अधिक उत्पादन हेतु ग्वारफली (Cluster Beans) की खेती कब व कैसे करें


ग्वार (Cluster Beans) एक बहुउद्देशीय दलहनी फसल है। इसका वानस्पतिक नाम साइमोप्सिसटेट्रागोनोलोबा है। इस फसल की जड़ गहरी होती है तथा यह कम पानी चाहने वाली होती है जिसके कारण इसकी अधिकतम खेती हमारे देश के पश्चिमी भाग के शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में की जाती है। इसकी खेती अनेक उद्देश्यों जैसे-सब्जी (हरी फलियाँ), पशुओं के लिए पौष्टिक चारा व दाना, हरी खाद, भूमि संरक्षण आदि के लिए की जाती है। ग्वार के बीजों से लगभग 30-33 प्रतिषत तक गोंद की मात्रा पाई जाती है जिसे ‘ग्वारगम’ के नाम से जाना जाता है। ‘ग्वारगम’ का उपयोग अनेक उद्योगों जैसे- तेल निकालने वाले उद्योगों, खाना बनाने और भोजन पदार्थों के अलावा छपाई, कपड़ा और कागज़ उद्योगों में भी किया जाता है। इसलिए इसे औद्योगिक फसल भी कहा जाता है। ग्वारफली की सब्जियाँ शाकाहारी लोगों का संतुलित आहार है। प्रोटीन और रेशा युक्त होने के कारण इसे सब्जियों में प्रमुखता दी जाती है।
ग्वारफली से स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है। इसका इस्तेमाल दाल और सूप बनाने में भी किया जाता है। हरी फलियों के 100 ग्राम भाग में 81.0 ग्राम पानी, 3.2 ग्राम प्रोटीन, 0.4 ग्राम वसा, 1.4 ग्राम खनिज, 3.2 ग्राम रेशा और 10.8 ग्राम कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। इसके अतिरिक्त हरी फलियों में कैल्शियम (130 मि.ग्रा.), फास्फोरस (57 मि.ग्रा.), लोहा (1.08 मि.ग्रा.) तथा विटामिन-ए, थाइमिन, फोलिक अम्ल और विटामिन-सी इत्यादि भी इसमें पाए जाते हैं। पशुओं को ग्वार खिलाने से उनमें ताकत आती है। दूधारू पशुओं की दूधदेने की क्षमता में वृद्धि होती है। हरी खाद के रुप में इसकी फसल से 45-50 कि. ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर भूमि में उपलब्ध होती हैं। ग्वारफली की खेती गर्मी के मौसम में और बारिश के मौसम में की जाती है। सब्जी वाली ग्वारफली की फसल में बुवाई के 50 से 55 दिनों बाद कच्ची फलियाँ तुड़ाई पर आ जाती हैं। इस प्रकार बहुत ही कम समय में यह किसानों को आय प्रदान करती है।

उपयुक्त जलवायु
ग्वार एक उष्णकटिबंधीय फसल है जो 18 से 30 डिग्री सेल्सियस के औसत तापमान पर पकती है। खरीफ की गर्म और आर्द्र जलवायु के कारण पेड़ों की वृद्धि अच्छी होती है। अत्यधिक बरसात तथा ठण्ड को यह सहन नहीं कर पाता है। शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में जहाँ बरसात कम परन्तु एक नियमित अन्तराल पर हो तो ग्वार की फसल से अत्यधिक उत्पादन लिया जा सकता है। जहा अत्यधिक गर्मी पड़ती है और सिंचाई की सुविधा हो तो ग्वार की फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।18-28 डिग्री सेल्सियस के मध्य का तापमान ग्वारफली के बीज अंकुरण के लिए आदर्श होता है। ग्वारफली के पौधे को प्रतिदिन लगभग 6 से 8 घंटे सूर्य प्रकाश की जरुरत होती है।
भूमि का चयन व तैयारी
ग्वार की खेती के लिए उचित जल निकास वाली दोमट व बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। यह फसल सिंचित एवं असिंचित दोनों क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगायी जा सकती है। हल्की क्षारीय व लवणीय भूमि जिसका पीएच मान 7.5 से 8.5 तक हो, वहां पर ग्वार की खेती आसानी से की जा सकती है।
भूमि को तैयार करने के लिये एक जुताई मिटटी पलटने वाले हल या डिस्कहैरो से क्रॉस जुताई करके पाटा लगा देना चाहिए। इसके उपरांत एक कल्टीवेटर से जुताई पर्याप्त रहता है जिससे मृदा नमी संरक्षितर हें। जुताई जून के द्वितीय पखवाड़े में करनी चाहिए। इस प्रकार तैयार खेत में खरपतवार कम पनपते हैं। अंतिम जुताई के समय 200-250 किं्वटल प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर खेत में पाटा लगा कर तैयार कर लेवें।
उन्नतकिस्में
हरी फलियों के लिएः-शरदबहार, पूसा सदाबहार, पूसा नवबहार, पूसा मौसमी, गोमा मंजरी, आईसी-1388, एम-83 और पी-28-1-1 आदि किस्में।
दानों के लिएः-दुर्गापुर सफेद, मरू ग्वार, दुर्गाजय, एफएस-277, अगेती ग्वार-111, आरजीसी-197, आरजीसी-417 और आरजीसी-986 आदि किस्में।
हरे चारे के लिएः-ग्वारक्रांति, बुन्देल ग्वार-1, बुन्देलग्वार-2, बुन्देल ग्वार-3, एचएफजी-119, गोरा-80 और आर आई-2395-2 आदि किस्मों की खेती कर सकते हैं।
बुआई का उपयुक्त समय
ग्वारफली की खेती गर्मी के मौसम में और बारिश के मौसम में की जाती है। गर्मी के मौसम में खेती करने के लिए मध्य फरवरी से मार्च के पहले सप्ताह में बुआई कर देनी चाहिए। बारिश के मौसम की फसल की बुआई के लिए जून और जुलाई का महीना सबसे उपयुक्त समय है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जुलाई के पहले सप्ताह या वर्षा ऋतू के आगमन के साथ बुआई कर दी जाती है।
बीज की मात्रा एवं बीजोपचार
ग्वार की बुआई कतार या पंक्ति में करने के लिए प्रति हेक्टेयर 12 से 15 किलोग्वार के बीज की आवष्यकता होती है, जबकि छिटकवा विधि से ग्वार की बुआई करने के लिए 15 से 18 किलो प्रति हेक्टेयर बीज की जरुरत पड़ेगी। ग्वार की जड़ों के अच्छे विकास के लिए इनके बीजों को उपचारित करना बहुत ही जरुरी होता है। अतः बीज की बुवाई से पहले बीज को 1ः30 घंटे तक स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के 500 मिली ग्राम प्रति लीटरपानी के घोल में भिगोकर, छाया मे सुखाकर व 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रतिकिलो बीज की दर से बुवाई के पहले उपचार करके बोना चाहिए। बीजों को 2-3 ग्राम राइबोजियम कल्चर प्रतिकिलो बीज की दर से भी उपचारित करने से 10-15 प्रतिषत तक नत्रजन की बचत होती है।
बुवाई की विधि
बीजों की बुवाई कतारमें 45-60 सेमी की दूरी पर जबकि पौधे से पौधे की दूरी 20 सेमी रखना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण
फसल की शुरूआती वृद्धि के दौरान निराई और गुडाई प्रक्रिया द्वारा खेत को साफ रखें। रासायनिक तरीके से खरपतवारों की रोकथाम के लिए पैंडीमैथालीन 750 मि.ली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 24 घंटों के अंदर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
खाद एवं उर्वरक
ग्वारफली की खेती के लिए 200 से 250 किं्वटल गोबर की सड़ी खाद, 25-30 किलो ग्राम नाईट्रोजन, 40-50 किलोग्राम फोस्फोरस, 20 किलोग्राम सल्फर तथा 5 किलोग्राम जिंक प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में डालने से उत्पादन अच्छा होता है। गोबर की खाद को अंतिम जुताई से पहले समान रूप से खेत में बिखेर कर ही जुताई करनी चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा एवं अन्य उर्वरकोंको खेत की अंतिम तैयारी के समय भूमि में डालना चाहिए। शेष नत्रजन की मात्रा 25-30 दिनबाद खडी फसल में देवें।
सिंचाई प्रबंधन
खरीफ फसल में समय परवर्षा न होने पर आवश्यकता के अनुसार 2-3 सिंचाई करनी चाहिए। सब्जी वाली फसल में सिचाई का विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है। फूल आने के समय तथा फलियाँ बनने के समय भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए अन्यथा फलियों की पैदावार व गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। गर्मी की फसल में सिंचाई 7-10 दिन के नियमित अन्तराल में करनी चाहिए। सिंचाई हल्की व कम गहरी होनी चाहिए। बूँद-बूँद सिंचाई विधि से सिंर्चाइ करने से जल बचत के साथ अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।
फसल की कटाई
बीजोत्पादनः-जब ग्वार के पौधों की पत्तियाँ सूख करगिरनेलगे एवं 50 प्रतिशत फलियाँ एकदम सूखकर भूरी हो जाये तब कटाई करें। कटाई के बादफसलकोधूप मे सुखाकर श्रमिको या थ्रेशर मशीन द्वारा उसकी थ्रेशिंग (मडाई) करें। दानो को अच्छी तरह धूप में सुखा कर उचित भण्डारण करें।
सब्जी उत्पादनः-सब्जी के लिए उगाई गई फसल से समय-समय पर लम्बी, मुलायम एवं अधपकी फलियाँ तोडते रहना चाहिए।
चारा उत्पादनः-चारे के लिए उगायी गई फसल को फूल आने एवं 50 प्रतिशत फली बनने की अवस्था पर काट लेना चाहिए। इस अवस्था से देरी होने पर फसल के तनों में लिग्निन का उत्पादन होने लगता है, जिससे हरे चारे की पाचकता एवं पौष्टिकता घट जाती हैं।
उपज
ग्वारफली की उपज मौसम, प्रजाति, मृदा के प्रकार और सिंचाई सुविधाओं पर निर्भर करती है। उन्नत प्रबंधन तकनीकों से ग्वार की फसल से 250-300 किं्वटल हरा चारा, 12-18 किं्वटल दाना और 70 से 120 किंवटल हरी फलियां प्रति हेक्टेयर प्राप्त कर सकते हैं।
रोग प्रबन्धन
एन्थेक्नोजरोगः पत्तियों तथा फलियों पर भूरे रंग के धब्बे हो जाते हैं तथा किनारे लाल पड़ जाते हैं। रोगनियंत्रण के लिए बुवाई से पूर्व बीजोपचार थायरम या कैप्टान 2 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से करें। रोग ग्रसित पत्तियों व फलियों पर मेंकोजेब 2 ग्राम या कार्बोन्डाजिम 2 ग्रामप्रति लीटर का घोल बनाकर 7 से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
चूर्णिल आसिता रोगः रोगी पौधे पर सफेद चूर्णी धब्बे दिखाई देने लगते है। इसके नियंत्रण के लिए घुलनशील गंधक की 2 मात्रा प्रतिलीटर पानी या थियोफिनेटमिथाइल 2 ग्राम मात्रा का प्रतिलीटर पानी के घोल का छिड्काव करें।
जीवाणु अंगमारीः पतियों पर काले-भूरे धब्बे के रूप में दिखाई देने लगते है, जो बढ़कर पूरी पत्ती को ढक लेताहै। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बीजोंको 50 डिग्रीसेन्टीग्रेट गर्म पानी में 10 मिनट तक डालकर बुवाई करें या बीज को एक घण्टा 30 मिनट तक स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के 500 मिलीग्राम प्रतिलीटर पानी के घोल में भिगोकर, छाया में सुखाकर व 2 ग्रामकार्बेन्डाजिम प्रति किलोबीज की दर से बुवाई पूर्व उपचार करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर कॉपर ऑक्सिक्लोराइड़ 50 डबल्यू पी 500 ग्रामप्रति एकड़ क्षेत्र में 200 लीटर पानी के साथ छिड्काव करें।
जड़ गलनः पौधों की जड़ें भूरी व काली पड़कर गलने लगतीहै। बीजों को बुवाई से पहले कार्बोक्सिन 2 ग्राम प्रतिकिलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें। इसकी रोकथाम के लिए गर्मी में खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करे और उचित जलनिकास का प्रबंधन करें।
मोजेकः यह एक विषाणुजनित रोगहै, जो सफेद मक्खी कीट से फैलता हैै। रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला दे। इसके लिए रोगरोधी किस्मों का चयन करें। कीट नियंत्रण के लिए डायमिथोएट 30 ईसी 1.25 मिलीलीटर दवा प्रति लीटर पानी का घोलबना कर छिड़काव करें।
कीटप्रबन्धन
चेपा/मोयला/सफेदमक्खीः यह कीट नई और कोमल पत्तियों का रस चूसकर पौधे की उपजको कम करते हैं। अतः पौधों की वृद्धि अवस्था के दौरान डायमिथोएट 30 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति लीटरपानी में घोलकर छिड़काव करें।
फली बेधक कीटः ये कीटें फलियों में छेदकर उन्हें खाकर नुकसान पहुँचाती हैं। नियंत्रण के लिए एमोमेक्टिनबेंजोइट 100 ग्रामप्रति एकड़ पानी के साथ स्प्रे करें। आवश्यकता होने पर 15 दिन के अन्तराल पर पुनः छिड़काव करें।









