पशुपालन

पशुधन प्रजनन नीति

डॉ. गोविना देवांगन, डॉ. देवेश कुमार गिरी, डॉ. दीपक कुमार कश्यप, डॉ. शैलेश विशाल, डॉ. काशिफ रज़ा डॉ. नितेश कुमार कुंभकार, डॉ. क्रांति शर्मा

उ‌द्देश्य

  1. स्थानीय नस्ल का अनुवांशिकी विकास, सलेक्टिव ब्रिडिंग, अपग्रेडिंग एवं क्रास ब्रिडिंग के माध्यम से कर राज्य में दुधारू एवं भारवाहक पशुओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  2. प्राकृतिक गर्भाधान एवं कृत्रिम गर्भाधान हेतु पर्याप्त उन्नत नस्ल के सॉड एवं बछड़े की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  3. प्रदेश में अंडा एवं मांस के पर्याप्त उत्पादन हेतु स्थानीय पशु पक्षियों (कुक्कुट, भेड़, बकरी, सूकर, खरगोश) का अनुवांशिकी विकास सुनिश्चित करना।
  4. पशु प्रजनन अधोसंरचना का विकास एवं सुदृढीकरण, जिससे आधुनिकतम प्रजनन तकनीकी का उपयोग करते हुए उच्चतम गुणवत्ता वाले जर्म प्लाज्म का व्यापक प्रसार करना।
  5. महत्वपूर्ण भारतीय नस्ल के पशुधन को संरक्षण तथा व्यापक रूप से इन नस्लों का पशु प्रजनक संघ एवं गौशालाओं में विस्तार करना।
  6. निकृष्ट नर पशुओं का बधियाकरण कर प्रजनन हेतु उच्च अनुवांशिकी के नर पशुओं का क्रमबद्ध तरीके से प्रतिस्थापन करना।

पशु प्रजनन नीति :

  • राज्य में विद्यमान पशुधन जैसे गोवंश, भैसवंश, भेड़, बकरी, सूकर तथा कुक्कुट का विकास पशु प्रजनन नीति के माध्यम से किया जाना है।
  • अपग्रेडिंग से राज्य के स्थानीय गोवंश का विकास साहीवाल, गीर, रेडसिन्धी, थारपारकर, कान्करेज, ऑगोल नस्ल से तथा भैस वंश का विकास मुर्रा एवं सुरती नस्ल से किया जाना है।
  • शहरी एवं अर्धशहरी क्षेत्रों में जहाँ पर दूध का अच्छा मूल्य पशुपालकों को मिल सके एवं सिंचाई का पर्याप्त साधन हो वहाँ पर क्रास ब्रिडिंग से देशी पशुओं का अनुवांशिकी विकास किया जाना है।
  • क्रास-ब्रिडिंग हेतु विदेशी नस्ल का अधिकतम अनुवांशिकी स्तर 50-62.5% परिस्थितिक जलवायु के आधार पर किया जाना है। छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से क्रास-ब्रिडिंग हेतु जर्सी एवं होलिस्टिन नस्ल का चयन किया गया है।
  • राज्य में विद्यमान निकृष्ट नर पशुओं का व्यापक रूप से बधियाकरण कर उन्नत नस्ल के नर पशुओं का कमबद्ध वितरण किया जाना है ताकि क्षेत्र में बहुत ही कम उत्पादकता वाले नर पशुओं से होने वाले अवांछनीय प्रजनन को रोका जा सकें।
  • उच्च अनुवांशिकी धारित नस्ल के नर पशुओं का संरक्षण एवं व्यापक प्रसार पशुपालन विभाग की अनुमति से किया जाना है। प्राकृतिक गर्माधान हेतु नर पशुओं का चयन जो कि एक न्यूनतम निर्धारित मापदण्ड रखता हो पशुपालन विभाग की सहमति से किया जाना है।

नस्लवार एवं जिलावार प्रस्तावित प्रजनन नीति

क्र. क्षेत्र जिला अनुमोदित प्रजनन नीति
1 ग्रामीण क्षेत्र में सभी जिलों में अपग्रेडिंग

1 भारतीय दुधारू नस्ल साहीवाल/गिर/रेडसिन्धी द्वारा

2-भारतीय द्विकाजी नस्ल थारपारकर/ऑगोल/कॉकरेज/हरियाणा द्वारा

2 अर्थ शहरी क्षेत्र सभी जिलों मे क्रास-ब्रिडिंग

जर्सी 50% / होलेस्टिन 50 % नस्ल द्वारा (हॉफ ब्रेड)

अपग्रेडिंग

भारतीय दूधारू नस्ल जैसे साहीवाल/गीर/रेडसिन्धी द्वारा

3 शहरी क्षेत्र में

 

 

सभी जिलों मे

 

क्रास ब्रीडिंग

जर्सी एवं होलेस्टिन नस्ल द्वारा तथा एफ 2 जनरेशन में क्रिस  क्रासिंग एवं रोटेशनल क्रासिंग

आऊट क्रासिंग

भारतीय दूधारू नस्ल में जैसे साहीवाल/गीर/रेडसिन्धी

अपग्रेडिंग

भारतीय दूधारू नस्ल जैसे साहीवाल/गीर/रेडसिन्धी द्वारा

भैस वंश: सुनियोजित फार्म में प्रजनन हेतु मुर्रा नस्ल का चयन किया जाना है। स्थानीय भैंसो का उन्नयन मुर्रा या सुरती नस्ल से किया जाना है।

बकरी: जमुनापारी/बारबरी/ब्लैक बेंगाल/सिरोही नस्ल से स्थानीय बकरी का अपग्रेडेशन किया जाना है।

भेड़: स्थानीय भेड़ का अपग्रेडेशन रेम्ब्यूलेट से एवं पहाड़ी क्षेत्रों में पसमीना नस्ल से किया जाना है।

सूकर: स्थानीय सूकर का अपग्रेडेशन मिडिल व्हाईट यार्कशायर /रशियन चरमुखा /कृष्णाशायर नस्ल से किया जाना है।

कुक्कुट :

  1. असील नस्ल चूंकि जगदलपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर की स्थानीय नस्ल है। अतः इन जिलों में इसका व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार किया जाना है। इसके अलावा जापानीस क्वेल, टर्की, गिनी फाउल का भी प्रसार किया जाना है।
  2. शेष जिलों में अण्डा उत्पादन हेतु व्हाइट लेग हार्न तथा द्विकाजी (अंडा एवं मांस उत्पादन) उपयोग हेतु व्हाइट लेग हार्न, आर० आई० आर० एवं अष्ट्रालार्प के क्रास का उपयोग किया जाना है।
  3. बनराज, गिरिराज नस्ल एवं जापानीस क्वेल, टर्की, गिनी फाउल का भी व्यापक रूप से प्रसार किया जाना है।

बतख: स्थानीय बत्तख का खाकी केम्पवेल नस्ल से अपग्रेडेशन किया जाना है।

रगोश: चिन्चीला/अंगोरा/ग्रे-जाईण्ट नस्ल से अपग्रेडेशन किया जाना है।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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