उद्यानिकीराज्य

नाशपाती की खेती

नूतन सिंह एवं डा. प्रतिभा कटियार

सेब के बाद नाशपाती एक महत्वपूर्ण फल है जिसकी खेती मुख्यतः हिमालय पर्वतो पर समुद्र तल से 1700-2400 मीटर की ऊंचाई पर की जाती है। यह एक मध्यम आकर का पेड़ है जिसकी ऊंचाई 10-16 मीटर की होती है, कई तरह की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल होने के कारण नाशपाती की खेती भारत के उप-उष्ण से संयमी क्षेत्रों में की जा सकती है कम सर्दी वाली किस्मों की खेती उत्तर भारत के समतल क्षेत्रों में की जा सकती है अधिक सर्दी वाली किस्मों की खेती जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उतराखंड जैसे जगहों पर की जा सकती है। यह फल विभिन्न पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत है जैसे की प्रोटीन (0.69 ग्रा.) विटामिन (विटामिन ए- 0.06 मिग्रा.) (विटामिन बी- 0.03 मिग्रा.) कैल्सियम (8 मिग्रा.) फोस्फोरस (15 मिग्रा)/ 100 ग्रा. पल्प।

जलवायु
नाशपाती की खेती के समुद्र तल से 1200-1800 मीटर की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक की जा सकती है-
न्यूनतम तापमान ( शरदऋतु) – 2°-10° सेल्सियस
अधिकतम तापमान – 15°-25° सेल्सियस
न्यूनतम तापमान (ग्रीष्मऋतु) – 10°-18° सेल्सियस
अधिकतम तापमान – 20°-32° सेल्सियस
वार्षिक वर्षा – 100 – 125 सेमी.

मिट्टी
इसकी खेती मध्यम बनावट, गहरी बढि़या जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी में की जा सकती है जिसकी च्भ् 8.5 के कम हो (6.0 -7.5)।
नाशपाती के खेती के लिए अम्लीय मृदा अच्छी नही मानी जाती है।

प्रसिद्ध किस्मे
Patharnakh:  यह नाशपाती की प्रसिद्ध कठोर, फैलने वाली और अधिक फल देने वाली किस्म है। इसके फल सामान्य आकार के, गोल और हरे रंग के होते है, जिन पर बिंदियां बनी होती हैं। इसका गुद्दा रसिला और कुरकुरा होता है । अधिक समय तक स्टोर करने की गुणवत्ता के कारण दूर वाले स्थानों पर आसानी से भेजा जा सकता है। यह किस्म 5-6 वर्ष की आयु में फलने लगता है। जुलाई के अंतिम सप्ताह में फल तुड़ाई योग्य हो जाता है। इसकी औसत पैदावार 1.5 किंवटल प्रति वृक्ष होती है।

Punjab Beauty: यह नरम नाशपाती वाली किस्म है। इसके वृक्ष मध्यम कद के पिरामिड आकर के लगातार फल देने वाले होते है, इसके फल मध्यम आकार के, पीले रंग के होते है। इनका गुदा सफेद ज्यादा रसीला और मीठा होता है। फल प्रौढ़ होने पर नरम हो जाते है इसके फल जुलाई के तीसरे हफ्ते में पक जाते है। इस किस्म की औसतन पैदावार 80 किलो प्रति वृक्ष होती है।

Punjab Nectar: यह नरम नाशपाती वाली किस्म है। इसके वृक्ष मध्यम कद के होते है। इसके फल सामान्य से बढ़े आकार के होते है। जिनका निचला भाग पीले-हरे रंग के और सफेद गुद्दे वाले होते है। पकने के समय यह बहुत रसीले हो जाते हैं। यह किस्म जुलाई के अंत तक पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसतन पैदावार 80 किलो प्रति वृक्ष होती है। यह किस्म प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

Punjab Gold: यह नरम किस्म की नाशपाती है । इनका फल बढ़े आकर का सुनहरा -पीले रंग का होता है। यह किस्म जुलाई के अंतिम सप्ताह में पक कर तैयार हो जाता है। यह किस्म और भी कई उत्पाद बनाने के लिए भी उचित माना जाता है। इस किस्म की औसतन पैदावार 80 किलो प्रति वृक्ष होती है।

Keiffer: यह नाशपाती की संकर किस्म है। इसके वृक्ष अधिक उत्पादन देने वाले एवं रोग प्रतिरोधक होते है। इसके फल सामान्य से बड़े आकर के निचले भाग में नुकीले भूरे लाल रंग के है । फल अगस्त – सितम्बर में पक के तैयार हो जाते है। इस किस्म का औसतन पैदावार 100 किलो प्रति वृक्ष होता है।

पौध रोपण
नाशपाती पौध रोपण के लिए मध्य जनवरी से लेकर फरवरी तक का समय उपयुक्त माना जाता है रोपण के लिए एक साल पुराना स्वस्थ पौधा चुने।

पौध रोपण से पूर्व गड्ढो की तैयारी
रोपण से एक माह पहले 1×1×1मीटर के गड्ढे खोद कर तैयार कर ले और ऊपर वाली मिट्टी एवं गोबर खाद से गड्ढो को भर कर छोड़ दे।

पौध के बीच का फासला
पौधों के बीच 5×5 मीटर का फासला रखेंद्य पत्थरनख किस्म की नाशपाती के लिए 8×4 मीटर की दुरी रखें और नरम किस्म की नाशपाती के लिए 6×6 मीटर की दुरी रखें।

पौध रोपण के पश्चात ध्यान देने योग्य बातें

  • रोपण के तुरन्त बाद पौधों के चारों तरफ बना ले।
  • पौध रोपण के तुरन्त बाद पौधों को पानी दें।
  • पौधों के जड़ों के पास मिट्टी चढ़ा दे ताकि पानी पौधे की जड़ो के पास जमा न हो पाये।
  • 10 दिन के अन्तराल पर 2-3 बार पौधों को पानी दें।
  • अप्रैल दृ मई के महीने में 7 दिनों के अन्तराल में पौधों को पानी दें।
  • दीमक के प्रकोप से पौधों को बचाने के लिए क्लोरोपिरिफोस का उपयोग 10 मि. ली./ली. पानी में करें |
  • इसके 1ली. घोल को प्रत्येक पौधों के जड़ों में डालें। यह प्रक्रिया मार्च से जून के बीच एक महीने के अन्तराल पर दोहराये।
  • sun burn और bark cracking से बचने के लिए एक बार मार्च, मई और फिर बरसात में बोरडेक्स मिश्रण का उपयोग करें।

खाद

पौधों की आयु (वर्ष) गोबर खाद(किग्रा) यूरिया(ग्रा.) सिंगल सुपर फास्फेट(ग्रा.) म्यूरेट आफ़ पोटाश(ग्रा.)
1-3 वर्ष 10-20 100-300 200-600 150-450
4-6 वर्ष 25-35 400-600 800-1200 600-900
7-9 वर्ष 40-60 700-900 1400-1800 1050-1350
10 वर्ष से ऊपर 60 1000 2000 1500

गोबर खाद सिंगल सुपर फास्फेट और म्यूरेट आफ़ पोटाश की पूरी मात्रा दिसंबर के महीने में डालें। यूरिया की आधी मात्रा फूल निकलने से पहले फरवरी माह के शुरू में और बाकि की आधी मात्रा फल निकलने के बाद अप्रैल महीने में डालें।

पौधों की देखभाल
कीट बीमारी और रोकथाम
दीमकः यह छोटे पौधों को नुकसान पहुँचाता है यह प्रमुखतया नवम्बर से जून तक अधिक क्षति पहुँचाते हैं। ये जमीन में अंडे देते हैं तथा नये शिशु भूमि में उपलब्ध कार्बनिक पदार्थो को तथा पौधों की जड़ों को खाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए माइक्रो नीम खाद को अवश्य प्रयोग करना चाहिए अगर दीमक लग ही गया हो तो केरासिन तेल को पानी में मिलाकर निराई गुड़ाई कर प्रयोग करना चाहिए।

रस चूसने वाले कीड़ेः ये कीड़े पत्तियों और मुलायम टहनियों में पाये जाते हैं, जिनसे ये रस चूसते रहते हैं। इसकी रोकथाम के लिये प्रारम्भिक अवस्था में सभी क्षतिग्रस्त भागों को काटकर नष्ट कर देना चाहिए। अधिक प्रकोप की नीम का काढ़ा माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर तर बतर के छिड़काव करना चाहिए।

पत्ती खाने वाली सूंडीः इस कीट की सूंडी नाशपाती की पत्तियों को खाती हैं। इसका प्रकोप होने पर नीम का काढ़ा माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर छिड़काव करना चहिये।

भृंगः इसके वयस्क पत्तियों को छान देते हैं तथा अत्यधिक प्रकोप होने पर पौधे आंशिक रूप से पर्णरहित हो जाते हैं। इस प्रकार पौधों की बढ़वार रूक जाती है तथा फलत प्रभावित होती है। ये भृंग प्रायः मई-जून माह में आक्रमण करते हैं तथा 5-3 माह तक सक्रिय रहते हैं। इसके नियंत्रण के लिए नीम का काढ़ा माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर के छिड़काव करनी चाहिए।

मकोड़ा जूंः यह पत्तों को खाते है और इनका रस चूसते है, जिस से पत्तें पीले पड़ने शुरू हो जाते हैद्य इनका हमला दिखाई दें, तो घुलनशील सल्फर 1.5 ग्राम या प्रोपरगाइट 1 मि.ली. या फेनेजाक्वीन 1 मि.ली. या डिकोफॉल 1.5 मि.ली. को पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

टिड्डाः इसका हमला होने पर फूल चिपकवे हो जाते है और और प्रभावित भागों पर काले रंग की फंगस नम जाती है। इसकी रोकथाम के लिए कार्बरील 1 किलो या डाईमेथोएट 200 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिला कर स्प्रे करें।

चेपा और थ्रिप्सः यह पत्तों का रस चूसते है, जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैंद्य यह शहद जैसा पदार्थ छोड़ते हैं, जिस कारण प्रभावित भागों पर काले रंग की फंगस बन जाती है। इसकी रोकथाम के फरवरी के आखिरी हफ्ते जब पत्ते झड़ना शुरू हो तो इमीडाक्लोप्रिड 60 मि.ली. या थाईआमिथोकसम 80 ग्राम को प्रति 150 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें। दूसरी स्प्रे मार्च महीने में पूरी तरह से धुंध बनाकर करें और तीसरी स्प्रे फल के गुच्छे बनने पर करें।

नाशपाती का धफड़ी रोगः इस बीमारी के साथ पत्तों के निचली और काले धब्बे दिखाई देते है। बाद में यह धब्बे स्लेटी रंग में बदल जाते है, प्रभावित भाग टूट कर गिर जाते हैं। बाद में यह धब्बे फलों के ऊपर दिखाई देने लगते है। इसकी रोकथाम के लिए कप्तान 2 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे पौधे की निष्क्रिया समय से शुरू करके पत्ते झड़ने के समय तक 10 दिनों के फासले पर करें। प्रभावित फलों, पौधे के भागों को हटा दें और खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें।

जड़ का गलनाः इस बीमारी के साथ पौधे की छाल और लकड़ी भूरे रंग की हो जाती है और इस पर सफेद रंग का पाउडर दिखाई देता है। प्रभावित पौधे सूखना शुरू हो जाते है, इनके पत्ते जल्दी झड़ जाते है। इसकी रोकथाम के लिए कॉपर आक्सीक्लोराइड 400 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिला कर मार्च महीने में स्प्रे करें। जून महीने में दोबारा स्प्रे करें। कार्बेन्डाजिम 10 ग्राम $ कार्बोक्सिन(वीटावैक्स) 5 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिला कर, इस घोल को लगभग पूरे वृक्ष पर दो बार डालें। पहली बार मानसून आने से पहले (अप्रैल-मई) और दूसरी बार मानसून के बाद (सितंबर-अक्तूबर) में डालें। इसके बाद पोषे को हल्का पानी लगाएं।

गुलाबी बीमारीः यह फफूंद जनित व्याधि है जो पौधों के तने, शाखाओं और टहनियों पर पाई जाती है तथा कैंकर और अंगमारी रोग पैदा करती है। यह घनी शाखाओं के मध्य से प्रारम्भ होती है तथा ऊपर और नीचे दोनों तरफ फैलती है। फलस्वरूप हल्का भूरा धब्बा टहनियों पर उभर जाता है, जो बाद मे चलकर गुलाबी रंग में परिवर्तित हो जाता है। यह बीमारी बरसात में तेजी से फैलती है। शाखाओं की अधिकता, जलभराव, अत्यधिक नमी और सामान्यतया गर्म मौसम बीमारी फैलाने में मदद करते हैं। इसके नियंत्रण के लिए रोगग्रस्त टहनियों को काट कर अलग कर देते हैं तथा रोगग्रस्त भाग को खुरच कर चौबटिया पेस्ट नीम के तेल का का लेप कर देते हैं

सिंचाई
नाशपाती के पौधों कों गर्मियों के महीने में अधिक पानी की आवश्कता पड़ती है। अप्रैल से जून के महीने में पानी की कमी हेने पर पौधों के बढ़वार एवं फल के आकर गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। गर्मियों के महिनों में पौधों को 5-7 दिनों के अन्तराल में और सर्दिओं में 15 दिनों के अन्तराल पर पौधों को पानी देंना चाहिए। तथा जनवरी के महीने में सिंचाई नहीं करना नहीं चाहिए। फल देने वाले पौधों को गर्मियों में खुला पानी देना चाहिए, इससे फलों के गुणवत्ता एवं आकर में वृद्धि होता है।

कटाई और छटाई
नाशपाती में प्रांरभिक अवस्था में कृन्तन और सधाई की आवश्यकता पड़ती है, क्योकि इसमें अग्रस्थ ओज (एपिकल डामिनेन्स) का लक्षण प्रबल रूप में पया जाता है। अतः जमीन से 50-60 से.मी. की ऊँचाई तक किसी शाखा को नहीं बढ़ने देते हैं तथा 90-100 से.मी. ऊँचाई पर सिरे की कली को काट देते है। इस प्रकार से कक्ष से कलियाँ निकलना प्रारम्भ हो जाती है, जिनमें एक-दो स्वस्थ कलियों को हर वर्ष पौधों के चारों तरफ बांध देते है। इस प्रकार से 3-4 वर्ष में 6-7 शाखाओं युक्त एक सुदृढ़ ढ़ाँचा तैयार हो जाता है। नाशपाती की सधाई रूपान्तरित केन्द्रीय अग्र प्ररोह (माडोफाइड सेन्ट्रल लीडर) प्रणाली में की जाती है। इसमें एक वर्ष पुरानी शाखाओं पर फ्रूटिंग स्पर बनती हैं जो 5-10 वर्ष तक फल देती रहती हैं। पुराने फ्रूटिंग स्पर एवं रोगग्रस्त शाखाओं को काटकर अलग कर देते हैं।

तुड़ाई- कटाई
फल जून के प्रथम सप्ताह से सितम्बर के मध्य तोड़े जाते है। फलों को परिपक्व हो जाने के बाद तब तोड़ें जब वे गहरे हरे रंग से हल्के हरे रंग के परिवर्तित हो जायें फल तोड़ते समय स्परों को बचा कर रखना चाहिए। अच्छी आमदानी के लिए फलों के आकार के अनुसार श्रेणीकरण करें और उचित डिब्बों में पैकिंग कर दूर अथवा नजदीक के बाजारों में भेजें। फलों का भंडारण 400 फारेरहाइट पर 50-55 दिन तक कर सकते है। लम्बे समय तक (4-5 महीने) भड़ारण के लिए फलों को 350 फारेनहाइट तापमान पर रखें।

उपज
साधारणतया नाशपाती के एक वृक्ष से 1-1.5 क्विटंल फल प्राप्त हो जाते है अतः प्रति हैक्टर क्षेत्र से 400-600 किंवटल फल उत्पादित हो जाता है। इस प्रकार बागवान को नाशपाती की खेती करके 40,000 रु से 60,000 रु प्रति हैक्टर की शुद्ध आय प्राप्त हो सकती हैं।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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