मुँहपका एवं खुरपका रोग, लक्षण एवं बचाव
डॉ नेहा साहू,डॉ. वर्षा रानी गिलहरे, डॉ गोविना देवांगन, डॉ ऋतु गुप्ता, डॉ काशिफ रज़ा, डॉ शैलेष विशाल और डॉ ढालेश्वरी


परिचय : मुँहपका खुरपका रोग या फुट एंड माउथ डिजीज या थ्डक् विभक्त खुर वाले पशुओं जैसे गाय, भैंस, भेंड़, बकरी, सूअर आदि पालतू पशुओं एवं हिरन आदि जंगली पशुओं में होने वाला एक अत्याधिक संक्रामक रोग है, खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसान दायक होती है। दूध देने वाले पशु , दूध काम देने लगते है, दूध पीते बछड़े आमतौर पर मर जाते हैं और गर्भवती जानवरों का गर्भपात और गर्भपात के बाद बांझपन हो सकता है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु Aptho virus से होता है। यह रोग पशुओं में बहुत तेजी से फैलता है, बहुत काम समय में एक झुण्ड से पूरे गांव के अधिकतर पशुओं को संक्रमित कर देता है देश के पशु उत्पादों के निर्यात में भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
रोग कारक : खुरपका मुँहपका एक वायरल संक्रमण रोग है, जो एफ्थोवायरस नामक वायरस के कारण होता है, जो पिकोर्नविरिडे (Picornaviridae) परिवार से संबंधित है। एफ्थोवायरस वायरस के सात सीरोटाइप हैं, जैसे A,O,C, SAT-1, SAT-2, SAT-3 और ASIA-1 । शोधकर्ताओ के अनुसार यह वायरस जंगली जानवर से आया है। भारत में अभी किसी जंगली जानवर के नमूने में इसकी उपस्थति नहीं मिली है।
रोगजनन : संक्रमित पशु के सीधे संपर्क में आने से, पशु बाजार से या परिवहन के दौरान प्रत्यक्ष रुप से रोग का प्रचार प्रसार होता है।
अप्रत्यक्ष रूप से संक्रमित जानवर के मल, मूत्र, लार, दूध और वीर्य से। दूषित वस्तु जैसे चारा, पानी, उपकरण एवं वाहन से । संक्रमित जानवर एरोसोल के रूप में भी वायरस छोड़ सकते हैं, जो हवा के माध्यम से फैल सकता है।
रोग के लक्षण
- तीव्र ज्वर (102-10500F) साधारणतः युवा पशु में जानलेवा होता है। पशुओं की मृत्यु प्रायः गलाघोटु रोग होने से होती है(गलाघोटु रोग से बचाने के लिए अपने पशुओं को बरसात से पहले इसका टीका अवश्य लगवाएं)
- मुँह से अत्यधिक लार का टपकना (रस्सी जैसा)
- जीभ तथा तलवे पर छालों का उभरना जो बाद में फट कर घाव में बदल जाते हैं।
- जीभ की सतह का निकल कर बाहर आ जाना एवं थूथनों पर छालों का उभरना।
- खुरों के बीच में घाव होना जिसकी वजह से पशु का लंगड़ा कर चलना या चलना बंद कर देता है।
- मुँह में घावों कि वजह से पशु भोजन लेना तथा जुगाली करना बंद कर देता है एवं कमजोर हो जाता है।
- दूध उत्पादन में लगभग 80 प्रतिशत की कमी, गाभिन पशुओं के गर्भपात एवं बच्चा मरा हुआ पैदा हो सकता है।
- बछड़ों में अत्याधिक ज्वर आने के पश्चात बिना किसी लक्षण की मृत्यु होना।,
उपचार : इस रोग का कोई इलाज नहीं है चूकि ये छूत की बीमारी है इसलिए हमें संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिये। प्रभावित पशुओं के मुंह और पैरों को 1 प्रतिशत पोटेशियम परमैंगनेट (KMnO4) एंटीसेप्टिक घोल से दिन में 3-4 बार धोना चाहिए। मुँह में बोरो ग्लिसेरीन लगाए। पशु चिकित्सक की सलाह से ज्वरनाशी एवं दर्दनाशक का प्रयोग करे एवं जिस पशु के मुँह, खुर एवं जीभ में घाव हो उसको 3 या 5 दिन तक प्रतिजैविक लगवाए। खुर के घाव में हिमैक्स या नीम के तेल का प्रयोग करें जिससे की मक्खी नहीं बैठे क्योंकि मक्खी के बैठने से कीड़े होते हैं। कीड़ा लगने पर तारपीन तेल का उपयोग करें।
रोकथाम और नियंत्रण : पहला टीकाकरण 3माह की उम्र में, उसके बाद पहले टीकाकरण के 30 दिन बाद दुसरा टीकाकरण होना चाहिए। फिर 6 महीने के अंतराल पर एक बार दोहराया जाना चाहिए। एक क्षेत्र/गांव के सभी पशुओं का टीकाकरण एक बार में किया जाना चाहिए। रोग को नियंत्रित करने के लिए रिंग टीकाकरण किया जाना चाहिए। टीकाकरण के 15-21 दिन बाद ही बाहरी पशुओं को गाँव में लाया जाना चाहिए। रोग वाले क्षेत्रों से पशुओं की खरीद नहीं की जानी चाहिए। बिमारी के छह महीने बाद तक नए जानवरों को नहीं खरीदा जाना चाहिए। बिना टीकाकरण वाले जानवरों को पशु मेलों में जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हमेशा ऐसी जगह से चारा खरीदना करना पसंद करें जहाँ छह महीने या उससे अधिक की अवधि में बीमारी का संक्रमण न हुआ हो।
अगर किसी गॉव या क्षेत्र में रोग फैल गया हो तो संक्रमित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए तथा पशुओं के खरीदी/बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। संक्रमित पशुओं को आम चरागाह में चरने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। प्रभावित पशुओं को तालाबों/झरनों/नदियों आदि से पानी पीने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। पहले स्वस्थ पशुओं की देखभाल की जानी चाहिए और फिर संक्रमित पशुओं की देखभाल करनी चाहिए। बीमार पशुओं की देखभाल करने के बाद, व्यक्ति को खुद को और अपने कपड़ों को 4 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट घोल से धोना चाहिए। दूध इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तनों को 4 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट घोल से साफ करना चाहिए। बछड़ों को प्रभावित पशुओं का दूध नहीं पिलाना चाहिए।
प्रभावित पशुओं के पैरों को 2 प्रतिशत कॉपर सल्फेट के घोल से धोया जा सकता है। सोडियम हाइड्रोक्साइड (2 प्रतिशत), सोडियम कार्बोनेट (4 प्रतिशत ) और साइट्रिक एसिड (0.2 प्रतिशत) का उपयोग करके फर्श, परिसर और सभी संक्रमित सामग्रियों को कीटाणुरहित करना उचित है। पशु घरों के चारों ओर चूने का पाउडर छिड़का जाना चाहिए। फार्म के प्रवेश द्वार पर लाल दबा या चूने के घोल की व्यवस्था की जानी चाहिए। निकटतम सरकारी पशुचिकित्सा अधिकारी को सूचित करना चाहिए।
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) भारत सरकार के द्वारा सितम्बर 2019 में केंद्रीय क्षेत्र योजना के तहत FMD को 2025 तक नियंत्रित करने और 2030 तक इस रोग को पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य के साथ संचालित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में रोग के प्रति, प्रतिरक्षा बढ़ने के लिए और दूध उत्पादन में कमी, बांझपन से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए खुर वाले जानवरों का हर छह महीने में सघन टीकाकरण किया जा रहा है।
लेखक :
डॉ नेहा साहू (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ)
डॉ. वर्षा रानी गिलहरे (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ)
डॉ गोविना देवांगन (सहायक प्राध्यापक),
डॉ ऋतु गुप्ता (सहायक प्राध्यापक),
डॉ काशिफ रज़ा (टीचिंग सहायक),
डॉ शैलेष विशाल (टीचिंग सहायक) और
डॉ ढालेश्वरी (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ)









