पशुपालनराज्य

गौपालन एवं प्रबंधन

डॉ. रामचंद्र रामटेके, डॉ.मनोज गेंद्ले एवं डॉ. देवेश कुमार गिरि

गाय पालन मुख्यतः दुग्ध उत्पादन एवं कृषि कार्य हेतु बैल उत्पादन के लिए किया जाता है। गाय पालन अच्छे ढंग से एवं लाभप्रद होने के लिए आवष्यक है कि हमें गौ पालन के मुख्य बिंदु मालूम हो ताकि असामयिक मृत्यु, उत्पादन में कमी के कारण नुकसान न हो।

गौ पालन के मुख्य बिन्दु –
(1) नस्ल एवं नस्ल सुधार (2) पोषण (3) प्रबंधन (4) बीमारियॉं।

नस्ल एवं नस्ल सुधार:- भारत में गाय की प्रमुख नस्लें:-
दुधारू नस्लें: (1) साहीवाल (2) गिर (2000 किग्रा. दूध/300 दिन में )
कार्य करने वाली नस्लः(1)अमृत महल(2) निमाड़ी( 500 किग्रा. दूध/300 दिन में )
दोनों उपयोग: (1) हरियाणा (2) कन्क्रेेज।

विदेषी नस्ल:- जर्सी, होलस्टीन फ्रेजियन (एच. एफ), रेड डेन, ब्राउन स्विस
नस्ल सुधार क्यों:- हमारे देषी नस्ल के जानवर न ऊॅंचे होते हैं, न तगड़े होते हैं और न उनमें लाभप्रद दुग्धोत्पादन होता है। अतः ये कोई खास लाभप्रद नहीं होते। ये चारा खाते हैं, जंगल नष्ट करते हैं एवं गोबर देने के अलावा किसी उपयोग के नहीं है।

नस्ल में सुधार लाने के दो तरीके होते हैं:-
(1) उन्नत नस्ल के सांड से प्राकृतिक गर्भाधान
(2) कृत्रिम गर्भाधान
नर के वीर्य का उपयोग कृत्रिम गर्भाधान द्वारा, दूर-दूर तक आसानी से, कम लागत में किया जा सकता है। मादा को बदलना/बाहर से लाना काफी महंगा एवं जटिल होता है।

पोषण:- गौवंशीय पषुओं के आहार के प्रमुखतः दो भाग होते हैंः-
(एक) सांद्र मिश्रण

(1) अनाज की उपज – कोढ़ा, चोकर, चुनी (3) अन्य- खनिज लवण, विटामिन।
(2) तिलहन की उपज- खल्ली
समुचित मात्रा में मिलाकर बाजार में उपलब्ध।

(दो) चारा

यह दो प्रकार के होते हैं:-
हरा चारा:- (1) मक्के का चारा (2) जौ का चारा (3) बरसीम (4) लूसर्न।

सूखा चारा:- (1) भूसा – धान/गेहूूं का (2) साइलेज।

उचित मात्रा में संतुलित आहार देने पर –

(1) बछड़े-बछियों का विकास दर सही रहता है। (3) बछड़े स्वस्थ पैदा होते हैं।
(2) बछिया जल्द गर्मी में आती है। (4) बैल अच्छा कार्य करते हैं।
आवश्यक रुप से देवे।

गौ वंशीय एवं भैंस वंषीय पशुओं का उचित प्रबंधन एवं रख-रखाव
पशु पालन साधारण कृषि व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है जो देश की अर्थ व्यवस्था में अहम भूमिका निभाने के साथ ही हमारे देष में घटती कृषि योग्य भूमि, बढ़ती आबादी एवं बेरोजगारी की समस्याओं के समाधान के लिए काफी महत्वपूर्ण है। इसके लिए जरूरी है कि किसानों को पशुओं के उत्तम रख-रखाव की वैज्ञानिक विधियों की भली-भांति जानकारी हो जिससे अधिकतम उत्पादन संभव हो सके।
1. दुधारू पशुओं की देखभाल एवं रखरखाव:-
दुधारू पशुओं के रखने का स्थान साफ-सुथरा हवादार एवं ऐसा होना चाहिए जिससे प्रतिकूल मौसमों (गर्मी, सर्दी, बरसात) में इन पषुओं को सुरक्षित रखा जा सके। पषुओं को मौसम के अनुसार नहलाना, खरहरा करना चाहिए। पषुओं को नियमित रूप से उसके षरीर व दूध के मुताबिक संतुलित पषु आहार अवष्य खिलाएं। दूध दुहने में लगभग 12 घंटे का अंतर रखे जिससे दूध की मात्रा एवं संरचना में अधिक परिवर्तन न आये। दुधारू पषु हेतु 12 महीने हरे चारे का प्रबंध रखना चाहिए। दुधारू पषुओं को छूत की बीमारियों के बचाव हेतु समय-समय पर टीकाकरण करवाना चाहिए। पषुओं के बीमार होने पर पषु चिकित्सक को दिखाएं। ऐसा करने पर कम लागत में अधिक दुग्ध उत्पादन संभव हो सकेगा।

2. गाभिन पषुओं का रखरखाव व उचित देखभाल:-
गाभिन पशुओं को ब्याने से तीन महीने पहले अन्य पशुओं से अलग कर लेना चाहिए एवं इस अवस्था में गाय, गर्भ में बच्चे के उचित विकास के साथ-साथ अधिक दूध उत्पादन के लिये भी अपने आपको तैयार करती है। गर्भपात रोकने के लिए ऐसे पशुओं को डराना, धमकाना, दौड़ाना एवं मारना नहीं चाहिए। दुधारू पषुओं को अचानक शुष्क न करें, बल्कि उन्हें 15 दिन के समय काल में धीरे-धीरे शुष्क करें। पषुओं को ब्याने के पहले उनके नीचे सूखा आराम दायक बिछावन लगा देना चाहिए। ब्याने के एक सप्ताह पूर्व ऐसा आहार देना चाहिए जो सरलता से पच सके। ब्याने के बाद कम से कम 15 दिन तक दाना भिगोकर नहीं देना चाहिए। ब्याने वाले स्थान का फर्ष उंचा नीचा नहीं होना चाहिए एवं फर्ष फिनायल से साफ करना चाहिए तथा प्रसूति गृह साथ-सुथरा, रोषनी युक्त व हवादार होना चाहिए।

3. पशुओं के प्रसव के दौरान देखभाल:-
प्रसव के दौरान पशुओं के समीप किसी प्रकार का शोर, भीड़-भाड़ न हो। प्रसव क्रिया प्रारंभ होने का सबसे मुख्य लक्षण पशु के योनि मार्ग से श्लेष्मा निकलना और अषांत रहना। इस समय योनि द्वार से जल थैली बाहर निकलती है जिसे अपने आप ही फटने दें। बच्चा पहले सामने के पैरों पर सिर टिकी हुई अवस्था में बाहर आता है। प्रसव के बाद योनि द्वार, पूंछ तथा पीछे के आसपास के हिस्सों को गुनगुने पानी से तैयार पोटेशियम परमैग्नैट के घोल (0.1 प्रतिशत) से साफ करें। सामान्यतः जेर 4 से 6 घंटे में बाहर निकल जाता है। यदि जेर 12 घंटे तक अपने आप न निकले तो योग्य पशु चिकित्सक की सहायता लेनी चाहिए। जेर को किसी सुरक्षित स्थान पर गाड़ देना चाहिए। ब्याने के तुरंत बाद पषु को गुड़ या सीरा गुनगुने पानी में घोलकर पिलाना चाहिए। ब्याने वाले स्थान पर फिनाईल एन्टी सेप्टिक घोल से छिड़काव करना चाहिए।

4. नवजात षिषु की देखभाल:-
नवजात शिशु के नाक एवं मुंह से श्लेष्मा को निकाल देना चाहिए जिससे वह सामान्य रूप से श्वसन कर सके। यदि बच्चा सामान्य रूप से श्वांस न ले रहा हो तो पिछले घुटने पकड़ कर उल्टा लटका देना चाहिए। साधारणतः नाभि सूत्र (अम्बिलिकल कार्ड) अपने आप टूट जाती है। वहां पर टिन्चर आयोडिन अवश्य लगाएं। अगर नाभि सूत्र जुड़ी हुई हो तो उसे ब्लेड से तीन से पांच इंच छोड़कर काट कर तथा उसपर टिन्चर आयोडिन का लेप लगाएं। नवजात बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ही खीस (कोलस्ट्रम) पिलानी चाहिए। खीस पिलाना अति आवश्यक है क्योंकि खीस में गामाग्लोबूलिन (एक पदार्थ जो हानिकारक जीवाणुओं के साथ जुड़कर उसे नष्ट करने में सहायता करता है) होता है। जो कि नवजात षिषु को कई तरह की बीमारी से सुरक्षा देता है। खीस दिन में तीन चार बार उसके षारीरिक वजन के 10 वें भाग की दर से पिलानी चाहिए।

खीस पिलाने के चार-छह घंटे के अंदर बच्चों का मल विसर्जन अपने आप हो जाता है। नवजात बच्चे को ठंडी हवा व खराब मौसम सेे बचाएं तथा गर्म स्थान में रखें, जिससे निमोनिया न हो। उसके रखने का स्थान साफ-सुथरा व हवादार तथा फर्ष पर बिछावन अवष्य होना चाहिए। 15 दिन की उम्र पर कृमि की दवा अवष्य पिलाएं। 3-4 माह की उम्र पर – छूत की बीमारियों के टीके अवष्य लगाए।ं

टीकाकरण सारणी

बीमारी प्रभावित होने वाले पशु, सामान्य लक्षण बीमारी का समय टीकाकरण का समय
खुरा चपका गाय, सूकर, भेड़, बकरी बुखार, खाने में अरूचि, उत्पादकता में कमी, लार गिरना, मुंह, खुर में घाव साल में कभी भी हो सकता है वर्ष में एक बार
गल घोटू गाय/भैंस बुखार, गले में सूजन, सांस लेने में तकलीफ, दस्त अधिक मृत्युदर सितम्बर/बारिश में बारिश से पहले 06 महीने बाद पुनः दोहरायें
एक टंगिया गाय/भैंस बुखार खाने में अरूचि, मांस पेषी में दर्द, लंगड़ापन मृत्युदर अधिक बारिश में बारिश से पहले 06 महीने बाद पुनः दोहरायें
एन्थ्रेक्स गाय/भैंस तेज बुखार, प्राकृतिक छेदों से रक्त बहाव तत्काल मृत्यु बारिश में वर्ष में एक बार

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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