बंसतकालीन गन्ने के लिये उन्नत सस्य तकनीक
हेमन्त कुमार जॉगड़े, दिनेश कुमार मरापी, योगेश कुमार सिदार, मनमोहन सिंह बिसेन, पंकज भार्गव एवं बिरेन्द्र तिग्गा1


गन्ने (sugarcane cultivation) की फसल भारतवर्ष में आदिकाल से होती आ रही है। गन्ने की फसल के उत्पादन में विश्व में भारत प्रथम स्थान रखता है। गन्ने के मुख्य उत्पाद चीनी, खाण्डसारी एवं गुड़ बनाया जाता है जिससे निर्यात द्वारा बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा का अर्जन किया जाता है। इसके अन्य उत्पादों खोई एवं शीरा बनाया जाता है। गन्ने कीखोई कामुख्य तौर पर फाईवर बोर्ड (गत्ता बनाने), पेपर, प्लास्टिक एवं जलने के तौर पर प्रयोग किया जाता है एवं शीरा एल्कोहल एवं सिरका बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा भी अन्य उपयोग जैसे पशुओं के चारे, शीरा मिश्रित एवं भूमि सुधर में खाद के रूप में (स्टीलेज) प्रयोग किया जाता है।छतीसगढ़ के किसान भाइयों के द्वारा हर वर्ष लगभग आधे से अधिक क्षेत्र में गन्ने की फसल ली जाती है, लेकिन उचित सस्य तकनीक न अपनाने के कारण गन्ने के उत्पादन में निरन्तर कमी आ रही है। अतः गन्ने की फसल से अधिक उत्पादन लेने हेतु निम्नलिखितसस्य तकनीक अपनावें।

गन्ने की उन्नत तकनीक
जलवायु आवश्यकताः
गन्ना की खेती उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में किया जाता है। गन्ने की पौधे की अधिक वानस्पतिक वृद्धि के लिये 70 प्रतिशत आर्द्रता वायुमण्डल में होनी चाहिए। गन्ने में तापमान, आर्द्रता एवं सूर्य की रोशनी अंकुरण, पौध वृद्धि एवं पकने की अवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। गन्ने की वृद्धि आर्द्र एवं गर्म में अच्छा माना जाता हैं। गन्ने की अच्छे विकास के लिये तापमान 26 से 32 डिग्री सेन्टीग्रेड अधिकतम माना जाता है तथा अधिक तापमान होने से पौधे की प्रकाश संश्लेषण रूक जाता है। पकने के समय तापमान 12 से 14 डिग्री सेन्टीग्रेड अच्छा माना जाता है। वार्षिक वर्षा 600 से 3000 मिलीलीटर वाले क्षेत्रों में गन्ने की खेती की जा सकती है।
भूमि आवश्यकताः
गन्ने की खेती के लिये विशेष प्रकार की भूमि आवश्यकता नहीं होती है लेकिन अच्छे विकास के लिये रेतीले दोमट से चिकनी दोमट वाले भूमियों (डोरसा-कन्हार भूमि) सर्वोत्तम रहती है। भूमि की पी एच 7.5 से 8.5 तक होनी चाहिए। गन्ने की वृद्धि के लिये अधिक कार्बनिक प्रदार्थ एवं अधिक जल धारण क्षमता रहना चाहिए। भूमि में उपयुक्त जल निकास व्यवस्था होनी चाहिए।
खेत की तैयारी:
गन्ना की खेती के लिये गहरी जुताई एवं ढेले रहित गहरी नालियों हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करें क्योंकि भूमि एवं तत्वों की उपलब्धि के आधार पर गन्ने की कारगर जड़ों का फैलाव उपर से नीचे एवं बगल में लगभग 45 सेन्टीमीटर तक होता है। धाने के खेतों में मचौआ करने के कारण कण विन्यास बिगड़ जाने से गहरी जुताई करना एवं ढेले फोड़ना आवश्यक है। यह कार्य रोटावेटर द्वारा आसानी से किया जा सकता है। भूमियों में कण विन्यास सुधार एवं उर्वराशक्ति बढ़ाने के लिये हरी खाद या जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए। खेत की खड़ी, आड़ी एवं गहरी जुताई कर एवं पाटा चलाकर खेत समतल करें। रिजर की सहायता से काफी गहरी नालियॉ बनाएॅ या फावड़े से भी बनाया जा सकता है क्योंकि गहरी नालियॉ बनेगी उतनी ही मिट्टी चढ़ाने हेतु मिट्टी मिलेगी जिससे गन्ना कम गिरेगा। नालियॉ निकालने के बाद अगर आवश्यकता हो तो फावड़े की सहायता से मेढ़ों को सुधार लें।
बोने की दूरी एवं समयः
कतारों और पौधे की बीच की दूरी जलवायु, फसल प्रबंधन एवं प्रजातियों की पत्तियों के फैलाव पर निर्भर करती है। फैलने एवं चौड़े पत्ते वाली प्रजातियों को, सीधे व कम फैलने वाली प्रजातियों की अपेक्षा अधिक दूरी पर बोयें। बंसतकालीन बुआई में फैलने वाली प्रजातियॉ के लिये दूरी कतार से कतार 95 सेन्टीमीटर एवं सकरी प्रजातियॉ के लिये दूरी 90 सेन्टीमीटर रखी जाती हैं। भरपूर खाद पानी एवं उत्तम प्रबंधन करने के लिये दूरी अधिक रखें जिससे पौधें की बढ़त पर्याप्त हो, कल्ले की संख्या प्रति ऑख 10-15 कल्लों से अधिक न आने दें जिससे प्रतिस्पर्धा के कारण बढ़त पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।गन्ने की बंसतकालीन बुवाई के लिये फरवरी के बीच सप्ताह से मार्च के अंतिम सप्ताह तक बाने के लिये उपुक्त समय रहता है।
बीज एवं बोनी:
अच्छे बीज चयन के लिये निम्नलिखित बातों ध्यान देना चाहिए-
- उन्नत प्रजाति के बीज का ही चयन करें।
- गन्ना बीज की उम्र लगभग 9 माह या कम हो तो अंकुरण अच्छा होता है अधिक उम्र के गन्ने का उपरी भाग बीज हेतु उपयुक्त रहता है एवं निचले भाग को पिरोई के काम में लावें।
- बीज ऐसे खेत से लेवें जिसमें रोग व कीट का प्रकोप न हो एवं जिसमें खाद पानी समुचित मात्रा में दिया जाता रहा हो।
- जहां तक हो नम गर्म हवा उपचारित या टिश्यूकल्चर से उत्पादित बीज का ही चयन करें।
- हर 4-5 साल बाद बीज बदल दें क्योंकि समय के साथ रोग व कीट ग्रस्तता में वृद्धि होती जाती है।
- बीज काटने के बाद कम से कम समय में बोनी दें।
बीज की तैयारीः
अपनी शुद्ध रोग रहित बीज अपने खेत पर स्वयं ही तैयार करें। गर्म नम हवा संयंत्र से उपचारण हेतु हर कारखाने में निःशुल्क सेवा उपलब्ध है। कम से कम 10 क्विंटल उन्नत जाति के 2 आंख के टुकड़े 54 डिग्री सेन्टीग्रेट पर चार घंटे उपचारित कर बोयें। इससे लाल सड़न, उकटा, घास जैसी बढ़वार, कंडवा जैसे बीज जन्य रोगों से मुक्ति मिलेगी। उपचारित बीज के पोलीबैग बनाएॅ एवं उन्नत पद्यति से बोये ंतो अधिक लाभ होगा। इस आधार बीज के पुनः द्विगुणन से प्रमाणित एवं प्रमाणित से सामान्य बीज बनायें जो आगे 3-4 साल तक काम में लाया जा सकता है।
बीज का मात्राः
शीघ्र पकने वाली किस्मों के लिये 70-75 क्विंटल तथा देर से पकने वाली किस्मों के लिये 60-65 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है जिससे 35-40 हजार तक गन्ने के टुुकड़े बनाये जा सकें।
बीजोपचारः
बीटावेक्स पावर 250 ग्राम को 250 लीटर पानी में घोलकर बीज के टुकड़ों को उपचारित करें, जिससे भूमिजन्य बीमारियों का असर बीज पर न हो।
बोने की विधिः
अच्छी तरह खेत की तैयारी के बाद निर्धारित दूरी पर नालियॉ निकालने के उपरांत गन्ने की बुवाई निम्नलिखित किसी भी तरह की जा सकती है।
1. सिंचाई के साथ:-सिंचाई करने के साथ- साथ मेढ़ों के उपर पहले से बिछाये गये टुकड़ों को गोली मिट्टी में पैर की सहायता से या हाथ से दबाये।
2. सूखी बोनी:-नालियों में गन्ने के टुकड़ों को कतार में या द्योढ़ान पद्धति से जमा दें एवं हर एक मेढ़ छोड़कर दूसरी पर उलटे बखर की सहायता से मिट्टी समतल करें। यह मिट्टी बिछाये गये गन्ने को ढक लेगी और दो मेढ़ों के बीच में सिंचाई करने मे सहायता होगी। इस तरह हर एक मेढ़ को छोड़कर दूसरी मेढ़ को समतल करें।
3. रोपण पद्धतिः इस विधि में बीज की बचत होती है एवं प्रति ऑख कल्ले आदि अधिक फूटते है। यह दो प्रकार से की जाती है।
(अ) खेत में 3 से 4 फीट पर मेढ़ बनाने के उपरांत गन्ने के एक ऑख के टुकड़े खेत में खड़े या आड़े लगाये जाते है दो टुकड़ों के बीच की दूरी 20 से 30 सेन्टीमीटर रखी जावे।
(ब) पोलीबैग प्लाटिंग के अंकुरित पौधे 60 से 75 सेन्टीमीटर की दूरी पर लगायें।
4. पट्टेदार बुवाई:-इस पद्धति में दो कतार दो फीट (उत्तरी मघ्यप्रदेष में) या 2.5 से 3 फुट (शेष मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में) की दूरी पर जोड़ी में लगाई जाती है। दो जोड़ी के बीच में लगभग 5 या 6 फुट की पट्टी खाली रखी जाती है यह पद्धति टपक सिंचाई पद्धति के लिए भी बहुत उपयुक्त है। पट्टी में अंतरवर्तीय फसल आसानी से ली जा सकती है।
5. पट्टेदार जिग जेग बुवाईः-तीन फुट अंतर पर नालियॉ निकालें। दो नालियॉ के जोड़े में 2 फुट अंतर पर 8 से 9 इंच गहरे गड्ढे उपयुक्त विधि से बनाएं एवं पोलीबैग पौधे रोपें। गड्ढे ऐसे बनाए जिससे दूसरी लाइन का गड्ढा पहली लाईन का गड्ढा के दो पौधों के बीचों-बीच आवें। इसके बाद दो लाईन की जोड़ी खाली छोड़े। अगली दो लाईन की जोड़ी में उसी पद्धति से बुवाई करें। ड्रिप सिंचाई अपनाएं। बीच की खाली जगह में दो या तीन अंतरवर्तीय फसलों की वजह से यह एक लाभदायक पद्धति है इस तरह हमेशा गन्ना एक ही खेत में बना रहेगा व खेत बदलने की आवश्यकता नहीं रहेगी। यह डॉ. मिश्रा जिग जेग पट्टा पद्धति के नाम से महाराष्ट्र में प्रचलित है।
6. पिट (गड्ढा) पद्धति:– इस पद्धति में चार से पॉच फीट की दूरी पर डेढ़ से दो फुट घेरे के गड्ढे बनाकर गन्ना बीज को सघन रूप से बोया जाता है एवं मुख्यतः मातृ गन्ने को ही प्रोत्साहित किया जाता है। खाद आदि का भरपूर उपयोग कर कहीं अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। यह टपक सिंचाई के लिए भी उत्तम है।
7. कटर प्लांटर विधिः उन्नत बुवाई तकनीक पर आधारित यह एक स्वचलित यंत्र है टैक्टर से चलने वाले इस यंत्र में पूरे गन्ने डाले जाते है एवं पांच क्रियाएं एक साथ होती है जैसे नालियॉ बनाना, खाद डालना, गन्ने के दो या तीन आंख के टुकड़ों को मिट्टी से ढकना इसकी क्षमता 2 हेक्टेयर प्रतिदिन है।
गन्ने की जातियॉः
| क्र. | किस्म | शक्कर (प्रतिशत) | अवधि (माह) | उपज(टन प्रति हेक्टेयर) | विशेषताएँ |
| 1 | को. 419 | 17-18 | 12-14 | 70-80 | रस के लिये उपयुक्त, मुलायम गन्ना |
| 2 | को. 1305 | 18-19 | 11-12 | 90-100 | कीट, रोग कम, अधिक शक्कर |
| 3 | को. 6304 | 18-19 | 12-14 | 100-110 | अधिक शक्कर, लाल सड़न निरोधक |
| 4 | को. 86032 | 16-17 | 10-11 | 70-80 | रस के लिये उपयुक्त, मुलायम गन्ना |
| 5 | को. एल. के. 8001 | 16-17 | 11-12 | 100-110 | अच्छी उपज, मध्यम मोटाई |
| 6 | को. 8338 | 19-20 | 9-10 | 80-90 | उत्तम गुड़, अधिक शक्कर |
| 7 | को. जे. 2087 | 16-17 | 10-11 | 100-120 | लाल सड़न व कंडवा निरोधक |
| 8 | को.जे. 86-141 | 20-21 | 9-10 | 90-100 | जड़ी अच्छी, उत्तम गुड़, शक्कर अधिक |
गन्ने में खाद एवं उर्वरकः
गन्ना मुख्यतः बसंतकाल में गन्ने को समान मात्रा में खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता होती है। अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि सामान्यतया 1 क्विटंल गन्ना पैदा करने हेतु 211 ग्राम नत्रजन, 107 ग्राम फास्फोरस व 182 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति हरी खाद, खली, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, जैविक खादों एवं विभिन्न उर्वरकों द्वारा की जा सकती है पर श्रेष्ठतम तो यह होगा कि उपलब्धता अनुसार अधिक से अधिक जैविक खादों का प्रयोग करें। गन्ने में खादों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना चाहिए।
गन्ने हेतु आवश्यक नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश की मात्रा
| पोषक तत्व | मात्रा किलो प्रति हेक्टेयर | उर्वरक एवं मात्रा |
| नत्रजन | 300 | यूरिया 650 किलोग्राम |
| स्फुर | 80 | सिंगल सुपर फॉस्फेट 500 किलोग्राम |
| पोटाश | 90 | म्यूरेट ऑफ पोटाश 150 किलोग्राम |
इस उर्वरक मात्रा का एक तिहाई नाइट्रोजन, पोटाश एवं फास्पफोरस पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय ही दें। शेष दो तिहाई नाइट्रोजन दो बार में टॉपड्रेंसिग के रूप में देनी चाहिए, पहली कल्ला पफूटते समय तथा दूसरी कल्ले पफूटने के लगभग 45 दिन बाद। गन्ने में तीन साल के अन्तराल पर 100-150 कुन्तल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद दें।
सिंचाईः
गन्ने से सफल उत्पादन हेतु महत्वपूर्ण आवश्यकता है सिंचाई पर्याप्त जल उपलब्ध होने के बाद भी उसके अच्छे प्रबंधन से ही गन्ना फसल में उत्पादन वृद्धि की जा सकती है। गन्ना एक ऐसी फसल है जिसमें सूखे की अवस्था सहन करने की क्षमता के कारण यह अच्छी उपज देने में सक्षम है। सिंचाई के प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि गन्ने में 90 से 120 एकड़ इंच पानी की आवश्यकता होती है। गन्ने के लिए 7-8 सिंचाइयों की पर्याप्त मानी जाती है। जिसमें 3-4 सिंचाइयां वर्षाकाल प्रारम्भ होने से पहले तो कर दी जाती हैं। सिंचाई का महत्व गन्ने में कल्ले निकलते समय ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इसलिए बुवाई के 30 दिन बाद गन्ने की सिंचाई करना अति आवश्यक है। कम से कम तीन सिंचाइयां अप्रैल, मई और जून में करनी चाहिए, दूसरीसिंचाई 90 दिन बाद एवं तीसरी सिंचाई 130 दिन बाद अवश्य करनी चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण:
गन्ने के खेत में खरपतवारों की मौजूदगी से गन्ने की उपज में 40 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। अतः आवश्यक है कि गन्ने की फसल को बुवाई के 60-120 दिन के मध्य खरपतवारों से मुक्त रखा जाए। गुड़ाई विधि से खरपतवारों के प्रभावशाली नियन्त्रण हेतु गन्ने के खेत में बुवाई के 30, 60 व 90 दिनों के बाद गुड़ाई करनी चाहिए।
गन्ने के प्रमुख खरपतवार
एक बीज पत्रीय
मौथा (साइपरस रोटेन्डस), सावॉ (एकीनोक्लोआ कोलोनस ), जंगली रागी (इल्यूसाइन इंडीका ), दूब (साइनोडान डेक्टीलान )
द्विबीजपत्रीय
चौलाइ(अमेरेन्थस जातियॉ), नोनिया (पोर्चिलाका ), बथुआ (चीनोपोडियम एल्बाम ), लटजीरा (सेजीरेटस कोनीजायड), अगिया(स्ट्राईगा), दूधी (यूफोरबीया ), कृष्ण नील (ऐनागेलिस), खट्टी बूटी (आक्नोलिस ), केना (केमेलिना)।
नियंत्रणः
हाथ से निंदाईः गन्ना के बोने के 15-20 दिन बाद एक गुड़ाई करना आवष्यक है, जिससे भूमि की पपड़ी टूट जावे एवं अंकुरण अच्छा हो, इसके बाद फसल को 90 दिन तक निंदाई- गुड़ाई कर नींदा रहित रखें।
पलवार से नींदा नियंत्रणः
गन्ने की बीजू फसल में मिट्टी चढ़ाने के बाद नींदा नियंत्रण करने के लिये गन्ने की सूखी पतियों की पलवार काफी प्रभावी है। इससे खेत की नमी का भी संरक्षण होता है।
रासायनिक खरपतवार नियंत्रणः
- 2,4-डी सोडियम लवण 50 प्रतिशतः 2.4 किलोग्राम$1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर जमाव के बादमशीन से छिड़काव करें। इससे चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार,बथुआ, कृष्णनील, गजरी, मकोय, कटीली इत्यादि खरपतवारनष्ट हो जाते हैं।
- एट्राजिनः 1.5 से 2.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जमाव से पहलेछिड़काव करें।
- सिमेजिनः 2.4 किलोग्राम $ 1000 लीटर पानी प्रति हेक्टेयरमई के अन्तिम सप्ताह में गुड़ाई के उपरान्त छिड़काव करें।
- मेट्रीब्युजिनः 2-3 किलोग्राम दवा को 600 लीटर पानी मेंघोलकरप्रति हेक्टेयर अंकुरण से पूर्व प्रयोग करना चाहिए।
- पैराक्वाटः 0.5-1.0 किलोग्राम मात्रा 1000 लीटर पानी मेंघोलकरप्रति हेक्टेयर 5-10 प्रतिशत गन्ना के जमाव की दशा पर करनेसे सभी प्रकार के खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।
- एलाक्लोरः मोथा घास को नष्ट करने के लिए 2-3 किलोग्राम दवा 600 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर छिड़काव करने सेखरपतवार नष्ट हो जाते हैं।
मिट्टी चढाना एवं बांधनाः
जिन प्रजातियों में गिरने की प्रवृत्ति है तथा जो गन्ना समतल जमीन में बोया जाता है उस गन्ने में मिट्टी चढ़ानाएवं समय से बांधना अति महत्वपूर्ण है। जब नाइट्रोजन कीआखिरी टॉपडेªेंसिंग जुन-जुलाई में करते हैं। उसके बाद मिट्टी चढा देनी चाहिए जब पफसल 15 सेंन्टीमीटर उँचाई की हो तथा मिट्टी हल्की हो, तो फसल पर मिट्टी चढ़ाना चाहिए। पहली बंधई लगभग 150 सेंन्टीमीटरकी उँचाई पर जुलाई के अन्त में तथा दूसरी बंधई पहली बंधई के लगभग 50 सेंन्टीमीटर उपर अगस्त में तथा आवश्यकता हो तो अगस्त-सितम्बर में दो पंक्तियों के तीन तनों की एक साथ बंधई करनी चाहिए।
बीमारियों का नियन्त्रण
भारतवर्ष में गन्नाफसल में मुख्यतया 7 या 8 रोगों का प्रकोप होता है, जिससे फसल को प्रतिवर्ष काफी क्षति होती है प्रमुख रोगों का विवरण निम्नलिखित है-
1. लाल सड़नः यह रोग गन्ना उद्योग एवं किसानों के लिए बहुत ही हानिकारक है। इस रोग में गन्ने की उपर सेतीसरी पत्ती सुखने लगती है। गन्ने का तना रंगहीन तथा गांठों पर छोटे-छोटे बिन्दु बन जाते हैं। बाद की अवस्था में तना सूख, सिकुड़ एवं खोखला हो जाता है। रोग ग्रस्त गन्ने को चीरने पर पीथ लाल रंग की होती है तथा एल्कोहल जैसी गंध आती है।
रोकथामः गन्ने की पेड़ी स्वस्थ तथा रोगरहित होनी चाहिए।गन्ने की बिजाई करने के पूर्व थायोफानेट मिथाइल दवा का 0.25 प्रतिशत से बीजोपचार करें,लाल सड़न रोग से रोगरोधी प्रजातियां जैसे को.6304 व को. जे. 2087 की बुवाई करें। लाल सड़न रोग से ग्रसित क्षेत्रा में तीन साल तक गन्ने की बुवाई नहीं करनी चाहिए।
2. कन्डुआः यह रोग वर्षभर प्रभावी रहता है लेकिन इसका प्रभाव अप्रैल से जुलाई तक ज्यादा प्रभावकारी रहता है। रोगी पौधों के सिर से काले रंग के चाबुक आकार की संरचना निकलती है। शूरू में यह एक चमकीली सफेद परत से ढकी रहती है जिसमें काले रंग का चूर्ण भरा रहता है, यह चूर्ण फफंूद के विषाणु होते है जिनसे रोगग्रस्तता वायु के वेग से बढ़ती है।
रोकथामः रोगरोधी प्रजातियों को. जे. 2087, सी.ओ. 348 एवं सी.ओ. 318 को बोना चाहिए। बोने से पहले गन्ने के टुकड़ों को 54 डिग्री सेंटीग्रेड गर्म पानी सेबीस मिनट तक उपचार किया जाना चाहिए। कन्डुआ रोग से ग्रसित गन्ने के पेड़ को खेत से सावधनी से निकालकर जला देना चाहिए।
3. घासी प्ररोहः इस रोग का मुख्य लक्षण फसल में ढेर सारे पतले-पतले कल्ले निकलते है, पत्तियां भी पतली व लंबी घास जैसी हो जाती है पूरा पौधा घास जैसा दिखाई देता है। प्रथम लक्षण पौधों में देरी से निकलने वाले सफेद रंग के कल्ले अन्य बीमारियों जैसे मोजेक एवं पेड़ी का बोनापन का प्रकोप कहीं-कहीं देखने को मिलता है।
रोकथामः रोगग्रसित सेट्स नहीं बोना चाहिए। सेट्स को 52 डिग्री सेंटीग्रेड गर्म पानी से तीस मिनट तक उपचार किया जाना चाहिए। कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशी के 0.05 प्रतिशत घोल में गन्नों को पद्रह मिनट तक उपचारित करके रोपित करना लाभकारी होता है।
कीट नियन्त्राण
गन्ने की पफसल को बहुत बड़ी मात्रा में कीटों के द्वारानुकसान किया जाता है। कुछ मुख्य कीट निम्न हैं-
1. तना छेदकः मादा मोथ क्रीम रंग के अण्डे पत्ती की निचली सतह पर देती है। छोटे लार्वे भद्दे सफेद रंग केजिनका सिर भूरे लाल रंग का होता है, पहले कोमल पत्ती की त्वचा को एक-दो दिन खाते हैं। उसक बाद वे तने के पास पहुँच कर उसमें छेद बना देते हैं। लार्वा कोमल उतकों को खाते हैं जिससे बीच की पत्ती सूख जाती है। उस पत्ती को निकालते हैं तो दुर्गन्धयुक्त गन्ध आती हैइसके प्रकोप से नये कल्ले भी प्रभावित होते हैं।
रोकथामः मई-जून में खेत की सिंचाई करनी चाहिए जिससेआर्द्रता ज्यादा होने से कीड़ों की संख्या को रोकने में सहायता होती है। न्युवाक्रान 40 ई.सी. की 1.5 लीटर मात्रा 600 लीटर पानी मेंघोल बनाकर छिड़काव करें।
2. पायरिलाः नीम्फ और प्रौढ़ पत्ती के नीचे का रस चूस लेते हैं। चूसी गयी पत्तियों का रंग पीला-सपफेद हो जाता है। पायरिला गन्ने की उत्पादकता और गन्ने की रिकवरी को भारी मात्रा में हानि पहुंचाता है। पायरिला शहद की तरह अपशिष्ट प्रदार्थ निकालता है जो काली फंगस को आकर्षित करता है। यह फंगस पूरी पत्ती को ढक लेती है जो पूरी तरह प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया को प्रभावित करती है। यह कीड़ा अपै्रल-मई और अगस्त-सितम्बर में ज्यादा गन्नेकीफसल को प्रभावित करता है।
रोकथामः अण्डों को एकत्रित करके नष्ट कर देना चाहिए।क्यूनालफॉस 0.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करना चाहिए।
3. गन्ने की सफेद मक्खीः प्रौढ़ एवं निम्पफ दोनों पत्तियों की निचली सतह के रस को चूसते रहते हैं और पत्तियां पीली पड़ जाती हैं। पूरी पफसल पीली एवं बीमार दिखने लगती है। बढ़वार रूक जाती है। इस कीड़े के प्रकोप से रिकवरी कम हो जाती है। जूस में पानी की मात्रा ज्यादा हो जाती है तथा गुड़ की गुणवत्ता गिर जाती है।
रोकथामःपानी भराव की स्थिति न होने दें। यदि कीड़े का प्रकोप ज्यादा है तो रेटून फसल को नहीं बोना चाहिए। न्युवाक्रान 40 ई.सी. 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें।
4. गुरदासपुर बोररः इसका मोथ हल्के भद्दे भूरे रंग का होता है जो पत्तियों के उफपर सपफेद रंग के अण्डे देता है। सूंडिया उपरी इन्टरनोड में एक आम छेद के द्वारा घुस जाती है। लार्वा सामूहिक रूप से 10-12 दिन तक कोमल उतकों को खाते रहते हैं। गन्ने का उपरी सिरा सूख जाता है। 12 दिन के बाद अलग-अलग लार्वा वहाँ से निकलकर गन्ने के अन्य भागों में चले जाते हैं। इस तरह से मुख्य तनेमें जाकर तने को खोखला कर देते हैं जिससे हवा द्वाराया हल्का ध्क्का लगने पर पौध टूट जाता है।
रोकथामः सूखे हुए उपरी सिरे को काटकर अलग कर देना चाहिए तथा सूखे भाग को जला देना चाहिए फसल पर न्यूवाक्रान 40 ई.सी. 1000 लीटर पानी में गन्ने केउपरी भाग में छिड़काव चाहिए।
कटाई:
गन्ने की कटाई नवम्बर अन्त से लेकर मार्च-अप्रैल तक की जाती है। जब गन्ने के रस में चीनी की मात्रा सर्वाधिक हो, तब कटाई करें। कटाई जमीन की सतह से करें, जिससे फुटाव अच्छा होता है। कटाई के बाद सिंचाई अवष्य करें।
उपजः
उन्नतसस्य क्रियाए अपनाई जाये तो गन्ने से 80- 100 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार ली जा सकती है। जिन गन्नों मे 17-20 प्रतिशत तक सुक्रोज होता है, उन्हें आदर्श माना जाता है।










