सोयाबीन की प्रमुख बीमारियाँ एवं उनके रोकथाम के उपाय
आयुष गुप्ता, सुरेश कुमार साहू, डॉ. ऐश्वर्या ललित टंडन


विश्व की सबसे अधिक महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में सोयाबीन का महत्वपूर्ण स्थान है। भारतवर्ष की यह प्रमुख तिलहनी फसल है। यह पूरे तिलहनी फसल के उत्पादन का 29 प्रतिशत भाग सोयाबीन की फसल के उत्पादन का है। छत्तीसगढ़ में सोयाबीन की फसल में विभिन्न प्रकार की बीमारियों का प्रकोप होता है। जैसे कि कवक, जीवाणु, विषाणु व सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी प्रमुख है। मृदा जनित बीमारियों के द्वारा लगभग 12 प्रतिशत, विषाणु के द्वारा 50 प्रतिशत एवं गेरूआ रोग के द्वारा लगभग 80 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता है। इन बीमारियों के द्वारा होने वाले नुकसान से बचने के लिये विभिन्न बीमारियों के लक्षण व रोग प्रबंधन के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है।
सोयाबीन की फसल में निम्न प्रमुख बीमारियाँ पाई जाती हैं।
1. पीला मोजेक रोग-
यह रोग मूंग के पीला मोजेक विषाणु द्वारा उत्पन्न होता है तथा बैमेसिया टेबेकाई नामक सफेद मक्खी द्वारा स्वस्थ पौधे तक फैलता है। सफेद मक्खी साल भर सक्रिया रहती है तथा जब ये एक बार वायरस को ग्रहण कर लेती है तो उम्र-भर रोग फैलाती है। यह वायरस सफेद मक्खी द्वारा अन्य दलहनी फसलो व खरपतवारो पर भी रोग फैलाता है। इस कारण ये रोग सोयाबीन का विनाशकारी रोग माना जाता हैं।

इस रोग मे सर्वप्रथम पतियों पर गहरे पीले रंग के धब्बो के रूप में प्रकट होता है। ये धब्बे धीर धीरे फैलकर आपस में मिल जाते है जिससे पुरी पत्ती ही पीली पड़ जाती हैं। पत्तियों के पीले पड़ने के कारण अनेक जैविक क्रियांए प्रतिकुल रूप से प्रभावित होती है तथा पौधो में आवश्यक भोज्य पदार्थ का संश्लेषण नही हो पाता है। अतः पौधो पर पुष्पन कम होता हैं एवं फलियां लगती भी है तो उनमें दानो का विकास नही हो पाता हैं।
रोकथाम-
- रोगी पौधो को जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर दें।
- रोग अवरोधी किस्म PK 416/ 472/ 1024/ 1042, हरा सोया, पूसा-37 की बिजाई करें।
- खरपतवारों को फसल में से समय पर निकाल दें।
- सफेद मक्खी के रोकथाम के लिए खेत में बिजाई के 20-25 दिनों के बाद 10-15 दिनो के अन्तर 250 मि0लि0 डाईमैथोएट 30 ई.सी., आक्सीडैमेटान मिथाईल 25 ई.सी (मैटासिस्टाक्स) या 250 मि0लि0 फार्मेथियान 25 ई.सी. (एथियो) या 400 मि.लि. मैलाथियान 50 ई.सी. को 250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।
- इसके अतिरिक्त भूमि या फसलो पर विसक्रमंण के लिए समय-समय पर नीम के सुखे पत्तों के पावडर, नीम के बीजों के पावडर या निबौली के पावडर का पांच प्रतिशत (100 लि0 पानी में 5 किलो ग्राम से छिड़काव करते रहना चाहिए।
2. राइजोक्टोनिया झुलसन
यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक कवक के कारण होता है। इस रोग का संक्रमण पत्ती, तना एवं फलियों पर होता है, यह पौधे के निचले या मध्य भाग से प्रारंभ होकर ऊपर की ओर बढ़ता है। रोगी पत्तियों के ऊपर पनीला भाग बनता है, जो शीघ्र ही हरा से लाल भूरा हो जाता है तथा बाद में गहरा भूरा से काला हो जाता है। रोगी भाग कभी कभी छोटे-छोटे धब्बे के रूप में दिखाई देता है, कभी – कभी पूरी पत्ती झुलस जाती है। रोगी पत्तियाँ टूटकर नीचे की ओर लटक जाती है। फलियाँ, तना एव पर्णवृन्त के ऊपर भी गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। रोगी पत्तियों एवं पर्णवन्त के ऊपर फफूंद के छोटे एवं मध्यम आकार के हल्वे भूरे या गहरे भूरे रंग के स्क्लेरोशिया बन जाते हैं। ज्यादा घनी फसल एवं अधिक नमी की अवस्था में इसका संक्रमण ज्यादा होता है।

रोकथाम-
- पौधों से पौधों की दूरी अधिक होनी चाहिये, जिससे हवा का आवागमन अच्छा हो।
- खरपतवारों को नष्ट कर दें।
- खेत में जल का निकास अच्छा करें।
- फसल कटाई के बाद बचे हुये ठूठों को जला दें।
- खड़ी फसल पर कार्बेन्डाजिम का 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल में रोग के लक्षण दिखते ही 15 दिन के अन्तराल में 2 बार छिड़काव करें।
3. गेरूआ रोग
यह फेकोप्सोरा पेकैरहैज़ी नामक फफूंद से होता है। गेरूआ रोग के द्वारा लगभग 80 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता है। प्रारंभिक अवस्था में पत्ती की निचली सतह पर हल्का पीला भूरा या लाल भूरा धब्बा बनता है, जो कि बाद में आकार में बढ़ने लगता है तथा धब्बे के ऊपर भूरे से गहरे भूरे रंग की फुंसियों का निर्माण होता है ये फुंसियाँ परिपक्व अवस्था में फूट जाती है तथा रोग के बीजाणु भूरे रंग के पावडर सरीखे निकल आतें हैं। ये फुन्सियों पत्तियों की निचली सतह में सबसे ज्यादा बनती है, फुंसियों की निचली सतह पर बनने से पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीलापन दिखाई देता है। जो क्रमशः रोग की तीव्रता के अनुसार बढ़ता है, अंततः पत्तियों पीली पड़ जाती है तथा रोग पर्णवृन्त, तना एवं पत्ती की ऊपरी सतह पर फैल जाता है। फुन्सियों से बीजाणु निकलकर आपस में चिपक जाते हैं और एक समूह के रूप में पत्तियों की निचली सतह पर चिपके रहते हैं, पत्तियों ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं और सूखकर समय से पहले गिर जाती हैं। दानों का आकार एवं वजन बहुत कम हो जाता है। अंततः उपज कम आती है।

रोकथाम-
- रबी एवं जायद में उगे हुये सोयाबीन के पौधों को निकाल दें।
- रोग रोधी जातियाँ जैसे इंदिरा सोया-9 या जे एस 93-05 का प्रयोग करें।
- मक्का, ज्वार, कपास, सूरजमुखी आदि फसलों के साथ फसल चक्र अपनायें।
- कार्बेण्डाजिइम + थाइरम (1:1) 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें।
- हेक्साकोनाजोल 5 ई.सी. या प्रोपिकोनाजोल 25 ई.सी. नामक दवा का 0.1 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव करें, गेरूआ रोग से आक्रमण होने पर प्रतिवर्ष परिलक्षित होने की दशा में बुवाई के 30-40 दिन बाद एक सतर्कता छिड़काव करें। मैंन्कोजेब (0.3 प्रतिशत) या क्लोरोथालोनिल (0.2 प्रतिशत) का सुरक्षात्मक छिडकाव 2-3 बार, 8-10 दिन के अन्तर पर करना चाहिये।
4. एन्थेकनोज
यह सोयाबीन का प्रमुख रोग है जो कोलेटोट्राइकम ट्रकेटम नामक फफूंद के कारण होता है। यह रोग पौधे की किसी भी अवस्था में आक्रमण कर सकता हैं, इसका संक्रमण मुख्यतया तना, पर्णवृन्त व पत्तियों में होता है। ग्रसित भाग पर अनियमित आकार के भूरे धब्बे बनते हैं जो कि बाद में बढ़ने लगते हैं और तने आदि को चारों ओर से घेर लेते हैं जिसके परिणामस्वरूप रोगी भाग सूख जाता है। तने का ऊपरी कलिका वाला भाग भी सूख जाता है तथा पत्तियाँ गिर जाती हैं। फलियों में भी इस रोग के लक्षण भूरे धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं तथा फली बनते ही यदि रोग का संक्रमण हो जाता है, तो फली में दाने नहीं भरते और फली भूरी पड़कर मर जाती है तथा दाने के स्थान पर फफूंद का जाल दिखाई देता है। यदि रोग का संक्रमण दाने भरने के बाद की अवस्था में होता है, तो दाने छोटे गहरे भूरे रंग के एव सिकुड़कर अनियमित आकार के हो जाते हैं तथा उनका वजन कम हो जाता है एवं गुणवत्ता प्रभावित होती है। फली की अवस्था में रोग का संक्रमण किस्मों एव बुआई की तिथियों पर निर्भर करता है। फलियों पर काले काले छोटे-छोटे दाने जो फफूंद की बीजाणुधानियों होती है, वलय में या अनियमित आकार के फल्लियों पर बिखरे होते हैं, जिन्हें नग्न आंखों से आसानी से देखा जा सकता है।

रोकथाम-
- जिस क्षेत्र में इसका प्रकोप ज्यादा होता है उस क्षेत्र में फसल कटाई के बाद बचे अवशेषों को जला दें।
- अच्छे स्वस्थ एवं चमकीले बीजों का प्रयोग करें।
- बदरंग एवं कटे-फटे बीजों का चुनाव न करें।
- फसल की बुवाई जून के द्वितीय सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अवश्य कर दें।
- थीरम या कार्बेन्डाजिम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से बीजोपचार करें।
- खडी फसल पर रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही मैंन्कोजेब या थायोफिनेट मिथाइल का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर पहला छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव फूल एवं फली में दाने भरते समय 8-10 दिन के अन्तराल से 10 ग्राम सेंडोविट प्रति 10 लीटर मिलाकर करें।
5. स्क्लेरोशियम तना सडन
इस रोग का सक्रमण पौध रोग अवस्था से लेकर फसल की परिपक्व अवस्था तक हो सकता है। इसका संक्रमण मृदा से लगे पौध एवं परिपक्व तने के आधार भाग पर सफेद कपास के समान फफूंद का जाल फैल जाता है| जिससे सक्रमित पौधे नष्ट हो जाते है। सकमित भाग पर फफूंद के लाल भूरे या गहरे भूरे रंग के दानों (सरसों के दानों) के आकार के स्क्लेरोशिया बनते है। स्क्लेरोशिया फफूंद के कवक जाल से सम्बद्ध होते है।

रोकथाम-
- रोगी पौधे दिखते ही मिट्टी सहित उखाड़कर एक गड्डे में डालकर नष्ट कर देवें।
- खेत का जल निकास अच्छा रखें।
- गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।
- थीरम या कार्बेन्डाजिम 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुआई करें।
6. कलिका झुलसनः
यह विषाणु जनित रोग है। रोग के लक्षण प्रथम पत्ती में सुई के नोक के समान छोटे-छोटे पीले धब्बे के रूप में प्रकट होते हैं। ये धब्बे बाद में मृत होकर भूरे हो जाते हैं, पत्तियों में हरापन कम हो जाता है। कभी-कभी ये पीले धब्बे गोल आकार में बनते हैं। इस रोग के संक्रमण से पत्तियाँ छोटी रह जाती है। पौधों की अग्र कलिका लम्बाई में बढ़कर हसियों के समान मुड जाती है तथा सूख कर गिर जाती हैं। संक्रमित पौधे बौने रह जाते हैं तथा अधिक समय तक हरे रहते हैं। यदि रोग का संक्रमण बुवाई के एक महीने बाद होता है तो पौधे बहुत छोटे रह जाते हैं और अन्त में मर जाते हैं। संक्रमण फूल-फली बनने की अवस्था में होने पर पौधों की लम्बाई कम प्रभावित होती है, फूल एवं फलियों बहुत कम (84-95%) बनती हैं। दाने सिकुड़े एवं छोटे हो जाते हैं, जिससे उपज में काफी नुकसान (71-98%) होता है। रोगी पौधे को यदि फाड़ कर देखा जाय तो इनका पिथ भूरा हो जाता है। रोगी पौधों की जड़ों में गांठों का निर्माण औसतन 50 प्रतिशत कम होता है। इस रोग का प्रसार थ्रिप्स पामी नामक कीट द्वारा होता है।

रोकथाम-
- स्वस्थ्य, चमकीले एवं भारी बींज बुआई के लिए प्रयोग करें।
- रोगी पौधों को देखते ही उखाड़ कर जला दें तथा रोगी पौधों से प्राप्त बीज का इस्तेमाल बुआई हेतु नहीं करें।
- फसल को जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अवश्य बो देना चाहिये
- रोग अवस्था में कीटनाशक दवा एमिडाक्लोप्रिड 8 का 100 मि.ली. दवा प्रति 500 लीटर पानी में या 10-15 दिन के अन्तर में छिडकाव करना चाहिये ।
- थायोमिथाक्सेम 70 डब्लू.एल. 3 ग्राम प्रति किलो की दर से बीजोपचार करें एवं थायोमिथाक्सेम 25 डब्लू जी 100 ग्राम प्रति हेक्टेयर 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
7. जीवाणु फुन्सी :-
यह एक जीवाणु जनित बीमारी है । पत्तियों पर हल्के भूरे रंग के पिन के आकर के धब्बे निचली एवं ऊपर सतह पर बनते हैं। इन्हीं धब्बों के ऊपर छोटी-छोटी पीली फुन्सियों बनती है, जो कि बाद में गहरे भूरे रंग में परिवर्तित हो जाती है। ये धब्बे एवं फुन्सियाँ चमकीले पीले रंग के प्रमण्डल से घिरे रहते हैं। रोग की तीव्रता की अवस्था में ये धब्बे आपस में मिलकर बडे समूह बनाते हैं तथा पत्तियाँ पीली पडकर झड़ने लगती हैं। इसके लक्षण पर्णवृन्त एवं पत्तियों पर भी दिखाई देते हैं।

रोकथाम-
- कटाई के बाद बचे हुये अवशेषों को जला दें या कम्पोस्ट बना लें।
- कासुगामाइसिन 2 ग्राम+कॉपर आक्सीक्लोराइड 2 ग्राम या स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 200 मि ग्रा. 02 प्रतिशत + सीओसी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
- रोग रोधी जातियों जैसे- जे.एस. 80-21, पी. के. 472, जे.एस. 335, जे.एस. 75-46. जे.एस. 72-44, एन.आर.सी. 37 एवं जे. एस. 9305 का प्रयोग करें।
8. पत्ती धब्बा
अ. माइरोथीसियम पत्ती धब्बा –
इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों पर छोटे-छोटे गोलाकार कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं जो अल्प पारदर्शी प्रमंडल से घिरे रहते हैं। धब्बे धीरे-धीरे आकार में बढ़ जाते है एवं मध्यम भाग सफेद धूसर रंग का हो जाता है। पहले नमी की उपस्थिति में, धब्बे के ऊपर सफेद एवं बाद में काले रंग के स्पोरोडोकिया बन जाता है एवं सफेद धूसर भारी कुछ समय बाद टूटकर गिर जाता है तथा एक छोटा छिद्र बन जाता है। नई फलियों के ऊपर भी हल्के भूरे रंग के धब्बों के रूप में संक्रमण होता है. जिसके ऊपर सफेद रंग की फफूंद उग जाती है जो कि शीघ्र काले रंग के स्पोरोडोकिया में परिवर्तित हो जाती है, जिससे अपरिपक्व फलियाँ झड़ जाती हैं तथा परिपक्व फलियाँ के ऊपर भी फफूंद के स्पोरोडोकिया भी बिखरे हुये होते हैं। जिससे दाने छोटे अनियमित आकार के हो जाते हैं।

(ब) टारगेट पत्ती धब्बा
यह बीमारी रोग ग्रसित पौधों के पत्तियों, तना, फली, बीज एवं बीजपत्र एवं जड़ को प्रभावित करती है। इसमें गोल, अनियमित एवं लाल भूरे रंग के छोटे एवं बड़े आकार के (10-15 मि.मी.) या अधिक ब्यास के धब्बे बनते है। धब्बे हल्के हरे एवं पीले हरे घेरे से घिरे रहते हैं। अधिक संक्रमित पौधों की पत्तियों अपरिपक्व अवस्था में ही झड़ जाती है। इस रोग के लक्षण पर्णवृन्त एवं तनों पर गहरे भूरे एवं छोटे, लम्बे, नाव के आकार के धब्बे बनते हैं। फली के ऊपर भी गोलाकार लगभग एक मि.मी. व्यास, हल्का धसा हुआ, मध्य भाग बैगनी, काला एवं परिधि भूरी होती है। कभी- कभी फफूँद का कवक जाल फली के अंदर प्रवेश कर बीज के ऊपर भी छोटे काले भूरे रंग के धब्बे बनाते हैं। बीज पत्र एवं जड़ पर गहरे, लाल भूरे एवं गोलाकार या अण्डाकार धब्बे बनते हैं। जो बाद में गहरे बैगनी भूरे रंग के दिखाई देते है, जो कि अनुकूल परिस्थिति में पूरी जड़ गहरे भूरे रंग की हो जाती है।

रोकथाम-
- स्वस्थ्य चमकीले, भारी बीजों को ही बोने के लिए चुनाव करें।
- बोने से पहले बीज को थीरम, केप्टान या कार्बेन्डाजिम दवाओं से 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
- खड़ी फसल पर मैंन्कोजेब (2.5 ग्राम) थायोफिनेट मिथाइल 1.5 ग्राम प्रति लीटर या कार्बेण्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 30-35 दिन बाद रोग के लक्षण दिखते ही छिड़काव करें।









