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छत्तीसगढ़ में लिलियम फूल उत्पादन की उन्नत तकनीकी

राम सिंह

छत्तीसगढ़ में लिलियम फूल की खेती के लिए बहुत ही अनुकूल वातावारण हैं। छ. ग. में मुख्यतः तीनों जलवायु वाले क्षेत्र में लिलियम फूल की खेती किया जा सकता हैं। कि आज के दौर में छ. ग. में जहॉ फूलों की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में लिलियम के फूलों की खेती ने छ. ग. के किसानों को एक नई राह की ओर दिखाई हैं। जिससे छ. ग. के किसान भाई लिलियम के फूलों की खेती करके अच्छी आमदानी हासिल कर आपने आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकते हैं। लिलियम एक विदेशी पौधा हैं। दुनिया में टयूलिप के फूल के बाद लिलियम एक ऐसा फूल हैं। जिसकी फूल एक बेहद ही खूबसूरत फूल होती हैं। जिसकी वजह से बाजार में अधिक मांग के साथ-साथ इसकी अच्छी कीमत भी मिल जाती हैं।

लिलियम फूलों की लोकप्रियता कुछ मुख्य विशेषताओं के वजह से बढ़ते जा रही हैं, जैसे की इसका लुभावना आकार, विभिन्न प्रकार के रंग, अधिक समय तक तरो-ताजा रहने व आकर्षक बनवाट के गुणों के कारण इसके फूल अति सुन्दर होता हैं। लिलियम के फूलों का उपयोग आमतौर पर- शहर के बड़े- बड़े होटलों में, रेस्टोंरेट, शादी, धार्मिक सहित अन्य कर्यक्रमों में, इसकी मांग बढ़ते जा रहा हैं।
मिटटी: मिटटी बलुई और भुरभुरी होनी चाहिए, पानी एक जगह न हो इसके लिए जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए।
मिटटी का उपचाऱ: जिस जगह लिलियम की खेती करनी हो उस खेत को छः हफ्ते तक पानी से भरा रहना चाहिए। मिटटी को आठ इंच की गहराई तक फार्मिलिन के घोल का पानी मे मिलाकर मिटटी को गिला करना चाहिए। ऐसा करने से मिटटी के हानिकारक की मर जाते हैं।

खाद की मात्रा:
इसकी अच्छी पैदावार फसल के लिए एन पी के 25 किलो/एकड़, डी.ए.पी. 10 किलो/एकड़, म्यूरेट आफ पोटश 20 किलो/एकड़, फेरस 2.50 किलो/एकड़, जिक 2.50 किलो/एकड़, मैग्नेशियम 2.50 किलो/एकड़, इस प्रकार की खेती बेड़ या रिज पर की जाती है। अतएव खाद की मात्रा उसी अनुसार रखंे।

लिलियम दो प्रकार की होती हैं-
ओरिएंटल लिलियम 110 से 120 सेन्टींमीटर का पौधा होता हैं। और साथ ही ये बेहतरीन खुबशू देने वाला फूल हैं।

ओरिएंटल लिलियम के फूल की प्रजातियॉ-
सफेद फूलों में -व्हाइड मांउटेन, कासा ब्लान्का
गुलाबी रंग फूलों में – ओलम्पिक स्टार, कैसकैड, स्टार गेजर मोना लीसा
एशियेटिक लिलियम इनकी उचाई 80 से 90 सेन्टींमीटर का पौधा होता हैं। परन्तु ये बिना खुशबू का एक बेहतरीन रंग वाला सुन्दर फूल होता हैं।

एशियाटिकलिलियम के फूल की प्रजातियॉ-
अलास्का, नवोना, सेनकेयर,
नारंगी रंग में किस्में – इटिल, कम्पास, एपलडून
पीला रंग में किस्में – ड्रीमलैंड, पोलीआना, सनरेज, कनेक्टीकट किंग
गुलाबी रंग में किस्में – टोस्काना, मोन्टै रोजा
सफेद रंग में किस्में – ओंनी, मोन्ट ब्लैंक पोमा
इन दोनों की ही हाइब्रिड और अन्य कई तरह की लगभग 100 से भी अधिक किस्में हैं।

बुआई का समय –
छत्तीसगढ में इसकी बुआई का समय अक्टूबर मध्य माह से लेकर नवम्बर के शुरूवात किया जा सकता हैं।

बल्ब डिस्इन्फेशन:
बल्ब को बोने से पहले 2 से 3 ग्राम प्रति लीटर पानी मे बवस्टिन या कैप्टान के घोल मे 15 से 20 मिनट उपचारित करना चाहिए।

पौधे की दूरी:
4 से 5 इच पौधे से पौधे की दूरी, उसकी गहराई 4 से 6 इच होनी चाहिए, बल्ब के आकार के अनुसार।

उगाने की जगह:
लिलियम को ग्रीन हॉउस या शेड हॉउस मे उगाना चाहिए, लिलियम को खुले मे तभी उगाया जा सकता है जहॉ पर तेज हवा और बर्फ न पडती हो। लिलियम की खेती कम तापमान पर की जाती हैं। अच्छी पैदवार लेने के लिए औसतन दिन का तापमान 20 से 25 सेंटीग्रेड से कम ना हो तो वहीं रात का 10 से 12 सेंटीग्रेड से कम नही होनी चाहिए।

जल प्रबन्ध
खेत के उपरी सतह पर हमेशा नमी बनी रहनी चाहिए ।

फूल की कटाई:
जैसे ही लिलियम की पहली कली मे रंग आ जाए तब उसे काट लेना चाहिए। अगर उसे पहले काट दिया तो कली पूरी तरह से बढ नहीं पायेगी। अगर कली को खिलने के बाद काटा जायेगा तो फूलांे को भेजने मे कठिनाई होगी तथा फूल को नुकसान भी हो सकता हैं ।

फूलोंको रखने का तरीकाः
फूलों को 2 से 5 सेन्टीग्रेट तापमान पर रखना चाहिए। कटे हुए फूलो को पानी मे ही रखकर ठण्डे कमरे मे रखना चाहिए।

कीट एव बीमारियॉः
कीट

एफिड एंव थ्रिप्स
पहचान- इसका आकार छोटा तथा पख काले रंग के होते हैं। एफिड के प्रौढ और अर्भक दोनांे ही पत्तियों और फूलांे का रस चूसते हैं। जिससे फूल का आकार खराब हो जाता है। थ्रिप्स पत्तियांे का रस चूसता हैं जिससे पत्तियॉ सफेद हो जाता हैं। यह विषाणु बिमारी (बड निक्रोसिस) को फेलाने मे अत्यत सहायक हैं।
नियन्त्रणः एफिड एव थ्रिप्स के नियन्त्रण के लिए मैटासिस्टाक या मैलाथियान 1 से 2 मिलीलिटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर पौधा छिडकाव करना चाहिए।

बीमारियॉ एव उसकी रोकथाम:
फफॅॅुदी ( राइजोकटोनिया सोलनी)
पहचान- हल्के भूरे रंग के धब्बे निचले पत्तियों पर दिखायी पड़ती हैं। इससे पौंधौं का विकास रूक जाता है। इन पौंधौ से अच्छे फुल नहीं प्राप्त हो पाते हैंं।
नियंत्रण इस रोग की रोकथाम के लिये मिटटी को उपचारित करके ही बल्ब लगाना चाहिये। बल्ब को बोने से पहले किसी फफूदीं नाशक कैप्टान या बैवस्टीन से उपचारित करना चाहिये।

फिटोफथरा (कालर रॉक)
पहचान- पौधौं का अच्छा विकास नहीं है। पत्तियां पीली पड जाती हैं। भूरे रंग के पौधे पर दिखाई देते हैं जो पत्ते पर धीरे-धीरेे फैलने लगते हैं।
नियंत्रण बल्ब बोने से पहले मिटटी को उपचारित करना चाहिए। खेत मे पानी एक जगह एकत्रित नही होने देना चाहिए । ज्यादा खराब पौधा को निकाल देना चाहिए ।

बोटराइटिस
पहचान- पत्तियॉ पर भूरे रग के धब्बें पड़ जाते हैं। जो 1 से 2 मिलीमीटर तक के होते है। पानी एक जगह एकत्रित होने से इस बीमारी का प्रकोप और तेज हो जाता हैं।
नियंत्रण बल्ब बोने से पहले मिटटी को उपचारित कर ले। मिटटी मे बहुत नमी नहीं होनी चाहिए। बल्ब को कार्बेन्डाजिम $ मैन्कोजेब मे शोधित करके बीज को रोपे।

फ्यूजेरियम (फंगस)
यह रोग भृदा मे ज्यादा पाया जाता है। यह रोग प्रायः जड़ों में लगाया जाता हैं।
पहचान – इसमें बल्ब की परत (स्केल) मुलायम हो जाती हैं एवं रंग भूरा हो जाता है। पौधौं के स्टैम पर
भी इसके लक्षण देखे जा सकते हैं।
नियंत्रण- बल्ब को सिस्टेमिक फंगीसाईट में एवं कान्टैक्स फंगीसाईट में बोने के पहले शोधित करना चाहिये।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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