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उड़द और मूंग के प्रमुख रोग एवं उनके रोकथाम के उपाय

आयुष गुप्ता एवं राहुल साहू

उड़द और मूंग दोनों ही दलहनी फसलें हैं, जो गर्म जलवायु में अच्छी तरह से उगती हैं। उड़द और मूंग जैसी दलहनी फसलों की बुवाई खेत में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाती है, जिससे दूसरी फसलों से अधिक उत्पादन मिलता है। इन फसलों से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है अगर उन्नत किस्मों का उपयोग किया जाता है और उचित खाद और सिंचाई की जाती है। फसल की पैदावार और उत्पादन को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख रोग हैं, जिनकी रोकथाम बहुत जरूरी है, आइए जानें रोगों के प्रबंधन के बारे में।

मूंग और उड़द की फसलों में कई प्रकार के रोग लगने की संभावना रहती है। इनमे से कुछ प्रमुख रोग जैसे पीला मोजेक, पत्ती धब्बा पाउडरी मिल्ड्यू, और चारकोल विगलन रोग शामिल हैं।

1. पीला मोज़ेक वायरस (Yellow Mosaic Virus – YMV):

लक्षण:

  • पत्तियों पर पीले व हरे चकत्तों का निर्माण।
  • संक्रमित पत्तियां मुड़ जाती हैं।
  • पौधे का विकास रुक जाता है और फलियाँ कम बनती हैं।
  • फलियाँ सिकुड़ जाती हैं और दाने नहीं बनते।

कारण:

  • यह रोग जेमिनी वायरस समूह का होता है।
  • फैलाव सफेद मक्खी (Bemisia tabaci) के माध्यम से होता है।

अनुकूल परिस्थितियाँ:

  • उच्च तापमान (25-35°C)।
  • अधिक आर्द्रता।
  • देर से बोई गई फसल में अधिक प्रकोप।

नियंत्रण:

  • जैविक: नीम तेल (3-5 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव।
  • रासायनिक: थायोमेथोक्साम 25 WG (100 ग्राम/हेक्टेयर) या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL (0.3 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव।

रोकथाम:

  • रोगमुक्त बीजों का उपयोग।
  • सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु पीले चिपचिपे ट्रैप।
  • रोगग्रस्त पौधों को नष्ट करें।
  • रोग प्रतिरोधी किस्में जैसे – उड़द – नरेन्द्र उड़द -1, मूंग – मूंग-1, गंगा-8।

2. पत्ती धब्बा रोग (Cercospora Leaf Spot):

लक्षण:

  • पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के गोलाकार धब्बे जिनके किनारे स्पष्ट होते हैं।
  • बाद में धब्बे सूख जाते हैं और पत्तियां झड़ने लगती हैं।

कारण:

  • सर्कोस्पोरा क्रूयूऐन्टा और सर्कोस्पोरा कैनेसेन्स नामक फफूंदी।

अनुकूल परिस्थितियाँ:

  • गर्म व आर्द्र वातावरण और वर्षा के बाद लम्बे समय तक गीलापन।

नियंत्रण:

  • जैविक: ट्राइकोडर्मा विरिडी से बीजोपचार।
  • रासायनिक: मैंकोजेब (0.2%) , ब्लकापर (0.3%) या कार्बेन्डाजिम (0.1%) का छिड़काव हर 10-15 दिन पर।

रोकथाम:

  • पौध अवशेषों को जला दें।
  • खेत में उचित वायुसंचार बनाए रखें।
  • फसल चक्र अपनाएं और रोग प्रतिरोधी किस्मो को चुने।
  • बीजों का उपचार कार्बेंडाजिम फफूंदनाशी 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करें।

3. झुलसन या पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew):

लक्षण:

  • पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसे पदार्थ का जमाव।
  • धीरे-धीरे पूरा पत्ता सफेद हो जाता है।
  • पौधों की वृद्धि रुक जाती है।

कारण:

  • एरीसिफे पॉलीगोनी नामक फफूंदी।

अनुकूल परिस्थितियाँ:

  • शुष्क मौसम व रात में अधिक ओस।

नियंत्रण:

  • जैविक: नीम अर्क का छिड़काव।
  • रासायनिक: 25–30 किग्रा/हे. गंधक चूर्ण छिड़कें या हेक्साकोनाज़ोल (0.2%) का छिड़काव।3 ग्राम घुलनशील गधंक प्रति लीटर पानी, 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति लीटर पानी या 1 मिली डिनोकेप प्रति लीटर पानी में से किसी एक कवकनाशी को 15 दिन के अंतराल पर तीन बार छिड़काव करें।

रोकथाम:

  • रोग दिखाई देते ही प्रारंभिक छिड़काव करें।
  • रोगी पत्तियों को हटाकर नष्ट करें।
  • रोग प्रतिरोधी किस्म – उड़द एल.बी.जी. 17 ।
  1. चारकोल विगलन रोग (मेक्रोफोमिना ब्लाइट रोग):

लक्षण:

  • पौधे के निचले तनों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे।
  • जड़ें धीरे-धीरे सड़ने लगती हैं।
  • तने के अंदर काले रंग की राख जैसे धब्बे (इसलिए इसे “चारकोल” विगलन कहा जाता है)।
  • पौधा अचानक मुरझा जाता है, जबकि मिट्टी में नमी होती है।
  • तनों को चीरने पर अंदर महीन काले धब्बे (स्क्लेरोशिया) दिखाई देते हैं।

कारण:

  • यह रोग एक मृदाजनित फफूंदी मैक्रोफोमिना फेसियोलिना द्वारा होता है।
  • यह फफूंदी मिट्टी में और पौधों के अवशेषों में स्क्लेरोशिया (sclerotia) के रूप में लम्बे समय तक जीवित रहती है।

अनुकूल परिस्थितियाँ:

  • उच्च तापमान (>30°C), सूखा, खराब जल निकासी।
  • रोकथाम और नियंत्रण:
  • बीजोपचार- थाइरम 2.5g + कार्बेन्डाजिम 1g/kg बीज या ट्राइकोडर्मा 4g/kg बीज।
  • जैविक उपाय- ट्राइकोडर्मा विरिडी कम्पोस्ट में मिलाकर मिट्टी में डालें।
  • रासायनिक उपाय- कार्बेन्डाजिम या थिओफेनेट मिथाइल का स्प्रे/ड्रेंचिंग या 15 दिनों के अंतराल में मेंकोजेब 0.2% की दर से 3 छिड़काव करें।
  • खेती विधि- जल निकासी सुधारें, फसल चक्र अपनाएं, रोगग्रस्त पौधों को नष्ट करें।

समेकित रोकथाम के उपाय (Integrated Disease Management)

उपाय विवरण
बीजोपचार थाइरम (2.5 ग्राम) + कार्बेन्डाजिम (1 ग्राम) प्रति किग्रा बीज।
फसल चक्र उड़द/मूंग के बाद गेहूं, चना या मक्का की फसल लें।
जल निकासी खेत समतल और नालियों युक्त होना चाहिए।
साफसफाई रोगग्रस्त अवशेषों को जला दें।
समय पर बुवाई आद्र्रता कम होने से रोग प्रकोप कम होता है।
जैव एजेंट ट्राइकोडर्मा विरिडी का प्रयोग करें।

 

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