मक्का की वैज्ञानिक खेती
चेतना सिन्हा एवं डॉ सुनील कुमार शस्य विज्ञान विभाग, इं.गां.कृ.वि.वि, रायपुर (छत्तीसगढ़)


मक्का की खेती अनाज, भुट्टे एंव चारे के लिए की जाती है। भारत में मक्का के खेती लगभग 64 लाख हेक्टेयर भूमि पर की जाती है। भारत में मक्का की औसत उपज लगभग 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। जबकि सघन पद्धतियाँ अपनाकर संकऱ ध् संकुल किस्मों से 35. 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयरउपज प्राप्त की जा सकती है। मक्का की खेती के लिए बलुई दोमट तथा उत्तम जल निकस की भुमि उपयुक्त होती है। पहली मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2.3 जुताइयॉं देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत तैयार कर लें।
भूमि का चूनाव:
मक्का की अधिकतम पैदावार के लिये उच्चहन (डाँड) भूमि उत्तम है। सामान्यतः मक्का की खेती सभी प्रकार की मृदाओं, बलुई मिट्टी से भारी चिकनी मिट्टी तक सफलतापूर्वक की जा सकती है परन्तु बलुई दोमट मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त होती है।
भूमि की तैयारी:
खेत को एक बार मिट्टी पलटने वाली हल से जुताई करने के बाद दो-तीन बार कल्टीवेटर से आड़ी-खड़ी जुताई करके जमीन को भुरभुरी एवं महीन बना लें। पाटा चलाकर खेत को समतल बना लेना चाहिये, इससे अच्छा अंकुरण होता है।
उन्नत किस्में ( विशेष संकर/किस्मों के नाम)
1. शीघ्र एवं अतिशीघ्र अवधि वाली
प्रो-एग्रो-4212 (बायर), प्रकाश, पूसा शीघ्र मक्का-1, विवेकसंकर-9, (80-90दिन) विवेक मक्का संकर-27, विवक संकर मक्का-43, विवेक संकर मक्का-51 (एफ.एच.-3554), पी.एम.एच.-5, नर्मदा मोती, सी.ओ.बी.सी.-1, एफ.एच.-3515, 31 वाई 45
2. मध्यम अवधि (90-95दिन) हाइशेल (एम.सी.एच.-42), डी.एम.एच.-117, बायो-9637, मालवीय संकर मक्का-2, एस.-6217, के.एम.एच.-3426, एन.एम.एच.-803 ,के.एम.एच.-3712, जे.एच.-31292, प्रताप क्यू.पी.एम. संकर -1 (ई.एच.क्यू.-16), सी.ओ.एच.(एम.)(सी.एम.एच.-08-292), एल.जी. 32-81, कोएच. (एम) 9 (सी.एम.एच.-08-350), डी.एम.एच. 121 (बी.एच.41009), कोएच.(एम.)10 (सी.एम.एच.08-433), एच.एम.-4, प्रताप मक्का-5
3. देर से पकने वाली (95-110दिन) एन.एम.एच.-731, एन.के.-30 बायो 9681, 900 एम. गोल्ड, सीड टेक 2324, प्रो. 4640, (एन.ई.सी.एच.-132), डी.के.सी.-8101, डी.के.सी.-9117, सी.एम.एच. 08-282 एक्स. 8 बी. 562, बायो 9544 (बायो 151), पी.-3785
बीज और बुवाई
अच्छी उपज प्राप्त करने हेतू उन्नतशील शुद्ध एंव प्रमाणित बीज समय एंव क्षेत्र अनुकूलता के अनुसार चयन कर बोयें । बीज को 2ण्5 ग्राम थीरम/बाविस्टीन प्रति कि. ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें।इसके बाद एजोस्पाइरिलम तथा पी.एस.बी. कल्चर 5-10 ग्राम/किलोग्राम बीज के हिसाब से प्रयोग करें। संकुल तथा संकर प्रजातियॉं का 12-15 किण्ग्राण् बीज एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त है। बुवाई हल के पीछे कूडो में 3.5 सेण्मीण् गहराई पर करेें। स्थानीय किस्मों कि पंक्ति की दूरी 45 से.मी. व संकर किस्मों में यह दूरी 60 सेण्मीण् रखें। संकर एंव संकुल किस्मों में पौधें की दूरी निकाई के बाद 25 सेण्मीण् एंव स्थानीय किस्मों में 20 सेण्मीण् रखें ।
उर्वरक उप्रयोग
मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें। यदि मृदा परीक्षण न हुआ हो तों देर से पकने वाली संकर किस्मों के लिए 120:75:50 व शीघ्र पकने वाली किस्मों के लिए 80:50:30 तथा देशी किस्मों के लिए 60:30:30 किलोग्राम नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए । बुवाई के समय आधी नाइट्रोजन, पूरी फास्फोरस और पोटाश कूड़ों में बीज के 5 सेण्मीण् नीचे देवे। शेष नाइट्रोजन दो बार में टॉप ड्ेसिंग बुवाई के 25.30 दिन बाद तथा दूसरी नरमंजरी निकलने समय दें। नरमंजरी निकलने की अवस्था संकर तथा संकुल किस्मों में क्रमशरू 50.60 व 40.50 दिन बाद आती है। जिंक की कमी वालें क्षेत्रों में अन्तिम जुताई के साथ 25 किण्ग्राण् जिंक सल्फेट प्रति हे. की दर से भूमि में मिलायें।
खाद की मात्रा (कि.ग्रा.):
| नत्रजन | स्फुर | पोटाश | |
| शीघ्र | 80 | 50 | 30 |
| मध्यम | 100 | 60 | 40 |
| देर से | 120 | 75 | 50 |
जिंक सल्फेट 20-25 किलो प्रति हेक्टेयर
मक्के में खरपतवार प्रबन्धन:
खरपतवार फसल के प्रमुख शत्रु है जो अपज में अप्रत्याशित हानि पहुँचाते हैं। अतः निंदाई-गुड़ाई समय पर न की जाये तो उत्पादन अत्यधिक प्रभावित होता है। निंदाई-गुड़ाई से भूमि पोली बनी रहती है। भुमि में वायु के अच्छे संचार से जड़ो को खाद्य पदार्थ व जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हाता है। इसके पश्चात 20-30 दिन पर फसल अवस्था पर हैण्ड हो से कतार के बीच में निंदाई करना चाहिए या हाथ से उखाडकर नींदा नियंत्रण करना चाहिये। इसके पश्चात पौधों पर मिट्टी चढ़ाना चाहिये। जिससे पौधे गिरते नहीं हैं। रासायनिक नियंत्रण हेतु दवा की मात्रा एवं डालने की समय सारणी में दी गई है।
| क्र. | खरपतवारनाशक | प्रति एकड़ डालने की मात्रा | डालने का समय | नियंत्रित होने वाले खरपतवार | |
| सक्रिय तत्व (ग्राम) | व्यावसायिक उत्पाद (मि.लि./ग्रा.) | ||||
| 1 | ऐलाक्लोर | 800-1000 | 1600-2000 | बोनी के 0-3 दिन के अंदर | ये सँकरी एवं चौड़ी पत्ती के खरपतवारों को नियंत्रित करता है। |
| 2 | एट्राजिन | 300-400 | 600-800 | बोनी के 0-3 दिन के अंदर | ये चौड़ी पत्ती वाले व कुछ सँकरी पत्ती वाले खरपतवारों पर नियंत्रण करता है |
| 3 | पेण्डीमेथालिन 30 ई.सी. | 300-400 | 1000-1200 | बेनी के 0-3 दिन के अंदर | ये सँकरी पत्ती वाले जैसे-सावां, बंदरपुछिया आदि चौड़ी पत्ती और वाले जैसे- लुनक, छोटी दुधी आदि खरपतवारों पर नियंत्रण करता है |
| पेण्डीमेथालिन 37.8 सी.एस. | 264.6 | 700 | |||
| 4 | 2,4 डी. | बोनी के 25 दिन के बाद किन्तु 30 दिन के अंदर | ये चौड़ी पत्ती वाले जैसे- मोथा, जलकुंभी आदि खरपतवारों का नियंत्रण करता है। | ||
| 1.सोडियम साल्ट 80% | 400 | 500 | |||
| 2. इमाइन साल्ट 58% | 200 | 344 | |||
| 3. इथाइल इस्टर 38% | 360 | 1060 | |||
जल प्रबन्ध
पौधों की प्रारम्भिक अवस्था तथा से दाना बनने की अवस्था में पर्याप्त नमी आवश्यक है। वर्षा न होने पर सिंचाई अवश्य करें। अधिक वर्षा की स्थिति में जल के निकासी की व्यस्था भी होनी चाहिए ।
पौधे संरक्षण
दीमक . के प्रकोप वाले क्षेत्र में अखिरी जुताई पर क्लोरोपाइरीफॉस 20 ई. सी., 2.5 लीटर पानी में घोलकर 20 कि.ग्रा. बालू में मिलाकर प्रति हे. की दर से बुवाई के पहले मिट्टी में मिला दें।
तना छेदक कीट की – सूडि़यॉं तने में छेद करके अन्दर ही खाली रहती है। जिससे हवा चलने पर पौधे टूट जाते है। रोकथाम तथा बुवाई के 20.25 दिन के बाद लिण्डेन 6 प्रतिशत दाने 20 किण्ग्राण् अथवा कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत दाने 20 किण्ग्रा प्रति हेव की दर से प्रयोग करें।
पत्ती लपेटक कीट – की सूडि़यॉं पत्ती के दोनों किनारे को रेशम जैसे सूत से लपेटकर अन्दर से खाली है। नियंत्रण हेतू बुवाई के 2.5-7 सप्ताह के बाद कार्बेरिल 50 प्रतिशत, घुलनशील चूर्ण को 1.5 किण्ग्राण् ध् हे. या क्यूनालफॉस 25 इ.सी. 2 लीटर/हे.की दर से छिड़काव करें।
टिड्डों – के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों को खाकर हानि पहुॅचाते है। इनके नियंत्रण हेतू मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 20.25 किग्रा प्रति हे. की दर से बुरकाव करें।
भुड़ली (कमला कीट) की गिड़ारें पत्तियों एंव फसल को काफी हानि पहुॅचाती हैं। इसके शरीर पर रोयें होते है। इसकी रोकथाम हेतू मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 20 किण्ग्रा या क्लोरपायरीफास 20 ई. सी. 10 लीटर का बुरकाव या छिड़काव प्रति हे. करना चाहिए।
तुलासिता रोग – से पत्तियों पर पीली धारियॉं पड़ जाती है। पत्तियों के नीचे की सतह पर सफेद रूई के समान फफॅूदी दिखाई पड़ती है। इसकी रोकथाम हेतू जिंक या मैंगनीज कार्बोमेट 2 किण्ग्रा अथवा जीरम 27 प्रतिशत 3 लीटर हे. की दर से आवश्यक पानी की मात्रा में घेालकर छिड़काव करें।
पत्तियों पर झुलसा रोग – से पत्तियों पर बड़े लम्बे अथवा अण्डाकार भूरेरंग में धब्बे पड़ जाते है। और रोग बढ़ने पर पत्तियॉं झुलस जाती है। इनके उपचार हेतू जिनेब या जिक मैगनीज कार्बोमेट 2 किग्रा/हे. दर से आवश्यक पानी कि मात्रा में घोलकर छिड़काव करें।
तना सड़न रोग – से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में तने कि पोरियो में जलीय धब्बे दिखाई देते है। तने शीघ्र सड़ने लगते है। उनसे दुर्गन्ध आने लगती है। पत्तियॉं पीली पड़ कर सूख जाती है। रोग की रोकथाम हेतू 15 ग्राम स्ट्प्टोसाईक्लीन अथवा 60ग्राम एग्रीमाइसीन प्रति हे. दर से आवश्यक पानी की मात्रा में घोलकर छिड़काव करें।
कटाई मड़ाई . फसल पकने पर भुट्टों के डंठल तोंड़कर, सुखाने के पश्चात हाथ या मशीन से दाना अलग करना चाहिए।
उपज (क्विं./हे.) : 40-50 (सामान्य), 55-65 (संकर)
चेतना सिन्हा एवं डॉ सुनील कुमार
शस्य विज्ञान विभाग, इं.गां.कृ.वि.वि, रायपुर (छत्तीसगढ़)









