

अदरक उष्ण कटिबंधीय मसाला फसल है। सामान्यतः अदरक के लिए गर्मी और नमीयुक्त मौसम उपयुक्त रहता है फिर भी 1500 मीटर की ऊंचाई के केरल के घाटी प्रदेषों में भी अदरक कि खेती की जाती है। वर्षा पोषित खेती के लिए 1500-3000 मि.मी. वार्षिक वर्षा आवष्यक है। बीजो के रोपण से लेकर अंकुरण तक हल्की वर्षा और बढ़वार कि स्थिति में बीच-बीच में भारी वर्षा अच्छी होती है। बुवाई के कम से कम एक महीने पहले बरसात समाप्त होनी चाहिए। अदरक कि खेती के लिए केरल का मौसम सर्वोत्तम माना गया है।
भूमिः- अदरक की खेती विभिन्न प्रकार कि मृदाओं में की जा सकती है लेकिन उचित जल निकास वाली दोमट या रेतीली दोमट और ठोस चिकनी मिट्टी इसके लिए उपयुक्त रहती है। भूमि कम क्षार वाली होनी चाहिए। काफी धुप मिलने वाली खुली जगहों में एक फसल के रूप में नारियल, सुपारी, काली मिर्च इत्यादि फसलों के अंत सस्यन के रूप में अदरक की खेती की जा सकती है। रबड़ के बाग में भी पहले तीन वर्ष तक अदरक कि खेती की जा सकती है।
भूमि की तैयारीः- अप्रैल-मई में मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए और उसके उपरांत 4.5 जुताई हैरों या कल्टीवेटर से जुताई करे उसके उपरांत पाटा चलाये। ऐसा करने से भूमि समतल और भुरभुरी हो जाती है।सूत्रकृमि से बचाव के लिए बोआई से पूर्व मिट्टी में 10.15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 100 किलो माइक्रो नीम कि खाद अवष्य डाले और अदरक के बीज को केरोसिन तेल से उपचारित कर बुवाई करें।
प्रजातियांः- भारत एवं विदेषों में फसल व गुणवत्ता कि दृष्टि से अदरक कि विभिन्न किस्में उगाई जाती है। इनकी किस्म निम्न प्रकार है-
कच्चा अदरकः- रयो डी, जनीरो, चीन वाय नाटू लोकल, टफनागिया तैलीराल रयो डी, जनिरो, सौंठ, मारना वायनाटू मनन्तवाटी वल्लनाटू, एरनाटू, कुरूघ्पटी
नवीनतम किस्में
सुप्रभाः- इस किस्म में फुटाव अधिक होता है इसके प्रकांड लम्बे, अण्डाकार सिरो वाले, चमकीले, भूरे रंग के होते है। यह किस्म पर्वतीय क्षेत्रों में 4.4 प्रतिषत, 1.9 प्रतिषत तेल, 8.9 प्रतिषत ओलेरिओसिन रेषा लिए अति उत्तम है।
सुरूचिः- इसके प्रकन्द हरापन लिए पीले रंग के होते है। जिनमें रोग कम जिनमें रेषा 3.8 प्रतिषत और ओलेरिओसिन 10 प्रतिषत होता है। इसमें रोग कम लगता है। यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है।
सुरभिः- इस किस्म को उत्परिवर्तन मयुटेषन से विकसित किया गया है। इसके प्रकन्द में तेल 2.1 प्रतिषत पाया जाता है। प्रकन्द अधिक संख्या में बनते है, जिनका छिलका गहरे चमकीले रंग का होता है। यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है।
बीज बोआई
बोआई का समयः- अदरक की बोआई क्षेत्र विषेष के मौसम के अनुसार मई जून में कि जाती है। जहां पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो वहां पर इसकी बोआई अप्रैल से मई के मध्य तक करनी चाहिए। परन्तु जहां पर वर्षा आधारित फसल उगानी हो, वहां पर पहली वर्षा के ठीक बाद बोआई करनी चाहिए। बोआई के समय का उपज पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
बीज की मात्राः- एक हेक्टेयर के लिए लगभग 20-25 क्विंटल बीज प्रकंदों की आवष्यकता होती है। बोने के लिए रोगमुक्त बीज प्रकंदों की आवष्यकता होती है, जिन्हें 4.5 से.मी. आकार के टुकड़ों में काट लेते है। प्रत्येक टुकड़े का भार 25-30 ग्राम तक होना चाहिए। जिसमें कम से कम दो आंखे अवष्य होनी चाहिए।
बीजोपचारः- 5 लीटर देसी गाय का मट्ठा लेकर उसमें प्रति लीटर 3 चने के आकार के बराबर हिंग लेकर अच्छी तरह घोल कर बीज या प्रकंदो को डालकर अच्छी तरह भिगो दें। बीज या प्रकंदों के सूखने पर बुवाई करें। 5 लीटर देसी गाय के गौ मूत्र में बीज या प्रकंदों को भिगोकर सूखने पर बुवाई करें। केरोसिन तेल से प्रकंदो या बीज को उपचारित कर बुवाई करें।
उपरोक्त विधि से उपचार कर बीज बुवाई करने से भूमि जनित रोगों से बचाव हो जाता है। बीज प्रकंदों को सदैव पंक्तियों में बोना चािहए पंक्तियों की आपसी दूरी 15-20 से.मी. और पौधों कि आपसी दूरी 15-20 से.मी. रखनी चाहिए। प्रकंदो 4 को से.मी. से अधिक गहरा नहीं बोना चाहिए। बोने के उपरांत बीज प्रकंदो को मिट्टी से भली भांति ढ़क देना चाहिए। बोवाई के तुरंत बाद ऊपर से गोबर कि खाद या घास फूस पत्तियों से ढ़क देना चाहिए। ऐसा करने मिट्टी के अन्दर नमी बनी रहती है और तेज धूप के कारण अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पड़ता है।
जैविक खादः- अदरक मृदा से अधिक मात्रा में पोषक लेती है। 25-30 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद और आर्गेनिक 2 खाद बैग भू पावर वनज 50 किलो ग्राम या 2 बैग माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट 40 किलोग्राम, 2 बैग माइक्रो भू पावर वनज 10 किलोग्राम, 2 बैग सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट 10 किलोग्राम, 2 बैग माइक्रो नीम वनज 20 किलो ग्राम और 50 किलो अरंडी कि खली इन सब खादों को मिलाकर अच्छी तरह घोलकर करपम्प द्वारा छिड़काव करें। दूसरा, तीसरा छिड़काव 25-30 दिन बाद आवष्यकतानुसार करते रहे। इस तरह से स्वादिष्ट स्वास्थ्य वर्धक और निरोग अदरक का उत्पादन करें।
गौमूत्रः- 10 लीटर देसी गाय का गौमूत्र लेकर पारदर्षी कांच या प्लास्टिक के बर्तन में लेकर 10.15 दिन तक धूप में रखे और आधा लीटर प्रति पम्प पानी में मिलाकर प्रयोग करें।
नीम का काढ़ाः- 25 ग्राम नीम की ताजी पत्ती तोड़कर कुचल कर पिस कर किलो 50 लीटर पानी में उबालते है, जब पानी 20-25 लीटर रह जाये ठंडा कर आधा लीटर प्रति पम्प पानी में मिलाकर प्रयोग करते है।
सिंचाईः- अदरक की फसल में भूमि में बराबर नमी रहना चाहिए पहली सिंचाई बोवाई के कुछ दिन बाद ही करते है और जब तक वर्षा प्रारंभ न हो जाये 15 दिन के अंतर पर सिंचाईयां करते रहते है। गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिए।
खरपतवार नियंत्रणः- अदरक के खेत को खरपतवार रहित रखने और मिट्टी को भुर भुरा बनाये रखने के लिए आवष्यकतानुसार निदाई गुढ़ाई करना चाहिए। अदरक की फसल अवधि में 2-3 बार निदाई गुड़ाई करना पर्याप्त होता है। प्रत्येक निदाई के उपरांत मिट्टी अवष्य चढ़ानी चाहिए।
रोग नियंत्रण
मूल बिगलन या मृदु बिगलनः- यह अदरक का प्रमुख रोग है जो पिथियम एफेनीडरमेटम नामक फंफूदी द्वारा होता है। इस रोग के प्रकोप के कारण नीचे की पत्तियां पीली पड़ जाती है बाद में पूरा पौधा पीला पड़ कर मुरझा जाता है। भूमि के समीप का भाग पतला एवं कोमल हो जाती है। पौधों को खींचने पर वह प्रकांड से जुड़े स्थान से सुगमता से टूट जाता है बाद में पूरा प्रकंद सड़ जाता है। जिसे प्रकंद बिगलन की संज्ञा दी जाती है। इस रोग के बीजाणु भूमि में उपस्थित रहते है और बीज के रूप में प्रयुक्त प्रकंद भी बीजाणु अपने साथ ले जाते है। इसलिए इस रोग से प्रभावी बचाव हेतु दोनों को ही उपचारित करना पड़ता है। उपरोक्त उपचारित करने के विधि से प्रकंदों को उपचारित करते है और माइक्रो नीम और अरंडी की खली का खाद जमीन या भूमि में अवष्य देते है।
जीवाणुक म्लानिः- यह एक संक्रामक रोग है। यह रोग केरल में विषेष रूप से लगता है। जलांष नष्ट होकर पत्तों का लटक जाना इसका प्रथम लक्षण है। भरी वर्षा के बाद पुन धुप निकलते समय इसका प्रथम लक्षण प्रकट होता है। धीरे-धीरे कुछ दिनों में सभी पत्ते लटकने लगते है। लटकते हुए पत्तों के छोर में पहले केसर युक्त पिलापन दिखाई पड़ता है। 3-4 दिन में पुरे पत्ते इस रोग से ग्रसित हो जाते है। इस रोग के रोकथाम के लिए गौ मूत्र या नीम का काढ़ा का माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
पत्ती धब्बा:– इस रोग फिलोसटीकटा जिंजी बरी नामक फंफूदी के कारण होता है। पत्तियों पर अंडाकार या अनियमित आकार के धब्बे पड़ जाते है। जो बाद में आपस में मिल जाते है। पौधों कि वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रकंदो की उपज कम हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर छिड़काव करें।
खुदाईः- फसल की खुदाई इस बात पर निर्भर करती है उसे किस उद्देष्य के लिए उगाया गया है। कच्चे अदरक के रूप में इसे छठे महीने में खोद लेना चाहिए जब कि सौंठ के लिए 8 महीने बाद खुदाई करनी चाहिए। फसल के पकने पर पत्ते पीले पड़कर सुख जाते है। बड़ी सावधानी से मिट्टी खोदकर अदरक निकालते है।
उपजः- अदरक की उपज किस्म भूमि की उपजाऊपन और फसल की देखभाल पर निर्भर करती है। आमतौर पर प्रति हेक्टेयर 100-150 ताजे प्रकंद मिल जाते है, जो सुखाने 20 से 30 क्विंटल सोंठ के रूप होते है।
भण्डारणः- दिसम्बर जनवरी महीने में अगली खेती के पहले बीज को 4-5 महीनों तक सुरक्षित रखना है। भारतीय मषाला अनुसंधान संस्थान ने इसके लिए बहुत ही सरल और कम खर्च वाली रीति विकसित की है। इसके अनुसार अदरक बीज क्युनलफोस 0.1 और मैकोजेब 0.3 घोल में 1 लीटर पानी में 4 मि.ली. क्युनालफोस 25 ई.सी. पर 3 मैकोजेब की दर से तैयार किये गए मिश्रण में ग्राम 30 मिनट तक डुबोकर रखने के बाद छाया दार जगहों में सुखाना चाहिए। सामान्यतया जहां जीवाणुक म्लानि की संभावना होती है, वहां 10 लीटर पानी में 2 स्ट्रेपटरोसेक्लिन की दर से तैयार किये गए घोल में 30 मिनट तक डुबोकर रखना चाहिए। अदरक के बीज प्रकंदो के भंडारण के लिए छायादार जगह में पर्याप्त लम्बा चौड़ा लगभग 60 से.मी. गहराई का गडढ़ा तैयार करना चाहिए। यदि मिट्टी दुर्बल है तो गड्ढे के नीचे लगभग 2 से.मी.तक रेत डालकर उसमें ऊपर 10 से.मी. ऊंचाई तक अदरक के बीज रखना चाहिए। इस तरह रेत क्रमानुक्रम में 45-50 से.मी. तक गडढ़ा भर देना चाहिए। इसके बाद गडढ़ा एक तख्त से ढकना चाहिए, जिसके बीच में एक छेद भी होना चाहिए। ज्यादा गर्मी और वर्षा से बीजों को बचाने के लिए भण्डारण के ऊपर नारियल या ताड़ के पत्तों से छप्पर बनाना चाहिए। ऐसे तैयार किये अदरक के बीजों का लगभग 20-25 दिनों के उपरांत तख्त निकाल कर जांच करे और सूखे या गले सादे बीजों को निकाल दें।
पलवार:- पत्तियों का पलवार देने से अंकुरण अच्छा होता है और खरपतवार भी कम मिलते है। तीन बार पलवार देने से अधिक उपज मिलती है। 5000 किलोग्राम हरी पत्तियों के पलवार 30 दिन व 80 दिन के बाद देते है। जब पौधा 20-25 से.मी. उंचे हो जाये तो उन पर मिट्टी चढ़ा देते है।
अदरक बीज का संकलनः- बीज रूप में अदरक का संकलन कीट मुक्त व कीटाणु रहित पौधों से करना चाहिए। अदरक का बीज लेते समय यह सावधानी रखनी चाहिए कि अंकुरों पर क्षति न पहुंच जाये।











