सस्य क्रियाओं द्वारा फसलो में खरपतवार प्रबंधन
दिनेश कुमार मरापी, हेमन्त कुमार जांगड, बिरेन्द्र तिग्गा, योगेश कुमार सिदार, मनमोहन सिंह बिसेन एवं पंकज भार्गव


खरपतवार वह पौधे है जो ऐसे स्थान पर उससमय उगते है जहां पर मनुष्य उगाना नहीं चाहता है तथा फसलों एवं मनुष्य के लिए हानिकारक होते है जिससे लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होती है। जेथ्रो तुल के अनुसार “खरपतवार वे अनइच्छित पौधे है, जो किसी स्थान पर बिना बोये उगते हैं और जिनकी उपस्थिति कृषक को लाभ की तुलना में हानिकारक अधिक है।” खरपतवारों से फसलों की उपज में लगभग 31.5 प्रतिशत (खरीफ एवं जायद में 36.5 प्रतिशत और रबी में 22.7 प्रतिशत) तक हानि होजाती है। जो कि 20 से 28 अरब भारतीय रूपये में हानि पिछले दो दशक से हो रहा है। इसके अतिरिक्त खरपतवार मृदा से 30-40कि.ग्रा. नत्राजन, 10-15 कि.ग्रा. फॉस्पफोरस तथा 20-30कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर तथा मृदा जल का बहुतअधिक मात्रा में उपयोग करते है। खरपतवारों से पशुओंतथा मनुष्यों में विभिन्न प्रकार की बीमारियों का प्रकोपभी हो जाता है।फसल उत्पादन में खपतवारों से होने वाला नुकसानएक साथ न होकर धीरे-धीरे होता है, खरपतवार फसल पौधों के साथ पोषक तत्व, जल, प्रकाश एवं स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते है और पौधों के हिस्से के पोषक तत्व, पानी, प्रकाश एवं स्थान दिन-रात हड़पते रहते है। इनसे औसत 30-35 प्रतिशत हानि आंकी गई है। विभिन्नजीव नाशकों की तुलना सर्वाधिक हानि 37 प्रतिशत अकेले खरपतवारों से जबकि बीमारियों से 22 प्रतिशत,कीड़ों से 29 प्रतिशत व अन्य से 12 प्रतिशत होती है। इसलिए खरपतवारों का समय से उचित सस्य क्रियाओंको अपनाकर खरपतवार प्रबंधन करना अतिआवश्यक है।
विभिन्न खरपतवार
(1) जीवन चक्र के आधार पर
(अ) एकवर्षीय खरपतवारः इनको मौसम के आधार पर पुनः वर्गीकरण निम्न प्रकार करते है-
1. वर्षा ऋतु (खरीफ) के खरपतवारः सावां, हजारदाना, सिलयारी, लहसुआ, विसखपरा, चौलाई, मकोय, पत्थरचटा आदि।
2. शरद ऋतु (रबी) के खरपतवारः कृष्णनील, बथुआ, मंडुसी, सेंजी, सत्यानाशी खरबथुआ, आदि
(ब) द्विवर्षीय खरपतवारः जंगली गाजर, कंटीली, कंस शीली गास आदि।
(स) बहुवर्षीय खरपतवारः दूब, जंगली जई, जंगली कोदो, मोथा, झरबेर, लटजीरा आदि।
(2) बीजपत्रक के आधार पर
(अ) एकबीजपत्री खरपतवारः सावां, मोथा, दूब मंडुसी, प्याजी, जंगली जई, जंगली कोदो, आदि।
(ब) द्विबीजपत्रीय खरपतवारः कृष्णनील, बथुआ, सेंजी, सत्यानाशी हजारदाना, सिलयारी, लहसुआ, चौलाई आदि
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नेक क्रियाओं के द्वारा खरपतवारों की वृद्धि एवं प्रजनन की रोकथाम करके प्रबंधन कियाजाता है। निम्नलिखित सस्य क्रियायें खरपतवारों के प्रबंधनमें सहायक होती है जैसेः
1.फसलों एवं जातियों का चुनाव
ऐसी फसलों का चुनाव करना चाहिए जो खरपतवारोंसे प्रतिस्पर्धा करने में पूर्ण क्षमता रखती है जैसे सनई,अरहर, चरी, बरसीम, ज्वार, लोबिया आदि। इस प्रकारउन प्रजातियों को ही उगाना चाहिए जो कम उर्वरा-शक्तिमें भी अच्छी प्रकार बढ़ने वाली हो। किस्में सुखा, पालाअत्यधिक नमी तथा कीटों एवं बीमारियों को सहन करनेकी क्षमता रखती है जैसे कि मडूंसी के लिएगेहंू की एच.डी. 2687, पी. बी. डब्ल्यू-343, डब्ल्यू.एच. 542 अन्य किस्मों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धाहै।
2. फसल चक्र
विभिन्न प्रकार की पफसलों को फसल चक्र मेंशामिल करने से खरपतवारों का चक्र टूटता है। अधिकपानी चाहने वाली फसल को कम पानी चाहने वालीफसल से बदलने पर, घास जाति की फसल कोदलहन/तिलहन से बदलने पर खरपतवारों की प्रजातियोंबदल जाती है। फसलों के बदलने से उनकी सस्यक्रियायें बदलती है उनमें प्रयोग होने वाले खरपतवारनाशकबदलते है इस प्रकार से खरपतवार हावी नहीं हो पाते।जैसे धान-गेहंू फसल चक्र में मडंूसी व सांवा खरपतवारोंकी समस्या होती है, इस फसल चक्र में बरसीम, गन्ना,सूर्यमुखी, तोरिया, मक्का, सब्जियों आदि लगाकर मंडूसीका प्रकोप कम कर सकते है। फसल चक्र में दलहनीफसलों जैस मूंग, मटर, उर्द, अरहर आदि शामिल करनेसे खरपतवारों का प्रभाव कम कर सकते है।
3.बोने का समय
विभिन्न प्रकार की फसलें तथा खरपतवारों के पौधेविभिन्न समय तथा तापक्रम पर उगते है। फसल को हमअवधि से कुछ पहले या बाद में बुवाई करने से शुरुआतीखरपतवार-प्रतिस्पर्धा से बचा जा सकता है। किसी भीवातावरण में अधिकांश मौसम खरपतवारों के जमने काएक निश्चित समय होता है यही समय फसलों के बोनेका भी होता है। जैसे गेहूं की अगेती बुवाई (25 अक्टूबर से 10 नवम्बर) करने से मडंूसी का जमाव नहीं हो पाताहै क्योंकि तापमान इसके अनुकूल नहीं होता। मडंूसी काजमाव आमतौर पर 20 नवम्बर के आस-पास शुरु होताहै। अगेती बुवाई गेहंू में पहली सिंचाई के बाद हीखरपतवार का जमाव होगा।
4.उचित पौध संख्या
फसल का समान जमाव व अच्छी बढ़वार की वजहसे खरपतवारों के लिए कम स्थान बचता है। फसलों की शीघ्र वृद्धि होने पर खरपतवार कम जमते है इसके लिएअच्छा बीज उपचार उत्प्रेरक रसायनों का प्रयोग, उचितबीज मात्रा, उचित विधि द्वारा बुवाई करने से हमें अच्छाजमाव मिलता है, जिससे खरपतवारों के मुकाबले फसल की वृद्धि अधिक होती है। उदाहरण धान में 33 पौधे प्रति वर्ग मीटर रोपाई की जानीचाहिए।
5.अन्तर्वतीफसलें
ऐसी फसलें जो कि पक्तियों में बोई जाती है तथाउनकी पंक्ति की दूरी अधिक होती है, उनमें अन्तर्वतीफसलों को उगाकर रिक्त पड़े स्थान पर खरपतवारों की वृद्धि को रोका जा सकता है। जैसे मक्का की फसल केसाथ लोबिया लगाने से मक्के में खरपतवारों की वृद्धि को रोकने के साथ-साथ कुल उत्पादकता में भी वृद्धि होती है गन्ना, अरहर की फसल में फासला अधिक होताहै इनमें मूंग, उर्द, लोबिया या सब्जियां आदि अंतःफसल के रूप में लगाने से अतिरिक्त आय के साथ-साथखरपतवार भी कम उगते है।
6.जल प्रबंधन
धान की रोपाई करने के समय खेत की पडलिंगकरके 3-4 दिनों तक पानी भरा रहने से खरपतवारों काप्रकोप कम हो जाता है। फसलों की प्रथम सिंचाई जबपौधे 10-15 सेन्टीमीटर ऊंचे हो जाएं तभी करनी चाहिए।जलीय तथा नम क्षेत्रों जैसे धान के खेत, सिंचाई कीनालियों, नहरों, पोखरों व तालाबों में जल-निकास करकेसूखा रख कर खरपतवारों को नष्ट कर सकते है, धानके खेत में पडलिंग तथा जल-निकासी एकान्तरित समान्तरपर करने से अधिकतर खरपतवार नष्ट हो जाते है।
7. खादों एवं उर्वरकों का प्रयोग
गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद आदि का प्रयोगकरने से सड़ने-गलने के समय विभिन्न प्रकार के कार्बनिकअम्ल छोड़ती है जिसके प्रभाव से खरपतवारों के बीजांकुरतथा भूमिगत भाग प्रभावित होते है जिससे इनकी वृद्धि रुक जाती है उचित मात्रा में खादों एवं उर्वरको क़े प्रयोग से पफसलों की वृद्धि अच्छी होकर खरपतवारों को दबादेती है।
8. खेत में मेड़ों तथा नालियों को कम करना
मेड़े तथा नालियां बनाते समय भूमि की उपरी परतके समस्त खरपतवार मेड़ों पर एकत्रित हो जाते है जिसेइनका प्रकोप अधिक होने से खेतों में फैलते हो जिसे एकसमान सिंचाई करने के लिए कम संख्या में मेड़े बनानीपड़े। कम मेड़ बनाने से कुल क्षेत्रा में भी वृद्धि हो जातीहै।
9.गर्मी में जुताई
रबी फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताईकर देनी चाहिए तथा इसे ढेलों की शक्ल में छोड देनाचाहिए। इस प्रकार धूप में आने से खरपतवारों की जड़ेंव राइजोम सूख जाते हैं। खरपतवारों के छिपे प्रजनकोको सुखाने के लिए खेत को एक या दो बार 15 दिन केअन्तराल पर हैरो से जोतना चाहिए जैस मोथा कानियंत्राण इस विधि द्वारा किया जा सकता है।
10. निस्तेज बीज क्यारी
फसल की बुवाई या रोपाई से पहले खरपतवारों कोउगाकर खेत की जुताई करके खरपतवारों का नष्ट करदेना स्टैल सीड बेड (निस्तेज बीज क्यारी ) कहलाता है। अगर समय हो तो यहीप्रक्रिया दोहराई जा सकती है जैसे धान के लिए नर्सरीक्षेत्रा को इस विधि द्वारा खरपतवार मुक्त किया जा सकताहै जैसे बरसीम, रिजका आदि पफसलों में यह विधिउपयुक्त है।
11.हरी खाद
हरी खाद उगाने से भी फसलों में खरपतवारों कीसमस्या कम होती है। फसल से पूर्व हरी खाद के दौरानही खरपतवारों का जमाव हो जाता है जो कि जुताई केसमय नष्ट हो जाते है दूसरी हरी खाद के जैव रसायनिकप्रभाव के वजह से भी खरपतवारों के जमाव पर असरपड़ता है। साथ ही फसल को पोषण मिलने की वजह सेउपज भी बढ़ती है।
12.फसल अवशेष पलवार/मल्चिंग
फसल अवशेषों को पफसल के बीच में पलवार केरूप में बिछाकर खरपतवारों को काबू किया जा सकताहै इसके अलावा यह फसलों को पोषण प्रदान करते हैजैसे गन्ने में पत्तियों बिछाकर खरपतवार नियंत्राण।
13.मृदा सौर्यकरण
मृदा की सतह पर प्लास्टिक सीट डालकर सूर्य कीकिरणों की ऊर्जा को समेटते हैं, इस प्रकार भूमि कीऊपरी सतह गर्म हो जाती है ऐसे में अधिकतर वार्षिकएवं बहुवर्षीय खरपतवारों के बीज नष्ट हो जाते है। चूकिभूमि में नमी बनाए रखी जाती है अतः बीज जमनेलगते है तथा गर्मी में झुलस जाते है बाकी बचे बीजकमजोर हो जाते है तथा उन पर फपफूंद/जीवाणु हमलाकर देते है।
14.जीरो-टिलेज तकनीक
जीरो-टिलेज सीडड्रिल मशीन से बुवाई करने सेखरपतवारों को कम किया जा सकता है। जीरो-टिलेजद्वारा बुवाई करने से गेहूं का जमाव जल्दी होता है, ऊपरीसतह को न छेड़ने की वजह से मडंूसी का जमाव कमहोता है। दीर्घकालीन प्रयोगों में पाया गया है कि जीरो-टिलेजके समय कम होते है। इस तकनीक से लगभग 30प्रतिशत खरपतवार जमाव कम होता है।
15.आच्छादन पफसलें
आच्छादन फसलें लोबिया, शकरकन्द, मूंग आदिमुख्य फसल में लगाने से खरपतवारों की बढ़वार रुकजाती है। गन्ने में धान या चौलाई व पत्तेदार सब्जियां भीउगाई जा सकती है।यदि किसान उपरोक्त सस्य क्रियाओं को अपनातेहुए खेती करें तो निश्चित तौर पर कम लागत एवं कमसमय में खरपतवार नियंत्राण करके अधिक पैदावार एवंलाभ कमा सकते हैं।











