छत्तीसगढ में बकरी पालन -ग्रामीण आजिविका का साधन एवं अधिकतम उत्पादन के लिये आहार प्रबंधन
डॉ. रामचंद्र रामटेके, डा.मनोज गेंदले, डा. सोनाली पुष्टि, डॉ. के.आर.बघेल, डॉ. केशर परवीन एवं डा.ओसामा कलीम


छत्तीसगढ़ का भौगोलिक क्षेत्रफल 135000 वर्ग कि.मी. है। 2011 के अनुसार जनसंख्या 2 करोड 55 लाख है। जिसमें 33 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति, 12 प्रतिशत अनुसूचित जाति एवं 51 प्रतिशत अन्य पिछडा वर्ग के लोग निवासरत है। छत्तीसगढ़ राज्य को पशु अनुवांशिक संसाधनों की विविधता के लिए जाना जाता है। 2019 के 20 वी पशु संगणना के अनुसार भारत में बकरी की आबादी लगभग 1350 लाख है, इनमें से लगभग 40 लाख बकरी छत्तीसगढ़ में पाई जाती है। छत्तीसगढ में बकरी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है, विशेष रूप से देश के शुष्क, अर्ध-शुष्क और पर्वतीय क्षेत्रों में बकरी सीमांत, छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को खाद्य और पोषण सुरक्षा प्रदान करते हैं। जनजातीय क्षेत्रों में प्रायः बकरी पालन, मुर्गी पालन एक सूकर पालन आजीविका के मुख्य क्षेत्र है। छ.ग में मुख्य रूप से अंजोरी, जमुनापारी/सिरोही/ओस्मानाबादी/ब्लेकबेंगाल नस्ल की बकरी पाली जाती है। छत्तीसगढ़ एक उन्नतिशील राज्य प्रदेश में पकरिया (पेन्ड्रा), सरोरा (रायपुर) कबीरधाम एवं पशु चिकित्सा महाविदयालय, अंजोरा दुर्ग में बकरी प्रजनन प्रक्षेत्र है। छत्तीसगढ में प्रति व्यक्ति मांस की उपलब्धता 2.250 किलोग्राम/व्यक्ति/वर्ष है जबकि राष्ट्रीय औसत 5.40 किलोग्राम/व्यक्ति/वर्ष है, इस डाटा के अनुसार एवं मांग एवं आपूर्ति के अनुसार हमारे प्रदेश में बकरीपालन की अपार संभावनायें है जिससे यहां के लोगो को दूध व मांस के रूप में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन मिल सकता हैं।

छत्तीसगढ की जलवायु एवं परिस्थितियों में बकरी पालन के लिये अनुकूलता की असाधारण क्षमता है। अतः समय की मांग के अनुसार छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में बकरीपालन की असीम संभावनाओं का भरपूर लाभ उठाना चाहिये। विश्व में पालतु बकरी की 300 से अधिक नस्लें हैं एवं वर्तमान में भारत में कुल 34 पंजीकृत नस्लें है इसके अलावा यहॉ पर स्थानीय अपंजीकृत संकर एवं विदेशी नस्लें भी पायी जाती है।

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रो में बकरी पालन का चलन प्राचीन काल से ही लोकप्रिय है। ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष वर्ग ’गड़रिया‘ इनके बड़े समूहो को परंपरागत रूप से पालते है। दूसरे गरीब एवं सर्वहारा तबके भी इनका पालन करते आये है। छत्तीसगढ में इसे छेरी कह कर संबोधित किया जाता है। प्रदेश मे 2019 के 20वी पशु संगणना के अनुसार 40 लाख बकरा बकरी, में से लगभग 10 लाख अंजोरी नस्ल की है छत्तीसगढ के पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्याालय के वैज्ञानिकों ने लगातार कई वर्षो तक इस स्थानीय बकरी का विधिवत अध्ययन किया एवं जिसे वर्ष 2022-23 को पंजीकृत (INDIA_GOAT_ANJORI_06038) किया गया है एवं अजोंरा स्थान के नाम से अंजोरी नाम दिया गया।

गरीबो की आय का प्रमुख स्त्रोत होने के कारण बकरी को ‘गरीब की गाय‘ कहा जाता है। बकरियां भारत में मुख्य मांस उत्पादक जानवरों में से हैं, जिनका मांस सबसे अच्छे मांस में से एक है और इसकी घरेलू मांग बहुत अधिक है। मांस के अलावा, बकरियां दूध, चमड़ा, फाइबर और खाद जैसे अन्य उत्पाद प्रदान करती हैं। बकरियां छोटी आकार की होने के कारण आसानी से महिलाओ एवं बच्चो के द्वारा पाली जा सकती है। दूध पौष्टिक एवं आसानी से पचने वाला होता है।बकरी का मांस प्रोटीन से भरपूर होता है। सूखे की स्थिति मेें भी जीवन यापन कर सकते है। बकरी के बच्चों को बडा करके आसानी से कभी भी बंेचा जा सकता है जिंदा बकरा एवं बकरी रू. 350 से 400रूपये एवं बकरे एवं बकरी का मांस रू. 600 से लेकर 700 रू. प्रति किलो की दर से बिकता हैं, मृत बकरी का चमड़ा भी बेचकर पैसा कमाया जा सकता है। बकरी व्यवसाय प्रारंभ करने के लिये अधिक धन की आवश्यकता भी नही होती है तथा रखरखाव पर खर्च भी बहुत कम होता है। जितने खर्च पर गाय पाली जाती है उतने खर्च पर 05 बकरियां पाली जा सकती है।
बकरियों के अधिकतम उत्पादन के लिये पोषण प्रबंधन का बहुत ही महत्वपूर्ण रोल होता है। बकरियों के पेट के चार भाग होते है जिनके नाम है रूमेन,रेटीकुलम ,ओमेसम एवं एवोमेसम। बकरी जुगाली करने वाली पशु है जो घास व कृषि अवशेष जो कि मनुष्य उपभोग नहीं करता उसे दूध व मांस के रूप में तब्दील करते है । बकरी सामने के पैर को खडे करके ब्राउसिंग करती है। बकरियों को हमेशा खाने की आदत होती है। सामान्यतः बकरियां एक दिन में साढ़े तीन से लेकर चार किलो तक हरा चारा खाती है। बकरियो को हरा चारा खिलाने से दाने की बचत की जा सकती है ।
बकरियों की चराई- बकरियां चराते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहियें-
- चारागाह में चरने के लिये क्या है इसका अंदाज लगाकर ही चराई करनी चाहिये।
- बकरियां ज्यादा से ज्यादा समय चारागाह में ही रहे ऐसी व्यवस्था करना चाहिये।
- बकरी, गाय एवं भैंस जैसे जानवर को एक साथ नही चराना चाहिये।
- कोमल चारे पर बकरियों को ज्यादा समय तक चरने नही देना चाहिये।
- एक ही चारागाह में ज्यादा समय तक चरने नही देना चाहिये ऐसा करने से उन्हे कृमि रोग हो सकता है।
- ठंड में घूप निकलने के बाद ही बकरियों को चरने भेजना चाहिये।
- बरसात में गीली जगह पर बकरियों का कभी नही चराना चाहिये।
- बीमार बकरियां चरने नही भेजना चाहिये।
- गर्भावस्था में बच्चा होने के दो हफ्ते पहले एवं बच्चा होने के दो हफ्ते बाद तक चरने नही भेजना चाहिये।
- नियंत्रित गर्भधारण के लिये बकरी एवं बकरे को एक साथ नही चरने देना चाहिये।
- साधारणतः सौ बकरियों के लिये एक आदमी पर्याप्त होता है।
बकरियों के चरने एवं खान-पान का व्यवहार अन्य पशुओं की तुलना में अतिविशिष्ट होता है। बकरियां अपने पिछले पैरो के बल पर खड़ी होकर पौधो के पसंदीदा एवं लाभदायक हिस्सो को बड़ी चतुराई एवं नाजुकता के साथ चरती है। मुख की विशिष्ट बनावट उसे कांटेदार पोधों से पत्तियां चरने में मदद करती है। ज्यादातर लोगो को यह गलतफहमी होती है। कि बकरियां कुछ भी खा लेती है। जबकि बकरियां खाने के मामले में बड़ी ‘‘नखरेवाली‘‘ होती है। जो चारा एक बकरी को पसंद है, वह दूसरी को नापसंद हो सकता है। पैरों द्वारा रौंदा गया या मिट्टी लगा चारा खाने के बजाए वे भूखी रहना पसंद करती है। अन्य पशुओं के विपरीत बकरियां कम नमी युक्त चारे पर आश्रित रहना पसंद करती है। बकरियों के खान-पान की वस्तुएं यदि बदलना हो तो धैर्य के साथ शनैः शनैः बदलाव करना चाहिये क्योकि प्रारंभ में ज्यादातर बकरियां नये पदार्थ के पास जाने से कतराती है लेकिन धीरे-धीरे उसे पसंद करने लगती है।
बकरियों की मनपसंद चारे-
1. वृक्षो की पत्तियां- जैसे पीपल, बड़, बबूल, सूबबूल, नीम, आम, अशोक, गूलर एवं शहतूत।
2. झाड़ियां- बेर, करौंदा, गोखरू, इत्यादि।
3. घास- दूब, सेवाई एवं अंजन इत्यादि।
4. चारा फसले- बरसीम, लूसर्न, बरबट्टी, सरसो, ग्वार, इत्यादि।
5. सूखे चारे- अरहर भूसा, चना भूसा, लाखड़ी भूसा, बरसीम, गवार, एवं जई भूसा इत्यादि।
6. फल्लियां इत्यादि- बबूल, बरगद, गूलर, एवं मटर।
7. सब्जियों के प्रतिउत्पाद -गाजर, मूली, शलजम, फूलगोभी, पत्तागोभी के पत्ते, सरसो, पालक इत्यादि।
बकरियों का पोषण प्रबंधन-
बकरी के पोषण संबंधी दैनिक आवश्यकताएं-
मध्यम आकार की लगभग 30 कि.ग्रा. वजन की बकरी स्टाल फीडिंग में की पोषण संबंघी दैनिक आवश्यकताएं निम्नानुसार होती है-
पाच्य प्रोटीन – 35 ग्राम
कुल पाचनशील पोषण आहार (टी.डी.एन) – 400 ग्राम
कैल्सियम – 02 ग्राम
फास्फोरस – 1.0 ग्राम
बकरियों की आंशिक रूप से चराई की पद्धित या प्रारंभिक गर्भावस्था में उपरोक्त आवश्यकता में 25 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़कर गणना करना चाहिये। यदि बकरियों को मामली पहाड़ी में चराया जाता हो तब उपरोक्त आवश्कता में 50 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़कर गणना की जा सकती हैं उंचे पहाड़ो एवं सूखे इलाको में चराई होने पर उपरोक्त मात्रा में 75 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़कर आवश्यक पोषण की गणना की जा सकती है।
गर्भावस्था के अंतिम काल में निम्नानुसार अतिरिक्त पोषक तत्वों की दैनिक आवश्यकताएं होती है-
पाच्य प्रोटीन – 55 ग्राम
सम्पूर्ण पाच्य तत्व (टी.डी.एन.) – 400 ग्राम
कैल्शियम – 02 ग्राम
फास्फोरस – 1.4 ग्राम
वृद्धिरत बकरी के बच्चों (औसत वृद्धि पर दर ग्राम प्रतिदिन) को निम्नानुसार अतिरिक्त पोषक तत्वों की दैनिक आवश्यकता होती है-
पाच्य प्रोटीन – 10 ग्राम
सम्पूर्ण पाच्य तत्व (टी.डी.एन.) – 100 ग्राम
कैल्शियम – 01 ग्राम
फास्फोरस – 0.7 ग्राम
दुग्ध उत्पादन (औसत 04 प्रतिशत वसा या फैट युक्त) करने वाली बकरियों केा निम्नानुसार अतिरिक्त पोषक तत्वों की देैनिक आवश्यकता होती है-
पाच्य प्रोटीन – 70 ग्राम
सम्पूर्ण पाच्य तत्व (टी.डी.एन.) – 350 ग्राम
कैल्शियम – 03 ग्राम
फास्फोरस – 2.1 ग्राम
बकरियों के लिये आदर्श सांद्र मिश्रण-
| क्र. | आहार | मात्रा (कि.ग्रा.) | क्र. | आहार | मात्रा (कि.ग्रा.) |
| 1 | मक्का (जोंधरा)/ज्वार | 50 | 1 | मक्का (जोंधरा)/ज्वार | 40 |
| 2 | मूंगफली/अलसी खली | 20 | 2 | सोयाबीन/सरसो खली | 15 |
| 3 | धान का भूसा | 22 | 3 | कनकी/गेंहू चोकर/धान का भूसा | 22 |
| 4 | मछली का चूरा | 05 | 4 | चुनी(चना/अरहर/मसुर/उडद/मुंग) | 20 |
| 5 | खनिज लवण | 02 | 5 | खनिज लवण | 02 |
| 6 | नमक | 01 | 6 | नमक | 01 |
| कुल | 100 | कुल | 100 |
उपरोक्त सांद्र मिश्रण को निम्नानुसार मात्रा में पूरक आहार के रूप में विभिन्न वर्गों में खिलाया जा सकता हैः
बकरी के बच्चे (2 से 4 माह तक) – 200-300 ग्राम प्रतिदिन
बड़ी बकरियां सूखी /गर्भवती – 450 ग्राम प्रतिदिन
दुधारू बकरियो को अतिरिक्त आहार – 350 ग्राम/कि.ग्रा दुग्ध उत्पादन की दर से
प्रजनन हेतु रखे गये बकरे – 450 ग्राम प्रतिदिन
बडी बकरियां को प्रतिदिन
हरा चारा -1 किलो, पैरा ग्रास -1 किलो तथा दाना – 300 ग्राम देना चाहिये
लेखक :
डॉ. रामचंद्र रामटेके, डा.मनोज गेंदले, डा. सोनाली पुष्टि, डॉ. के.आर.बघेल, डॉ. केशर परवीन एवं डा.ओसामा कलीम
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनू विश्वविदयालय, दुर्ग









