्टेयर के लिए 30-35 कुन्तलबीज की आवश्यकता पड़तीहै। खेत में उर्वरकों के इस्तेमाल के बाद ऊपरी सतह को खोदकर उस में बीज डालें और उस के ऊपर भुरभुरी मिट्टी डाल दें। लाइनों की दूरी 50-60 सेंटीमीटर होनी चाहिए, जबकि पौधों से पौधों की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर होनीचाहिए।
निराई-गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना
पौधे जब 25 से 30 दिनों के हो जाये तो पंक्तियों में निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को साफकर देना चाहिये और मिट्टी को भुरभूराकर देना चाहिये। निराई-गुड़ाई के बाद में नाईट्रोजन खाद की आधी मात्रा जड़ से 50 सेंटीमीटर की दूरी पर छिड़ककर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिये।आलू के जड़ और कंद किसी भी अवस्था में दिखाई न दें क्योंकि खुला आलू कंद प्रकाश के सम्पर्क में हरे हो जाते हैं और खाने योग्य नहीं रहते। बीच-बीच में खुले आलुकंदों को मिट्टी से ढकते रहना चाहिये। यदि आप खरपतवार पर कीटनाशक से नियंत्रण चाहते है तो पेंडामेथलिन 30 प्रतिशत 3.5 लिटर का 900 से 1000 लिटर पानी में घोलबनाकर बुवाई के 2 दिन तक प्रति हेक्टेयर छिड़काव कर सकते है, जिसे खरपतवार का जमाव ही नही होगा।
खाद और उर्वरक
आलू बहुत खाद खाने वाली फसलहै। यह मिट्टी के ऊपरी सतह से ही भोजन प्राप्त करती है। इसलिए इसे प्रचुर मात्रा में जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इसमें सड़े गोबर की खाद 200 किं्वटल तथा 5 किं्वटल खल्ली प्रति हें. की दर से डाला जाता है। खल्ली में अंडी, सरसों, नीम एवं करंज जो भी आसानी से मिल जाय उसका व्यवहार करे। ऐसा करने से मिट्टी की उर्वराशक्ति हमेशा कायम रहती है तथा रासायनिक उर्वरक पौधोें को आवश्यकतानुसार सही समय पर मिलता रहता है। रासायनिक उर्वरकों में 150 किलोग्राम नेत्रजन 330 किलोग्राम यूरिया के रूप में प्रति हें. की दर से डाला जाता है। यूरिया की आधी मात्रा यानि 165 किलोग्राम रोपनी के समय तथा शेष 165 किलोग्राम रोपनी के 30 दिन बाद मिट्टी चढ़ाने के समय डाला जाता है। 90 किलोग्राम स्फुर तथा 100 किलोग्राम पोटाश प्रतिहें. की दर से डाला जाता है। स्फुर के लिए डी.ए.पी. या सिंगल सुपरफास्फेट दोनों में से किसी एक ही खाद का प्रयोग करें। डी.ए.पी. की मात्रा 200 किलो ग्राम प्रति हें. तथा सिंगल सुपरफास्फेट की मात्रा 560 किलोग्राम प्रति हें. तथा पोटाश के लिए 170 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ़ पोटाश प्रतिहें. की दर से व्यवहार करें। सभी उर्वरकों को एक साथ मिलाकर अंतिम जुलाई के पहले खेत में छिंठ कर जुताई के बाद पाटा देकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। रोपनी के समय आलू की पंक्तियों में खाद डालना अधिक लाभकर है परन्तु ध्यान रहे उर्वरक एवं आलू के कंद में सीधा सम्पर्क न होन हीं तो कंद सड़ सकता है। इसलिए व्हील हो या लहसूनिया हल से नाला बनाकर उसी में खाद डालें। खाद की नाली से 5 से 10 सेंमी. की दूरी पर दूसरी नाली में आलू का कंद डालें।
सिंचाई
आलू में पहली सिंचाई आलू बोआई के एक सप्ताह बाद करनी चाहिये और उसके बाद प्रत्येक 8 से 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिये। आलू खुदाई के दो सप्ताह पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिये। ध्यान यह रखा जाना चाहिये, कि प्रत्येक सिंचाई में पानी आधी मेड़ तक ही देना चाहिये।
कीट व रोग नियंत्रण
समय परकीट व रोग नियंत्रण नहीं करने से फसल बर्बाद हो जाती है।
रोग नियंत्रण:
अगेती झुलसा:- यह रोग आलटरनेरिया सोलेनाई द्वारा उत्पन्न होतेहैं। पत्तियों पर कोणीय पिरगलन धब्बो, अंडाकार या वृत्ताकार रूप में दिखाई देताहै। धब्बे काले भुरे रंग के होते है। कंद पर भी दाग आ जाते हैं।
नियंत्रण के उपाय:- एगलाल से कंद उपचारित कर लगाये। जिनेब (0.2प्रतिशत) या डायएथेनजेड-78 (0.25 प्रतिशत) या डायथेन एम -45 (0.25 प्रतिशत) घोल का छिड़काव करें।
पछेती झुलसा- रोग फाइटोप्थोराइन्फेसटेन्स द्वारा उत्पन्न होता है। पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। बाद में यह काले हो जाते है। पत्तियों की निचली सतह सफेद कपासजैसा बढ़ता हुआ दाग दिखाई देता है। ग्रसित कंदो पर हल्के भूरे रंग के दाग और भुरे चित्तीनुमा चिन्ह दिखाई पड़ते देता है। कभी-कभी बीमारी माहामारी का रूप् धारण कर लेती है।
नियंत्रण के उपाय:- डायथेनजेड- 78 (0.25 प्रतिशत) का उायथेन एम-45 (0.25 प्रतिशत) घोल का छिड़काव करें। रोग निरोधी किस्में लगाएं।
जीवाणु मुरझाना- यह रोग स्यूडोमोनास सोलैनैसियेरत जीवाणु के कारण होता है। पौधा तांबोरंग का होकर सूख जाता है।
नियंत्रण के उपाय:-संक्रमित खेत में आलू न लगाएं। फसल चक्र अपनाएं। रोगग्रसित पौधों को उखाड़ कर जला दें। कैल्शियमआक्साइड 125 किलोहेक्टेयर की दर के मिट्टी में मिलाएं।
विषाणू तथा माइकोप्लाज्मा रोग:- दो प्रकार के विषाणु आलू की फसल में विषाणू रोग फैला हैं। संस्पर्शी तथा फैलाये जाने वाले विषाणू रोगों से आलू के उत्पादन में अधिक हानि होती है।
नियंत्रण के उपाय:- कीटो की रोकथाम करें। मुख्य रूप से माहू तथा लीफ हॉपर। रोग प्रगट होने के पहले रोगो रडायमेथोएट या थायोडान 0.2 प्रतिशत का देना चाहिए । साथ ही रोगी पौधो को निकालकर नष्ट कर दें।
कीट नियंत्रण:
एफिड/माहू:- वयस्क तथा छोटे एफिड पत्तियों का रस चूसते हैं। इससे पत्तियां पीली नीचे की ओर मुड़ जाती है। इस कीट से हानि का मुख्य कारण यह है कि कीट विषाणुरोग फैलाने में सहायक होता है।
लीफहापर /जैसिड:- पत्तियों की निचली सतह पर रहकर रस चूसते हैं। ग्रसित पत्तियां पीलीपड़ जाती हैं। यह कीट माइक्रोप्लाज्मा (वायरस रोग) फैलाने में सहायक होता है।
नियंत्रण के उपाय:- एफिड, जैसिड व हापर की रोकथाम के लिए बुवाई के समय थीमेट 10 जी 10-15 किलो प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय उपयोग करें। डायमेथोएट या थायोडान 0.2 प्रतिशत का रोगर 0.1 से 0.15 प्रतिशत 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
कुटआ कीट:-यह कीट पौधों के बढ़ाने पर ही डंठलों को जमीन की सतह से ही काट देता है। ये कीटरात्रि में ज्यादातर क्रियाशील होते हैं। कंदो में भी छेदकर देता है, कंद बिक्री योग्य नहीं रहते।
नियंत्रण के उपाय:- थीमेट 10 जी 10-15 किलो प्रतिहेक्टेयर की दर से उपयोग करें।
टयूबर मॉथ:- खेतों में इसके लारवा कोमल पत्तियों, डठलों और बाहर निकले हुए कंदो में छेदकर देतेहै। देशी भंडारों में इसके प्रकोप से अत्यधिक क्षति होती है।
नियंत्रण के उपाय:- थीमेट 10 जी का 10-15 किलो प्रतिहेक्टेयर की दर से उपयोग करें। आलू को खेत मेंढक कर रखें। देशी भण्डारण में आलू को शुष्करेत से 3-4 से.मी. ढकने से नियंत्रण किया जा सकता है या संग्रहण में मिथाइलब्रोमाइड धुमक उपयोग करें। शीत संग्रहण सर्वोत्तम है।
पाला से फसल का बचाव
आमतौर पर पछेती फसल पर पाला का असर ज्यादा होताहैं। अगेती फसल की खुदाई जनवरी माह तक हो जातीहै। इसलिए इस पर पाला का असर नहीं होता। पछेते आलू में दिसम्बर और जनवरी माह के अधिक ठंढा की आंशका होने पर फसल की सिचाई कर देनी चाहिये। जमीन भींगी रहने पर पाला का असर कम हो जाता है।
खुदाई
बाजार भाव एवं आवश्यकता को देखते हुए रोपनी के 60 दिन बाद आलू का खुदाई की जातीहै। यदि भंडारण के लिए आलू रखना होतो कंद की परिपक्वता की जाँच के बाद ही खुदाई करें। परिपक्वता की जाँच के लिए कंद को हाथ में रखकर अंगूठा से दवाकर फिसलाया जाताहै यदि ऐसा करने पर कंद का छिलका अगल नहीं होता है तो समझा जाताहै कि कंद परिपक्व हो गया है। ऐसे कंद की खुदाई करने से भंडारण के कंद सड़ता नहीं है। खुदाई दिन के 12.00 बजे तक पूरा कर लेनी चाहिए। खुदे कंद को खुले धूप में न रखकर छायादार जगह में रखा जाता है। धूप में रखने पर भंडारण क्षमता घट जाती है। 15 मार्च तक आलू के सभी प्रभेदों की खुदाई अवश्य पूरी कर लेनी चाहिए। खुरपी या पोटेटो डीगर से खुदाई की जाती है। खुरपी से खुदाई करने पर ध्यान रहे आलू कटने न पावें।
पैदावार
परिपक्वता अवधि एवं अनुशंसित फसल प्रणाली को अपनाने पर रोपनी के 60 दिन बाद 100 किं्वटल, 75 दिन बाद 200 क्विंटल, 90 दिन बाद, 300 क्विंटल तथा 105 दिन बाद प्रभेद के अनुसार 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जाती है। परन्तु यदि प्रथम सिंचाई रोपनी के 10 दिन बाद तथा 20 दिन के अंदर न हुआ तो उपज आधी हो जायगी। खेत गहराई से जोतना जरूरी है। अच्छी फसल के लिए खेती की हेंगाई मतलब खेती की मिट्टी फोड़ना बहुत जरूरी है।
आलू का भण्डारण
आलू की सुषुप्ता अवधि भण्डारण को निर्धारित करती है। भिन्न-भिन्न प्रजातियों के आलू की सुषुप्ता अवधि भिन्न-भिन्न होती है, जो आलू खुदाई के बाद 6-10 सप्ताहतक होती है। यदि आलू को बाजार में शीघ्र भेजना है तो शीतगृह में भण्डारित करने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए कच्चे हवादार मकानों, छायादार स्थानों में आलू को स्टोर किया जा सकता है। केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला में थोड़ी अवधि के भण्डारण के लिए जीरो एनर्जीकूल स्टोर का डिजाइन विकसित किया है, जिसमें 70-75 दिनों तक आलू को भण्डारित रख सकते हैं।










