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अंजीर की खेती

संगीता, प्रभाकर सिंह एवं हेमन्त पाणिग्राही, फल विज्ञान विभाग, इंदिरा गाँधी कृषि विष्वाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

परिचय
अंजीर की खेती व्यापारिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण खेती है, क्योंकि इसके फलों की बाजार में अच्छी कीमत मिलने की वजह से किसान भाइयों को अच्छी कमाई हो जाती है। अंजीर का फल स्वादिष्ट, स्वास्थ्यवर्धक और बहुपयोगी होता है। इसके फलों को ताजा और सुखाकर दोनो प्रकार से खाया जाता है। इसके अलावा अंजीर के फलों का उपयोग औषधि बनाने में भी की किया जाता है। अंजीर के पूर्ण रूप से पके हुए फल में चाीनी की मात्रा काफी ज्यादा पाई जाती है। अंजीर के फलो में कैल्सियम, विटामिन ए., बी., सी. और फाइबर जैसे कई तरह के पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसके उपयोग से मधुमेह, स्तन कैंसर, सर्दी-जुकाम, दमा और अपचन जैसी बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसका फल पीला, सुनहरी और बैंगनी रंग का होता है।

मिट्टी
अंजीर का पौधा भूमध्यसागरीय जलवायु का पौधा है। इसके पौधे को विकास के लिए गर्मी की आवष्यकता होती है। अंजीर का पौधा झाडीनुमा पौधे की तरह दिखाई देता है। अंजीर की खेती के लिए उचित जल निकास वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है, लेकिन अधिक उत्पादन लेने के लिए इसकी खेती हल्की दोमट मिट्टी में करना सबसे उपयुक्त होता है। जल भराव वाली जगहों पर इसकी खेती नही करनी चाहिए। इसकी खेती के लिए मिट्टी का पी. एच. मान 6 से 7 के बीच होना चाहिए।

जलवायु
अंजीर की खेती के लिए शुष्क और कम आर्द्र मौसम सबसे उपयुक्त होता है। इसके पौधे को सामान्य बारिष की आवष्यकता होती है। सर्दी का मौसम इसके पौधों के लिए अनुकुल नही होता है। सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसकी खेती के लिए नुकसानदायक होता है। इसके पौधे गर्मी के मौसम में अच्छे से विकास करते हैं और इसके फल भी गर्मियों के मौसम में ही पककर तैयार होते है। अंजीर के पौधें को शरूआत में सामान्य तापमान की जरूरत होती है। पूर्ण रूप से विकसित होने के बाद इसके पौधे 25 से 35 डिग्री तापमान पर अच्छे से विकास करता है। सर्दियों में 20 डिग्री से नीचे तापमान होने पर इसका पौधा विकास करना बंद कर देता है।

उन्नत किस्में
अंजीर की कई तरह की उन्नत कस्में हैं जिन्हें अधिक उत्पादन लेने के लिए विभिन्न क्षेत्रो में उगाया जाता हैं। भारत में इसकी खेती कई राज्यों की जा रही है।
पंजाब अंजीर : अंजीर की इस किस्म के पौधे लगभग दो साल बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं। इसके पौधों की लंबाई सामान्य होती है। इसके 4 से 5 साल पूराने पौधे से लगभग 15 किलो के आसपास फल प्राप्त होते है, जिनकी मात्रा पौधों के विकसित होने के साथ-साथ बढ़ते जाते है। इसके फल बडे़ आकर वाले और स्वादिष्ट होते हैं। इसके फल पीले रंग के होते हैं। जिन पर गुलाबी-जामुनी रंग की आभा बनी होती है।
पूना अंजीर : इस किस्म के पौधे सामान्य ऊँचाई के होते है। इसके पौधे 39 डिग्री के आसपास तापमाप पर अच्छे से विकास करते हैं। इसके फल सामान्य आकार और पीले रंग के होते है। इसके पूर्ण विकसित एक पौधे से 25 से 30 किलो तक फल प्राप्त किये जा सकते है।
मार्सलीज अंजीर : अंजीर की ये एक उन्नत किस्म है, जिसके पौधे अधिक तापमान को भी सहन कर लेते है। इसके फलों के पकने के दौरान तापमान अधिक होना अच्छा होता है। इस किस्म के फलों को अधिक समय तक भंडारित किया जा सकता है। इसके एक पौधे से 20 किलो के आसपास फल प्राप्त होते है।
पुनेरी अंजीर : अंजीर की इस किस्म के पौधे न्यूनतम 4 से अधिकतम 44 डिग्री तापमान वाली जगहों पर आसानी से उगाये जा सकते हैं। इस किस्म के पौधे सामान्य आकार के होते हैं। इसके पूर्ण विकसित पौधे से 20 से 25 किलो तक फल प्राप्त किये जा सकते है। इसके पौधे अधिक आद्रता को सहन नही कर सकत है। अधिक आर्दता्र का प्रभाव इसके पौधो के साथ साथ फलों पर भी देखने को मिलता है।
देनकर अंजीर : इस किस्म के पौधें बीज रोपाई के लगभग तीन से चार साल बाद फल देना शुरू कर देते है। इसके एक पौधें से लगभग 20 किलो के आस-पास फल प्राप्त होते है। इसके फल समान्य आकार के होते है। इसका रंग सूखने के बाद हल्का पीला दिखाई देता है।
इसके अलावा और भी कई किस्में है जिन्हें सम्पूर्ण भारत में अधिक पैदावार के लिए उगाया जाता है, जिनमें इंडियन रॅाक, ब्राउन टर्की, कृष्णा, एलीफेन्ट ईयर, ओसबॉर्न, वीपिंग फिग और सफेद फिग जैसे कई किस्में शामिल है।

खेत की तैयारी
अंजीर के पौधे एक बार लगाने के बाद लगभग 50 से 60 साल तक पैदावार देते है। इसकी खेती करने के लिए शुरूवात में खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवषेषों को नष्ट कर दें। उसके बाद खेत की दो से तीन तिरछी जुताई करने के बाद रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभरा बना लें। उसके बाद खेत में पाटा लगाकर मिट्टी को समतल बना लंे, ताकि खेत में जल भराव जैसी समस्या से छुटकारा मिल सकें। खेत को समतल बनाने के बाद उसमें 5 मीटर की दूरी बनाते हुए पंक्तियों में गड्ढों को तैयार करने के दौरान प्रत्येक पंक्तियों के बीच चार से पांच मीटर की दूरी होनी चाहिए। गड्ढों को तैयार करते वक्त उनका आकार दो फिट चौड़ा और एक से डेढ फिट गहरा होना चाहिए। गड्ढो के तैयार होने के बाद उनमें उचित मात्रा में जैविक और रासायनिक उर्वरक को मिट्टी में मिलकर भर दें। फिर अंजीर के पौधे का रोपण करें और अच्छे से सिंचाई कर दंे।

पौध तैयार करना
अंजीर की खेती के लिए पहले इसकी पौध तैयार की जाती है। इसकी पौध, कलम और बीज दोनों के माध्यम से तैयार कर सकते हैं। लेकिन नर्सरी में इनकी पौध तैयार करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि इसके पौधों की उचित देखभाल नहीं करने पर वो नष्ट हो जाते हैं। इसलिए इसकी पौध सरकार द्वारा रजिस्टई किसी भी नर्सरी से खरीदकर लगा सकते हैं। नर्सरियां में कई किस्मों के पौधे आसानी से मिल जाते हैं। नर्सरी से पौध खरीदते वक्त सिर्फ अच्छे से विकास कर रहे लगभग एक साल पुराने पौधे को ही खरीदें।ै
पौध रोपाई
अंजीर के पौधे की रोपाई खेत में तैयार किये गए गड्ढों में की जाती है। अंजीर के पौधों की रोपाई करने से पहले गड्ढों में उगने वाली खरपतवार को निकाल दें और उनमें उचित मात्रा में जैविक और रासायनिक उर्वरक को मिट्टी में मिलकर गड्ढों में भर दें। गड्ढे के बीचोबीच एक और छोटा गड्ढा तैयार कर उसमें पौधे की रोपाई की जाती है। पौधो को छोटे गड्ढें में लगाने से पहले उन्हंे गोमूत्र से उपचारित कर लें और पौधे को गड्ढों में लगाने के बाद उसे चारों तरफ से एक से डेढ सेटीमीटर तक मिट्टी डालकर दबा दें।
अंजीर के पौधें को साल में दो बार लगाया जा सकता है। जहाँ सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वहाँ इसके पौधो को फरवरी या मार्च माह में उगाा सकते हैं। लेकिन जहाँ सिंचाई की व्यवस्था न हो वहाँ इसे बारिष के मौसम में जुलाई या अगस्त माह के शुरूवात में उगा सकते है।

सिंचाई
अंजीर के पौधो को सिंचाई की सामान्य जरूरत होती है। सर्दियों के मौसम में इसके पौधों की 15 से 20 दिन के अंतराल में सिंचाई कर देनी चाहिए। गर्मियों में इसके पौधों को पानी की ज्यादा जरूरत होती हैं। गर्मियों के मौसम में इसके पौधों की सप्ताह में दो बार सिंचाई कर देनी चाहिए। जबकि बारिष के मौसम में इसके पौधों को सिंचाई की आवष्यकता नही होती है। लेकिन बारिष समय पर न हो और पौधें को पानी की जरूरत हो तो पौंधों को पानी देना चाहिए। इसके पूर्ण विकसित पौधे को साल भर में 10 से 12 सिंचाई की ही आवष्यकता होती है।

उर्वरक
अंजीर के पौधों में उर्वरक की आवष्यकता सामान्य रूप से होती है। इसके लिए शरूआत में गड्ढों को तैयार करते समय 15 किलो के आसपास पुरानी गोबर की खाद को जैविक खाद के रूप में मिट्टी में मिला लें। उसके बाद रासायनिक खाद के रूप में नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाष प्रत्येक की 50-50 ग्राम मात्रा को मिट्टी में मिलाकर गड्ढों में भर दें। इसके पौधों में नाइट्रोजन युक्त उर्वरक का इस्तेमाल करते समय कम नाइट्रोजन की मात्रा का इस्तेमाल करें, क्योंकि अधिक नाइट्रोजन इसके लिए उपयोगी नही होती। पौधों को दी जाने वाली उर्वरक की मात्रा को पौधों के बढ़ते उम्र के साथ बढ़ा देनी चाहए।

खरपतवार नियंत्रण
अंजीर की खेती में खरपतवार नियंत्रण नीराई-गुड़ाई के माध्यम से ही किया जाता है। लेकिन शुरूआत में इसके पौधों की गहरी गुड़ाई इससे जड़ो को नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए शुरूआत में खरपतवार को हाथों से निकाल कर खरपतवार नियंत्रण करें। अंजीर के पौधों की साल में पांच से सात गुड़ाई काफी होती है।

पौधों की देखभाल
अंजीर के पौधों की देखभाल करना काफी जरूरी होता है। इसके पौधों की अच्छी देखभाल कर जल्द ही अधिक उत्पादन हासिल किया जा सकता हैं। इसके पौधों को खेत में लगाने के एक साल बाद उनकी छँटाई कर दें। पौधों की पहली छँटाई के दौरान इसके पौधे को एक मीटर की ऊंचाई पर काट दें, ताकि पौधे में बगल से और नई शाखाओं का जन्म हो और पौधा झाडीनुमा बने जाए। जैसे ही अंजीर के पौधों फल लगना शुरू हो जाये उसके बाद हर साल गर्मियों के मौसम में इसके पौधों की छँटाई करनी चाहिए।

अंर्तवर्ती फसलें
अंजीर के पौधें खेत में लगने के लगभग तीन साल बाद पैदावार देना शुरू करते हैं। इस दौरान खेत में अंजीर के पौधों के बीच खाली पड़ी जमीन में सब्जी, कम समय में तैयार होने वाली बागबानी फसलें जैसे – पपीता, मसालें वाली फसलें और औषधीय फसलों को उगाकर अच्छी कमाई कर सकते है।

कीट व रोग नियंत्रण
अंजीर के पौधों में किसी तरह का कोई खास रोग देखने को नही मिला है, लेकिन कुछ कीटों की सुंडी होती है, जो इसके पŸिायों को खाकर पौधे के विकास को प्रभावित करती हैं। इनके नियंत्रण के लिए पौधों पर नीम के तेल या नीम काढे़ का छिड़काव करना चाहिए। इससे पौधों पर फल बनने के दौरान कीटों का आक्रमण भी नही होता है।

फलों की तुड़ाई
अंजीर के फलों की तुड़ाई फलों के पूर्ण रूप से पकने के बाद ही करनी चाहिए, क्योंकि इसके कच्चे फल तोड़ने के बाद फल अच्छे से पकते नही है, जिससे फलों की गुणवŸाा में कमी हो जाती है। इसकी विभिन्न किस्मों के फलों का बाहरी रंग अलग-अलग पाया जाता है, जिस कारण हर किस्म के फलों का रंग देखकर इसके फलों के पकने के बारें में पता लगाया जा सकता है। सामान्य रूप में इसके पके हुए फल मुलायम होते है और डंठल के पास से अंदर की तरफ से मूड जाते हैं। इसके फलों की तुड़ाई मई माह से अगस्त माह तक की जाती है। इसके फलों की तुड़ाई के दौरान फलों को पानी से भरे बर्तन में डालकर रखना चाहिए। इसके फलों की तुड़ाई के दौरान पेड़ों से निकलने वाले रस के हाथों पर लगने की वजह से शरीर में चर्म रोग हो सकता है। अतः फलों की तुड़ाई सावधानीपूर्वक हाथों पर ग्लब्स पहन कर करना चाहिए।

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