छत्तीसगढ़ में शिमला मिर्च (Capsicum) की खेती


सब्जियों में मिर्च की खेती का नकदी फसल के रूप में अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी कुछ जातियों को सब्जी की किस्मों के लिए उगाया जाता है उसे शिमला मिर्च कहते है तथा दूसरी तरह की किस्मों को मसालों के रूप में उपयोग में लाया जाता है। शिमला मिर्च की खेती देशवासियों को भोजन तथा खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के अलावा रोजगार सृजन तथा विदेशी मुद्रा का भी अर्जन कराती है।
छत्तीसगढ़ के परिपेक्ष्य में: छत्तीसगढ़ में सामान्यतः तापमान 25 से 35 सेंन्टीग्रेड तक होता हैं इसिलिए शिमला मिर्च की खेती साल भर पूरे राज्य में की जा सकती है। बदलती खाद्य शैली के कारण शिमला मिर्च की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
उपयोग:
- गुणवत्ता की दृष्टि से शिमला मिर्च प्रोटेक्टिव फूड माना गया है।
- इसमें कई औषधीय गुण भी पाये जाते है।
- शिमला मिर्च में विटामिन ए, विटामिन सी, पोटेशियम, कैल्शियम तथा अन्य खनिज प्रचुर मात्रा में पाये जाते है, जिसके कारण अधिकतर बिमारियों से बचा जा सकता है।
जलवायु:
- यह समशीतोष्ण जलवायु की फसल है, जिसके लिए न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेन्ट्रीग्रेड तथा अधिकतम तापमान 35 डिग्री सेन्ट्रीग्रेड सर्वोत्तम होता है।
- सामान्यतः इस फसल को खरीफ, शरद या जायद ऋतु में लिया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में शीत ऋतु में भी तापमान 8 से 10 सेन्टीग्रेड के नीचे अक्सर नहीं आता एवं शीत का प्रभाव बहुत कम दिनों के लिए रहने के कारण इसे साल भर लिया जाता है।
भूमि:
- उत्तम जल निकास वाली सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है।
- जीवांशयुक्त, दोमट तथा चिकनी दोमट मिटटी इसके लिए सर्वोत्तम है।
- पौधों के अच्छी बढ़वार के लिए 5.5 से 6 पी. एच. की भूमि उत्तम पाई गई है।
प्रमुख किस्में:
ऽ ग्रीन गोल्ड, इंदिरा, भारत, केलिफोर्निया वंडर, अर्का गौरव, अर्का मोहनी, पूसा दीप्ति।
बीज की मात्रा एवं नर्सरी:
- सामान्य किस्म के 750 से 800 ग्राम एवं संकर शिमला के 200 से 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है।
- शिमला मिर्च के बीज महंगे होने के कारण इसकी पौध प्रो-ट्रेज में तैयार करनी चाहिए। इसके लिए अच्छे से उपचारित ट्रेेज का उपयोग किया जाना चाहिए। ट्रेेज में मीडिया का मिश्रण जैसे वर्मीकुलाइट, परलाइट एवं कोकोपीट 1:1:2 की दर से तैयार करना चाहिए एवं मीडिया को भली भांति ट्रेेज में भरकर प्रति सेल एक बीज डालकर उसके उपर मीडिया का हल्का मिश्रण डालकर हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो मल्च का उपयोग भी किया जा सकता है।
पौधरोपण:
- 30 से 35 दिन में शिमला मिर्च के पौधे रोपाई योग्य हो जाते है।
- रोपाई के समय पौधे की लंबाई तकरीबन 16 से 20 सेन्टीमीटर एवं 4-6 पत्तियां होनी चाहिए।
- रोपाई के पूर्व पौधों को 2 प्रतिशत कार्बेण्डाजिम में डुबोकर लगाना चाहिए।
- पौधों की रोपाई अच्छी तरह से उठी हुई तैयार क्यारियों में करनी चाहिए।
- क्यारियों की चौड़ाई सामान्यतः 90 से.मी. रखनी चाहिए।
- पौधों की रोपाई ड्रिप लाईन बिछाने के बाद 45 से.मी. की दूरी पर करनी चाहिए।
- एक क्यारी पर पौधों की सामान्यतः दो कतार लगाते है।
खाद एवं उर्वरक:
- 25 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद एवं 250 किलोग्राम, नाइट्रोजन, 150 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 150 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए।
सिंचाई:
- गर्म मौसम में 7 दिन तथा ठंडे मौसम में 10 से 15 दिन के अंतराल पर।
- ड्रिप सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर उर्वरक एवं सिंचाई ड्रिप द्वारा ही करनी चाहिए।
निंदाई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण:
- शिमला मिर्च की 2 से 3 बार गुड़ाई करना आवश्यक है।
- अच्छी उपज के लिएि 30 एवं 60 दिनों के बाद गुड़ाई करनी चाहिए।
- शिमला मिर्च में अच्छी उपज के लिए मिटटी चढ़ाना आवश्यक है। यह कार्य 30-40 दिन की अवस्था पर करना चाहिए।
- मल्चिंग के उपयोग से मृदा में नमी एवं खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है।
उत्पादन एवं विपणन:
- शिमला मिर्च के फलों की तुड़ाई हमेशा पूरा रंग व आकार होने के बाद ही करनी चाहिए तथा तुड़ाई करते समय 2-3 से.मी. लम्बा डण्ठल फल के साथ छोड़कर फल को पौधों से काटा जाना चाहिए।
- वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर संकर शिमला मिर्च की औसतन पैदवार 700-800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
अनुदान सुविधाएंः
- राष्ट्रीय बागवानी मिशन अंतर्गत प्रति हेक्टेयर 60,000/- रू. की इकाई लागत पर 40 प्रतिशत अनुदान| प्रति कृषक अधिकतम 2 हेक्टेयर हेतु दी जाती है। अधिक जानकारी हेतु अपने क्षेत्र के उद्यानिकी अधिकारी से संपर्क करें |









