क्लासिकल स्वाइन फीवर (Classical Swine Fever): सूकर पालन उद्योग के लिए एक गंभीर संक्रामक रोग
डॉ. वर्षा रानी गिलहरे (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ), डॉ नेहा साहू (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ), डॉ गोविना देवांगन, डॉ ऋतु गुप्ता, डॉ काशिफ रज़ा, डॉ शैलेष विशाल और डॉ ढालेश्वरी


प्रस्तावना : क्लासिकल स्वाइन फीवर (Classical Swine Fever, CSF), जिसे हॉग कॉलेरा (Hog Cholera) के नाम से भी जाना जाता है, सूकरों का एक अत्यंत संक्रामक एवं आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वायरल रोग है। यह रोग घरेलू तथा जंगली दोनों प्रकार के सूकरों को प्रभावित करता है और तीव्र संक्रमण, उच्च मृत्युदर, उत्पादन में गिरावट तथा व्यापारिक प्रतिबंधों का कारण बनता है। रोग का कारक क्लासिकल स्वाइन फीवर वायरस (CSFV) है, जो फ्लैविविरिडी (Flaviviridae) परिवार के पेस्टी वायरस (Pestivirus) वंश से संबंधित RNA वायरस है। यह रोग मनुष्यों में नहीं फैलता, किंतु पशुधन उद्योग पर इसका प्रभाव अत्यंत गंभीर होता है। भारत में सूकर पालन विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ तथा मध्य भारत के कई क्षेत्रों में ग्रामीण आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। ऐसे में क्लासिकल स्वाइन फीवर किसानों की आय और पशुधन विकास के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भारत कृषि प्रधान देश है, जहाँ पशुपालन कृषि अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। सूकर पालन कम लागत में अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय माना जाता है। सूकर तेजी से बढ़ने वाले पशु हैं और कम समय में अधिक मांस उत्पादन प्रदान करते हैं। यही कारण है कि छोटे एवं सीमांत किसान भी इस व्यवसाय को अपनाते हैं। हालाँकि सूकर पालन उद्योग अनेक संक्रामक रोगों से प्रभावित होता है, जिनमें क्लासिकल स्वाइन फीवर सबसे विनाशकारी रोगों में से एक है। यह रोग अत्यधिक संक्रामक होने के कारण थोड़े समय में पूरे झुंड को प्रभावित कर सकता है। रोग फैलने पर पशुओं की मृत्युदर 90 प्रतिशत तक पहुँच सकती है। इसके कारण किसान भारी आर्थिक नुकसान झेलते हैं। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन द्वारा क्लासिकल स्वाइन फीवर को एक अधिसूचित रोग माना गया है। इसका अर्थ है कि रोग की उपस्थिति की सूचना संबंधित पशु स्वास्थ्य अधिकारियों को देना आवश्यक होता है ताकि समय पर नियंत्रण उपाय किए जा सकें।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
क्लासिकल स्वाइन फीवर का पहला वैज्ञानिक विवरण 19वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरिका में दर्ज किया गया था। प्रारंभिक वर्षों में इस रोग ने सूकर उद्योग को भारी नुकसान पहुँचाया। बाद में वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह स्पष्ट हुआ कि रोग का कारण एक विशिष्ट वायरस है। 20वीं शताब्दी में यूरोप, एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई देशों में इस रोग ने महामारी का रूप लिया। विभिन्न देशों ने व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम, जैव-सुरक्षा उपाय तथा पशु आवागमन नियंत्रण लागू कर रोग को नियंत्रित करने का प्रयास किया। कई विकसित देशों ने रोग उन्मूलन में सफलता प्राप्त की, जबकि अनेक विकासशील देशों में यह रोग आज भी स्थानिक (Endemic) रूप में मौजूद है। भारत में भी यह रोग कई दशकों से पाया जाता है और समय-समय पर विभिन्न राज्यों में इसके प्रकोप की सूचना मिलती रही है।
रोगकाकारक (Etiology)
क्लासिकल स्वाइन फीवर वायरस (CSFV) एक आवरण युक्त (Enveloped), एकल-श्रृंखला RNA वायरस है। यह फ्लैविविरिडी परिवार के पेस्टीवायरस समूह का सदस्य है। वायरस की मुख्य विशेषताएँ है: RNA आधारित वायरस, वातावरण में सीमित समय तक जीवित रहता है, ठंडे तापमान पर लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है, संक्रमित मांस और मांस उत्पादों में कई महीनों तक जीवित रह सकता है। सामान्य कीटाणुनाशकों द्वारा नष्ट किया जा सकता है। वायरस की विभिन्न आनुवंशिक उपजातियाँ (Genotypes) विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इन उपजातियों के कारण रोग की गंभीरता एवं प्रसार क्षमता में अंतर देखा जा सकता है।
महामारी विज्ञान (Epidemiology)
महामारी विज्ञान वह विज्ञान है जो रोग के प्रसार, कारणों तथा नियंत्रण उपायों का अध्ययन करता है।
क्लासिकल स्वाइन फीवर केवल सूकर प्रजाति को प्रभावित करता है। इनमें शामिल हैं: घरेलू सूकर व जंगली सूकर। अन्य पशु इस रोग के प्राकृतिक वाहक नहीं माने जाते। रोग संक्रमण के प्रमुख स्रोत हैं: संक्रमित सूकर, संक्रमित रक्त, संक्रमित मल-मूत्र, नाक और आँखों के स्राव, संक्रमित मांस, दूषित उपकरण व दूषित वाहन है। जब स्वस्थ सूकर संक्रमित पशु के संपर्क में आते हैं तब वायरस आसानी से फैलता है। दूषित उपकरण, जूते, कपड़े, वाहन, पानी तथा चारा भी संक्रमण फैला सकते हैं। संक्रमित गर्भवती सूकर से भ्रूण में वायरस पहुँच सकता है। ऐसे बच्चे जन्म से संक्रमित होते हैं और लंबे समय तक वायरस का प्रसार करते रहते हैं।
रोगजनन (Pathogenesis)
रोगजनन से आशय है कि वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद किस प्रकार रोग उत्पन्न करता है। वायरस सामान्यतः मुख या नाक के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। प्रवेश के बाद यह टॉन्सिल तथा स्थानीय लिम्फ ऊतकों में वृद्धि करना प्रारंभ करता है। इसके पश्चात वायरस रक्त प्रवाह में पहुँचकर पूरे शरीर में फैल जाता है। वायरस मुख्यतः लिम्फनोड्स, प्लीहा, अस्थिमज्जा, गुर्दे व रक्तवाहिकाएँ जैसे अंगों को प्रभावित करता है। वायरस प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करता है जिससे पशु अन्य संक्रमणों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है। रक्तवाहिकाओं को होने वाली क्षति के कारण पूरे शरीर में रक्त स्राव होने लगता है। यही रोग की प्रमुख पहचान है। रोग के विभिन्न रूप है: अति तीव्ररूप (Peracute Form), रोग का सबसे गंभीर रूप है। इसमें अचानक तेज बुखार, अत्यधिक कमजोरी, भोजन त्यागना, कुछ दिनों में मृत्यु एवम अनेक बार पशु में स्पष्ट लक्षण दिखाई देने से पहले ही मृत्यु हो जाती है। दूसरा है तीव्ररूप (Acute Form) जो कि सबसे सामान्य रूप है। लक्षण 40–41°C तक बुखार, भूख में कमी, सुस्ती, आँखों से स्राव, त्वचा पर लाल धब्बे, कब्ज के बाद दस्त, चलने में कठिनाई, साँस लेने में परेशानी, मृत्यु दर बहुत अधिक हो सकती है। तीसरा उप-तीव्ररूप (Subacute Form) है। इस रूप में लक्षण अपेक्षाकृत हल्के होते हैं। हल्का बुखार, वजन कम होना, धीमी वृद्धि, बार-बार दस्त होता है। चौथा जीर्णरूप (Chronic Form), यह लंबे समय तक चलने वाला संक्रमण है। इसमें लगातार कमजोरी, शरीर का क्षीण होना, विकास रुक जाना, रुक-रुककर बुखार, लगातार दस्त रहता हैं। ऐसे पशु लंबे समय तक वायरस का प्रसार करते रहते हैं। क्लासिकल स्वाइन फीवर के लक्षण आयु, प्रतिरक्षा स्थिति तथा वायरस की विषाणुता पर निर्भर करते हैं।
रोग के मुख्य लक्षण:
तेज बुखार, भूख न लगना, अत्यधिक सुस्ती, आँखों में सूजन, नाक से स्राव, कब्ज, दस्त, त्वचा पर लाल धब्बे, कानों का नीला पड़ना, कमजोरी, पक्षाघात जैसे लक्षण गर्भवती सूअरों में गर्भपात, मृत शिशुओं का जन्म, कमजोर बच्चों का जन्म नवजात बच्चों में कंपन, कमजोरी, वृद्धि में रुकावट।
शवपरीक्षण (Post-Mortem Findings)
मृत पशुओं के शव परीक्षण में निम्न परिवर्तन दिखाई देते हैं: प्लीहा में इन्फार्क्ट, गहरे रंग के धब्बे, गुर्दे, छोटे रक्त स्रावी धब्बे “टर्की एग किडनी” जैसा स्वरूप, लिम्फनोड्स, सूजन, रक्तस्राव, आँतें, बटन अल्सर, श्लेष्मा झिल्ली में क्षति, त्वचा, रक्त स्रावी चकत्ते, बैंगनी धब्बे, ये परिवर्तन रोग की पहचान में अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।
रोग का पहचान (Diagnosis)
क्लासिकल स्वाइन फीवर के लक्षण कई अन्य सूकर रोगों से मिलते-जुलते हैं, विशेषकर अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF), साल्मोनेलोसिस, एरिसिपेलस तथा पोर्साइन रिप्रोडक्टिव एंड रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (PRRS) से। इसलिए केवल नैदानिक लक्षणों के आधार पर रोग की पुष्टि नहीं की जा सकती। सटीक निदान के लिए प्रयोगशाला परीक्षण आवश्यक हैं। पशु चिकित्सक लक्षणों के आधार पर प्रारंभिक संदेह कर सकते हैं। लगातार तेज बुखार, त्वचा पर रक्त स्रावी धब्बे, दस्त एवं कमजोरी, उच्च मृत्यु दर, गर्भपात एवं प्रजनन समस्याएँ बीमारी के प्रारंभिक लक्षण होते है। प्रयोगशाला जांच हेतु रक्त, टॉन्सिल ऊतक, लिम्फनोड, प्लीहा, गुर्दा तथा अस्थि मज्जा नमूनों को उचित तापमान पर सुरक्षित रखकर प्रयोगशाला भेजा जाता है।
प्रयोगशाला परीक्षण
(क) RT-PCR: यह वर्तमान समय की सबसे संवेदनशील और विश्वसनीय तकनीक है। इससे वायरस की आनुवंशिक सामग्री (RNA) की पहचान की जाती है।
(ख) ELISA: यह परीक्षण वायरस के विरुद्ध बने प्रतिरक्षी (Antibodies) अथवा वायरस एंटीजन की पहचान करता है।
(ग) वायरस आइसोलेशन: विशेष कोशिका संवर्धन (Cell Culture) में वायरस को विकसित कर उसकी पहचान की जाती है।
(घ) इम्यूनोफ्लोरेसेंस परीक्षण: ऊतकों में वायरस की उपस्थिति का पता लगाने के लिए उपयोग किया जाता है।
विभेदक निदान (Differential Diagnosis)
क्लासिकल स्वाइन फीवर का अंतर निम्न रोगों से करना आवश्यक होता है:
अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF): दोनों रोगों के लक्षण काफी समान होते हैं, लेकिन ASF का कारण अलग वायरस है और इसका कोई व्यापक टीका उपलब्ध नहीं है।
साल्मोनेलोसिस: यह जीवाणु जनित रोग है जिसमें दस्त और बुखार प्रमुख लक्षण होते हैं।
एरिसिपेलस: इस रोग में त्वचा पर विशेष प्रकार के हीरे (Diamond) आकार के धब्बे दिखाई देते हैं।
PRRS: मुख्यतः प्रजनन तथा श्वसन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करता है।
भारत में क्लासिकल स्वाइन फीवर की स्थिति
भारत में क्लासिकल स्वाइन फीवर लंबे समय से एक स्थानिक रोग के रूप में मौजूद है। विशेष रूप से निम्न राज्यों में इसका प्रभाव अधिक देखा गया है: असम, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचलप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिमबंगाल, छत्तीसगढ़ पूर्वोत्तर भारत में सूअर पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए रोग का प्रभाव वहाँ विशेष रूप से गंभीर माना जाता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राष्ट्रीय सूकर अनुसंधान केंद्र तथा विभिन्न राज्य पशुपालन विभाग रोग नियंत्रण हेतु कार्यरत हैं।
आर्थिक प्रभाव (Economic Impact)
क्लासिकल स्वाइन फीवर केवल एक पशु रोग नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या है।
प्रत्यक्ष आर्थिक हानि
1.रोग के गंभीर प्रकोप में बड़ी संख्या में पशुओं की मृत्यु हो जाती है।
2.संक्रमित पशु सामान्य गति से विकसित नहीं हो पाते।
3.प्रजनन क्षमता में कमी, गर्भपात, मृत बच्चों का जन्म, कमजोर बच्चों का जन्म जैसी समस्या।
- हालाँकि रोग का विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है, फिर भी सहायक चिकित्सा तथा प्रबंधन पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है।
अप्रत्यक्ष आर्थिक हानि
पशु व्यापार पर प्रतिबंध, निर्यात में कमी, रोग नियंत्रण कार्यक्रमों की लागत, किसानों की आय में कमी, बाजार मूल्य में गिरावट, सूअर पालन उद्योग पर प्रभाव, रोग फैलने पर कई बार पूरे झुंड को नष्ट करना पड़ सकता है। इससे उत्पादन घटता है मांस की उपलब्धता कम होती है किसानों का विश्वास प्रभावित होता है निवेश कम हो जाता है। छोटे और सीमांत किसानों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है।
उपचार (Treatment)
क्लासिकल स्वाइन फीवर का कोई विशिष्ट एंटी वायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। सहायक उपचार से पशु की स्थिति सुधारने में सहायता कर सकते हैं। पर्याप्त पानी, इलेक्ट्रोलाइट्स, विटामिन सप्लीमेंट, द्वितीयक संक्रमण रोकने हेतु एंटीबायोटिक, स्वच्छ एवं आरामदायक वातावरण, यह उपचार केवल सहायक होते हैं, रोग को समाप्त नहीं करते।
टीकाकरण (Vaccination)
क्लासिकल स्वाइन फीवर के नियंत्रण का सबसे प्रभावी उपाय टीकाकरण है। टीकाकरण से रोग की रोकथाम, मृत्युदर में कमी, वायरस प्रसार में कमी एवं उत्पादन में सुधार होता है। बिमारी के रोकथाम हेतु सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला टीका जीवित दुर्बलित टीका (Live Attenuated Vaccine) है। यह प्रभावी प्रतिरक्षा उत्पन्न करता है। सेल कल्चर आधारित टीके एवं आधुनिक तकनीक से विकसित टीके का उपयोग कई देशों में किया जा रहा है। बच्चों को निर्धारित आयु में टीका तथा प्रजनन पशुओं का नियमित टीकाकरण स्थानीय पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार किया जाता है।
जैव–सुरक्षा (Biosecurity):
जैवसुरक्षा रोग नियंत्रण का आधार है। केवल प्रमाणित स्रोत से पशु खरीदें। नए पशुओं को कम से कम 21 दिन पृथक रखें। पशुओं को गुणवत्ता युक्त संतुलित आहार एवं स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करायें। अनावश्यक आगंतुकों को प्रवेश न दें। वाहनों का कीटाणु शोधन करें। फार्म की नियमित सफाई, मल-मूत्र का उचित निपटान, उपकरणों की सफाई, शेड का नियमित कीटाणुशोधन आदि कर रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है।
रोग नियंत्रण रणनीति
किसी क्षेत्र में रोग नियंत्रण हेतु निम्न कदम महत्वपूर्ण हैं:
- शीघ्र पहचान रोग की प्रारंभिक पहचान प्रसार रोकने में सहायक होती है।
- संक्रमित पशुओं को तुरंत अलग करें।
3.निगरानी (Surveillance), नियमित जांच एवं रिपोर्टिंग प्रणाली विकसित करें।
- व्यापक एवं नियमित टीकाकरण कार्यक्रम चलाएँ।
- सभी फार्मों में जैव-सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करें।
रोग उन्मूलन कार्यक्रम
विकसित देशों में रोग उन्मूलन के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई गईं हैं। सक्रिय निगरानी, संक्रमित क्षेत्रों का नियंत्रण, पशु आवागमन प्रतिबंध, व्यापक टीकाकरण, और किसानों का प्रशिक्षण जैसे उपायों से कई देशों ने रोग मुक्त दर्जा प्राप्त किया।
किसानों के लिए व्यावहारिक सुझाव
क्लासिकल स्वाइन फीवर नियंत्रण के लिए नियमित टीकाकरण करवाएँ। नए पशुओं को क्वारंटीन में रखें। बीमार पशु तुरंत अलग करें। मृत पशुओं का वैज्ञानिक निपटान करें। फार्म में साफ-सफाई रखें। केवल प्रमाणित स्रोत से पशु खरीदें। पशुचिकित्सक से नियमित संपर्क बनाए रखें। संदिग्ध रोग की सूचना तुरंत दें।
भारतीय अनुसंधान संस्थानों की भूमिका
भारत में कई संस्थान इस रोग पर अनुसंधान कर रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) आई सी ए आर देश में पशु स्वास्थ्य अनुसंधान का प्रमुख संगठन है। राष्ट्रीय सूकर अनुसंधान केंद्र सुकर उत्पादन, प्रबंधन तथा रोग नियंत्रण पर कार्य करता है। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) उन्नत निदान तकनीकों तथा टीका विकास पर अनुसंधान कर रहा है। विभिन्न राज्यों के पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय भी रोग निगरानी तथा अनुसंधान कार्यक्रम संचालित करते हैं।
भविष्य की चुनौतियाँ
क्लासिकल स्वाइन फीवर नियंत्रण में अभी भी कई चुनौतियाँ हैं। छोटे किसानों में जागरूकता की कमी, अपर्याप्त टीकाकरण कवरेज, जंगली सुकरों की भूमिका, पशुओं का अनियंत्रित आवागमन, सीमित प्रयोगशाला सुविधाएँ, भविष्य में उन्नत निदान तकनीक, बेहतर टीकों तथा मजबूत रोग निगरानी प्रणाली की आवश्यकता होगी।
भविष्य की अनुसंधान दिशाएँ
वर्तमान में वैज्ञानिक विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान कर रहे हैं: उन्नत टीके, मार्कर वैक्सीन, पुनः संयोजित (Recombinant) वैक्सीन, डीएनए आधारित वैक्सीन, तीव्र निदान तकनीक, पोर्टेबल PCR, फील्ड डायग्नोस्टिक किट, बायो सेंसर आधारित परीक्षण, रोग नियंत्रण में एकीकृत दृष्टिकोण, आनुवंशिक अध्ययन में वायरस के नए प्रकारों की पहचान और उनके विकास क्रम का अध्ययन। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) रोग निगरानी एवं प्रकोप पूर्वानुमान में भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
निष्कर्ष
क्लासिकल स्वाइन फीवर विश्वभर में सुकर पालन उद्योग के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। भारत जैसे देश में, जहाँ सुकर पालन लाखों परिवारों की आजीविका से जुड़ा है, इस रोग का प्रभाव और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। रोग का कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिए रोकथाम ही सबसे प्रभावी रणनीति है। नियमित टीकाकरण, मजबूत जैव-सुरक्षा, प्रभावी रोग निगरानी, वैज्ञानिक प्रबंधन तथा किसानों की जागरूकता के माध्यम से इस रोग को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों, पशुचिकित्सकों और किसानों के समन्वित प्रयासों से भारत भविष्य में क्लासिकल स्वाइन फीवर की समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है तथा सुकर पालन उद्योग को अधिक सुरक्षित, उत्पादक और लाभकारी बना सकता है।
लेखक:
डॉ. वर्षा रानी गिलहरे (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ),
डॉ नेहा साहू (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ),
डॉ गोविना देवांगन (सहायक प्राध्यापक), डॉ ऋतु गुप्ता (सहायक प्राध्यापक),
डॉ काशिफ रज़ा (टीचिंग सहायक),
डॉ शैलेष विशाल (टीचिंग सहायक) और डॉ ढालेश्वरी (पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ)









