धान की अधिक उपज और उत्तम गुणवत्ता के लिए पोटाश
नेहा गावडे़, मृदा विज्ञान एवं रासायनिक शास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविधालय रायपुर


भारत में धान की खेती लगभग साढे चार करोड़ हैक्टर भूमि पर होती है। विश्व के कुल धान क्षेत्रफल में भारत का योगदान 35% और उत्पादन मे 22% है। हाँलाकि देश मे धान की औसत उत्पादकता लगभग 35 क्विंटल प्रति हैक्टर है , जो अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम हे जैसे कि चीन (66 क्विंटल / हैक्टर ) इन्डोनिशया (50 क्विंटल हैक्टर) और वियतनाम (55 क्विंटल / हैक्टर) पंजाब प्रांत की औसत धान की उत्पादकता 56 क्विंटल और पश्चिम बंगाल मे 40 क्विंटल ही है। सिंचाई, उन्नत उपज प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान है। संतुलित है। संतुलित और समुचित उर्वरक उपयोग कर धान की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।
अधिक उपज का आधार
सर्वप्रथम भूमि की उर्वरकता और उत्पादकता अधिक उत्पादन का मुख्य आधार है। धान की अधिक उपज पाने के लिए किसान कड़ी मेहनत करता है और खेती के आधुनिक तरीके अपनाता है, लेकिन फसल की आवश्यकतानुसार र्प्याप्त उर्वरक उपयोग करने केा नजर अंदाज कर देता है। देश की विभिन्न स्थानों पर किये गये अनुसंधान प्रयोग से यह निश्कर्ष निकला है कि नाइट्रोजन और फॉस्फोरस के साथ पोटाश देना भी फसल के लिए आवश्यक हे। संतुलित उर्वरक उपयोग सिंचित और असिंचित दोनो ही परिस्थितियों में समान रूप से महत्वपूर्ण है।
हर फसल भूमि से ही सब पोषक तत्वों को प्राप्त करती है। धान की अधिक उत्पादन देने वाली किस्में भूमि से अधिक मात्रा मे आवश्यक पोषक तत्व लेती हैं। औसतन तौर पर प्रत्येक क्विंटल धान की उपज के लिए 2.5 किग्रा. नाइट्रोजन, 0.9 कि.ग्रा. , फास्फोरस और 3.3 कि.ग्रा. पोटाश तत्व भूमि से लिया जाता है। धान के पौधें की सही बढ़वार और विकास के लिए कई मुख्य, गौण और सूक्ष्म तत्वों की भी आवश्यकता होती है।
धान की फसल मे पोटाश का महत्व
- पोटाश देने से धान मे अधिक कल्ले बनते हैं जिसकी वजह से अधिक संख्या मे बालियॉ आती हैं। बालियों और दानों के बनने और विकास के समय समुचित पोटाश पोषण, प्रकाश संश्लेषण से बने भोजन को बालियों और दोनों मे स्थानांतरित करने में मदद करता हे जिसे परिणामस्वरूप अधिक संख्या मे दाने पूरे भरे हुए और वजनी होते हैं। अंतिम परिणाम होता है- अधिक उपज ।
- नाइट्रोजन और फॉस्फोरस का सही लाभ लेने मे पोटाश मदद करता है और अधिक नाइट्रोजन से हानेे वाले नुकसान को बचाता है। पोटाश से प्राटेीन और कार्बोहाड्रेट की मात्रा भी बढ़ती है जिसके कारण धान के दाने वजनी, चमकदार और मोटे रहते हैं। अतः पोटाश का मतलब है अधिक गुणवत्ता वाले दाने ।
- पौधेो मे प्रकाश संश्लेषण आवश्यक हे, खासकर ठण्डे और बादलो से घिरे समय में सूर्य के प्रकाश के उपयागे के लिए पोटाश के प्रयोग से प्रकाश संश्लेशण की क्रिया को बरकरार रखने मे सहायता मिलती है।
- पोटाश पौधेो मे बीमारियोेें, कीडांे और सूखे जलपलायन, लवणीय आदि को सहने की क्षमता बढाता है।
- धान के पौधे में पोटाश कोशिकाओं के विस्तार को बढावा देता है , पोटाश देने से बड़ी कोशिकाओं का निमार्ण का अर्थ है कोशिकाओं की दीवार के लिए अधिक पदार्थ बनाना। मोटी कोशिका दीवार फसल के ऊतकों को अधिक स्थिरता देगी ओैर फसल को कीड़े बीमारियों और आड़े गिरने के प्रति अधिक प्रतिरोधक देने में सहायता करेगी।
- पोटाश पौधों की जडों की बढ़वार और विकास और लम्बी सूक्ष्म जडों को बढावा देता है जिसके कारण पौधेा भूमि पानी और पोषक तत्व ले सकते हैं। इसका यह भी अर्थ है कि भूमि मे पौधे भूमि से ज्यादा पानी और पोषक तत्व ले सकते हैं। इसका अर्थ है कि भूमि मे पौधे की पकड़ मजबूत होती है।
- पोटाश पौधें द्वारा पानी के प्रभाव उपयोग को बढावा देता है जिसके कारण फसल में सूखा गर्मी या सर्दी सहने की क्षमता बेहतर होती है। बारानी या असिंचित धान में पोटाश बहुत ही उपयोगी है।
धान मे पोटाश की कमी के लक्षण
धान में पोटाश की कमी के सामान्य लक्षण निम्नानुसार हैः-
- पोटाश की कमी से पुरानी पत्तिया सबसे पहले प्रभावित होती है। पत्ती के सिरे और किनारे से हल्के पीले या नारंगी रंग के धब्बे या धारिया दिखाई देना आरंम्भ होती है।
- पीली पत्तियों का बाद में ऊतक क्षय हो जाता है और पत्तियाँ झुलसी हुई दिखाई देती हैं। ऊतक भूरें रंग के हो जाते हैं और पत्तियाँ सूख जाती हैं।
- कमी के लक्षण ऊपरी नई पत्तियों पर बढ़ते हैं यदि छोटी और गहरे रंग की रहती है।
- तने पतले और कमजोर रहते है और गिर सकते हैं।
- जडें सही विकसित नहीं होती है और प्रायः सड़ जाती हैं।
- यदि पिछले दो वर्षो मे खेत में जिक नही डाला गया हैं तो रोपाई से पहले खेत में दस किलोग्राम जिंक सल्फेट (21: जिंक ) प्रति एकड़ डालें।
- नाइट्रोजन , फास्फोरस और पोटाश के असंतुलित उपयोग से भूमि की उर्वरकता का हास हो सकता है और धीरे- धीरे भूमि के स्वास्थय और फसल की उपज मे गिरावट आ सकती है और किसान की आमदनी कम हो सकती है। इसलिए नुकसान से बचने के लिए पोटाश का इस्तेमाल करें।
उर्वरक उपयोग विधि
सही समय और सही विधि से सही मात्रा मे उर्वरक दिया जाना चाहिए । फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा धान की रोपाई के समय देनी चाहिए । यदि धान की खड़ी फसल मे पोटाश की कमी के लक्षण दिखाई दे तो बीस किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति एकड़ खेत मे डालें । नाइट्रोजन की दो तिहाई मात्रा को बराबर हिस्सों मे बढ़वार की अवस्था और बालियां निकलने की अवस्था पर दें।
धान में अपर्याप्त मात्रा मे पोटाश देने का अर्थ हैः
- कम विकसित पौधें।
- जडों का कम विकास ।
- कीडे़ – बीमारियों , सूखे का अधिक प्रकोप
- फसल का पकने से पहले आडा़ गिरना और सड़ना जिससे किसान को भारी नुकसान होता है।
- छोटे, बेडोल और बदरंग दाने ।
- कम उपज।
- कम लाभ।
धान की अधिक उपज लेने के प्रभावी बिन्दु
- क्षेत्र की जलवायु और भूमि को ध्यान रखते हुए सही किस्म का चुनाव करें।
- उत्तम गुणवत्ता का प्रमाणित और उपचारित बीज काम में लें।
- खरपतवार नियंत्रण करें।
- समय पर पर्याप्त सिंचाई दें ।
- पकाव के सही समय पर फसल काटें।










