पशुपालन

प्लास्टिक प्रदूषण और पशु स्वास्थ्य पर उसका दुष्प्रभाव : मूक प्राणियों के लिए बढ़ता हुआ जानलेवा संकट

डॉ. ढालेश्वरी , डॉ. गोविना देवांगन, डॉ. नीता मिश्रा एवं डॉ. नेहा साहू

भूमिका : वर्तमान समय में प्लास्टिक एवं पॉलीथीन मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। दैनिक उपयोग में आने वाली पॉलीथीन थैलियाँ, खाद्य पदार्थों के पैकेट, प्लास्टिक की बोतलें तथा अन्य प्लास्टिक उत्पाद सुविधा तो प्रदान करते हैं, किन्तु इनके अनुचित निपटान से पर्यावरण एवं पशु स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं। शहरों, कस्बों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में फैला प्लास्टिक कचरा आज पशुओं के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में उभरकर सामने आया है।

सड़कों पर घूमने वाले गौवंश, भैंस, बकरी तथा अन्य पशु भोजन की तलाश में कूड़े के ढेरों तक पहुँच जाते हैं। भोजन के अवशेषों के साथ वे बड़ी मात्रा में पॉलीथीन एवं प्लास्टिक सामग्री भी निगल लेते हैं। यह सामग्री उनके पाचन तंत्र में जमा होकर धीरे-धीरे एक जानलेवा स्थिति उत्पन्न कर देती है, जिसे “पॉलीथीन अवरोध” या “पॉलीथीन इम्पैक्शन” कहा जाता है।

क्या है पॉलीथीन अवरोध?

पॉलीथीन एक अपाच्य पदार्थ है जिसे पशुओं का पाचन तंत्र विघटित नहीं कर सकता। जब पशु बार-बार पॉलीथीन निगलते हैं, तो यह उनके रूमेन (जठर) और रेटिकुलम में एकत्रित होने लगती है। समय के साथ यह मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि भोजन एवं पानी के सामान्य आवागमन में बाधा उत्पन्न होने लगती है। परिणामस्वरूप पाचन क्रिया प्रभावित होती है, पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो जाता है और पशु धीरे-धीरे गंभीर रोगग्रस्त हो जाता है। कई बार शल्य चिकित्सा के दौरान पशुओं के पेट से 20 से 80  किलोग्राम तक पॉलीथीन एवं प्लास्टिक सामग्री निकाली गई है, जो इस समस्या की भयावहता को दर्शाती है।

समस्या के प्रमुख कारण

पॉलीथीन अवरोध की समस्या के पीछे अनेक कारण उत्तरदायी हैं—

  1. खुले में कचरा फेंकना : घरों, होटलों, बाजारों एवं धार्मिक स्थलों से निकलने वाला कचरा प्रायः खुले स्थानों पर फेंक दिया जाता है, जहाँ पशु आसानी से पहुँच जाते हैं।
  1. भोजन की कमी : आवारा पशुओं को पर्याप्त हरा चारा एवं संतुलित आहार उपलब्ध नहीं हो पाता, जिसके कारण वे कूड़े के ढेरों में भोजन खोजते हैं।
  1. प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग : एकल उपयोग (Single Use Plastic) की बढ़ती प्रवृत्ति से पर्यावरण में प्लास्टिक कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है।
  1. जन-जागरूकता का अभाव : अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि उनके द्वारा फेंकी गई एक छोटी पॉलीथीन भी किसी पशु की मृत्यु का कारण बन सकती है।

किन पशुओं में अधिक दिखाई देती है यह समस्या?

यद्यपि सभी पशु इससे प्रभावित हो सकते हैं, किन्तु निम्न पशुओं में यह समस्या अधिक पाई जाती है—

  • गाय
  • भैंस
  • बछड़े
  • बकरी
  • भेड़

विशेष रूप से शहरी एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में घूमने वाली निराश्रित गायों में यह समस्या अत्यधिक देखने को मिलती है।

रोग के लक्षण : पॉलीथीन अवरोध धीरे-धीरे विकसित होने वाला रोग है। प्रारंभिक अवस्था में लक्षण स्पष्ट नहीं होते, लेकिन समय के साथ निम्न लक्षण दिखाई देने लगते हैं—

  • भूख में कमी
  • जुगाली का कम होना या बंद हो जाना
  • वजन में लगातार गिरावट
  • दूध उत्पादन में कमी
  • पेट का फूलना
  • कब्ज या अनियमित मल त्याग
  • कमजोरी एवं सुस्ती
  • शरीर का रूखा एवं बेजान दिखाई देना
  • निर्जलीकरण
  • बार-बार लेटना एवं उठना
  • पेट दर्द के लक्षण
  • गंभीर स्थिति में पशु का गिर जाना एवं मृत्यु

पशु स्वास्थ्य पर प्रभाव : पॉलीथीन केवल पाचन तंत्र को ही प्रभावित नहीं करती बल्कि पूरे शरीर की कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

  • पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो जाता है।
  • शरीर में ऊर्जा की कमी हो जाती है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है।
  • प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
  • दूध उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
  • पशु धीरे-धीरे अत्यधिक दुर्बल हो जाता है।

रोग का निदान : रोग के निदान हेतु पशु चिकित्सक निम्नलिखित प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं—

  • पशु का शारीरिक परीक्षण
  • रूमेन गतिविधियों का मूल्यांकन
  • रोग का इतिहास
  • अल्ट्रासोनोग्राफी
  • रेडियोग्राफी (विशेष परिस्थितियों में)
  • प्रयोगशाला परीक्षण

अनुभवी पशु चिकित्सक कई बार केवल लक्षणों एवं इतिहास के आधार पर भी रोग की पहचान कर लेते हैं।

उपचार

औषधीय उपचार : यदि रोग प्रारंभिक अवस्था में हो तो सहायक उपचार दिया जा सकता है। इसमें तरल पदार्थ, विटामिन, खनिज तत्व तथा पाचन क्रिया को सुधारने वाली औषधियाँ शामिल होती हैं।

शल्य चिकित्सा (रूमेनोटोमी) : गंभीर मामलों में रूमेनोटोमी सबसे प्रभावी उपचार है।

इस प्रक्रिया में पशु के बाएँ पार्श्व भाग में शल्य चीरा लगाकर रूमेन को खोला जाता है तथा उसमें जमा पॉलीथीन, प्लास्टिक एवं अन्य विदेशी पदार्थों को सावधानीपूर्वक बाहर निकाला जाता है। इसके बाद रूमेन एवं त्वचा की परतों को वैज्ञानिक विधि से बंद किया जाता है। समय पर की गई शल्य चिकित्सा पशु का जीवन बचा सकती है तथा उसे पुनः स्वस्थ बना सकती है।

आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव : पॉलीथीन अवरोध केवल पशु स्वास्थ्य की समस्या नहीं है, बल्कि यह पशुपालकों एवं समाज के लिए आर्थिक चुनौती भी है।

इसके कारण—

  • दूध उत्पादन घटता है।
  • उपचार पर अधिक खर्च आता है।
  • पशुओं की कार्यक्षमता कम होती है।
  • प्रजनन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • पशु मृत्यु से प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान होता है।

भारत जैसे कृषि एवं पशुपालन प्रधान देश में यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक क्षति का कारण बन रही है।

रोकथाम ही सर्वोत्तम उपाय : पॉलीथीन अवरोध की रोकथाम उपचार से कहीं अधिक सरल एवं प्रभावी है।

आवश्यक सावधानियाँ

  • पॉलीथीन एवं प्लास्टिक कचरा खुले में न फेंकें।
  • कूड़ेदानों का नियमित उपयोग करें।
  • पशुओं को संतुलित एवं पर्याप्त आहार उपलब्ध कराएँ।
  • एकल उपयोग वाली प्लास्टिक का प्रयोग कम करें।
  • आवारा पशुओं के लिए चारा एवं पानी की व्यवस्था करें।
  • स्वच्छता एवं जागरूकता अभियान चलाएँ।
  • स्थानीय निकायों द्वारा कचरा प्रबंधन को मजबूत बनाया जाए।

पशुपालकों की भूमिका : पशुपालक यदि अपने पशुओं के खान-पान पर ध्यान दें तथा उन्हें कूड़े के ढेरों से दूर रखें, तो इस समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है। पशुओं में भूख कम होना, वजन घटना या जुगाली बंद होने जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

निष्कर्ष : पॉलीथीन अवरोध पशुओं में तेजी से बढ़ती हुई एक गंभीर एवं जानलेवा समस्या है। यह समस्या मानव की लापरवाही, प्लास्टिक के अनियंत्रित उपयोग तथा कचरा प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था का परिणाम है। यदि हम प्लास्टिक कचरे का उचित निपटान करें, पर्यावरण को स्वच्छ रखें तथा पशुओं के प्रति संवेदनशील बनें, तो हजारों मूक प्राणियों का जीवन बचाया जा सकता है।

पशुओं की सुरक्षा केवल पशुपालकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। स्वच्छ वातावरण, जिम्मेदार नागरिकता और पशुओं के प्रति करुणा ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।

एक फेंकी हुई पॉलीथीन किसी मूक पशु की मृत्यु का कारण बन सकती है; इसलिए प्लास्टिक का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करें और पशुओं के जीवन की रक्षा करें।

लेखक :
डॉ. ढालेश्वरी , डॉ. गोविना देवांगन, डॉ. नीता मिश्रा एवं डॉ. नेहा साहू

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button