Uncategorized

तोरई (Gilky) की वैज्ञानिक खेती

युगल किशोर लोधी, जितेन्द्र त्रिवेदी एवं प्रवीण कुमार शर्मा

बारिश के मौसम में बड़े पैमाने कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती की जाती है। तोरई भी एक बेलवाली कद्दूवर्गीय सब्जी हैं, जिसको नगदी फसल के तौर पर व्यावसायिक रूप में बड़े खेतों में तथा उसके अलावा छोटी गृहवाटिका में भी उगाया जाता हैं। इसकी खेती ग्रीष्म और वर्षा दोनों ऋतुओं में की जाती हैं, क्योंकि गर्मियों के दिनों में बाजार में इसकी मांग बहुत ज्यादा होती हैं और बारिश का मौसम तोरई की खेती के लिए सबसे अच्छा होता है। इसकी बुवाई फरवरी-मार्च व जून-जुलाई में बीच की जाती है। तोरई की मांग छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों के बाजारों में रहती है। तोरई कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, जिंक तथा आयरन जैसे खनिज तत्वो से भरपूर होने के साथ-साथ खाने में भी स्वादिष्ट होती है। इसमें विटामिन सी, थायमिन, राइबोफ्लेविन भरपूर मात्रा में पाए जाते है। इसके अलावा, इसमें फाइबर की मात्रा भी अधिक होती है। तोरई की फसल 70-80 दिनों में फल देना शुरु कर देती है। चिकनी तोरई के कोमल मुलायम फलों की सब्जी बनाई जाती हैं, तो वहीं इसके सूखें बीजों से तेल भी निकाला जाता है। इस सब्जी की गैर-मौसमी खेती पॉलीहाउस के अंदर की जा सकती है जिससे अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। अगर वैज्ञानिक तरीके से तोरई की खेती की जाये तो इसकी फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

उपयुक्त जलवायु
समशीतोष्ण जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसके पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए शुष्क और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। अधिक ठण्ड जलवायु को इसके पौधे सहन नहीं कर पाते है। गर्मियों के मौसम में इसके पौधे अच्छे से वृद्धि करते है। तोरई के पौधे सामान्य तापमान में अच्छे से अंकुरित होते है। इसके पौधे अधिकतम 35 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है। पुष्पन व फलन के समय ज्यादा गर्मी या वर्षा का होना पैदावार पर विपरीत प्रभाव डालता है।

उपयुक्त मिट्टी
तोरई की अच्छी फसल के लिए कार्बनिक पदार्थो से युक्त उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसकी खेती में उचित जल निकासी वाली भूमि की जरूरत होती है। इसे मिट्टी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है। रेतीली दोमट मिट्टी में उगाने पर यह अच्छा उत्पादन देती है। मिट्टी का पी. एच. मान 6.5-7.0 होनी चाहिए या इसकी रोपाई के लिए थोड़ी क्षारीय मिट्टी भी अच्छी रहतीहै।

तोरई की उन्नत किस्में
अच्छी किस्म के बीजों से खेती करने पर पैदावार भी अच्छी होती है। पूसा चिकनी, पूसा स्नेहा, पूसा सुप्रिया, काशी दिव्या, कल्याणपुर चिकनी, फुले प्राजक्ता, घिया तोरई, पूसान सदार, सतपुतिया, कोयम्बटूर- 2 आदि उन्नत किस्में है।

खेती की तैयारी
तोरई के खेत को तैयार करने के लिए सबसे पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हल से 2-3 गहरी जुताई कर दी जाती है। इसके बाद खेत को कुछ दिनों के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है। इसके बाद खेत में 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालकर रोटावेटर लगाकर जुताई कर दी जाती है। इसके बाद खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल बना दिया जाता है।

बीजोपचार
तोरई फसल को फफूंद जनित रोग से बचाव हेतु बीजों का उपचार आवश्यक है। तोरई के बीजों को थाइरम नामक फफुदनाशी (2 ग्राम दवा प्रतिकिलोग्राम बीज) दर से उपचारित करना चाहिए। बीजों के शीघ्र अंकुरण के लिए बीजों को बुवाई से पूर्व एक दिन के लिए पानी में भिगोना चाहिए तथा इसके पश्चात बोरी या टाट में लपेटकर किसी गर्म जगह पर रखना चाहिए। इससे बीजों को जल्द अंकुरण में मदद मिलती है।

बुवाई
तोरई की बुवाई बीज एवं पौधों की रोपाई दोनों ही विधि से की जाती है। तोरई के एक हेक्टेयर के खेत में दो से तीन किलो बीज की आवश्यकता होती है। बीजो की रोपाई के लिए खेत में धौरेनुमा क्यारियों को तैयार कर लिया जाता है। तोरई के बीजों की रोपाई मेड के अंदर डेढ़ से दो फीट दूरी रखते हुए की जाती है, ताकि इससे पौधे भूमि की सतह पर अच्छे से फैलस के तैयार की गई इन क्यारियों के मध्य 3 से 4 मीटर तथा पौधे से पौधे के मध्म 80 सेमी. की दूरी रखनी चाहिए। नालियाँ 50 सेमी. चौडी व 35 से 45 सेमी. गहरी होनी चाहिए। इसके बीजों की रोपाई खरीफ के मौसम में जून के महीने में की जाती है।

सिंचाई प्रबंधन
तोरई के पौधों की सिंचाई आवश्यकतानुसार की जाती है। यदि इसके बीजो की रोपाई जून के महीने में की गई है, तो प्रारंभिक सिंचाई को बीज रोपाई के तुरंत बाद करना होता है तथा उसके बाद तीन से चार दिन के अंतराल में हल्की-हल्की सिंचाई की जाती है, ताकि खेत में नमी बनी रहे और बीजो का अंकुरण ठीक से हो सके। इसके अलावा बारिश के मौसम में की गई रोपाई के लिए पौधों को जरूरत पड़ने पर ही पानी देना होता है।

खाद व उर्वरक प्रबंधन
बुवाई से पहले मिट्टी की जांच करवायें, जिससे मिट्टी में पोषक तत्व और उर्वरकों को जरूरत के हिसाब से डाल सकें। साधारण भूमि में 15-20 टन तक गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए। तोरई को 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30-40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय ही समान रूप से मिट्टी में मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की बची हुई शेष मात्रा 45 दिन बाद पौधों की जड़ों के पास डालकर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन
तोरई के पौधों में खरपतवार पर नियंत्रण के लिए नीराई-गुड़ाई किया जाता है। इसके पौधों की आरम्भिक गुड़ाई बीज रोपाई के 15 दिन बाद की जाती है। इसके बाद की गुड़ाई को आरम्भिक गुड़ाई के 15 से 20 दिन के अंतराल में करना होता है। रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए खेत में बीज रोपाई से पहले बासालीन शाकनाशी की उचित मात्रा 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

रोग प्रबंधन
एन्थ्रेक्नोज: इस बीमारी से पत्तों से फलों पर भूरे धब्बे पड़ जाते हैं तथा अधिक नमी वाले मौसम में इन धब्बों पर गोंद जैसा पदार्थ दिखाई देता है। इस रोग से बचने के लिए मैंकोजेब का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से 15 से 20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
चिट्टारोग या पाउडरी मिल्ड्यू: फफूंद से पत्तों, तनो और पौधों के दूसरे भागों पर फफूंदी की सफेद आटे जैसी परत जम जाती है। रोग की रोकथाम के लिए केरेथॉन एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी को घोलकर छिड़काव करें।

डाउनी मिल्ड्यू: पत्तों की ऊपरी सतह पर पीले और नारंगी रंग के दाग धब्बे बन जाते हैं। रोग के नियंत्रण के लिए लौकी की जाति के खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए। पौधों पर मेंकोजेब या कॉपर आक्सीक्लोराइड का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
कीट प्रबंधन
लालड़ी या रेडपंपकिन बीटल: रेडपंपकिन बीटल यह सभी कद्दूवर्गीय सब्जियों का प्रमुख कीट है। इसके लाल पीले रंग के प्रौढ़ पत्तियों में गोल सुराख बनाते हैं तथा क्रीम रंग की सुण्डिया जमीन में रहकर जड़े काटकर पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं। रोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत कार्बेरील का या 0.05 प्रतिशत साईपरमेंथ्रिन का छिड़काव करें। सुंडियों से बचने के लिए 1.5 लीटर क्लोरपायरिफॉस प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में बिजाई के एक महीने बाद सिंचाई के साथ उपयोग करें।

मोजेक: प्रभावित पौधों के पत्ते पीले पड़ जाते हैं। जिससे पैदावार बहुत कम मिलती है। यह विषाणु जनित रोग है जो बीज व चेंपा द्वारा फैलता है। इस रोग से बचाव के लिए रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए चेंपा को नष्ट करने के लिए नियमित रूप से कीटनाशक का छिड़काव करें।

तेला, चेंपा और माइटः यह सभी शिशु तथा प्रौढ़ावस्था में पत्तों से रस चूसते हैं। जिसके कारण पौधे पीले व कमजोर हो जाते हैं तथा पैदावार घट जाती है। इन सभी की रोकथाम के लिए मेलाथीयॉन 0.05 प्रतिशत या इमिडाक्लोप्रिड 0.05 प्रतिशत का छिड़काव करना लाभप्रद है।

फलमक्खी: कोमल फलों के गूदे में अंडे देती हैं और इन अंडों से निकलने वाली लटेफल के गुद्दे को खाती है। जिससे फल सड़कर खराब हो जाते हैं। इस कीट के प्रकोप से बचने के लिए 0.2 प्रतिशत कार्बेरील या 0.1 प्रतिशत मेलाथीयॉन का 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

तोरई की तुड़ाई
बिजाई के 70-80 दिनों के बाद फसल तुड़ाई के लिए तैयार हो जातीहै। 3-4 दिनों के अंतराल पर तुड़ाई करें। नर्म और मध्यम आकार के फलों की तुड़ाई करनी चाहिए। तोरई के फलों को तोड़ने के बाद ठण्डे छायादार स्थान पर रखे। इसके अलावा टूटे हुए फलों पर बीच-बीच का पानी छिड़कते रहें जिससे फल ताजे बने रहेंगे। इस प्रकार पूरी फसल की तुड़ाई लगभग 7-8 बार में हो जाती है।

तोरई की उपज
तोरई की पैदावार उसकी किस्मव खेती के प्रबंधन तकनीकों पर निर्भर करता है। तोरई की उन्नत किस्म की खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाये तो 150 से 300 किंवटल प्रतिहेक्टेयर तक पैदावार हो जाती है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button