कृषि एवम संबद्ध क्षेत्रराज्य

टिकाऊ खेती आज की आवश्यकता

पुनेश्वर सिंह पैकरा, गणेशी लाल शर्मा और चंद्रेश कुमार ध्रुव

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जो देश की 80 प्रतिशत जनसंख्या की जीविका का मुख्य आधार हैं। कृषि क्रिया जीविका यापन के लिये प्राचीन समय से ही एक प्रमुख क्रिया हैै। कृषि का इतिहास बहुत प्राचीन है, संसार में यह क्रिया वर्षो से की जा रही है, पहले जब कृषि के लिये उचित संसाधन एवं तकनीक नहीं होती थी, तब भी कृषि से उत्पादन लिया जाता था, और आज जब देश कृषि के क्षेत्र में विकास का सरताज प्राप्त कर अत्याधुनिक तकनीक से परिपूर्ण होकर खाद्यान्न से स्वसम्पूर्णता की ओर है, तब भी उत्पादन लिया जा रहा है।
कृषि की इस निरन्तर क्रिया में उत्पादन बढ़ाने के लिए समय के अनुसार निरन्तर परिवर्तन कि है। पुराने समय में जहॉ देशी तकनीक से कम उत्पादन मिलता था, तो आज विभिनन उन्नत तकनीक से कम उत्पादन को बहुत अधिक हद तक दूर कर दिया है। उत्पादन की इस होड़ मे खेती की उपजाऊ स्थिती पर इसका बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा है आज के युग में प्रायः उन्नत तकनीक से ही लगभग खेती का प्रचलन है, जिसने एक तरफ उत्पादन में असिमित बढ़त मिली है, किन्तु इसके दूसरी तरफ इस क्रिया में उपयोग होने वाले रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों ने भूमि के स्वास्थ्य पर न की बुरा प्रभाव डाला है, बल्कि इससे उत्पादित खाद्य सामग्री ने मनुष्य कि जीवनशैली एवं स्वास्थ्य पर भी पूरी तरह प्रभाव डाला है।

‘‘टिकाऊ खेती, खेती की वह क्रिया है, जिसमें परिस्थितिकी के सिद्धांतो का उपयोग कर जीवो एवं उनके वातावरण के सम्बधो का अध्ययन करते है।’’

प्रमुख उदेश्य:-

  • मानव खाद्य आवश्यकता की पूर्ति करना।
  • वातावरण एवं प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता को बढ़ाने जिस पर की कृषि आधारित है।
  • गैर-नवीनीकृत संसाधनों का समायोजन इस प्रकार करना, जिससे उनका अत्याधिक दक्षतापूर्ण उपयोग लिया जा सके।
  • कृषि क्रिया की आर्थिकता को जीवन्त समय तक टिकाऊ बनाए रखना।
  • टिकाऊ खेती के माध्यम से कृषकों एवं जन समुदाय की जीवन शैली की गुणवत्ता में सुधार करना।

टिकाऊ खेती की आवश्यकता क्यो:-
1. पारिस्थितिकी सतुंलन का बिगड़ना:- आज देश में हो रहे नित प्रतिदिन मानव द्वारा संसाधनों के अत्याधिक उपयोग से प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे कि भूमि के स्वास्थ्य एवं मृदाक्षरण के साथ-साथ जलवायु के परिवर्तन सामने आ रहे है, जिससे खेती बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
2. मिट्टी की उत्पादकता में कमी:- मिट्टी की उत्पादकता उन्नत खेती का मुख्य आधार है। आज खेती में हो रहे निरतंर रासायानिक उर्वरक एवं रसायनों के कारण मिट्टी की उत्पादकता में गिरावट आ रही है, जो देश के कुछ राज्यों से लेकर यह पूरे देश के लिये प्रमुख समस्या बनते जा रही है, इस समस्या के लिये टिकाऊ खेती के माध्यम से इस समस्या का समाधान करना अत्यंत आवश्यक है।
3. सिंचाई जल की कमी:- सिंचाई जल की निरतंर घटती मात्रा इसकी अनउपलब्धता भी एक प्रमुख समस्या है। टिकाऊ खेती के माध्यम से कार्बनिक पदार्थो का खेती के उपयोग कर, मिट्टी में जल संरक्षण क्षमता शक्ति को बढ़ाये जा सकता है।
4. जैवविविधता सरंक्षण का खतरा:- निरंतर उत्पादन के लिये अत्याधिक मात्रा में हो रहे रसायनों के उपयोग में जैवविविधता पर गहरा असर डाला है। इनके सरंक्षण के लिये मिश्रित फसल पद्धति से इनका सरंक्षण संभव है।
5. प्रदूषण:- कीटनाशक रसायनों के अत्याधिक उपयोग एवं इनकी गलत तरीके से उपयोग एवं भण्डारण ने मानव स्वास्थ के साथ-साथ वातावरण में भी प्रदूषण की समस्या निर्मित हुई है।
6. रोजगार की अनउपलब्धता:- ग्रामीण समुदाय की जनसंख्या की आय का प्रमुख आधारभूत साधन खेती है। आज जहॉ तकनीकी विशेषीकरण एवं मशीनीकरण से एक तरह उत्पादन में वृद्धि हुई है, किन्तु दूसरी तरफ इनके उपयोग से ग्रामीणों के रोजगार में कमी हुई है।
7. कृषि लागत में वृद्धि:- खेती में बढ़ते रासायानिक उर्वरक एवं कीटनाशी रसायनों की बढती मात्रा एवं कृषकांे कि इन पर निर्भरता से इनकी मूल्य वृद्धि पर व्यापक असर डाला है, जिससे खेती की लागत में अत्याधिक वृद्धि हुई है, जिसका असर सीधे किसानों के साथ-साथ उपभोक्ता पर भी पड़ा है।

टिकाऊ खेती अपनाने के लिये क्या करें:- खेती के व्यवसाय को बनाये रखने एवं इससे निरंतर अधिक उत्पादक प्राप्त करने के लिये निम्न बातों पर ध्यान देने की जरूरत है:-
 रासायानिक उर्वरकों के निरंतर अत्याधिक उपयोग के कमी करना इनके स्थान पर जैविक खाद, गोबर खाद एवं हरी खाद का उपयोग करें।

  • जैव-विविधता के संरक्षण के लिये जैविक खाद का उपयोग करे।
  • कृषकों के आर्गेनिक खेती के लिये प्रेरित करना एवं इनके लाभों के बारे मे बताना।
  • नियमित मिट्टी परीक्षण कराए एवं अनुमोदन के अनुसार मिट्टी में सूक्ष्म तत्वों का उपयोग करें।
  • सिंचाई जल की उपयोगिता बढ़ाने के लियें उचित फसल पद्धति को अपनाएं एवं मिट्टी में जैविक खादों का उपयोग कर मिट्टी में जल सरंक्षण क्षमता को बढ़ायें।
  • कृषि पर जलवायु परिवर्तन के बढतें प्रभाव को कम करने के लिये बढतें वन कटाव को रोके एवं इसके लिये लोगों को जागरूक करें।
  • इन सारी चीजों को खेती में अपनाकर खेती की बढ़ती लागत को कम करें ।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button