पशुपालनमत्स्य पालनराष्ट्रीय

छत्तीसगढ के परिपेक्ष्य में मछली सह बतख पालन

डॉ. रामचंद्र रामटेके, डॉ. दुष्यंत दामले, डा. गोविना देवांगन एवं डा. देवेश गिरि

मछली पालन (Fishery) के कुल खर्च का 60-65 प्रतिशत भाग जैविक एवं रासायनिक खाद (गोबर का खाद या चूना) व पूरक आहार मेें चला जाता हैं। यदि मछली पालन के साथ बतख पालन (Duck) को समन्वित किया जाता हैं, जिसमें एक अपषिष्ट या उप उत्पाद दूसरे के लिए उपयोगी होता हैं। और इससे ज्यादा लाभ प्राप्त होता है। मछली पालन के साथ बतख पालन करने से मछली उत्पादन में वृद्धि होती हैं। एवं मत्स्य पालक को 1.5-2 गुना तक आर्थिक लाभ मिलता हैं। बतख जो तालाब में मल- मूल का त्याग करता हैं, वह खाद का कार्य करता हैं। इसलिए खेत में अलग से खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती हैं। बतख अपने भोजन की तलाश में मिट्टी खोदती हैं जिससे मिट्टी के पोषक तत्व पानी में घुलतें हैं। बतख के पानी में तैरने से ऑक्सीजन पानी में घुलता हैं जिससे पानी में ऑक्सीजन की कमी नहीं होती हैं। इन सब के बदलें बतख तालाब के कीड़े-मकोड़े एवं मेंढक के बच्चे, घोंघा, जलीय घास आदि को खाता हैं। बतख में तैरते हुए मत्स्य बीजों को खाने की क्षमता नहीं होती हैं।

मछली पालन सह बतख पालन से लाभ:-
1. मछली का उपयोग परिवार के लिए ।
2. साग – सब्जी एवं अंडे की प्राप्ति ।
3. उत्सर्जित भोज्य पदार्थो बतख के लिए मिलेगा ।
4. अनुपयोगी साग-सब्जी का उपयोग बतख के लिए ।
5. बतख का खाद तालाब के लिए उपयोग में आयेगा ।
6. खाद युक्त जल सिंचाई के लिए।
7. कम्पोस्ट की प्राप्ति ।

तालाब में मत्स्य बीज का संचय:-
1. जो मछली खाने में स्वादिष्ट हो ।
2. जिसका जीरा या बीज उपलब्ध हो ।
3. जिसकी मांग बाजार में हो ।
4. जिसकी बढ़त तालाब में अच्छी हों ।

मछलियों के बीज की मात्रा:-
मछलियों में बीज की मात्रा उसके लंबाई पर निर्भर करती हैं। अगर 1 इंच का जीरा डाले तो मछली बीज की दर 10,000 जीरा प्रति एकड व अगर जीरा 21/2 इंच या 6 सेमी. का हैं, तो 4,000 जीरा प्रति एकड़ है। इसके अलावा किसानों का यह मानना हैं कि तालाब में अधिक मात्रा में जीरा डाल दे और 2 महीने में मछलियां निकाल कर उसे बाजार में बेचना चालू करें तो उसका मूनाफा अधिक होता हैं।

अलग अलग मछलियों की जाति का संचय अनुपात:-
चूंकि तालाब में मछलियों के भोजन एवं स्थान निश्चित हैं, इसलिए तालाब में पाली जानी वाली मछलियों का अनुपात भी निश्चित होनी चाहिए। तालाब में 6 प्रकार की मछलियों को पालना चाहिए, ताकि तालाब के सभी जगह का समुचित उपयोग हो सकें। साथ ही साथ सभी प्रकार के भोज्य पदार्थों का भी उपयोग हो सकें। तालाब में कम से कम 3 प्रकार की मछली रोहू: कतला: मृगल 30: 30: 40 अनुपात में संचय अवश्य करना चाहिए। देखा गया हैं कि सिल्वर कार्प, डालने पर कतला का विकास कम हो जाता हैं। इसलिए तालाब में कतला की मात्रा अधिक रखनी चाहिए । यदि तालाब में ग्रास कार्प के लिए उपयुक्त घास नहीं हैं, तो ग्रास कार्प का संचय कम करना चाहिए । संभव हो तो 4 ग्राम से बड़ा जीरा डालें। 4 ग्राम से ऊपर का जीरा नहीं मिल रहा हैं। या छोटे जीरे का संचय कर रहें हैं तो बतख के लिए अलग से घेरा बना दें ताकि बतख पूरे तालाब में न जा पाये या जीरें की संख्या को 1000 से 2000 तक बढ़ा कर तालाब में डालें ।

सावधानियां:-
1. रासायनिक खाद एवं कीटनाशक का प्रयोग कम या नहीं करना चाहिए ।
2. खेत में पानी के प्रवेश व निकासी की अच्छी व्यवस्था हो तथा उसमें जाली भी लगी होनी चाहिए ताकि मछली वहां से निकल न सकें ।

बीज संचय में सावधानियां :-
बीज या जीरा ऑक्सीजन वाली पॉलीथिन में लायें । इससे परिवहन के दौरान मृत्युदर कम होती हैं।

  1. मछली बीज का संचय सुबह या शाम के समय करना चाहिये जब पानी ठंडा हों । इससे मृत्युदर कम होती है।
  2. पॉलीथिन के थैली में भरे जीरे को सीधे पानी में न डालें इसे थोड़ी देर तालाब के पानी में रखें । ताकि थैली और तालाब का तापमान बराबर हो जाये ।
  3. जीरा या बीज को स्वतः पॉलीथिन के थैली से तालाब में जाने दें ।
  4. संचय के दिन तालाब में पूरक आहार न डालेे ।
  5. एक गमछे को पानी में डुबाते हुए चारों तरफ से पकड़े और उसमें पहले मछली को छोड़े और उसके ऊपर पोटेशियम परमेंग्नेंट को डाले इससे मछली का विकास अधिक होता हैं।
  6. मछली बीज संचय में कोशिश करना चाहिये कि बीज की लंबाई व बीज दर मानक अनुसार हो  जिससे मछली में आपसी प्रतिस्पर्धा नहीं होगा। और मछली का उत्पादन अच्छा होगा।
  7. मछली बीज हमेशा अच्छे हैचरी जिसकी बीज में गुणवत्ता हो ऐसे फर्म से ही लेना चाहिये।

मछली का आहार प्रबंधन:-
चावल का कोढ़ा एवं सरसों की खली 1: 1 अनुपात में 1 किलो चावल का कोढ़ा व 1 किलो सरसों की खली अच्छें से मिलाकर व बारिक पीसकर दे सकते हैं।

  1. मछलियों को खाना सुबह-शाम एक निश्चित जगह पर ही डाले ताकि मछली को आदत ही जाये और मछली उस जगह पर आकर भोजन ग्रहण करें।
  2. साथ ही 1 प्रतिशत खनिज लवण भी देना चाहिए। 2 किलोग्राम पूरक आहर में 20 ग्राम खनिज लवण।
  3. इसके अलावा किसी बोरे में खाना डालकर उसमें छोडकर दे और उसे तालाब में डाल दें।
  4. जैसे- जैसे खाना खत्म होगा बोरा अपने आप ऊपर आ जायेगा।
  5. तालाब में 4 जगह में बोरे में खाना डाले, अगर बोरे में नही डालते है। तो उसे एक निश्चित जगह में ही खाना डालना चाहिए।
  6. इसके अलावा गेंहूं का चोकर, अन्य अनाज की खली, मक्के का चोकर, जौ का चूर्ण, कनकी, सोयाबिन का चूरा आदि पूरक आहार में इस्तेमाल कर सकते है।
  7. इसके अलावा मछली का चूरा, रक्त चूर्ण, हड्डी का चूरा, मेढक खाद्य, मट्ठा, सपरेटा, मांस का छिछड़ा, घोंघा, सीपी, आदि खाने में मिलाकर दिया जा सकता है।

पूरक आहार तालिका के अनुसार देना चाहिए:-

माह किलाग्राम/एकड माह किलाग्राम/एकड
1 2 7 8
2 3 8 9
3 4 9 10
4 5 10 11
5 6 11 12
6 7 12 13

खनिज लवण और विटामिन में सभी प्रकार के खनिज लवण और विटामिन्स आते हैं। इसकी कमी के कारण मछलियों में तरह-तरह की बिमारियां होती हैं। बाजार में खनिज लवण और विटामिन अलग-अलग प्रकार से मिलता हैं। इसको मछलियों के खाने में मिलाकर देना चाहिए ।

बतख पालन
तालाब के क्षेत्रफल के हिसाब से बतख पालन करना चाहिए। एक एकड तालाब में 120-160 देशी बतख और 80-120 विदेशी बतख का पालन करना चाहिये ताकि उचित मात्रा में खाद मिल सके, और बतख के अंडे से अतिरिक्त आय की प्राप्ति होती हैं।

पालने योग्य बतख की प्रजाति
देशी प्रजाति – 150 – 170 अण्डा/वर्ष
खाखी केंपबेल – 250 अण्डा/वर्ष
व्हाइट पेंकिन – 250 अण्डा/वर्ष

बतख के लिए आवास निर्माण:-
दिन के समय बतख तालाब के आस-पास या पानी में रहता हैं, लेकिन रात में उसे आवास की जरूरत पड़ती हैं, इसलिए बतख का आवास तालाब के किनारें लकड़ी या बांस से बनाया जा सकता हैं। बतख का आवास साफ-सुथरा और सुखा होना चाहिए। साथ ही साथ रोशनी की उचित व्यवस्था भी होनी चाहिए एक बतख को 0.3-0.5 वर्ग मीटर जगह की आवश्यकता होती है। ध्यान रहें कि बतख को समूचित जगह उपलब्ध हो क्योंकि कम जगह में बतख की उचित व्यवस्था नही हो पाती हैं। बतख के आवास से तालाब तक नाली की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि धोवन का पानी तालाब में जा सकें। जिससे मछली का विकास अच्छे से हो सकेंगा। आवास को लकड़ी, बांस या गांव में जो समान हैं, उसका उपयोग करके भी बनाया जा सकता हैं। तालाब से आवास में जाने के लिए सीढ़ी का रास्ता बना दिया जाना चाहिए ताकि बतख और उनके बच्चे भी आ जा सकते हैं। उस तरह आवास को छिद्र युक्त होना चाहिए। ताकि जो भी मल-मूत्र निकलेगा वो तालाब में जा सकें। इस तरह से आवास के नीचे बहुत ज्यादा मात्रा में खाद जमा हो जाता हैं। इसलिए इस खाद को बीच-बीच में फैलाते रहना चाहिए।

बतख का परिवहन:-
बतख के बच्चे हैंचरी में उपलब्ध होते हैं। साधारणतः बतख 1 दिन या 2-14 दिन या 2-4 सप्ताह या 5-8 सप्ताह, 12 सप्ताह के उम्र के समूह में बांटकर बेचा जाता हैं। 9 सप्ताह के बाद ही पता चलता हैं कि बतख नर हैं या मादा। 2-4 महीने के बतख के बच्चे को आवष्यक टीका लगवाने के बाद तालाब में डालना चाहिए।

बतख की आहार व्यवस्था:-
बतख दिन भर तालाब में घूमती रहती हैं, और वहां उपलब्ध कीड़े-मकोड़े को खाती हैं। बतख को थोड़ी बहुत ऊपरी आहार की जरूरत पड़ती हैं। बतख सभी प्रकार का कच्चा व पका भोजन खा सकता हैं। घर के बचे हुए भोजन को भी बतख को खिलाया जा सकता हैं । बाजार से मुर्गी आहार खरीदते है, उसे बतख को खिलाया जाता हैं। मुर्गी आहार एवं चावल का कोढ़ा 1ः2 के अनुपात में मिलाकर अधिकतम 100 ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से देना चाहिए । सुबह के समय तालाब के किनारे भोजन की व्यवस्था करें तथा रात के समय उनके आवास में भोजन दें। भोजन को हमेशा पानी में मिलाकर देना चाहिए ।

मछली सह बतख पालन में तालाब की देखभाल एवं सावधानियां:-
1. जब जीरा एक माह का हो जाये तब उसके बाद बतख को तालाब में जाने देना चाहिए ।
2. चूंकि बतख तथा उनके बच्चों को बिल्ली, कुत्ता, सियार तथा अन्य जंगली जानवर खा सकतें हैं।  इस कारण इनका विषेष ध्यान रखने की आवश्यकता हैं।
3. बतख का आवास साफ-सुथरा एवं सूखा होना चाहिये अन्यथा बतख बीमार पड़ सकते हैं एवं
रोशनी की भी व्यवस्था होनी चाहियंे ।
4. बतख को 10 बजे के बाद ही बाहर भेजना चाहिए क्योंकि बतख 9 बजे तक अण्डे देती हैं।

बतख में होने वाली प्रमुख बीमारियांरू. बतख को मुर्गियों की अपेक्षा बहुत कम बीमारी होती हैं लेकिन कुछ जानलेवा बीमारियां भी हो सकती हैं जो निम्नलिखित हैं:-

प्लेग (Plague) :
1. यह वायरस के कारण होता हैं।
2. इसमें बतख सुस्त हो जाता हैं।
3. पंख बिखरा हुआ दिखाई देता हैं।
4. आंखों में सूजन आ जाती है।
5. हरा सफेद पतला दस्त होता हैं।
6. प्यास बढ़ जाती हैं।
7. मरने की क्षमता (Mortality) 5-100 प्रतिशत हो सकती हैं।
8. टीकाकरण द्वारा बीमारी से रक्षा हो जाती हैं।
9. टीकाकरण 8 सप्ताह में करतें हैं।
10. इसके लिए कोई कारगर दवाई नहीं हैं।

डक वाइरस हेपेटाइटिस (Duck virus Hepatitis) :
यह रोग 2-3 सप्ताह के चूजों में वायरस से होने वाला रोग हैं इसमें बतख आंख बंद करके बैठे रहती हैं। और बाद में गिर जाती हैं। मृत बतखों का सिर पीछे की तरफ मुड़ा हुआ पाया जाता हैं। बीमारी के कारण मृत्युदर 50-55 प्रतिशत हो सकती हैं। इस बीमारी का कोई इलाज नहीं हैं। परंतु इसे टीकारण के द्वारा रोका जा सकता हैं। बीमारी के रोकथाम के लिए 1 दिन के चूजे के पंखे में टीका दिया जाता हैं। प्रजनन में रखी गयी बतखों को 8-9 महीने के बतख में वैक्सीन लगाने पर अण्डा में जर्दी द्वारा बच्चें में पहुंच जाती हैं।

इसके अलावा बतखों में चेचक, कॉलरा पैराटाइफाइड, काक्सिडियोसिसए हैजा, एस्परजिलोसिस बीमारियों के साथ-साथ आंतरिक एवं बाह्य परजीवियों के कारण भी बिमारियां हो सकती हैं, अन्तः एवं बाहय परजीवी का भी खतरा रहता हैं, इससे बचाव के लिये कृमिनाषक दवा उदाः एम्प्रोलियम, पिपराजिनया एलबेंडाजोल आहार में मिलाकर देना चाहियें। कैल्शियम, फास्फोरस व मैग्निषियम की कमी होने पर पैर या गर्दन टेढ़ा दिखता हैं, तो आहार में खनिज लवण देना चाहिए ।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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