धान की फसल को प्रभावित करने वाले प्रमुख रोग: लक्षण और रोकथाम
भावेश कुमार साहू, अनुज कुमार पटेल


धान दुनिया का सबसे प्रमुख अनाज है और विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या का मुख्य भोजन है। धान ( Oryza sativa L.) विश्व की सबसे अधिक उपभोग की जाने वाली अनाज फसल है, जो विशेष रूप से दक्षिण एशियाई देशों की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले दशक में भारत विश्व का सबसे बड़ा धान निर्यातक रहा है, और धान देश की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। खाद्यान्न फसलों में धान कुल खेती योग्य क्षेत्र का लगभग 35% हिस्सा रखता है, कुल खाद्यान्न उत्पादन में 41% का योगदान देता है और आहार कैलोरी का एक प्रमुख स्रोत है। यह भारत की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या का मुख्य भोजन है। भारतीय आहार में धान कुल कैलोरी का लगभग 30% प्रदान करता है।धान की अधिकांश खेती खरीफ मौसम में होती है, जबकि एक छोटा भाग रबी मौसम में सुनिश्चित सिंचाई के अंतर्गत उगाया जाता है।धान, एक उष्णकटिबंधीय फसल होने के कारण, गर्म एवं आर्द्र जलवायु में अच्छी तरह उगता है। इसे सिंचित क्षेत्रों तथा पर्याप्त वार्षिक वर्षा वाले वर्षा-आधारित क्षेत्रों दोनों में उगाया जा सकता है। इसी कारण धान की खेती खरीफ और रबी दोनों मौसमों में की जाती है। छत्तीसगढ़ को अपने उच्च धान उत्पादन और जर्मप्लाज्म संग्रह की समृद्ध विविधता के कारण “भारत का धान का कटोरा” कहा जाता है।
धान की फसल को प्रभावित करने वाले प्रमुख रोग: लक्षण और रोकथाम
धान (धान) विश्व की प्रमुख खाद्य फसलों में से एक है और करोड़ों लोगों का मुख्य आहार है। लेकिन यह फसल कई रोगों से प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में भारी कमी आ सकती है। यदि समय पर पहचान और उचित प्रबंधन न किया जाए, तो किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए धान की प्रमुख बीमारियों, उनके लक्षणों और रोकथाम उपायों की जानकारी अत्यंत आवश्यक है।
- ब्लास्ट रोग ( Blast Disease)
कारण: मैग्नापोर्थे ओरिज़ा (फफूंद)
लक्षण:
- पत्तियों पर भूरे या नाव के आकार के धब्बे बनते हैं, जिनका मध्य भाग धूसर हो सकता है।
- बालियों के गर्दन भाग पर काले या भूरे धब्बे बनते हैं, जिससे बालियाँ टूट सकती हैं और दाना नहीं बनता।
रोकथाम एवं नियंत्रण:
- रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें।
- बीज उपचार स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंसया कार्बेन्डाजिम से करें।
- आवश्यकतानुसार ट्राइफ्लोक्सीस्ट्रोबिन या टेबुकोनाज़ोल जैसे फफूंदनाशकों का छिड़काव करें।
- अधिक नाइट्रोजन खाद के प्रयोग से बचें।

- फॉल्स स्मट (False Smut)
कारण: यूस्टिलागिनोइडिया विरेन्स (फफूंद)
लक्षण:
- स्मट बॉल्स का बनना : प्रत्येक प्रभावित दाना मखमली बीजाणु गेंद (स्पोर बॉल) में बदल जाता है, जो शुरुआत में पीला-हरा होता है और परिपक्व होने पर हरा-काला हो सकता है।
- दिखावट : ये स्मट बॉल्स सामान्य दानों से बड़ी होती हैं और झिल्ली फटने पर इनकी सतह चूर्ण जैसी दिखाई देती है।
- संक्रमण का पैटर्न : आमतौर पर एक बाली में केवल कुछ ही दाने प्रभावित होते हैं, बाकी दाने सामान्य रहते हैं।
- समय : लक्षण बालियाँ निकलने के समय या उसके बाद दिखाई देते हैं, अक्सर दाना भरने की अवस्था में।
रोकथाम एवं नियंत्रण:
- स्वस्थ और रोगमुक्त बीज का उपयोग करें।
- स्वस्थ बीज का उपयोग करें, संतुलित खाद दें, संक्रमित बालियों को हटाएँ और आवश्यकता अनुसार फूल अवस्था में उपयुक्त फफूंदनाशी का छिड़काव करें।
- खेत की सफाई रखें और रोगग्रस्त पौधों को नष्ट करें।

- शीथ ब्लाइट ( Sheath Blight )
कारण: राइजोक्टोनिया सोलेनाई (फफूंद)
लक्षण:
- पत्तियों के आवरण (शीथ) पर पानी से भीगे भूरे धब्बे बनते हैं, जो धीरे-धीरे फैल जाते हैं।
- रोग बढ़ने पर पत्तियाँ और बालियाँ भी प्रभावित होती हैं, जिससे उपज में भारी कमी आती है।
रोकथाम एवं नियंत्रण:
- खेत में जल जमाव न होने दें और पौधों की अधिक सघनता से बचें।
- बूटिंग अवस्था पर उपयुक्त फफूंदनाशक का छिड़काव करें।
- फसल चक्र अपनाएँ और संक्रमित अवशेषों को नष्ट करें।

- ब्राउन स्पॉट ( Brown Spot)
कारण: बाइपोलारिस ओरिज़ा (फफूंद)
लक्षण:
- पत्तियों पर छोटे गोल या अंडाकार भूरे धब्बे बनते हैं।
- यह रोग विशेष रूप से पोषक तत्वों की कमी वाले खेतों में अधिक होता है।
रोकथाम एवं नियंत्रण:
- संतुलित उर्वरक प्रबंधन करें, विशेषकर पोटाश और फास्फोरस का उचित उपयोग करें।
- रोग दिखने पर फफूंदनाशकों का छिड़काव करें।
- फसल चक्र और खेत की सफाई अपनाएँ।

- बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट ( Bacterial Leaf Blight – BLB )
कारण: जेंथोमोनास ओराइजी (जीवाणु)
लक्षण:
- पत्तियों पर पानी से भीगे जैसे धब्बे बनते हैं, जो बाद में पीले या भूसे रंग के हो जाते हैं।
- रोग गंभीर होने पर पत्तियाँ ऊपर से नीचे तक सूख जाती हैं।
रोकथाम एवं नियंत्रण:
- बीज उपचार और रोपाई से पहले पौध की जड़ों को स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस में डुबोकर लगाएँ।
- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या अन्य अनुशंसित जीवाणुनाशकों का छिड़काव करें।
- खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें और रोग प्रतिरोधी किस्में लगाएँ।

- विषाणुजनित रोग (Viral Diseases)
धान का टुंग्रो रोग
यह एक गंभीर वायरल रोग है, जो धान की फसल में भारी उपज हानि करता है।
- यह रोग दो विषाणुओं के कारण होता है जो मिलकर पौधों में गंभीर लक्षण उत्पन्न करते हैं।
- राइस टुंग्रो बैसिलिफॉर्म वायरस (RTBV)
राइस टुंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV)
वाहक (Vector)
- यह रोग मुख्य रूप से लीफहॉपर (Green leafhopper ) हरा फुदका द्वारा फैलता है।
- प्रभावित अवस्थाएँ
- यह रोग धान की सभी वृद्धि अवस्थाओं में हो सकता है, लेकिन शाकीय अवस्था (vegetative stage) में संक्रमण होने पर अधिक नुकसान होता है।
लक्षण:
- पौधों की वृद्धि रुक जाना (बौनापन)
- पत्तियों का पीला से नारंगी रंग होना
- कम टिलर बनना
- बालियों का सही विकास न होना और दाने कम भरना
रोकथाम एवं नियंत्रण:
- लीफहॉपर वाहकों को आकर्षित करने, नियंत्रित करने और उनकी संख्या की निगरानी के लिए लाइट ट्रैप लगाएं।
- प्रति हेक्टेयर 1 लाइट ट्रैप स्थापित करें।
- प्रति हेक्टेयर 12 पीले चिपचिपे (येलो स्टिकी) ट्रैप लगाएं।
- सुबह के समय लाइट ट्रैप के पास बैठी लीफहॉपर की आबादी को कीटनाशक का छिड़काव/डस्टिंग करके नष्ट करें। यह प्रक्रिया प्रतिदिन अपनाएं।
- आवश्यकतानुसार पाइमेट्रोज़ीन 50% डब्ल्यूजी और क्लोरपाइरीफोस 50% + साइपरमेथ्रिन 5% EC का छिड़काव करें।

लेखक :
भावेश कुमार साहू (पीएचडी शोधार्थी) पादप रोग विज्ञान विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
अनुज कुमार पटेल (पीएचडी शोधार्थी) कीट विज्ञान विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)











