पशुपालन

डेयरी पशुओं में ऊष्मा तनाव (Heat Stress) एवं पोषण प्रबंधन

डॉ..मनोज कुमार गेंदले, रामचंद्र रामटेके एवं आशुतोष तिवारी

भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में उच्च तापमान एवं आर्धता की स्थिति डेयरी पशुओं के लिए प्रतिकूल होती है। विशेष रूप से ग्रीष्म ऋतु के दौरान, जब तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, तब पशुओं में ऊष्मा तनाव की समस्या अधिक देखी जाती है। उच्च उत्पादन देने वाली नस्लें ;जैसे क्रॉसब्रीड गायेंद्ध ऊष्मा तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। इसका मुख्य कारण उनका उच्च चयापचय दर (Metabolic rate) है, जिससे उनके शरीर में अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है।

ऊष्मा तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया : ऊष्मा तनाव की स्थिति में पशुओं में निम्नलिखित शारीरिक परिवर्तन देखे जाते हैंः
1. शरीर का तापमान बढ़ना
2. श्वासन दर(Respiration Rate) में वृद्धि
3. हृदय गति में वृद्धि
4. पसीना एवं लार स्राव में वृद्धि
5. चारे का सेवन कम होना
इन परिवर्तनों का उद्देश्य शरीर के तापमान को नियंत्रित करना होता है, लेकिन लंबे समय तक यह स्थिति रहने पर पशु की उत्पादकता प्रभावित होती है।

उत्पादकता पर प्रभाव
1. दुग्ध उत्पादन पर प्रभाव : ऊष्मा तनाव के कारण पशु कम चारा खाते हैं, जिससे ऊर्जा की कमी होती है और परिणामस्वरूप दुग्ध उत्पादन में कमी आती है।
2. प्रजनन पर प्रभाव : हीट (Estrus) के लक्षण स्पष्ट नहीं होता है एवं गर्भधारण दर (Conception Rate) कम हो जाती है तथा भू्रण मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है
3. स्वास्थ्य पर प्रभाव : रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है एवं संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है

पोषण प्रबंधन (Nutritional Management)
ऊष्मा तनाव के प्रभाव को कम करने के लिए संतुलित एवं वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन आवश्यक है।
1. ऊर्जा प्रबंधन : आहार में ऊर्जा की मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए, वसा (Fat) का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जा सकता है एवं फाइबर की अधिकता से बचना चाहिए
2. प्रोटीन प्रबंधन : उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का उपयोग करें । अत्यधिक प्रोटीन से अमोनिया उत्पादन बढ़ता है, जो हानिकारक हो सकता है।
3. खनिज तत्वों की पूर्ति : ऊष्मा तनाव में इलेक्ट्रोलाइट असन्तुलन होता है, इसलिए सोडियम (Na) ,पोटेशियम (K) एवं मैगनीशियम ;डहद्ध की पर्याप्त मात्रा देना आवश्यक है।
4. विटामिन पूरक : विटामिन A,D एवं Eका उपयोग एंटीआक्सीडेंट के रूप में कार्य करते हैं
5. जल प्रबंधन : स्वच्छ एवं ठंडा पानी हमेशा उपलब्ध होना चाहिए पानी की मात्रा बढ़ानी चाहिए

प्रबंधन संबंधित उपाय
1. पशुओं के लिए छायादार स्थान उपलब्ध कराना
2. शेड में उचित वेंटीलेशन (Ventilation)
3. कूलिंग सिस्टम (Foggers, Sprinkler) का उपयोग
4. दिन के ठंडे समय (सुबह/शाम) में भोजन देना

विशेष पोषण रणनीतियाँ
1. बफर (Buffer) का उपयोग (जैसे सोडियम बाइकार्बोनेटद)
2. यीस्ट (Yeast) सपलेमेंट का उपयोग
3. बाईपास फैट एवं बाईपास प्रोटीन का उपयोग
4. एंटीअक्सीडेंट (Salenium, Vitamin E) का समावेश

निष्कर्ष :

भारत के अधिकांश क्षेत्रों में ऊष्मा तनाव डेयरी उद्योग के लिए एक गम्भीर चुनौती है एवं इसके प्रभाव से पशुओं की उत्पादकता, प्रजनन क्षमता एवं स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, बल्कि उनकी उत्पादकता, प्रजनन क्षमता तथा आर्थिक लाभप्रदाता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। ऊष्मा तनाव तब उत्पन्न होता है जब पशु अपने शरीर से उत्पन्न अतिरिक्त ऊष्मा को वातावरण में प्रभावी रूप से निर्गम नहीं कर पाते।इस स्थिति में पशुओं के शारीरिक, जैवरसायनिक एवं हार्मोनल कार्यों में परिवर्तन होते हैं, जिससे दुग्ध उत्पादन में कमी, प्रजनन असफलता तथा रोगों की संवेदनशीलता में वृद्धि होती है। इस समस्या के प्रभावी प्रबंधन हेतु पोषण संबंधित रणनीतियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

लेखक :

डा.मनोज कुमार गेंदले 1, रामचंद्र रामटेके 2 एवं आशुतोष तिवारी 2
प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष,
पशुचिकित्साा एवं पशुपालन महाविद्यालय, अंजोरा, दुर्ग

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