कददूवर्गीय सब्जियों के प्रमुख रोग एवं रोकथाम
आशीष प्रधान, नवीन कुमार मरकाम और गिरिजा शंकर


औषधीय गुणों की दृष्टि से कददू, तरोई शीघ्र पचने वाली, दस्तावर और बलदासक तरकारी हैं। हमारे देश के किसान जितना तरोई कददू एवं लौकी की सब्जी के रूप में प्रयोग करते है, उतना किसी अन्य सब्जी को नही। शहरो में कददू लौकी, तरोई की सब्जी के रूप में खूब चलन हैं। सब्जी के अतिरिक्त लौकी का रायता खीर और बर्फी भी तैयार की जाती है। कुष्माण्ड वर्ग का यह मुख्य सदस्य है, जिसकी खेती हमारे देश में प्रायः गृहवाटिका के रूप में घर-घर की जाती है। तरोई, कददू लौकी की फसल में विभिन्न प्रकार के कीट और रोग बहुत हानि पहुचांते है जिनकी समय से नियंत्रित नहीं किया गया तो पूरी फसल नष्ट हो जाती है और किसान को काफी नुकसान सहना पड़ता है।
रोग नियंत्रण
1. मृदरूरोमिल आसिता – यह रोग फफूंद द्वारा होता है। ऐसे क्षेत्रों में जहाँ वर्षा अधिक होती है तथा वायुमण्डल आर्द्र रहता है, इस बीमारी का प्रकोप अधिक होता है। इसके मुख्य लक्षण पत्तियों की उपरी सतह पर पीले से लेकर भूरे तथा नीचली सतह पर औगनी रंग के धब्बे प्रकट होना है। रोग ग्रसित पौधों पर फल ठीक नहीं लगते है और उनमें स्वाभावित रंग उत्पन्न नहीं होता है।
रोकथाम – डाइथेन एम-45 का 0.25 प्रतिशत (250 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में घोलकर) घोल का 10-15 दिन के अन्तर से 3-4 बार छिड़काव करना चाहिए।
2. चूर्णिल आसिता – यह रोग भी एक फफूंदी के कारण होता है। इस रोग का आक्रमण पत्तियों तथा तने पर होता हैं। पहले पुरानी पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रंग के गोल धब्बे उत्पन्न होते हैं। जो धीरे-धीरे बढ़कर उपरी सतह पर भी सफेद चूर्ण के रूप में दिखाई पड़ते है और इस प्रकार पूरी पत्ती पर छा जाते है। रोग के अधिक बढ़ने पर पत्तियां पीली भूरी एवं सिकुडी दिखायी देती है।
रोकथाम –
(1) कैराथेन के 0.06 प्रतिशत (60 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में ) के घोल के तीन सप्ताह के अन्तर पर तीन छिड़काव करें।
(2) घुलनशील गंधक जैसे इलोसाल या सल्फैक्स की 3 किलोग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये।
3. मोजैक – यह रोग माहूँ के द्वारा फैलाये जाने वाले पाइरस के द्वारा होता है। इस रोग का प्रकोप होने पर पौधों की वृद्धि रूक जाती है। रागग्रस्त पत्तियां विकृत, झूर्रीदार एवं छोटी तथा कभी-कभी नीचे का मुड़ी होती है। नई निकलने वाली पत्तियां ऐठती सी मालूम पड़ती है और उनका रंग पीला हरा हो जाता है।
रोकथाम – इस रोग की रोकथाम के लिए माहू का नियंत्रण करना आवश्यक होता है। अतः फसल पर डाइमेक्राम 0.03 प्रतिशत (30 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में) घोल का छिड़काव करना चाहिए।
4. फल सडन रोग – यह रोग फफूंद के कारण होता है। इसका मुख्य लक्षण फलों पर रूई जैसी संरचना का दिखाई देना है। यह लक्षण मुख्यतः जमीन की सतह पर लगें, फलों पर दिखाई देता है। रोग ग्रसित फल मुलायम, गहरे हरे रंग के तथा जदा सिक्त धब्बे जौ लक्षण उत्पन्न करते है। इस बीमारी का मुख्यतः आर्द्र वायुमण्डल में अधिक प्रकोप होता है।
रोकथाम –
(1) जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।
(2) बोर्डेक्स मिश्रण (6.6.50) का छिड़काव करना लाभदायक होता है।
(3) रोग ग्रसित क्षेत्रों में बीज तथा मिटृी दोनों को उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए।
(4) बीज उपचार के लिए थीरम 0.25 प्रतिशत का प्रयोग करना चाहिए।
5. रूट नाट – यह रोग एक सूत्रकृमिक कारण होता है। रोग ग्रसित पौधे पीले तथा बौने रह जाते हैं। रोग का अधिक प्रकोप होने पर पौधे मर जाते है।
रोकथाम – फेनामिफास का 1.7-2.5 किग्रा सक्रिय अवयव का प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में छिड़काव करना चाहिए।
कीट नियंत्रण –
तरोई, कददू एवं लौकी की फसल पर लगने वाले प्रमुख कीट तथा उनके नियंत्रण के उपाय नीचे दिये हैं-
1. लाल कीट – चमकीले लाल रंग का यह कीट 7 मि.मी. लम्बा तथा 2.5 मि.मी. चौडा होता है। इसका शरीर लाल रंग के कडे पंखो से ढका होता हैं। शरीर की निचली सतह पर कारले पतले रोम होते है। इसके प्रोढ फसल को बधिक नुकसान पहुचांते हैं। लेकिन सूड़ी भी कुछ हद तक नुकसानदायक हैं। ये कीट पौधें की पत्तियां खाकर बिल्कुल नष्ट कर देते है। जिसके कारण पौधों की बढ़वार बिल्कुल रूक जाती है। बडे पौधों बनायें हैं। खायें हुए स्थान पर महीन शिराओं की जाली सी रह जाती है।
रोकथाम –
(1) पौधों पर सेबिन 10 प्रतिशत धूल का बुरकाव ठीक रहा है।
(2) मोनोक्रोटोफास का 0.15 प्रतिशत घोल भी पौधों में फल आने से पहले छिड़का जा सकता है।
2. इपीलेकना बीटिल – इस कीट के प्रौढ अण्डाकर पीले-भूरे रंग के होते हैं जिससे शरीर के ऊ काले धब्बे होते हैं। सूंडी पीले रंग की होती है तथा शरीर का कॉंटे जैसे होते पौंढ तथा सूंडी दोनों ही पत्तियां हरा रंग (क्लोरोफिल) खुरच-खुरच कर खाते हैं जिससे पत्तियों में केवल शिरायें ही रह जाती है। पत्तियों पर सफेद धारियां बन जाती हैं। पत्तियों का हरा रंग खा लेने से पत्तियां भोजन नहीं बना पाती हैं पैदावार काफी कमी आ जाती है।
रोकथाम –
(1) 0.2 प्रतिशत सेविन 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का छिड़काव करें
(2) यदि फसल का क्षेत्रफल छोटा है तो अण्डो, सूडि़यों व को हाथ पकडकर नष्ट कर दीजिये।
3. फल मक्खी – यह फलों छिलके के नीचे अंडे देती है जिससे सूडिरयां निकलकर गूदे में प्रवेश कर करती हैं। इससे फल सड जाता है। और जमीन पर गिर जाता है। लेकिन वर्षा के साथ ही संख्या में काफी वृद्धि हो जाती है। मक्खी जिस जगह पर अण्डे देती है वहॉ पर छोटे-छोटे निशान दिखाई देते है। जो गोंद जैसे पदार्थ से ढक रहते है। मादा अण्डे देने से पहले कई बार फल में छेद करती है जिससे फल के उपर रस निकल आता है।
रोकथाम –
(1) ग्रसित फलों को इकटृा करके जमीन में गहरा गाढ़ देना चाहिए।
(2) जमीन से 5 प्रतिशत एल्ड्रिन धूल का 20-25 किग्रा./है. क दरन से बुरकाव करके उपरी सतह की मिटृी में मिला देना चाहिए।
(3) बेल पर फूल दिखाई देते ही सेविन 0.2 प्रतिशत (200 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में) अथवा मैलाथियान 0.05 प्रतिशत (50 ग्राम मैलाथियान 50 प्रतिशत डब्ल्यू. पी. दवा 100 लीटर पानी में ) के घोल का भी छिड़काव किया जा सकता है।
4. माहू – इस कीट के प्रौढ़ व शिशु दोनों ही हल्के पीले हरे रंग के होते है और पत्तियों की निचली सतह पर रहकर मुलायम तने तथा पत्तियों का रस चूसते हैं। पत्तियां तथा पौध पीला पड़ जाता है। मुरझा जाता है और अन्त में सूख जाता है। यह कीट मोजैक नामे बीमारी के विषाणु भी बीमार पाधों से स्वस्थ पौधों में फैलाकर उसे भी रोगी बना देते है।
रोकथाम –
(1) इस कीट की रोकथाम के लिए फल बनने से पहले की अवस्था मे थायोमिथाक्जाम (07 ग्रा. दवा 15 लीटर पानी में) का छिड़काव कर कीट का नियंत्रण करें।
(2) फल बनने के बाद 0.05 प्रतिशत मैलाथियान या 0.05 प्रतिशत नुवार रका छिड़काव करना चाहिए उपरोक्त रोग व कीटों का निमंत्रण करके किसान भाई उत्पादन ले सकते हैं।
5. पत्तों को काटने वाली इल्लियां – पत्तों को काटने वाली इल्लियों में प्रमुख अर्द्ध कुंडलक इल्ली व तम्बाकू की इल्ली प्रमुख हैं।
- अर्द्ध कुंडलक इल्ली हरे, भूरे व कत्थई रंग की होती है। ये जब चलती है तो एक प्रकार आधी कुंडली बनाती है। इल्लियां पत्तीयों को खाकर भारी नुकसान करती है। कली व फूलों को भी खा जाते है।
- तम्बाकू की इल्ली प्रारंभ में हरी व बाद में काली हो जाती है। इसके ग्रीवा पर काली कंठी होती है। इसकी मादा प्रायः पत्तों के नीचे अंडे देती है। पत्तीयों का हरित द्रव्य खाकर छलनी बना देती है।
6. तना छेदक इल्लियों –
ऽ कहीं कहीं छल्ला भृंग (गर्डल बीटल) का प्रकोप भी देखा जा रहा है। गर्डल बीटल की इल्ली हरे रंग की होती है व तने को अंदर से खोखला कर देती है। प्रारंभ मे इसके प्रकोप से पत्तियां मुरझाने लगती है।
रोकथाम
- प्रकाश जाल लगाकर प्रौढ़ कीड़ों को नष्ट करें।
- फिरोमन ट्रेप अवश्य लगावें।
- फसल की सतत सर्वेक्षण करें एवं अर्द्ध कुंडलक इल्लीयों व तम्बाखू की इल्ली के अंड समूहों, छोटी इल्लीयों एवं गर्डल बीटल की मुझाई पत्तियों को हाथ से एकत्रित कर नष्ट करें। यह कार्य सामूहिक अभियान के रूप मे करें। इससे कीट फैलाव मे कमी आवेगी।
- फसल में ट्रायको कार्ड (5000 अंडे/हे.) के मान से लगावें।
- फसल पर भुरकाव हेतु क्निालफॉस 1.5 प्रतिशत रज 20 से 25 कि/हे. क मान से भुरकाव करें।
- छिड़काव हेतु क्लोरोफायरीफॉस 20 ई.सी./1.5 ली/हे. या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी./1.25 ली/हे. या क्निालफॉस 25 ई.सी./1.5 ली/हे. मीथेमिल 40 एस.पी./ 1 कि.ग्रा./है. या इन्डोएक्साकॉब 15 ई.सी./150 मि.ली./है. या लैम्डासायहेलोथ्रिन 5 ई.सी./300 मि.ली./है. या ट्रायझोफास 40 ई.सी./800 मि.ली/है. या स्पीनोसैड 45 एस.सी./187.5 मि.ली./है.











