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पालक भाजी की उन्नत खेती

युगलकिशोर लोधी, जितेन्द्र त्रिवेदी एवं प्रवीण कुमार शर्मा

पत्तियों वाली सब्जियों में पालक भी एक महत्वपूर्ण सब्जी है जिसकी खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में की जाती है। पालक एक आयरन से भरपूर, खनिज पदार्थ युक्त एवं विटामिन्स युक्त फसल है जिसका प्रत्येक मनुष्य को साधारण प्रयोग करना चाहिए। यह हरी सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसकी पत्तियां स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभकारी हैं। 100-125 ग्राम पालक रोज दैनिक जीवन के लिये संतुलित आहार के रूप में खाने की सिफारिश की जाती है। शरीर के हीमोग्लोबिन यानी खून के प्रति चौकन्ने लोगों के लिए पालक से उम्दा कोई दूसरी सब्जी नहीं होती। पालक की सूखी या रसीली सब्जी को लोग चाव से खाते हैं। इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी के अतिरिक्त नमकीन पकौड़े, आलू मिलाकर तथा भूजी बनाकर किया जाता है। यह एक ऐसी फसल है, जो कम समय और कम लागत में अच्छा मुनाफा देती है। पालक की 1 बार बोआई करने के बाद उस की 5-6 बार कटाई की जाती है। पालक की फसल पूरे साल ली जाती है। इसके लिए अलग अलग महीनों में इस की बोआई करनी पड़ती है। किसान पालक की व्यवसायिक खेती से अच्छा लाभ कमाया सकता है। इसके लिए उसको आधुनिक तकनीकी से खेती करनी होगी।

पालक के लाभदायक गुण
पालक हरी पत्तेदार सब्जी होती है। पालक में कई ऐसे गुण पाये जाते हैं जो हमारे शरीर और दिमाग की मजबूती के लिए जरुरी है। पालक के सेवन से पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। पालक प्रोटीन, कैलोरीज, खनिज तथा विटामिन्स का एक मुख्य साधन है जो कि दैनिक जीवन के लिए अति आवश्यक है। पालक में कैल्शियम, विटामिन ‘ए’ भरपूर मात्रा में पाया जाता है तथा ऑयरन, फास्फोरस, विटामिन ‘सी’ माध्यम मात्रा में पाया जाता है। पालक की पत्तियां शीतल, स्वास्थवर्धक, सुपाच्य, रक्त शोधक, कृमिनाशक रेचक, शमनकारी वमनरोधी, कफकारक, ज्वरनाशक होती है। इतना ही नहीं पालक में इनके आलावा निम्न गुण पाये जाते हैं- पालक की पत्तियां पथरी, श्वेत कुष्ठ, पित्त दोष स्केबीज आदि में भी लाभदायक होती हैं। पालक के इन्ही गुणों के कारण आज के समय में पालक का उपयोग बहुत ज्यादा हो रहा है।

पालक में पोषक तत्व (प्रति 100 ग्राम):

पोषक तत्व मात्रा
कैलोरीज 23 किलो कैलोरीज
पानी 91 प्रतिशत
प्रोटीन 2.9 ग्राम
कार्बोहाइड्रेट 3.6 ग्राम
शर्करा 0.4 ग्राम
रेशा 2.2 ग्राम
वसा 0.4 ग्राम
संतृप्त वसा 0.06 ग्राम
मोनो संतृप्त वसा 0.01 ग्राम
बहु संतृप्त वसा 0.17 ग्राम

पालक की खेती के लिए आवश्यकताएँ-
जलवायु
पत्ती वाली सब्जियों में पालक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। पालक की सफलतापूर्वक खेती के लिए ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है। ठण्ड में पालक की पत्तियों का बढ़वार अधिक होता है जबकि तापमान अधिक होने पर इसकी बढ़वार रूक जाती है, इसलिए पालक की खेती मुख्यतः शीतकाल में करना अधिक लाभकर होता है। परन्तु पालक की खेती मध्यम जलवायु में वर्षभर की जा सकती है।

मिट्टी
पालक की खेती करने से पहले यह देख लेना चाहिए कि जिस खेत में आप उसे बोने जा रहे हैं, वह समतल हो और उस में जल निकासी का अच्छा इंतजाम हो। पालक की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में पैदा की जा सकती है लेकिन सबसे उत्तम भूमि बलुई दोमट होती है। पालक का हल्का अम्लीय भूमि में भी उत्पादन किया जा सकता है। उर्वरा शक्ति वाली भूमि में बहुत अधिक उत्पादन किया जा सकता है। भूमि का पी.एच. मान 6.0 से 6.7 के बीच का अच्छा होता है।

खेत की तैयारी
पालक की बोआई से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए। इसके लिए हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 बार जुताई की जानी चाहिए। जुताई के समय ही खेत से खरपतवार निकाल देने चाहिए। अच्छी उपज के लिए खेत में पाटा लगाने से पहले 25 से 30 टन गोबर की सड़ी खाद व 1 किंवटल नीम की खली या नीम की पत्तियों से तैयार की गई खाद को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में बिखेर देना चाहिए। खेत में खाद आदि डालकर मिट्टी में भली-भांति मिला देना चाहिए। इस प्रकार से खेत को अच्छी तरह तैयार व साफ करके मिट्टी को भुरभुरा करना चाहिए तथा बाद में खेत में क्यारियां तैयार कर लेनी चाहिए।

पालक की उन्नत प्रजातियां
पालक की खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए क्षेत्र विशेष की जलवायु व भूमि के अनुसार किस्मों का चयन करना भी एक आवश्यक कदम है। साथ ही पालक की सफल खेती के लिए चयनित किस्मों की विशेषताओं का भी ध्यान रखना चाहिए। पालक की बोआई से पहले ही यह पक्का कर लें कि आप जिस किस्म का चयन कर रहे हैं वह अधिक उत्पादन देने वाली हो। पालक की उन्नतशील प्रजातियों में जोबनेर ग्रीन, हिसार सिलेक्सन 26, पूसा पालक, पूसा हरित, आलग्रीन, पूसा ज्योति, बनर्जी जाइंट, लांग स्टैंडिंग, पूसा भारती, पंत कंपोजिटी 1, पालक नंबर 15-16 खास हैं। इन प्रजातियों के पौधे लंबे होते हैं। इन के पत्ते कोमल व खाने में स्वादिष्ठ होते हैं।

बीज की मात्रा
पालक की खेती के लिए खेत में पर्याप्त मात्रा में बीज की आवश्यकता होती है। अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए सही व उन्नतशील बीज का चयन करना चाहिए, जिसे विश्वसनीय दुकान से पालक बीज प्राप्त करना चाहिए। वैसे एक हेक्टेयर में 25 से 30 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बोआई से पहले बीजों को 5-6 घंटे तक पानी में भिगो कर रखने से बीजों का जमाव बेहतर होता है।

बुवाई का समय
वैसे तो पालक की बोआई पूरे साल की जा सकती है, लेकिन फरवरी से मार्च व नवंबर से दिसंबर महीनों के दौरान बोआई करना ज्यादा फायदेमंद रहता है।

बीज की बुवाई
पालक का बीज दो प्रकार से बोया जाता है-
1. कतार द्वारा,
2. छिड़काव द्वारा।
बुवाई से पहले क्यारी में पानी भरके पलेवा कर देते है ताकि क्यारी में खूब अच्छी नमी होनी चाहिए लेकिन पैर नहीं धसे। पालक की पंक्ति में बुवाई करने के लिए पंक्तियों व पौधों की आपस में दूरी क्रमशः 20 से 25 सेन्टीमीटर और 20 सेन्टीमीटर रखना चाहिए ताकि घास फुस की सफाई की जा सके या निराई गुड़ाई आसानी से किया जा सके। पालक के बीज को 2 से 3 सेन्टीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए, इससे अधिक गहरी बुवाई नहीं करनी चाहिए। छिटकवां विधि से बोआई करते वक्त यह ध्यान रखें कि बीज ज्यादा पास पास न गिरने पाएं। छिड़काव विधि में पालक के बीज को खेत में खाद की तरह छिड़काव किया जाता है। बिज को बोने के बाद ऊपर मिट्टी से ढक देना चाहिए।

खाद व उर्वरक
प्रति हेक्टेयर 25 से 30 टन गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद 1 किंवटल नीम की खली या नीम की पत्तियों की सडी खाद को बुबाई से पहले खेत बखेर कर हल से जुताई कर अच्छी तरह से मिला दें। यदि रासायनिक खाद का प्रयोग करें तो 100 किलोग्राम नत्रजन, 50 किलोग्राम स्फुर तथा 60 किलोग्राम पोटाश का उपयोग पालक की फसल में करना चाहिए। स्फुर व पोटास की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की 20 किलोग्राम मात्रा को भी खेत की अंतिम जुताई के समय खेत में एक समान रूप से फैलाकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। तथा नत्रजन की शेष 80 किलोग्राम मात्रा को चार बराबर भागों में बॉटकर, पालक की फसल के प्रत्येक कटाई के बाद खड़ी फसल में डालनी चाहिए। यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि उर्वरक के छिड़काव के दूसरे दिन खेत की सिंचाई अवश्य करनी चाहिए, जिससे पौधों की जड़ों द्वारा पोषक तत्वों को सुगमता से ग्रहण कर लिया जाए जिससे दूसरी कटाई के लिए फसल जल्दी तैयार हो सके।

सिंचाई
यदि बुवाई के समय क्यारी में नमी कि कमी हो तो बुवाई के तुरंत बाद एक हल्की सिंचाई कर दे पालक को अधिक पानी कि आवश्यकता होती है अतः समय समय पर सिंचाई करते रहे। जाड़ों की फसल के लिए 8-10 दिन के बाद तथा जायद की फसल की सिंचाई हल्की-हल्की 2-3 दिन में करते रहना अति आवश्यक है। अच्छी उपज के लिये सिंचाई का बहुत ही योगदान होता है। गमलों में नमी के अनुसार 2-3 दिन के बाद तथा जायद की फसल के लिए रोज शाम को ध्यान से पानी देते रहना चाहिए। पानी देते समय ध्यान रहे कि गमलों में लगे पौधे टूटे नहीं और फव्वारे से ऊपर की दूरी से नहीं देना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण
यदि क्यारी में कुछ खर पतवार उग आये हो तो उन्हें जड़ से उखाड़ देना चाहिए यदि पौधे कम उगे हो तो उस अवस्था में खुरपी- कुदाल के जरिये गुड़ाई करने से पौधे कि बढ़वार अच्छी हो जाती है। पालक की फसल में रवी फसल के खरपतवार अधिक हो जाते है। इनको पहली, दूसरी सिंचाई के तुरन्त बाद खेत में निकाई-गुड़ाई करते समय फसल से शीघ्र उखाड़ या निकाल देना चाहिए। इस प्रकार से 2-3 निकाई फसल में करनी अति आवश्यक हैं। ऐसा करने से फसल की उपज अधिक होती है।

कीट नियंत्रण
वैसे तो फसल में कीटों का प्रकोप नहीं पाया जाता है, लेकिन कभी कभी माहू, बीटल और कैटरपिलर किट फसल को नुकशान पहुचाते हैद्य कैटर पिलर नाम का कीट पहले पत्तियों को खाता है और बाद में तने को नष्ट कर देता है। इस कीट से नजात पाने के लिए जैविक कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। जैविक कीटनाशक के रूप में किसान नीम की पत्तियों का घोल बना कर 15-20 दिनों के अंतर पर छिड़काव कर सकते हैं। इस के अलावा 20 लीटर गौमूत्र में 3 किलोग्राम नीम की पत्तियां व आधा किलो तंबाकू घोल कर फसल में छिड़काव कर के कीड़ों से नजात पा सकते हैं या मैलाथियान को 700 से 800 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टयर छिड़काव करना चाहिए। इसके साथ साथ मिथायल पेराथियान 50 ईसी 1.5 लीटर का 700 से 800 लिटर पानी मे मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए।

रोगों से बचाव
पालक की फसल में दो बीमारियों का अधिक प्रकोप होता है –
1. डैंपिग आफ
डैंपिग आफ की बीमारी अंकुर पर लगती है। छोटा पौधा पिचक जाता है तथा मर जाता है। यह पाइथीयम-अल्टीयम कवक द्वारा लगती है। इस पर नियन्त्रण के लिये सैरासन या सीडैक्स कवकनाशक से बीजों को उपचारित करके बोना चाहिए।
2. पाउडरी मिलड्यू
पाउडरी मिलड्यू बीमारी के द्वारा पालक की फसल की अधिक हानि होती है। इस बीमारी में पौधों की पत्तियों पर छोटे-छोटे पीले रंग के धब्बे बन जाते हैं जो आगे चलकर बड़ा रूप धारण कर लेते हैं और पूरा पौधा नष्ट हो जाता है। नियन्त्रण के लिए सल्फर का धूल भी लाभदायक होता है। ऐसे रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए।

पालक की कटाई
पालक के बिज को बोने के लगभग एक महीने बाद पालक काटने योग्य हो जाती है। पालक की पत्तियां जब पूर्ण रूप से विकसित हो जाएँ लेकिन हरी कोमल और रसीली अवस्था में हो तो जमीन कि सतह से ही पौधों को हसिया से काट लेते है कटाई के बाद क्यारी का हलकी सिंचाई कर देते है इससे पौधों कि पैदावार तेज होती है पत्तियों को काटते समय यह ध्यान रखना चाहिए की पालक के पौधे को कोई नुकशान ना हो। अगर पालक की अच्छी तरह से देखभाल की जाये तो पालक की 4 से 6 कटाई प्राप्त होती है। प्रति हेक्टेयर 80 से 90 किंवटल पालक की हरी पत्तियां प्राप्त होती है।

उपज
पालक की बोआई के 1 महीने बाद जब पत्तियों की लंबाई 15-30 सेंटीमीटर के करीब हो जाए तो पहली कटाई कर देनी चाहिए। यह ध्यान रखें कि पौधों की जड़ों से 5-6 सेंटी मीटर ऊपर से ही पत्तियों की कटाई की जानी चाहिए। हर कटाई में 15-20 दिनों का फर्क जरूर रखना चाहिए। हर कटाई के बाद फसल की सिंचाई करें, इस से फसल तेजी से बढ़ती है। पालक की उपज प्रत्येक जाति के ऊपर निर्भर करती है। 1 हेक्टेयर फसल से 150-250 किंवटल तक की औसत उपज हासिल की जा सकती है।

लाभ
पालक की उपज प्रत्येक जाति के ऊपर निर्भर करती है। 1 हेक्टेयर फसल से 150-250 किंवटल तक की औसत उपज हासिल की जा सकती है। जो बाजार में 10-15 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बेची जा सकती है। इस प्रकार अगर प्रति हेक्टेयर लागत के 25 हजार रुपए निकाल दिए जाएं तो 1000 रुपए प्रति किंवटल की दर से 200 किंवटल से 3 महीने में ही 2 लाख रुपए की आमदनी हासिल की जा सकती है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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