

फलों में पपीता (Papaya) अपना विशिष्ट स्थान रखता हैं। यह प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाला एवं औषधीय गुणों से भरपुर फलदार पौधा है, यह छः माह की उम्र से फलना प्रारंभ कर देता है जो दो वर्ष तक उत्पादन देता है। पपीता व्यवसायिक खेती के साथ-साथ गृहवाटिका की शोभा भी बढ़ाता हैं। पपीते के फलो से पपेन तैयार किया जाता है।
जलवायु:- पपीता उत्पादन के लिये धूप व उचित तापमान आवश्यक हैं। पपीते का तना खोखला व पत्ती चौड़ी होने के कारण इसे पाला, लू तथा तेज हवायें अधिक नुकसान पहंुचाती है अतः पाले व लू से बचाव के लिए आवश्सकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए।
भूमि:- पपीते की खेती उचित जल निकास युक्त किसी भी भूमि में जिसका पी.एच.मान. 6.5 से 7.5 हो में की जा सकती है परन्तु दोमट मिट्टी पपीते की खेती के लिये अति उत्तम होती हैं। छायादार व जल भराव वाली मिट्टी में तना गलन रोग लगने की अधिक संभावना रहती हैं। अतः उचित जल निकास वाली मृदाओ का चयन इसकी खेती के लिए करें।
पपीते की मुख्य किस्मेंः-
- पूसा नन्हा:- इस संकर किस्म के पौधे 25-30 सेमी. ऊंचाई से फलना शुरू कर देते हैं। फल मध्यम भार के व अण्डाकार होते है।
- कुर्ग हनिड्यू:- इस किस्म के फल अण्डाकार होते हैं और उन मर हल्की धारियां पाई जाती हैं।
- रेड लेडी 786:- यह प्रजाति अधिक उत्पादन व रोगो से लड़ने की क्षमता वाली एवं उभयलिंगी होने के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय हैं गूदा लाल रंग का व छिलका मोटा होता हैं।
- विनायक:- यह प्रजाति मध्य क्षेत्र के लिये उपयुक्त है इसका 8-10 माह में फलन प्रारंभ हो जाता हैं । फलों का वनज 1.5 से 2 कि.ग्रा. तथा आकार गोल व बेलनाकार होता हैं।
हनीडयू बडवानी लाल, बडवानी पीला, वाशिंगअन, सूर्या आदि भी उन्नत प्रजातियाँ हैं।
पपीता पौेध तैयार करना:- व्यावसायिक रूप से पपीते का प्रर्वधन बीज के द्वारा किया जाता हैं। पौध तैयार करने के लिये 3×1 मी. आकार की 15 सेमी ऊंची क्यारियां तैयार करनी चाहिएं। बीज को 10 से.मी. के अन्तर पर पंक्तियों में 3 सें.मी. की दूरी तथा 1 से.मी. गहराई पर बोया जाता हैं। एक हैक्टर में रोपण के लिए 250-300 ग्राम बीज व संकर किस्मों का 80 से 100 ग्राम बीज पर्याप्त होता हैं। बीज बुवाई बाद फव्वारे से सिंचाई करें, पौधे 40-50 दिनों में रोपाई हेतु तैयार हो जाते हैं।
भूमि की तैयारी:- अप्रैल-जून माह में भूमि की 2-3 जुताई करके 1.5 फीट3 (लम्बाई/चौडाई/गहराई) के आकार के गड्डे की ऊपरी मिट्टी में 15-20 कि.ग्रा. पकी हूई गोबर की खाद व 1 कि.ग्रा. नीम की खली प्रति गड्डें में भरना चाहिए।
पौधे रोपण:-
| रोपण दूरी (मीटर में) | पौंध संख्या (प्रति हैक्टेयर) |
| 1.80×1.80 | 3086 |
| 2.00×2.00 | 2500 |
एक गड्डे में एक ही पौधा लगायें, पौध रोपण हेतु उपयुक्त समय जुलाई-अगस्त व फरवरी-मार्च होता हैं।
खाद एवं उर्वरक:- खाद तथा उर्वरक की मात्रा मिट्टी की किस्म, वर्षा, स्थान तथा पौधों की आयु पर निर्भर करती हैं। सामान्यतः प्रथम वर्ष में पपीते के प्रत्येक पौधें के लिये 100 ग्राम किसान यूरिया, 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 125 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, की आवश्यकता होती है। सिंगल सुपर फास्फेट व म्यूरेट ऑफ पोटाश की पूरी किसान यूरिया की 30 ग्राम मात्रा 2 माह बाद व 60 ग्राम मात्रा 4 माह बाद फूल निकलने से पहले डालना चाहिये।
सिंचाई:- नमी की कमी का पपीते की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं पपीते के लिए ग्रीष्म ऋतु मे 5-7 दिन तथा शीत ऋतु मे 10-15 दिन पश्चात हल्की सिंचाई करनी चाहिए। ड्रिप सिंचाई अधिक लाभकारी हैं।
निंदाई-गुड़ाई:- पपीते के बगीचे को निंदाई गुड़ाई कर खरपतवारो से मुक्त रखना चाहिए।
अन्तरवर्तीय फसलें:- पपीते के पौधे के मध्य में प्रथम वर्ष मे कम बढने वाली सब्जियॉ जैसे फूलगोभी, प्याज, लहसुन आदि की खेती करना लाभदायक होती हैं।
विरलन:- यदि पपीते में अधिक संख्या में फल लगते हैं तो फलों की अच्छी बढवार नही हो पाती है, कुछ फलों का आकार बहुत छोटा व कुरूप् हो जाता है तथा कुछ अपने आप गिर जाते है। अतः अधिक पास-पास लगें फलो को प्रारंभिक अवस्था में तोड देना चाहिए जिससे बचे फल बडे आकार के उच्च गुणवत्ता युक्त प्राप्त होते हैं।
प्रमुख कीट:-
सफेद मक्खी:- यह कीट पत्तियों का रस चूसकर हानि पहॅुचाता हैं तथा विषाणु रोग फैलाने में भी सहायक होता हैं।
प्रवंधन:- इसकी रोकथाम हेतु इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 एस.एल. दवा की 100-200 मिली ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से अथवा थायोमिथाक्जॉम 25 डब्ल्यू.जी. दवा की 100 ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए।
लाल मकडी:- यह कीट पके फलों व पत्तियो की सतह पर पाया जाता है, इस कीट से प्रभावित पत्तियाँ पीली व फल काले रंग के हो जाते हैं।
प्रबंधन:- इसकी रोकथाम हेतु डायमिथेएट 30 ई.सी. 800 से 1000 मिली का प्रति हैक्टेयर की दर से घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।
प्रमुख रोग:-
तना व पौध गलन:- यह रोग किसी भी उम्र के पौधों को संक्रमित कर नष्ट कर सकता है। प्रभावित पौधो की पत्तियॉ पीली पडने लगती है और पौधा मुरझाकर गिर जाता हैं। तने के छिलके पर भी गीले से चकत्ते दिखाई देते है व पौधे की जडे सडने लगती है।
प्रबंधन:- बुवाई पूर्व बीजो को कार्बेन्डाजिम 2 से 3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। खडी फसल में रोग के लक्षण दिखने पर कार्बेन्डातिम $ मैन्कोजेब की 750 ग्राम मात्रा का प्रति हैक्टयर की दर से छिड़काव करंे।
पत्ती कुंचन रोग:- पपीते का यह विषाणु जनित रोग है, इसमें पत्तियाँ छोटी व झुर्रीदार तथा शिरायें पीली व मोटी हो जाती हैं। यह रोग सफेद मक्खी के द्वारा फैलता हैं।
प्रबंधन:- रोग ग्रसित पौधों को उखाड कर नष्ट कर देना चाहिए एवं सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 एस.एल.दवा की 100-120 मिली मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए।
पपीते का मोजेक रोग:- यह भी एक विषाणु जनित रोग हैं। इस रोग के कारण पत्तियों में पानीदार लम्बी चित्तियॉ पड जाती हैं।
प्रबंधन:- यह रोग रस चूसक कींटो के द्वारा फैलता है अतः इस रोग की रोकथाम हेतु इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 एस.एल. की 100-120 मिली मात्रा या थायाकमिथाक्जॉम 25 डब्ल्यू.जी. की 100 ग्राम मात्रा का प्रति हैक्टयर की दर से छिड़़काव करें।
एन्थेक्नोजः- यह एक फफॅूद जनित रोग हैं। रोग का आक्रमण तनो,पत्तियों और फलों पर होता हैं। फल तथा पत्तियों पर लम्बें धब्बे बन जाते है जिसके कारण फल सड़ कर गिर जाते हैं।
प्रबंधन:- रोग के लक्षण दिखाई देने पर डाइथेन एम 45 अथवा कॉपर आक्सीक्लोराइड दवा की 500 ग्राम मात्रा का प्रति हैक्टर की दर से घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।
फलों की तुडाईः- पपीते की फसल में लगभग 12-15 माह में फल तुडाई योग्य हो जाते है। जब फल हल्का से पीलापन देने लगे और दूध आना बंद हो जाये तो समझना चाहिए कि फल पक गया है तब फल की तुडाई कर देना चाहिए।
उपज:- पपीते की उचित देखभाल होने पर प्रति वृक्ष औसतन 50-70 किग्रा. तक उपज प्राप्त हो जाती हैं।










