

पशुधन क्षेत्र के अस्तित्व और विकास के लिए जल की महत्वपूर्ण भूमिका है। जीवन के लिए तत्काल आवश्यक सभी पर्यावरणीय घटकों में ऑक्सीजन के बाद जल का स्थान दूसरे स्थान पर है। एक पशु अपने शरीर की लगभग पूरी वसा और आधे से अधिक प्रोटीन की हानि के बाद भी जीवित रह सकता है लेकिन उसके शरीर के जल के दसवें भाग की हानि घातक होती है।
भूमि और जल संसाधनों के बहुतायत उपयोग से जल कमी की विभिन्न स्थितियां उत्पन्न हुई है जिससे स्वच्छ पिया जल की कमी पर बढ़ती चिताओं ने पशुधन द्वारा उपयोग किए जाने वाले पानी की मात्रा को निर्धारित करने के लिए प्रेरित किया है। सभी जल संसाधनों में ताजा पानी लगभग 2.5% है पृथ्वी की सतह का 70% हिस्सा पानी से ढका है जो 1400 मिलियन क्यूबिक किलोमीटर के बराबर है हालांकि इस पानी का 97.5% समुद्री पानी है जो खा रहा है। ताजा पानी की उपलब्धता केवल 35% है और इनमें से केवल 40% का प्रयोग मानव द्वारा किया जा सकता है। कुल ताजा पानी में से 68.7 प्रतिशत बर्फ की चोटियों में जमा हुआ है, 30% भूमिगत संग्रहित और केवल 0.3% पानी पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध है। कृषि मीठे पानी का सबसे बड़ा उपयोग करता है जिसमें लगभग 70% उपयोग होता है। कृषि के अलावा जल का प्रमुख उपयोग मत्स्य पालन, जल विद्युत उत्पादन, जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने, औद्योगिक उत्पादन और घरेलू उद्देश्यों के लिए होता है।
कृषि और उद्योगों में उपयोग किए जाने वाले जल की क्षमता अलग-अलग देश में जीवन शैली औद्योगिक विकास और जल उपयोग दक्षता के आधार पर अलग-अलग होती है। बढ़ती जनसंख्या और असरमित जीवन शैली से जल संसाधन की गंभीरता को भारत में बढ़ा दिया है पानी की उपलब्धता की समस्या विश्व स्तर पर असमान रूप से वितरित है जो खाद्य उत्पादन, मानव स्वास्थ्य और आर्थिक विकास में समस्याएं पैदा कर रही है। विकासशील देश तुलनात्मक रूप से कृषि में काम एवं औद्योगिक क्षेत्र में अधिक पानी का उपयोग कर रहे हैं जो औद्योगिक विकास में कुशल एवं खराब निवेश को दर्शाता है भारत में पानी का उपयोग खाद्य उत्पादन, पशुपालन और कृषि सिंचाई के लिए किया जाता है। वर्तमान में भारत में प्रति व्यक्ति जल उपयोग 135 लीटर है जो 25 वर्षों में बढ़कर 167 लीटर हो जाएगा 2050 तक भारत सबसे ज्यादा पानी की मांग करने वाला देश हो जाएगा एवं निकट भविष्य में भारत को पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ेगा।
भारत में जल की कमी के कारण
वर्तमान में भारत के शहरी क्षेत्र की आबादी 35% है जो 25 वर्षों बाद बढ़कर 55% हो जाएगी जल की कमी का मुख्य कारण शहरीकरण एवं औद्योगिकरण है साथ ही सिंचाई हेतु जल के अकुशल उपयोग, वाष्पीकरण, जल निकासी व्यवस्था एवं भूजल के अत्यधिक उपयोग जल की कमी के कारण है। नदी, नालो एवं तालाबों में सीवेज अपशिष्ट एवं अपशिष्ट जल छोड़ना भी जल संसाधनों के दुरुपयोग की ओर ध्यान एकग्रित करता है।
पशुधन की जल आवश्यकताए
पशु द्वारा जल के उपयोग की मात्रा मुख्य कारकों पर निर्भर करती है जैसे पशु का आकार, चारे, पर्यावरण का तापमान, शुष्क पदार्थ की मात्रा आदि पशु का वजन जितना अधिक होगा उसकी जल की आवश्यकता अन्य छोटे पशुओं की तुलना में अधिक होगी पशुओं को जल मुख्य रूप से तीन स्रोतों से मिलता है जिससे पशुओं में जल की आवश्यकता पूरी होती है।
- पीने का पानी- पीने का पानी जल सेवन का प्रमुख स्रोत होता है।
- निकला हुआ चारा – पशुओं में पानी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा हरे चारे एवं साइलेज द्वारा प्राप्त किया जाता है।
- चयापचय पानी – शरीर की चयापचय प्रतिक्रियाओं के दौरान कार्बनिक तत्वों के ऑक्सीकरण से हाइड्रोजन से पानी बनता है यह जल कुल जल आपूर्ति का 5 से 10ः भाग होता है।
पशुओं के शरीर से जल का निकासी मुख्य रूप से माल एवं मूत्र द्वारा होता है साथ ही वाष्पीकरण माध्यम (जैसे श्वसन, पसीना एवं श्वसन पथ ) द्वारा भी जल की हानि पशुओं के शरीर द्वारा होती है।
जल के कार्य
शरीर में जल कई कार्य करता है। यह पशु के ताप-नियामक तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पाचन और चयापचय के अपशिष्ट उत्पादों को खत्म करना रक्त चाप दबाव को नियंत्रित करना शरीर के भीतर पोषक तत्वों, हार्मोन और अन्य रासायनिक संदेशों का परिवहन आदि।
पशुधन उत्पादन में जल का उपयोग
पशु प्रोटीन के उत्पादन में तुलनात्मक रूप से जल की आवश्यकता पौधे प्रोटीन उत्पादन से अधिक होती है 1 किलो चिकन का उत्पादन करने के लिए 3500 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि 1 किलो बकरी एवं भेड़ का उत्पादन करने के लिए लगभग 51,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है इसलिए, शाकाहारी आहार की तुलना में मांसाहारी आहार के उत्पादन में जल का उपयोग अधिक होता है।
पशुधन उत्पादन के लिए जल गुणवत्ता का महत्व
घुलित ठोस शब्द का प्रयोग प्रायः पानी के लवणता स्तर को दर्शाने के लिए किया जाता है। लवणों में कार्बोनेट, बाइकार्बोनेट, सल्फेट, नाइट्रेट, क्लोराइड, फॉस्फेट और फ्लोराइड शामिल हैं। पानी में विशिष्ट आयनों का उच्च स्तर पशुओं की स्वास्थ्य समस्याओं और मृत्यु का कारण बन सकता है। ऐसे पदार्थ जो स्वाद पर ज्यादा प्रभाव डाले बिना विषाक्त होते हैं जैसे नाइट्रेट, फ्लोरीन और विभिन्न भारी धातुओं के लवण शामिल हैं। पानी में लवणों की अधिकता से पशु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जैसे पानी की गुणवत्ता पशुओं के प्रदर्शन एवं बीमारियों के प्रसार का वाहक बन सकता है फ्लोराइड के कारण दांतों का क्षरण, सल्फेट से दस्त, सोडियम क्लोराइड जैसे लवण शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन और अंतःकोशिकीय दाब को बदल देते हैं, जिससे निर्जलीकरण किया बढ़ती है। लवण गुर्दों पर भी दबाव डालते हैं। पानी की गुणवत्ता के साथ-साथ मात्रा भी चारे की खपत और पशु स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है क्योंकि खराब पानी की गुणवत्ता के कारण आमतौर पर पानी और चारे की खपत कम हो जाती है। पशुओं के लिए पानी की गुणवत्ता का मूल्यांकन करते समय, इस बात पर विचार किया जाता है कि क्या यह पशुओं के प्रदर्शन को प्रभावित करेगा या क्या पानी बीमारियों के प्रसार का वाहक बन सकता है और मानव उपभोग के लिए पशु उत्पादों की स्वीकार्यता या सुरक्षा प्रभावित होगी। कोबाल्ट, तांबा, आयोडाइड, लोहा, मैंगनीज और जस्ता अत्यधिक सांद्रता में विषाक्त हो सकते हैं, लेकिन समस्याएँ पैदा करने वाले उच्च स्तर पर शायद ही कभी देखे जाते हैं।
जल संसाधनों का संरक्षण
जल संसाधनों के संरक्षण हेतु रणनीतियां अपनाई जानी चाहिए।
- 70% ताजा पानी का उपयोग कृषि में होता है अतः किसानों को जन संरक्षण का प्राथमिक लक्ष्य बनाया जाना चाहिए।
- सरकारी एवं निजी उद्योगों को ताजा पानी के उचित मूल्य निर्धारण के लिए विश्व बैंक की नीतियों को लागू करना चाहिए।
- जल संरक्षण बढ़ाने के लिए वनों, आद्रभूमि एवं प्राकृतिक परिस्थितिकी प्रणालियों की रक्षा करनी चाहिए।
- फसल चक्र का उपयोग करना चाहिए।
- पानी के बहन और वाष्पीकरण को कम करने के लिए मल्च का उपयोग करना चाहिए।
- जल संरक्षण को बढ़ाने के लिए जल उपयोगकर्ताओं को जागरूक करना चाहिए।
पशुधन के प्रदर्शन पर जल तनाव का प्रभाव
शुष्क क्षेत्रों में जुगाली करने वाले पशुओं में जल की कमी के प्रति अनुकूलनशीलता देखी गई है। पानी एक जानवर के जीवित वजन का लगभग 60 से 70 प्रतिशत होता है और पानी का सेवन भोजन के सेवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है ये जुगाली करने वाले पशु लंबे समय तक पानी के अभाव को झेल सकते हैं। ऊँट बिना पानी पिए 17 दिनों तक केवल सूखा चारा खाकर रह सकते हैं। जुगाली करने वाले पशु कई दिनों तक बिना पानी के रह सकते हैं, जो पशु पानी का सेवन कम करते हैं, वे चारा भी कम खाते हैं और उनकी चयापचय दर धीमी होती है, जिससे पशु सूखे के दौरान लंबे समय तक जीवित रह पाते हैं और उन्हें कम चारा और पानी की आवश्यकता होती है। रेगिस्तानी बकरियाँ निर्जलीकरण का सामना करने और मल – मूत्र के माध्यम से पानी के नुकसान को कम करने के लिए तंत्र विकसित करके पानी की कमी से अनुकूलन करने में सक्षम हैं।
जल तनाव पशु के प्रदर्शन को किसी भी अन्य पोषक तत्व की कमी की तुलना में अधिक तेजी से प्रभावित करती हैं। पानी की कमी फीड सेवन, चयापचय और उत्पादकता को प्रभावित करती है। पालतू पशु भोजन के बिना लगभग साठ दिन जीवित रह सकते हैं लेकिन पानी के बिना केवल सात दिन। पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पेयजल का प्रावधान संतोषजनक दूध उत्पादन, विकास और पशु स्वास्थ्य के लिए एक प्रमुख शर्त है, ऊँट में अनियमित पानी के अंतराल को सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है। ऊँट अपने शरीर के वजन का 27% तक नुकसान सहन कर सकता है और एक बार में असाधारण मात्रा में पानी पी सकता है। शुष्क मौसम में, उपलब्ध चारे में पोषक तत्वों की मात्रा कम हो जाती हैै जिससे शुष्क पदार्थ के सेवन में कमी आ जाती है और पोषक तत्वों का सेवन अपर्याप्त होता है इससे पशुओं के उत्पादन और उत्पादकता पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक समय तक जल तनाव से पशुओं में निर्जलीकरण के लक्षण दिखाई देते हैं, जो त्वचा में कसाव (त्वचा की सिलवटें), वजन में कमी और श्लेष्मा झिल्लियों व आँखों के सूखने के रूप में देखे जा सकते हैं। पानी की कमी और उसके साथ-साथ आहार में कमी का सबसे स्पष्ट शारीरिक परिणाम वजन में कमी है।
व्यवहारिक अनुकूलन
पर्यावरणीय वातावरण सेे आहार प्रभावित होता है। अनुकूलित बकरियाँ शुष्क मौसम के दौरान उच्च गुणवत्ता वाले चारे का चयन कर सकती हैं, जबकि भेड़ों में उच्च गुणवत्ता वाले चारे के प्रति कम रुचि देखी गई। पर्यावरणीय वातावरण से पीने का व्यवहार भीे प्रभावित होता है, जिसके कारण पानी से वंचित भेड़ और बकरियाँ पानी पिलाने पर एक बार में ही बड़ी मात्रा में पानी पी जाती हैं। पर्यावरणीय वातावरण से प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है प्रजनन का समय अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में रहने वाली भेड़ों की एक अनुकूली विशेषता है। पानी की कमी के साथ-साथ आहार का सेवन भी कम हो जाता है, इसलिए जुगाली करने वाले पशुओं के प्रजनन चक्र पर भी प्रभाव पड़ता है।
जल तनाव की प्रतिक्रिया में शारीरिक परिवर्तन
पशु शरीर में संचित वसा पोषण और अभाव के समय उत्पादन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। देशी भेड़ों की वसा-पूँछ में मौजूद विशिष्ट वसा भंडार, ऊर्जा के एक सहज उपलब्ध स्रोत के रूप में कार्य करता है। पानी की कमी से वसा ऊर्जा सेवन में उपयोग होती है। आहार में प्रोटीन की कमी से जुगाली करने वाले पशुओं में सीरम एल्ब्यूमिन सांद्रता में गिरावट आती है एवं लंबे समय तक आहार की कमी से ग्लोब्युलिन सांद्रता भी कम हो जाता हैै। परिणामस्वरूप, गुर्दे द्वारा यूरिया का पुनः अवशोषण एवं रक्त में यूरिया की सांद्रता बढ़ाने की संभावना होती हैै।
गर्भावस्था
पानी की मात्रा शारीरिक परिवर्तन एवं गर्भावस्था चरण के अनुसार अलग-अलग होती हैं। अर्ध-शुष्क परिस्थितियों में रुक-रुक कर पानी पिलाने से गर्भवती पशुओं में रक्तसंचय में वृद्धि और बाह्यकोशिकीय द्रव में कमी होती र्है। 30 घंटे तक निर्जलित गर्भवती पशुओं में प्लाज्मा ऑस्मोलैलिटी में वृद्धि के साथ-साथ ग्लोमेरुलर निस्पंदन दर में कमी आती है।
दूध उत्पादन एवं संरचना
दूध देने वाले पशुओं में पानी की कमी से शारीरिक वजन में कमी देखी गई है, जो कम पानी और चारे के सेवन के साथ-साथ ऊर्जा की कमी के कारण होती है, जिससे दूध देने वाले पशु अपने शरीर के भंडार पर अत्यधिक निर्भर हो जाती हैं एवं शारीरिक रूप से, दूध देने वाले पशुओं में शुष्क पशुओं की तुलना में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम होती है। स्तनपान के दौरान, पशु में पानी की आवश्यकता अन्य शारीरिक स्थितियों की तुलना में सबसे ज्यादा होती है। निर्जलीकरण के कारण स्तन ग्रंथि में रक्त प्रवाह कम हो जाता है, जिससे दूध उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है। कुछ निर्जलित पशुओं में दूध उत्पादन में गिरावट मुख्यतः पानी की कमी का परिणाम हो सकती है। जल तनाव के कारण विभिन्न स्थितियां उत्पन्न हो जाती है जिनमें कोर्टिसोल का स्राव बढ़ जाता है जिससे प्लास्मिन प्रणाली सक्रिय हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप β-कैसिइन से चैनल ब्लॉकिंग गतिविधि वाला एक प्रोटियोज पेप्टोन निकलता है जो स्तन ग्रंथि के लुमेन में लैक्टोज स्राव में बाधा डालता है और परिणामस्वरूप उत्पादन में गिरावट आती है। पानी की कमी के दौरान दूध में वसा और वसा रहित ठोस पदार्थों की मात्रा कम होती है और पानी की मात्रा अधिक होती है। जल की कमी के दौरान जल की मात्रा में वृद्धि अनुकूलन का कारण है, जिससे संतान को दूध के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में जल प्राप्त होता है।
पशुधन के उत्पादक प्रदर्शन को बनाए रखने के लिए, एक फार्म प्रबंधक के लिए पशुधन के लिए पानी के सेवन की निगरानी अनिवार्य है। अधिकतम उत्पादन के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले पानी की प्रचुर आपूर्ति आवश्यक है। जल स्रोत के प्रबंधन से पशुधन अपशिष्ट के माध्यम से उत्सर्जित पोषक तत्वों का अधिक समान वितरण हो सकता है। जल स्रोत के सही उपयोग से स्वस्थ पर्यावरणीय प्रथाओं को बढ़ावा दिया जा सकता है। जल की कमी से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए, कमी के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने हेतु व्यक्तिगत एवं समुदाय स्तर पर अनुकूलन उपाय किए जाने चाहिए। इन उपायों में मौजूदा प्रथाओं में बदलाव और उपयुक्त तकनीक का कार्यान्वयन शामिल है ताकि जलवायु परिस्थितियों द्वारा प्रदान किए गए सीमित अवसरों का अधिकतम लाभ उठाया जा सके।
लेखक:
अरविंद कुमार नंदनवार एवं डॉ सेवक अमृत ढ़ेंगे,
सहायक प्राध्यापक,
रानी अवंती बाई लोधी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, छुईखदान









