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ग्रीष्म कालीन धान की उन्नत खेती

रितु भारती एवं डॉ. सुनील कुमार, इ.गा.कृ.वि.वि. रायपुर,

खाद्यानों में धान का महत्वपुर्ण स्थान है, एवं विश्व की जनसंख्या का अधिकांश भाग दैनिक भोजन में चावल का उपयोग करता है। चावल भारत के दक्षिण और पूर्वी हिस्सों के लोगों का मुख्य भोजन है। यह भारत में और एशिया के अन्य हिस्सों जैसे चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, थाईलैंड आदि में उगाया जाता हैं। भारत में प्रमुख चावल उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्रा, पंजाब, आसाम, बिहार, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और हरियाणा है। पर आंकड़़ो के अनुसार पश्चिम बंगाल की उत्पादकता सर्वाधिक हैं।
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में रबी सीजन में भी धान (ग्राीष्मकालीन धान) की खेती का क्षेत्र बढ़ रहा है। बढ़ती सिंचाई सुविधाओं के चलते किसान रबी सीजन में भी धान की खेती को तरजीह देने लगे हैं। पारंपरिक रूप से राज्य में धान की खेती मुख्य रूप से खरीफ सीजन में होती है। मानसून सक्रिय होने के साथ ही धान की बुवाई होती है। परन्तु कुछ सालों में छ.ग. के किसानों में भी ग्रीष्मकालीन धान की फसल लेने का ओर रूझान बढ़ा हैं। इस रूझान में परिवर्तन के पीछे मुख्य कारण खरीफ के मुकाबले ग्रीष्मकालीन धान की अधिक उत्पादकता हैं। बढ़ती सिंचाई सुविधाओं से इसको और भी मद्द मिल रही है। क्योंकि खरीफ धान के मुकाबले रबी धान को ज्यादा मात्रा में सूर्य की रोशनी मिलती है। जिससे प्रकाश संश्लेषण अधिक होता है, ऐसे में सैद्धांतिक रूप से यहां ग्रीष्मकालीन धान की उत्पादन क्षमता खरीफ धान के मुकाबले अधिक होती है।

जलवायुः
धान एक उष्ण कटिबंधीय जलवायु का फसल है जो समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ सकता है। आर्द्र परिस्थितियों में धान की खेती समशीतोष्ण और उष्ण कटिबंधीय जलवायु में भी की जा सकती है। पौधों की बढवार के लिए विभिन्न अवस्थाओं पर 21-35 सेंटीग्रेट तापक्रम की आवश्यकता होती है। फसल की अच्छी वृद्धि के लिए 25-30 सेंटीग्रेट तथा पकने के लिए 21-25 सेंटीग्रेट तापक्रम की आवश्यकता होती है। पौध बढवार के समय अधिक आर्द्रता परंतु फसल पकने के समय कम आर्द्रता का होना लाभदायक रहता है। सूर्य के प्रकाश का धान की पैदावार में बहुत महत्व है। अधिक उपज के लिए धूपदार मौसम आवश्यक है। धान की फसल 42०ब तक तापमान को सहन कर सकता है। इसीलिये इसकी खेती विभिन्न प्रकार की जलवायु में की जाती है। उच्च वर्षा ओर कम सर्दियों वाले क्षेत्रों (उत्तरी और पश्चिमी भागों) में धान की फसल एक वर्ष में एक बार उगाई जाती है। (मई से नवम्बर)। दक्षिण व पूर्वी राज्यों में दो या तीन फसलें उगई जाती है। भारत में धान की खेती गर्मी, शरद ऋतु और बारिश (खरीफ) के मौसम में की जाती हैं, धान की रबी (ग्रीष्म) सीजन के दौरान की जाने वाले खेती को ग्रीष्मकालीन धान भी कहा जाता है। इसे नवम्बर से फरवरी के महीने में बोया जाता और मार्च से जून के दौरान काटा जाता है।

भुमि का चुनावः
धान की खेती सभी प्रकार की भुमियों में की जा सकती हैं। परन्तु उचित जल धारण वाली दोमट भूमि इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम पाई गई है। इसकी खेती हल्की अम्लीय मुदा से लेकर क्षारीय (पी.एच. 5.5 से 8.0 तक) मृदा में की जा सकती है। छत्तीसगढ़ में धान की सफल खेती मटासी, डोरसा, एंव कन्हार भूमियों में की जा रही है। डोरसा भूमि की जलधारणा क्षमता मटासी भूमि के तुलना में काफी अधिक होती है। यह धान की खेती के लिए सर्वथा उपयुक्त होती है। कन्हार भूमि भारी, गहरी व काली होती है। इसकी जल धारण क्षमता अन्य भूमियों की अपेक्षा ज्यादा होती है। अतः यह रबी व ग्रीष्मकालीन फसल के लिए अधिक उपयुक्त पायी गई है। गोबर की खाद, कम्पोस्ट या हरी खाद बोआई से पहले प्रारम्भिक जुताई के समय खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए।

उन्नत किस्में:
हमेंशा आपके क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्मों के प्रमाणित बीज का बुआई हेतु उपयोग करें। यदि किसान पिछली फसल का बीज उपयोग करना चाहते है तब बीज का चुनाव ऐसे खेत से न करें जिसमे फसल कीट-रोग से प्रभावित न रहे और उसमे किसी दुसरी किस्म का मिश्रण न हो। इसके अलवा 2-3 वर्ष बाद नये बीज का प्रयोग करना चाहिए। संकर प्रजातियों का बीज अधिकृत संस्थान या विक्रेता से ही खरीदे तथा हमेशा नया बीज का ही उपयोग करें। छत्तीसगढ़ में ग्रीष्मकालीन धान के लिए प्रमुख उन्नत किस्मों की विशेषताएं अग्र सारणी में प्रस्तुत हैः-

ग्रीष्मकालीन धान की खेती हेतु उपयुक्त प्रमुख उन्नत किस्मों की विशेषताएं

किस्म का नाम अवधि (दिन) उपज (क्विं/हे.)
आई.आर.-36 115-120 45-50
आई.आर.-64 115-120 45-50
एम.टी.यू.-1010 112-115 45-50
कर्मा मासुरी 125-130 45-50
स्वर्णा सब-1 140-145 45-55
बम्लेश्वरी 130-135 50-60
राजेश्वरी 120-125 50-55
दुर्गेश्वरी 130-135 50-55
महेश्वरी 130-135 50-55

संकर धान की विनर-एनपीएच-567, बायर-6129, बायर-158, प्रोएग्रो-6201, पीएचबी-71, लोकनाथ, इंडोअमेरिकन-1000011, पीआरएच-10, केआरएच-2 आदि संकर किस्में भी छत्तीसगढ़ में ग्रीष्मकालीन मौसम में भी अच्छा प्रदर्शन कर रही है।

बीज एवं बीजोपचार
अच्छी उपज के लिए चयनित किस्मों का प्रमाणित बीज किसी विश्वसनीय संस्था से प्राप्त करें। बीज की मात्रा बीज आकार और बुवाई की विधि पर निर्भर करती है। रोपा पद्धति में 30-40 तथा कतार बोनी में 70-75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है। चावल सघनीकरण विधि (श्री पद्वति) से धान की खेती में 6-8किग्रा. तथा संकर धान का 15 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर बोआई पर्याप्त होता है। यदि पुराने बीज का उपयोग कर रहे है तो, सबसे पहले बीज को नमक के घोल (17 प्रतिशत) में डुबोएं पानी के ऊपर तैरते हुए हल्के बीज निकालकर अलग कर दें तथा नीचें बैठे भारी बीजों को निकालकर साफ पानी से दो- तीन बार धोएँ व छाया में सुखाने के उपरान्त बीजों को 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोआई करें।

ग्रीष्म में धान लगाने की पद्धतियां
ग्रीष्म ऋतु में धान की बोआई कतार पद्धति से अथवा रोपा विधि से करना चाहिए।

1. कतार बोनी: धान की रोपण खेती में बढ़ते खर्चे, पानी एवं मजदूरों की समय पर अनुपलब्धता की समस्या का समाधान हेतू धान की सीधी बुवाई ही रोपण विधि का एक अच्छा विकल्प है। सीधी बुवाई में खेत में लेह (पडलिंग) नहीं की जाती और लगातार खेत में खड़ा पानी रखने की अवश्यकता नहीं होती है। सीधी बुवाई में खेती पानी, श्रम व उर्जा कम लगती है अतः आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी है। इसके अलावा मृदा की भौतिक दशा अच्छी अच्छी बनी रहती है तथा फसल जल्दी तैयार होने से अगली फसल बुआई समय पर की जा सकती है। धान की बुवाई से एक सप्ताह पूर्व सिंचाई करें जिससे खरपतवार निकल आये। अब जूताई कर खेत तैयार करने के उपरान्त देशी हल के पीछे बनी कतारो में अथवा सीड-ड्रिल के माध्यम से बुआई की जाती है। बुआई 20-22 सेमी. की दुरी पर कतारों में करें तथा बीज बोने की गहराई 4-5 सेमी. रखना चाहिए।

2. रोपण पद्धति: इस विधि में धान की रोपाई वाले कुल क्षेत्र के लगभग 1/10 भाग में नर्सरी तैयार की जाती है। एक हैक्टेयर में रोपाई क्षेत्र में रोपाई करने के लिए धान की बारीक चावल वाली किस्मों का 30 किग्रा., मध्यम दाने वाजी किस्मों का 40 किग्रा. और मोटे दाने वाली किस्मों का 50 किग्रा. बीज की पौध तैयार करने की आवश्यकता होती है।

मुख्य खेत में पौध रोपण:- रबी-ग्रीष्म में पौध तैयार होने में 30-35 दिनों का समय लग सकता है। खेत मचाई के दूसरे दिन रोपाई करना ठीक रहता है। रोपा लगाते समय एक स्थान (हिल) पर 1-2 पौधों की रोपाई करें। पौधे सदैव सीधे एवं 3-4 सेमी. गहराई पर ही लगाए। कतारों व पौधों से पौधो के बीच दुरीे 20 ग 10 सेमी. (शीघ्र व मध्यम समय में तैयार होने वाली किस्मों) रखना चाहिए। पौध रोपण के बाद किसी कारणवश कुछ पौधे मर जाएँ तो उसके स्थान पर नए पौधे शीघ्र रोपना चाहिए जिससे खेत में प्रति इकाई क्षेत्रफल में वांक्षित संख्या में पौधे स्थापित हो सकें! अधिकतम उपज करने के लिए प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में धान के 400-500 बालीयुक्त पौधे होना चाहिए।

संतुलित पोषण प्रबंधन
धान की एक अच्छी फसल एक हेक्टेयर भूमि से 100-125 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60-80 किलोग्राम फास्फोरस, 40-60 किलोग्राम पोटाश का उपयोग करना चाहिए जो कि धान की किस्मों पर एवं मृदा परीक्षण पर भी निर्भर करता हैं।

धान की फसल में अंतिम जुताई के समय 5-10 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी प्रकार से सड़ी गोबर खाद या कम्पोस्ट का उपयोग करने से महँगे रासायनिक उर्वरकों की मात्रा में कटौती की जा सकती है।

नाइट्रोजन धारी उर्वरकों को तीन विभन्न अवस्थाओं अर्थात 30 प्रतिशत रोपण के समय, 40-50 प्रतिशत कंसे बनते समय तथा शेष मात्रा प्रारंभिक गभोट अवस्था के समय देना चाहिए। देश के अधिकांश धान क्षेत्रों की मिट्टियों में आज कल जस्ते की कमी के लक्ष्ण दिखते हैं। जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों मं 25 किलोग्राम/हेक्टेयर के हिसाब से जिंक सल्फेट खेत की अंतिम जुताई के समय देना लाभकारी पाया गया है।

खरपतवार प्रबंधन

कतार बोनी: सिंचाई के 3-4 दिन बाद जुताई करे तथा बतर (ओल) आने पर कतार में धान की बुवाई करें। बुवाई के 3-4 दिन के अंदर ब्यूटाक्लोर 1-1.5 किग्रा./हे. सक्रिय तत्व अथवा आक्साडायर्जिल 70-80 ग्राम का छिड़काव करें। बुआई के 30-35 दिन बाद कतारों के बीच पतले हल द्वरा जुताई करें या हाथ से निदांई करें। धान का अंकुरण होने के 14-20 दिन में यदि सांवा तथा सकरी पत्ती वाले खरपतवारों का प्रकोप अधिक हो तो फिनाक्सीप्राप 60 ग्राम या साहलोफाप 70-90 ग्राम/हे. तथा चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिये इथॉक्सीसल्फयूरान 15 ग्राम/हे. का प्रयोग करें।

रोपण विधि: रोपा लगाने के 6-7 दिन के अंदर एनीलोफॉस 400-600 मि.ली. प्रति हेक्टेयर या ब्यूटाक्लोर या थायोबेनकार्प या पेण्डीमेथालीन 1-1.5 कि/हे. सक्रिय तत्व का प्रयोग करें या फिर प्रेटीलाक्लोर और मेट सल्फयूॅरान को बराबर मात्रा में 600 ग्राम अथवा बिसपासरीबैक के 20-25 ग्राम का छिड़काव करें। धान अंकुरण होने के 20-25 दिन में यदि सांवा तथा संकरी पत्ती वाले खरपतवारों का प्रकोप अधिक होने पर फिनाक्सीप्राप 60 ग्राम प्रति हैक्टर या चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु इथाक्सीसल्फयूरान 15ग्राम/हे. का छिड़काव करें।

जल प्रबंधन:
धान फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती हैं। फसल की जल माँग भूमि के प्रकार, मौसम, भू-जल स्तर तथा किस्मों की अवधि पर निर्भर करता है। भारी से हल्की मिट्टि में लगभग 1000 मिमि. से 1500 मिमि. तक पानी लगता है । धान की कुल जल आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत भाग बीज अंकुरण से कंसा बनने की अवस्था तक, 50 प्रतिशत गर्भावस्था से दूध भरने तक तथा 10 प्रतिशत फसल के पक कर तैयार होने तक लगता है।

रोपा लगाने के समय मचाये या लेव किये गये खेत में 1-2 सेमी. से अधिक पानी न रखें। रोपाई के बाद एक सप्ताह तक खेत में पानी का स्तर 1-2 सेमी. रखने से रोपित पौधे अच्छे से स्थापित हो जाते है। पौधे स्थापित होने के बाद कंसे फूटने की अवस्था पूर्ण होने तक उथला जल स्तर 5$2 सेमी. तक बनाये रखें। बालियाँ निकलने के बाद खेत में उथला जल स्तर खेत को पूर्ण रूप से गीली या संतृप्त अवस्था में रखा जा सकता है। गभेट की अवस्था तक भूमि में पानी की कमी नहीं होनी चाहिये।

कटाई एवं मड़ाई:
धान की विभन्न किस्में लगभग 100-150 दिन में पक कर तैयार हो जाती हैं। सामान्यतौर पर बालियाँ निकलने केएक माह पश्चात् धान पक जाता है। धान की कटाई का सही समय तब समझना चहिए जब धान की बलिया पक जाये एवं दाना सखत (दानों में 20-24 प्रतिशत नमीं ) हो जायें एवं पौधों का कुछ भाग पीला पड़ जाये। दाने अधिक पक जाने पर झड़ने लगते है और उनकी गणवत्ता में दोष आ जाता है। फसल काटने के 1-2 सप्ताह पूर्व खेत को सुखा लेना चाहिए जिससे पूर्ण फसल एक समान पक जायें। कटाई हँसियो या शक्तिचालित यंत्रों द्वारा की जाती है। धान के बंटलों को खलियान में सूखने के लिए फैला देते हैं और बैलों द्वारा मड़ाई करते है। वर्तमान में कंबाइन हारवेस्टर के माध्यम से कटाई व गहाई की जा रही है।

उपज एंव भंडारण:
अनुकूल मौसम होने पर एवं सही सस्य विधियों के अनुशरण करने से धान की बौनी उन्नत एवं संकर किस्मों से 50-75 क्विंटल/हे. उपज प्राप्त की जा सकती है। धान को अच्छी तरह धूप में सूखा लेते हैं तथा दानों में 12-13 प्रतिशत नमी स्तर पर बंद स्थानों (पक्के बीन या बोर में भरकर) पर भंडारण किया जाना चाहिए।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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