

खरगोश पालन (Rabbit Farming) आनंददायक एवं लाभकारी व्यवसाय है, कई लोग रुचिवश अपने घर में खरगोश पालन करते है, लेकिन व्यवसाय के उद्देश्य से बढे पैमाने के पर पालन करे तो यह आय का एक बहुत आछा स्रोत हो सकता है। ऐसे लोग जिनके पास खेती या कोई अन्य व्यवसाय करने के लिए जमीन नहीं है उनके लिए भी खरगोश पालन आय का साधन बन सकता है। खरगोश पालन मांस उत्पादन के साथ साथ इसके शरीर के फर और खाल क लिए किया जाता है । खरगोश का मांस विदेश और उत्तर भारत में ज्यादा उपयोग किया जाता है । जिन्हे ह्रदय से जुड़ी कोई भी बीमारी है उनके लिए खरगोश का मांस अत्यंत फायदेमंद होता है।
खरगोश पालन का महत्व व सम्भावनाएँ
- खरगोश का मांस स्वादिस्ट एवं पौस्टिक होता है, इसमें कम मात्रा में वसा, तथा कोलेस्ट्रॉल व प्रोटीन ज्यादा मात्रा में उपस्थित होता है । इस गुण की वजह यह सुपाच्य है व सभी उम्र के व्यक्ति इसे ग्रहण कर सकते है |
- चारे का उपयोगी पदार्थ में परिवर्तन- मानव उपभोग तथा अन्य पशुओं के लिए अनुपयोगी खाद्य पदार्थो का दछता पूर्वक भक्षण करने में सक्षम है । अन्य पशुओं के अपेक्षा खरगोश में चारे के प्रोटीन उपयोग करने व मांस , खल , फर में परिवर्तित करने की क्षमता अधिक होती है ।
- खरगोश आकर में छोटे व दिखने में आकर्षक होते है इनके पालन हेतु कम स्थान, देखरेख व आहार की आवश्यकता होती है । घरों में लघुस्तरीय अथवा बढे पैमाने के पर वव्यसायिक फार्म दोनों ही के लिए उपयुक्त है तथा कम लागत में इनका पालन संभव है।
- इनकी उच्च वृद्धि दर और खाद्य परिवर्तन दक्षता के फलस्वरूप ४-५ महीनों में ही ये मांस उपभोग परिपक्व हो जाते है|
- नियमित प्रजनन – एक खरगोश साल भर में ५०-७० शावक उत्पन्न करती है । गर्भकाल ३१ दिनों का होता है। इनमे तीव्र शारीरिक वृद्धि और शीघ्र लैंगिक प्रौढ़ता (५-६ महीने) आ जाती है ।
- खरगोश का मोती की तरह चमकदार श्वेत मांश बहुत ही रोचक कम वषा तथा कम ऊर्जा वाला परन्तु प्रोटीन समृद्ध होता है ।
- खरगोश पालन में लागत अपेक्षाकृत काम खर्चा होता है।
खरगोश की प्रजातियां
- भारी वजन वाले प्रजातियां के खरगोश का वजन ४-५ किलोग्राम होता है इन प्रजातियों में आने वाले खरगोश ग्रे जायंट, फ्लेमिश जायंट, चिनचिला है ।
- मध्यम वजन वाले प्रजातियों का खरगोश का वजन २ से ४ किलोग्राम. होता है। इन प्रजातियों में आने वाले खरगोश है – न्यूज़ीलैंड वाइट, अंगोरा ,कलिफोर्नियन।
- कम वजन वाले प्रजातियों के खरगोश का वजन २ किलोग्राम से कम होता है। उदाहरण -नीदरलैंड ड्वार्फ , रेक्स, डच
खरगोश का आवास
छोटे स्तर जैसे अपने घर पर ही खरगोश पालन करने के लिए ज्यादा जगह की आवयश्कता नहीं होती। इसके लिए अपने घर के आँगन में ही एक छोटा सा घर बना कर उसी में खरगोश पाल सकते है । इनके घर में तापमान २० से २५ डिग्री, १२ घंटा उजाला तथा १२ घंटा अँधेरा होना चाहिए। खरगोशो को तेज धुप, वर्षा, कुत्ते बिल्ली आदि से बचाने के लिए भी उनके लिए शेड बनाना बहुत जरुरी होता है । वव्यसायिक स्तर पर पालन करने हेतु निम्न विधियों द्वारा फार्म का निर्माण कर सकते है-
१. डीप लिटिर प्रणाली – काम संख्या में खरगोश पालन करना है तो इस तरीके को अपना सकते है। डीप लिटिर प्रणाली में ३० से ज्यादा खरगोश नहीं रख सकते है । इसमें फर्श पक्का कंक्रीट होना चाहिए तथा सतह को गूदेदार बनाने क लिए व अधिक गर्मी एवं सर्दी से बचाने के लिए ४ से ६ इंच मोटी धान की भूषि या पूआल का कुट्टी बिछानी चाहिए । अवांछित प्रजनन से मादा को बचाने के लिए नर खरगोश को मादा से अलग घर में रखना चाहिए ।
२. पिंजड़ा में खरगोश पालन– इस व्यवसाय के अंतर्गत बढे पैमाने पर एवं बेहतर ढंग से खरगोश को रखा जा सकता है । इस व्वयसाय के अंतर्गत वयस्क नर के लिए ४ वर्ग फुट, मादा के लिए ५ वर्ग फुट शावक के लिए १.५ वर्ग फुट के स्थान की आवश्कता होती है एक पिंजड़ा जिसकी लम्बाई १.५ फुट, चौड़ाई १.५ फुट एवं ऊंचाई १.५ फुट हो उसमे एक वयस्क नर या दो बच्चे रह सकते है। अगर पिंजड़े की लंम्बाई ३ फुट, चौड़ाई १.५ फुट एवं ऊंचाई १.५ फुट हो तो ४ से ५ बच्चे ३ माह तक रह सकते है। २ मीटर लम्बा १ मीटर चौड़ा एवं 0.७५ मीटर उचे पिंजड़े मे १ मादा को अपने १० बच्चो के साथ अथवा ४ नर को रखा जा सकता है लोहे की तार का बना पिंजरा उपयोग करना चाहिए पिंजरे आयताकार होते है पिंजड़े में भोजन एवं पानी का बर्तन अलग अलग होना चाहिए। पानी का बर्तन सिरेमिक , ट्यूब बोतल एवं स्वचालित उपयोग में क्र सकते है ताजा व स्वच्छ पानी देना चाहिये खाने का बर्तन धातु का बना होना चाहिए
नेस्ट बॉक्स– यह भी पिंजरा होता है इसे प्रशव के उद्देश्य से बनुआ हटा है इस पिंजड़े के सतह की जाली का बनावट घनी एवं पास- पास १.५ X १.५ इंच की दुरी होनी चाहिए जिससे नवजात आकार में छोटा होने के कारण बाहर ना आ पाए । नवजात बच्चो का शरीर बिना रोये का होता है इसलिए इनका रोये उगने तक सर्दी के दिनों में अतिरिक्त ऊष्मा की वयवस्था करनी चाहिए।
भोजन/ पोषणिक आवश्यकताएं –
मुख्यत: हरा चारा, सूखा दानेदार चारा, लवण एवं पानी आहार सम्मिलित होता है
हरा चारा – विभिन्न प्रकार के हरे पत्तियाँ जैसे केले की पत्ती, फलीदार फसल हे, रसोई की अपशिस्ट पदार्थ, सब्जिया व अन्य पौधे की पत्तियाँ आहार सम्मिलित है प्रोटीन का मुख्य साधन बरसीम , रिजका और लोबिआ के साथ -साथ मुंग, उर्द, सोयाबीन और खलिय है । स्तनपान कराने रेशा प्रदान के लिए- सुखी घास , हरे-चारे, कंद खिलाये जाते है।
सूखा अनाजों का दानेदार चारा– गेहूं, जौ, जई, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंगफली तेल की खली, चावल की भूसी, मांस व् हड्डियों के चूर्ण का भोजन इत्यादि I विटामिन- वि. A, D, E, एवं अन्य विटामिनो की अल्पमात्रा, Ca, P, CO, I, K खनिज आवश्यक है। पौढ खरगोश की दैनिक जल आवश्यकता प्रायः ३०० मि. ली. से १.५ लीटर तक होती है। स्तनपान करने वाली मादा को १६-२०-% व् स्तनपान नही करने वाली मादा को १२-१५ % प्रोटीन की आवश्यकता होती है
पौढ खरगोश हेतु संतुलित आहार घटक
| क्र. | घटक | % |
| १ | चना | २५ .०० |
| २ | गेहू | २० ०० |
| ३ | चावल की भूसी | २० .०० |
| ४ | मूंगफली की खली | २३ .०० |
| ५ | मांस व् हड्डियों का चूर्ण | १० .०० |
| ६ | खनिज का मिश्रण | १ .०० |
| ७ | नमक | ०.५० |
| कुल | १०० |
आयु व् अवस्था के अनुरूप आहार की मात्रा
| क्र | अवस्था | शरीर भार किग्रा | आहार ग्राम | हर चारा ग्राम |
| १ | नर | ४-५ | १७५ | २०० |
| २ | मादा | ४-५ | १५० | २०० |
| ३ | स्तनपान करने वाली माता | ४-५ | २०० | २५० |
| ४ | ६ सप्ताह के बच्चे | ०.६-०.७ | ५० | १०० |
प्रजनन–
प्रजनन का उम्र – मादा खरगोश ५ से ६ माह में प्रजनन योग्य हो जाती है। परन्तु अच्छी गुढ़वत्ता का बच्चा पाने के लिए औसतन १ वर्ष के उम्र में प्रजनन करना चाहिए। प्रजनन कल ३१ दिन का होता है , १ प्रशव में १ -१२ बच्चे देते है प्रशव के कुछ दिन बाद ही मादा फिर से गर्भवती हो सकती है , लेकिन ४ सप्ताह बाद गर्भवती होना सर्वोत्तम है इस प्रकार वर्ष भर में ६०-७२ ( ६ बारप्रशव ) शिशु प्राप्त होते है
नर खरगोश- नर खरगोश भी साधारण तौर पर ५ से ६ माह में प्रजनन योग्य हो जाती है, नर व् मादा को अलग अलग रखना चाहिए, प्रजनन के लिए मादा को नर के पिंजरे में लाना चाहिए नर व मादा को १:१५ के अनुपात में एवं ७ वर्ष की आयु तक नर को उपयोग में लाया जाता है।
गर्भवती खरगोश की देखभाल –
गर्भवती खरगोश को अन्य खरगोशो से १०० से १५० ग्रा. ज्यादा खाना खिलाना चाहिए । गर्भवती खरगोश के पिंजड़े में बिछाने के लिए सूखे नारियल के रेशे का उपयोग किया जाना चाहिए।गर्भवती खरगोश अपने पेट के बालो को तोड़कर प्रशव हेतु एक दो दिन पूर्व नवजात के लिए एक घोसला बनाती है इस समय ना तो खरगोश को परेशान करना चाहिए और ना ही किसी को भी पिंजड़े के निकट जाने देना चाहिए।
प्रशव १५ से ३० मिनट की अवधि में समाप्त होती है बच्चे को जन्म देने के बाद माँ खुद को और अपने छोटे बच्चे की सुबह होने तक साफ़ कर लेती है मरे हुए बच्चे को नेस्ट बॉक्स से फ़ौरन ही हटा देना चाहिए।
खरगोशों को बीमार के संक्रमण से बचाने के लिए सफाई की वयवस्था–
- प्रक्षेत्र ऊँचे एवं हवादार जगह पर स्थापित होना चाहिए ।
- प्रतिदिन पिंजरे की सफाई आवश्यक है ।
- ताज़ा एवं स्वच्छ, संक्रमण रहित, पौष्टिक, चारा व पानी देना चाहिए
- बीमार एवं संक्रमित जानवर को अलग पिंजड़ा में रखना चाहिए । बीमार जानवर को उचित चिकित्सा सुविधा प्रदान करने हेतु किसी पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए ।
- एक माह में तीन बार टेट्रासीक्लीन दवा को .५ मि. ली. / ली पानी में घोल बना कर जानवर को पिलाना
- प्रक्षेत्र के चारो तरफ पेड़ पौधे लगाना चाहिए ।
- जावर को निर्धारित समय पर टिका एवं कृमिनाशक दवा देना चाहिए, जीवाणुओ से सुरक्षा प्रदान करता है ।
- एक वर्ष में दो बार चुना से पुताई होनी चाहिए एवं हफ्ते में दो बार पिंजरे का सतह को भी चुना से पोतना चाहिए।
- आयु के अनुसार आवास प्रदान करे
- अत्यधिक गर्मी से बचाने के लिए शरीर पर पानी का छिड़काव करना चाहिए ।
| स्वस्थ खरगोश के लक्षण – | बीमार खरगोश के लक्षण – |
| बाल स्वस्थ और चमकीले दीखते है। | कमजोर और उदास दिखाई देते है, बाल तेजी से गिरने लगते है । |
| खाना अच्छे से और जल्दी खा लेते है । | खाना खाना कम कर देते है। |
| आँख चमकीले दीखते है। | आँख, नांक, मुँह से पानी आने लगता है। |
| वजन भी तेजी से बढ़ती है । | वजन घटने लगते है । |
उपर्युक्त बिन्दुओ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि छोटे स्तर व् व्यवसायिक स्तर पर खरगोश पालन आसानी व सुविधापूर्वक किया जा सकता है, व विभिन्न आवस्य्क्ताओ की पूर्ति की जा सकती है.









