उद्यानिकी

बेल की खेती

आरती मंडावी एवं डॉ. संगीता

परिचय : बेल का वैज्ञानिक नाम ऐगल मारमेलोस है तथा यह रूटेसी कुल में आता है। इसकी उत्पत्ति भारत में हुई है बेल एक औषधीय तथा धार्मिक महत्व वाला फलदार वृक्ष है, जो मुख्य रूप से शुष्क एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसे वुड एप्पल या बेल फल भी कहा जाता है। यह भारत में प्राचीन काल से पूजनीय वृक्ष माना जाता है और इसके फल, पत्ते, फूल, तना एवं जड़ सभी औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। (Bael cultivation)

जलवायु एवं मिट्टी : बेल की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन दोमट या हल्की काली मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम होती है। पी.एच 6.0-8.5 तक उपयुक्त तापमानः 25.35 डिग्री सेल्सियस तापमान तक उत्तम माना जाता है। वर्षाः 600-800 मि.मी. पर्याप्त होती है।

पोषक तत्व

मात्रा इकाई
ऊर्जा 137 किलोकैलोरी
प्रोटीन 1.8 ग्राम
वसा 0.3 ग्राम
कार्बोहाइड्रेट 31.8 ग्राम
फाइबर 2.9 ग्राम
विटामिन सी 8 मिलीग्राम
विटामिन ए 55 आईयू
कैल्शियम 85 मिलीग्राम
फॉस्फोरस 50 मिलीग्राम
पोटैशियम 600 मिलीग्राम
आयरन 0.6 मिलीग्राम

किस्में
पंत शिवानी: पेड़ ऊपर की ओर, घने व वृद्धियुक्त होते हैं। मध्यम समय से पकते हैं। फल अण्डाकार, भार 1.2-20 किग्रा., छिलका मध्यम पतला व रंग पीला। फलों में रेशा व चिपचिपा पदार्थ कम होता है व भण्डारण क्षमता अच्छी होती है।

पंत उर्वशी: यह भी मध्यम समय में पकती है। फल अण्डाकार, लंबा, भार 1.6 किग्रा. प्रति फल होता है। छिलका मध्यम पतला तथा गूदे में रेशे की मात्रा कम पाई जाती है।

पंत अपर्णा: यह बौनी, कम घनी तथा शाखायें नीचे की तरफ लटकती है। पत्तियां बड़ी गहरे हरे रंग की होती हैं। फलत जल्दी व फल गोल 0.6-0.8 ग्रा. भार के पतले छिलके वाले तथा पकने पर हल्का पीला, गूदा पीला, लिसलिसा पदार्थ व रेशा कम पाया जाता है।

पंत सुजाता: पेड़ मध्यम आकार के, घने, फैलने वाले, मध्यम समय में पकते हैं। फल गोल, दोनों सिरों पर चपटे, भण्डारण क्षमता अच्छी होती है। फल का भार 1-1.4 किग्रा., छिलका पतला, बीज, रेशा कम व गूदा अधिक होता है।

अन्य किस्में: नरेन्द्र बेल-5, नरेन्द्र बेल -6

रोपण : बेल के पौधे बीज द्वारा तैयार किये जाते हैं। बीजों की बुवाई फलों से निकालने के तुरन्त बाद कर देते हैं, बुवाई का उत्तम समय जून है। वानस्पतिक विधियों जैसे कली रोपण द्वारा भी किया जाता है।बेल की रोपाई 10×10 मी. की दूरी पर जुलाई माह में करते हैं। पौध लगाने के 1 माह पूर्व 1x1x1 मी. आकार के गड्ढे खोद लिये जाते हैं तथा उसमें गोबर की खाद मिलाकर गड्ढे को भर देते हैं।

खाद एवं उर्वरक : बेल पर अभी तक कोई उर्वरक परीक्षण नहीं किये गये हैं, अतः सही तौर पर इनके लिये खाद एवं उर्वरकों की मात्रा बताना कठिन है। अन्य फल वृक्षों की तरह बेल को भी सभी आवश्यक तत्वों की आवश्यकता होती है। इनकी कमी को यह पेड़ बहुत हद तक सह लेता है। परन्तु अच्छी वृद्धि एवं विकास हेतु उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक देना चाहिये। एक फलदार पेड़ के लिये 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस, 500 ग्राम पोटाश की मात्रा प्रति वर्ष देना चाहिये। जिंक की पूर्ति हेतु 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का छिडकाव जुलाई, अक्टूबर व दिसम्बर में करते हैं।

सिंचाईः पहले दो वर्ष तक नियमित सिंचाई आवश्यक होती है। इसके बाद पौधे गहरी जड़ वाले होने के कारण कम पानी में भी अच्छे से बढ़ते हैं। गर्मी के मौसम में 20.25 दिन के अंतराल पर सिंचाई लाभकारी रहती है। खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई गुड़ाई आवश्यक है।

सघाई-छंटाई: साधने का कार्य पौध लगाने के 4-5 वर्ष में पूरा करना चाहिए। पहली छंटाई अप्रैल-मई में तथा दूसरी छंटाई अगस्त में करनी चाहिए।

फूलन-फलनः बेल का पौधा रोपाई के बाद धीरे.धीरे बढ़ता है और लगभग 4 से 5 वर्ष में फूल देना शुरू करता है। सामान्यतः मार्च से मई के बीच बेल के पौधों में फूल आते हैं। कुछ क्षेत्रों में यह अवधि फरवरी के अंत से जून तक भी बढ़ सकती है। फूल आने के बाद फलों को पकने में लगभग 8 से 9 महीने लगते हैं।

फलों की तुड़ाईः बेल के फल अप्रैल-मई में तोड़ने योग्य हो जाते हैं। फलों का रंग गहरे हरे रंग से पीला हरा हो जाये तो उसकी तुड़ाई डंठल सहित करते हैं।

पौध संरक्षण (1) दैहिक विकार

  • फलों का फटना-वेल की कुछ कियों जैसे चकइया में फल फटने की प है। फल पकने के थोड़ा पहले फट जाते हैं।
  • रोकथाम फलों को जनवरी माह में तोड़कर कृत्रिम रूप से पका लेना चाहिए।
  • रोग बेल को बैंकर और अन्तर्विगलन रोग काफी हानि पहुंचाते हैं। प्रभावित जला शोषित धब्बे बनते हैं जो बाद में बढ़कर भूरे हो जाते हैं।
  • रोकथाम रोकथाम हेतु स्टेप्टोमाइसीन सल्फेट नामक दवा के 500 भागप्रति 10 भाग पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिये।
  • अन्तर्विगलन रोग- यह रोग संग्रहित फलों में लगता है। इस रोग में फलों का दाहा पूर्णतया नष्ट हो जाता है।
  • रोकथाम फल तोडते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि उनमें चोट नलगे, इसी परिवहन के दौरान फलों की पैकिंग ऐसी होनी चाहिये कि वे हिले इले नहीं और उन्हें बोट लगे।
  • कीट-बेल एक सहनशील पेड़ है। इसे बहुत कम कीट हानि पहुंचाते हैं।
  • पर्ण सुरंगी और पर्णभक्षी इल्ली कभी-कभी थोडा नुकसान पहुंचाती है। इन कीटों में से पर्णभक्षी कोट बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योकि यह कौट पत्तियों को काटकर नुकसान पहुंचाता है।

रोकथाम-

  • ग्रसित पत्तियों को हाथ से रगड़ दें ताकि अन्दर की इल्लियां मर जाये।
  • ग्रसित पत्तियों तथा टहनियों का शीत ऋतु में तोड़कर नष्ट कर देना चाहिये।
  • 0.1% पैराधियान का छिड़काव करना चाहिये।
    0.04% मेटासिस्टाकस या फास्फोमिडान या निकोटिन का छिड़काव करना चाहिये।

आय एवं उपजः बेल की खेती उपज और आय दोनों दृष्टियों से किसानों के लिए लाभदायक है। सामान्यतः पौधा 4.5 वर्ष बाद फल देना शुरू करता है। प्रारंभ में प्रति पौधा 100-150 फल और 8-10 वर्ष की आयु में 250-400 फल तक उत्पादन होता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 200-400 ग्राम होता है। एक हेक्टेयर में 150-160 पौधों से औसतन 50-70 क्विंटल फल प्राप्त किए जा सकते हैं, जबकि उन्नत किस्मों और अच्छी देखभाल से उपज 80-100 क्विंटल तक पहुँच सकती है। बाजार दर 25.40₹ प्रति किलोग्राम होने पर एक हेक्टेयर से 1.5-2.5₹ लाख तक की आय संभव है। इस प्रकार बेल की खेती कम लागत में अधिक लाभ देने वाली स्थायी फसल है।

प्रमुख कीट
(क) फल मक्खी
लक्षणः फल पर छोटे-छोटे छेद हो जाते हैं, जिससे गूदा सड़ने लगता है।
नियंत्रणः
गिरे हुए सड़े फलों को तुरंत नष्ट करें।
मेथाइल यूजेनॉल (0.1ः) ट्रैप प्रति हेक्टेयर 8.10 लगाएँ।
जैविक उपाय के रूप में नीम तेल (5 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव करें।

(ख) तना छेदक
लक्षणः तने या शाखाओं में छेद बन जाते हैं और रस निकलने लगता है, पौधा कमजोर पड़ जाता है।
नियंत्रणः
प्रभावित शाखाओं को काटकर नष्ट करें।
नीम तेल या क्लोरपाइरीफॉस (2 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव करें।

(ग) पत्ताभक्षक इल्ली
लक्षणः पत्तियाँ खाकर पौधा कमजोर कर देती हैं।
नियंत्रणः
ट्राइकोग्रामा कार्ड जैविक नियंत्रण हेतु प्रयोग करें।
नीम अर्क या बवेरिया बेसियाना जैसे जैव कीटनाशक का उपयोग करें।

प्रमुख रोग
(क) पत्तों पर झुलसा रोग
लक्षणः पत्तियों पर भूरे धब्बे बनते हैं जो धीरे-धीरे बढ़कर सूख जाते हैं।
नियंत्रणः
प्रभावित पत्तियाँ तोड़कर नष्ट करें।
कार्बेन्डाजिम या मैन्कोज़ेब (2 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करें।

(ख) फल सड़न
लक्षणः फल पर काले धब्बे और सड़न दिखाई देती है।

नियंत्रणः
फलों को अधिक नमी से बचाएँ।
कार्बेन्डाजिम 0.1ः घोल का छिड़काव करें।

(ग) जड़ गलन रोग
लक्षणः जड़ें सड़ जाती हैं, पौधा मुरझाने लगता है।
नियंत्रणः
पौधारोपण से पहले गड्ढों में ट्राइकोडर्मा मिश्रित गोबर खाद डालें।

उपज : बेल का बीज पेड़ 7-8 वर्ष और कलमी पेड 4-5 वर्ष बाद फल देना प्रारंभ कर देता हैः फलों की संख्या पेड़ के आकार और उम्र के साथ बढ़ जाती है। एक 10-15 वर्ष पुराने पेड़ से 200-400 फल प्राप्त होते हैं। और 40-50 वर्ष पुराने पेड से 800-1000 फल प्राप्त होते है।
भण्डारण : बेल के फलों को साधारण अवस्था में अन्य फलों की तुलना में अधिक समय तक भण्डारित किया जा सकता है।
ज्यादा दिनों तक भण्डारित करने हेतु शीत भण्डारण करना ठीक रहता है।

विपणन : बेल का विपणन या तो ताजे फलों को सीधे बेचकर अथवा फलों को विभिन्न प्रकार संरक्षित पदार्थों में बदल कर किया जाता है।
बेल शरबत एक पौष्टिक और ठंडक देने वाला पेय है।यह पाचन ठीक करता है, लू से बचाता है और शरीर को ऊर्जा देता है। गर्मियों में इसका सेवन बहुत लाभकारी माना जाता है।

लागत : बेल की खेती की लागत अन्य फल फसलों की तुलना में कम होती है। पहले वर्ष में खेत की तैयारी, गड्ढे बनाना, पौध खरीद, खाद और सिंचाई व्यवस्था पर लगभग ₹25,000 से ₹30,000 प्रति एकड़ (लगभग ₹60,000 से ₹75,000 प्रति हेक्टेयर) तक खर्च आता है। इसके बाद के वर्षों में रखरखाव, खाद पानी और मजदूरी पर लगभग ₹15,000 से ₹20,000 प्रति वर्ष खर्च होता है। पौधे दीर्घायु होने के कारण एक बार की लागत लंबे समय तक लाभ देती है, जिससे यह फसल कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली सिद्ध होती है।

आय : छत्तीसगढ़ में बेल की खेती से किसानों को अच्छी आय प्राप्त हो सकती है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 156 बेल के पौधे लगाए जा सकते हैं। एक पूर्ण विकसित बेल का पेड़ औसतन 80 से 120 फल देता है, इस प्रकार प्रति हेक्टेयर लगभग 15,000 से 16,000 फल प्राप्त होते हैं। स्थानीय बाजार एवं प्रोसेसिंग इकाइयों में बेल का औसत मूल्य 25 से 40 रुपये प्रति फल तक मिलता है। इस आधार पर किसान को प्रति हेक्टेयर लगभग 4 लाख से 6 लाख रुपये तक की कुल वार्षिक आय हो सकती है। खेती में खाद, मजदूरी, सिंचाई एवं देखभाल पर होने वाला खर्च घटाने के बाद लगभग 3 लाख से 5 लाख रुपये तक शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। इस प्रकार बेल की खेती छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली एक लाभकारी फसल सिद्ध होती है।

लेखक :
आरती मंडावी एवं डॉ. संगीता
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र , राजनांदगांव
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय , सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)

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