उद्यानिकीकृषि एवम संबद्ध क्षेत्रराज्य

छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में खेख्सी की अपार संभावनाये एवं फसल प्रबंधन

डॉ. पी .के. भगत और ए. के. लकड़ा, रा. मो. देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसन्धान केंद्र अजिरमा अंबिकापुर (छ.ग.)

खेख्सा एक बहुवर्षीय कद्दूवर्गीय सब्जी है, जिसे भारत के कुछ क्षेत्रों में उगाया जाता है। खेख्सा के बीज को एक बार बोने के बाद इसके मादा पौधे से लगभग 8-10 वर्षों तक फल प्राप्त होते रहते हैं। यह सब्जी भारत में खरीफ के दिनों में ज्यादा नजर आती है। इसके तमाम फायदों को देखते हुए अब पूरी दुनिया में लोग खेख्सा की खेती करने लगे हैं। भारत के पहाड़ी इलाकों में इस सब्जी की खेती ज्यादा होती है। आयुर्वेद में भी खेख्सा के फायदों का उल्लेख मिलता है।

शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए सप्लीमेंट या आयुर्वेदिक दवाइयों  की जगह पे  इसे खाने से कुछ ही हफ्तों में शारीरिक ताकत कई गुना बढ़ सकती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं खेख्सा की जिसे कई जगहों पर लोग मीठे करेले के नाम से जानते हैं। इसके फलों का उपयोग अचार बनाने के लिए भी किया जाता है। यह कफ, खांसी, अरूचि, वात, पित्तनाशक और हृदय में होन वाले दर्द से आराम दिलाता है। इसकी जड़ों का उपयोग बवासीर में रक्त बहाव रोकने के लिए, पेशाब की शिकायत व बुखार होने पर बहुत लाभकारी होता है। खेख्सा के फलों का सेवन करने से मधुमेह रोगी के शर्करा नियंत्रण में भी बहुत उपयोगी है। खेख्सा में ल्यूटेन समेत कई अन्य कैंसररोधी तत्व मौजूद होते हैं। जो आंखों से जुड़े रोग, दिल से जुड़ी बीमारियों और कैंसर से बचाव करते हैं। खेख्सा में एंटी एलर्जिक और एनाल्जेसिक गुण होते हैं जिस वजह से यह सर्दी जुकाम और खांसी से आराम दिलाने में बहुत असरदार है।

बाजार में अच्छे दाम किसान भाईयों के लिए एक अतिरिक्त आय का साधन भी होता है। वर्तमान समय में जब खेख्सा का फल बाजार में आता है तो उसका मूल्य रूपये 90 से 100 रूपये तक प्रति किग्रा तक मिलता है। इससे किसान की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है। खेख्सा की सब्जी बहुत स्वादिष्ट होता है तथा मानव संतुलित आहार में एक महत्वपूर्ण भाग भी होता है। खेख्सा की सब्जी पौष्टिक गुणों से भरपूर होता है।

खेख्सा हेतु उपयुक्त जलवायु
खेख्सा गर्म एवं नम जलवायु की फसल है। खेख्सा की खेती उन स्थानों पर सफलतापूर्वक होती है, जहां औसत वर्षा 1100-1200 मिली. होती है और तापमान 27-32 डिग्री सेन्टीग्रेड होती है।

 भूमि एवं खेत की तैयारी
खेख्सा की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। परन्तु इसकी खेती रेतीली भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ हो तथा जल निकास की उचित व्यवस्था हो, अच्छी रहती है। इसके साथ ही मृदा का पी.एच. मान 5.5-7 के बीच होना चाहिए। खेख्सा अम्लीय भूमि के प्रति संवेदनशील होती है।

बुवाई का समय / विधि
खेख्सा के बीजों की बुवाई का समय जून-जुलाई है। बीजों के द्वारा प्रवर्धन से 1:1 के अनुपात में नर व मादा पौधे मिलते है। इसलिए खेख्सा की फसल के लिए बीजों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। खेख्सा की खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए प्रर्वधन वानस्पतिक भाग अर्थात् जड़ के कन्द द्वारा करना चाहिए। खेख्सा की फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए खेत में पौधों की संख्या पर्याप्त होना आवश्यक है। इस फसल की बुवाई अच्छी प्रकार तैयार खेत में क्यारी बनाकर अथवा गड्ढों में किया जात है। गड्ढे की आपस में दूरी 2&2 मीटर रखनी चाहिए। तथा प्रत्येक गड्ढे में 2-3 बीज की बुवाई करते हैं। और इस प्रकार 4&4 मीटर के प्लाट में कुल 9 गड्ढे बनते हैं। जिसमें बीच वाले गड्ढे में नर पौधा रखते हैं तथा बाकी 8 गड्ढों में मादा पौधों को रखते हैं। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एक गड्ढे में एक ही पौधा रखा जाता है।

उन्नतशील किस्में :-
अम्बिका-12-1, इंदिरा कंकोड़-1, अम्बिका-12-2, अम्बिका-12-3 बीज मात्रा सही बीज जिसमें कम से कम 70-80 प्रतिशत तक अंकुरण की क्षमता हो। ऐसे बीज की 8-10 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है।

पोषक प्रबंधन
खेख्सा की खेती से अधिक लाभ लेने के लिए संतुलित पोषण दें। सामान्यतया 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद खेत की अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। इसके अलावा 65 किग्रा. यूरिया, 375 किग्रा. एसएसपी तथा 67 किग्रा. एमओपी /हे. देना चाहिए।

सिंचाई निंदाईगुड़ाई
फसल की बुवाई के तुरन्त बाद खेत में हल्की सिंचाई करनी चाहिए। बरसात में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु दो वर्षा के समय में अधिक अन्तर होने पर सिंचाई करनी चाहिए। खेत में आवश्यकता से अधिक पानी को बाहर निकालने के लिए जल निकास की भी व्यवस्था हो क्योंकि अधिक पानी से बीज या कन्द सड़ सकता है। 2-3 बार निंदाई-गुड़ाई करना आवश्यक है।

पौधों को सहारा (स्टेकिंग) देना :
खेख्सा से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए पौधों को सहारा देना आवश्यक है। स्टेकिंग करने से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है तथा गुणवत्ता युक्त फल प्राप्त करने के लिए बांस या सूखी लकडिय़ों की टहनी आदि से सहारा देना आवश्यक होता है। ककोड़ा एक बहुवर्षीय फसल है इसलिए पौधों को सहारा देने के लिए लोहे के एंगल पर जालीनुमा तार 5-6 फीट ऊंची, 4 फीट गोलाकार संरचना का उपयोग कर सकते हैं जिससे अधिक फल प्राप्त कर सकते हैं।

फसल प्रबन्धन
कीट प्रबंधन :-

  • फल मक्खी :- इस कीट के पोतक हानिकारक अवस्था होती है , पोतक फसलों में प्रारंभिक अवस्था मे फलो के अन्दर प्रवेश करके इनके गुदा को खा कर हानि पहुंचाती है जिससे बाद मे फल सड़ने लगते है यह अवस्था जमीन मे इस्थित फलो मे इस कीट का आक्रमण अधिक पाया जाता है , इस कीट के रोकथाम हेतु  फ़र्मोथिओन २५ ई. सी. ०.६५० लीटर या एमिदाक्लोप्रिड २५ ई. सी. २-३ मिली या कार्बरिल ५०%  घु. चू. ३.० किलो ग्राम प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करे  l
  • लाल कीड़ा :- इस कीट के प्रोड़ तथा ग्रब दोनों ही हानि पहुचती है, प्रौड़ कीट उग रहे छोटे पौधे की कोमल पत्तियों एवं तनों को अपने मुखंगो के माध्यम से काट करके नुकसान पहुचती है  और फल बंनने की अवस्था मे ग्रब फलों को छिद्र करके अन्दर से खाकर खोखला कर उन्हें नुकसान पहुचता है, इस कीट के रोकथाम हेतु फ़र्मोथिओन २५ ई. सी. ०.६५० लीटर या डी.डी.वी.पी. ७६% ई. सी.०.२५०लीटर प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करे  l
  • पर्ण सुरंगक :- इनके लार्वा पत्तियों के बीच मे सुरंग बना कर पर्णहरिम को खाते हुए , टेड़ी- मेडी सुरंग बनाते हुए आगे की ओर बढती है , जिससे पत्तियों मे आना – जाना बंद हो जाता है , जिससे बाद मे पतियों पिली पड़ कर गिरने लगती है , इसके नियंत्रण हेतु कार्बरिल ५०%  घु. चू. ३.० किलो ग्राम प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करे  l

 रोग प्रबंधन :-

  • एन्थ्रकनोस :- इस रोग की प्रारंभिक अवस्था मे पत्तियों पर जल की कमी होने से छोट – छोटे पीले रंग के धब्बे दिखाई देते है जो की धीरे – धीरे सब तरफ फ़ैल जाते है , रुकाव न होने से ये धब्बे तने तथा फलों पर भी दिखाई देने लगते हैं , जिससे उपज मे बहुत हानि होती है , इसके नियंत्रण  क्लोरोथायोनिल ०.२ % या कार्बेन्डाजिम ०.१ % फफूंद नाशकों का प्रयोग करे  l
  • मृदुल आसिता :- इस रोग के प्रकोप से पत्तियों की निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाता है , और फसल को यदि नमी मिल जाय तो इसका प्रकोप बहुत ही बड जाता है ,जिससे फसल को बहुत हानि होती है , इसके नियंत्रण हेतु मेन्कोजेब ०.२५ % की दर से प्रयोग करे  l
  • पाउडरी मिल्ड्यू :- इस रोग के प्रकोप से पत्तियों एवं तनों की सतह पर सफ़ेद धब्बे दिखाई देते है, धीरे – धीरे कुछ ही दिनों मे यह फ़ैल कर प्रकाश संश्लेषण को बाधा पहुचता है, जिससे पौधे सुख जाते है , इसके नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम ०.१ % का पर्णीयछिड़काव करे l

डॉ. पी .के. भगत  और ए. के. लकड़ा,
रा. मो. देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसन्धान केंद्र अजिरमा अंबिकापुर (छ.ग.)

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