उद्यानिकी

काजू की खेती

आरती मंडावी, डॉ. संगीता एवं लिशा तंबोली

परिचय : काजू वैज्ञानिक नाम एनाकार्डियम ऑक्सिडेंटेल कुल एनाकार्डिएसी है। एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है, जिसे मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। भारत में यह फसल विशेष रूप से महाराष्ट्र, गोवा, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, केरल और छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों जैसे बस्तर, कोरबा, रायगढ़ और जशपुर बस्तर, कांकेर, कोण्डागांव, धमतरी, महासमुंद, रायगढ़ और सरगुजा में सफलता पूर्वक खेती की जाती है। काजू के बीज से मेवा और फल से काजू फेनी (शराब) जैसी उत्पाद तैयार होते हैं, जिससे किसानों को अच्छा आर्थिक लाभ मिलता है।

जलवायु और मृदा
काजू की खेती के लिए 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और 1000 से 2000 मिमी वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त रहते हैं। यह पौधा हल्की, दोमट या लाल मिट्टी में अच्छी तरह बढ़ता है पी एच मानः 5.5 से 7.0 के बीच उत्तम रहता है। जलभराव वाली भूमि से बचना चाहिए, क्योंकि यह पौधा सूखे को सहन कर सकता है लेकिन जलभराव नहीं।

प्रजातियाँ
छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के लिए उपयुक्त कुछ प्रमुख प्रजातियाँ हैंः
वि. आर. आई-3ए भास्करए बी.पी.पी-8ए एन.आर.सी.सी सिलेक्शन-2ए उल्लाल-3
ये प्रजातियाँ अधिक उत्पादन देने वाली और कीट-रोग प्रतिरोधी मानी जाती हैं।

रोपण
काजू का बाग लगाने हेतु सामान्यतः 8 से 12 मीटर की दूरी उपयुक्त होती है. परन्तु यह किस्म-विशेष स्थान विशेष मिट्टी, जलवायु के विभिन्न कारकों आदि पर कम या अधिक भी हो सकती है। उदाहरणतः रेतीली मिट्टी में दूरी 7 में 8 मीटर व उपजाऊ मिट्टी में रोपण दूरी 12 से 13 मीटर रखनी चाहिए। बौनी किस्मों हेतु रोपण दूरी 7 से 8 मीटर व लम्बी किस्मों हेतु 10 से 12 मीटर रखनी चाहिए। बाग लगाने से पहले निश्चित दूरी पर 50ग50ग50 सें.मी. माप के गड्ढा मई-जून में खोद लिए जाते हैं। इन गड्ढ़ों को मिट्टी तथा गोबर की खाद या कम्पोस्ट की खाद मिलाकर भर दिया जाता है। इसके बाद मौसम की एक या दो बरसात पड़ने के बाद इन गड्ढों में पौधे लगाए जाते हैं। बाग लगाने हेतु बरसात का मौसम उपयुक्त होता है। यदि सिंचाई की व्यवस्था हो तो पौधे मार्च में भी लगाए जा सकते है। स्वस्थाने बाग लगाने हेतु इन गड्यों में बीजों को बोया जाता है और लगभग एक साल बाद किसी मनचाही कायिक विधि (मुख्यतः मुकाठि कलम बंधन) द्वारा पौधे तैयार किए जाते हैं।

खाद एवं उर्वरक
काजू के पौधों को पोषण देने के लिए प्रति पौधा प्रति वर्ष लगभग 10 से 15 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद वर्षा प्रारंभ होने से पहले (जून-जुलाई) डालनी चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वरता और नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ती है। इसके साथ ही रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग भी संतुलित मात्रा में करना चाहिए। एक वर्ष पुराने पौधे को 200 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फॉस्फोरस और 100 ग्राम पोटाश देना चाहिए। पौधे की उम्र बढ़ने के साथ यह मात्रा क्रमशः बढ़ाकर पाँच वर्ष तक दोगुनी की जा सकती है। उर्वरक को पौधे के चारों ओर गड्ढा बनाकर मिट्टी में मिला देना चाहिए और बाद में सिंचाई करनी चाहिए। इस प्रकार के संतुलित खाद एवं उर्वरक प्रबंधन से पौधे स्वस्थ रहते हैं, फूल और फल अधिक लगते हैं तथा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

सिंचाई
काजू एक सूखा सहनशील फसल है, लेकिन शुरुआती 2.3 वर्षों तक नियमित सिंचाई आवश्यक होती है ताकि पौधे अच्छी तरह स्थापित हो सकें। गर्म और शुष्क मौसम में 15.20 दिन के अंतराल पर पानी देना चाहिए। वर्षा ऋतु के बाद यदि लंबे समय तक सूखा पड़े तो मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए हल्की सिंचाई करें। फल बनने के समय (जनवरी . फरवरी) हल्की सिंचाई करने से फल झड़ने की समस्या कम होती है और उपज में वृद्धि होती है। तीन वर्ष के बाद पौधे की जड़ें गहराई तक जाने लगती हैं, जिससे सिंचाई की आवश्यकता कम हो जाती है।

फूलना-फलना
काजू के पौधों में 3 से 5 वर्ष में फल आना प्रारंभ हो जाता है। काजू में पुष्पन की अवधि काफी लम्बी होती है। दक्षिण भारत में फूल मध्य सितम्बर से आना शुरू हो जाते हैं, और फरवरी तक पेड़ों पर आते रहते हैं। मध्यावधि में आने वाले फूल पैदावार की दृष्टि से अधिक उपयुक्त होते हैं। परागण की क्रिया के बाद फलों के पकने में लगभग 62 दिन लग जाते हैं। परन्तु किस्मों और स्थान के प्रभाव से इस समय में अन्तर हो जाता है। फल मार्च से लेकर मई-जून तक पकते हैं।

छंटाई
काजू के पौधों की छंटाई पौधे के सही आकार और स्वस्थ वृद्धि के लिए बहुत जरूरी है। पौधा रोपण के बाद पहले दो वर्षों में मुख्य तना सीधा बढ़ने दें और नीचे से निकलने वाली अनावश्यक शाखाएँ हटा दें। 3.4 वर्ष के बाद पेड़ का आकार कटोरे जैसा बनाना चाहिए ताकि सूर्य का प्रकाश और हवा का प्रवाह समान रूप से हो सके। हर वर्ष फल तोड़ने के बाद सूखी, रोगग्रस्त और आपस में रगड़ने वाली शाखाओं को काट देना चाहिए। इससे नई शाखाएँ निकलती हैं और अगले वर्ष अधिक फल लगते हैं।

फसल कटाई
काजू के पेड़ में फूल आना प्रायः दिसंबर . जनवरी से शुरू होकर फरवरी . मार्च तक रहता है। फल अप्रैल . मई में पकने लगते हैं। जब फल का ऊपरी भाग (सेब जैसा भाग) पीला या लाल हो जाए और नीचे का बीज (नट) भूरे रंग का दिखने लगे, तब कटाई करनी चाहिए। फलों को पेड़ से तोड़ने की बजाय खुद गिरने देना चाहिए ताकि बीज पूरी तरह पक जाए। फिर नट को अलग करके धूप में सुखाएँ।

प्रमुख कीट एवं उनके नियंत्रण
(क) फल छेदक कीट
लक्षणः यह कीट काजू के कोमल पत्तों, फूलों और फलियों का रस चूसता है, जिससे पत्तियाँ काली पड़कर सूख जाती हैं और फल झड़ने लगते हैं।
उपायः फूल आने के समय लैम्डा-सायहेलोथ्रिन 0.005 प्रतिशत या इमिडाक्लोप्रिड 0.005 प्रतिशत का छिड़काव करें। छिड़काव सुबह या शाम के समय करें।
(ख) तना छेदक कीट
लक्षणः यह कीट पौधे के तने या जड़ में छेद कर अंदर की लकड़ी खाता है, जिससे गोंद निकलने लगता है और पौधा सूखने लगता है।
उपायः प्रभावित तनों को काटकर नष्ट करें। छेद में क्लोरोपाइरीफॉस 0.2 प्रतिशत या केरोसिन ऑयल की कुछ बूँदें डालकर मिट्टी से बंद करें। स्वस्थ पौधों के तनों पर प्रति वर्ष एक बार बोर्डो पेस्ट लगाएँ।
(ग) फूल झुलसा कीट
लक्षणः यह छोटे कीट फूलों को नुकसान पहुँचाते हैं जिससे फलन में कमी आती है।
उपायः फूल आने की अवस्था में डाईमेथोएट 0.05 प्रतिशत या स्पिनोसेड 0.004 प्रतिशत का छिड़काव करें।

प्रमुख रोग एवं उनके नियंत्रण
(क) डाईबैक रोग
लक्षणः शाखाओं के सिरे से सूखना शुरू होता है और धीरे-धीरे पूरी शाखा सूख जाती है।
उपायः प्रभावित शाखाओं को काटकर जला दें। कटे हुए भाग पर बोर्डो पेस्ट (1 प्रतिशत ) लगाएँ। वर्षा शुरू होने से पहले बोर्डो मिश्रण (1 प्रतिशत) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) का छिड़काव करें।
(ख) फूल गलन रोग
लक्षणः फूलों पर काले धब्बे पड़ते हैं और फूल झड़ जाते हैं।
उपायः फूल आने से पहले और बाद में मैनकोजेब 0.2 प्रतिशत या कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें।
(ग) जड़ सड़न रोग
लक्षणः पौधे की जड़ें सड़ने लगती हैं, पत्तियाँ पीली होकर गिर जाती हैं और पौधा सूख सकता है।
उपायः जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें।प्रभावित पौधों के चारों ओर की मिट्टी में ट्राइकोडर्मा कल्चर या कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत घोल डालें। गोबर खाद में ट्राइकोडर्मा मिलाकर पौधे के चारों ओर डालें।

उपज
काजू के पौधे 3.4 वर्ष के बाद फल देना शुरू करते हैं और 8.10 वर्ष की आयु में अधिकतम उत्पादन पर पहुँचते हैं। सामान्य परिस्थितियों में एक स्वस्थ पेड़ से प्रति वर्ष लगभग 8.10 किलोग्राम सूखे नट प्राप्त होते हैं। प्रति हेक्टेयर औसतन 8 से 10 किं्वटल सूखे काजू नट की उपज मिल सकती है। अच्छी देखभाल, सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन से यह उपज 12.15 किं्वटल प्रति हेक्टेयर तक बढ़ाई जा सकती है।

लगतः
काजू की खेती की प्रारंभिक लागत भूमि की तैयारी, पौधारोपण, खाद, सिंचाई और श्रम पर आती है। पहले वर्ष में लगभग ₹40,000 से ₹50,000 प्रति हेक्टेयर तक खर्च होता है। इसके बाद के वर्षों में केवल रखरखाव, खाद और सिंचाई पर ₹20,000 से ₹25,000 प्रति हेक्टेयर का खर्च आता है। उचित देखभाल से यह लागत आसानी से पूरी हो जाती है और बाद के वर्षों में अच्छी आय प्राप्त होती है।

आयः
काजू की खेती से किसान को तीसरे वर्ष से ही आमदनी शुरू हो जाती है। तीसरे या चैथे वर्ष में प्रति हेक्टेयर लगभग 400.600 किलोग्राम सूखे काजू नट मिलते हैं, जिससे लगभग ₹60,000 से ₹1,20,000 की आय होती है। छठे से आठवें वर्ष में उपज बढ़कर 800.1000 किलोग्राम तक पहुँचती है, जिससे ₹1.2 से ₹2 लाख की आमदनी हो सकती है। दस वर्ष के बाद पौधे पूर्ण उत्पादन पर आते हैं और प्रति हेक्टेयर 1200.1500 किलोग्राम तक उपज मिलती है, जिससे कुल आय ₹1.8 से ₹3 लाख प्रति हेक्टेयर तक पहुँच जाती है। सभी खर्चों को घटाने के बाद किसान को शुद्ध लाभ के रूप में लगभग ₹1.2 से ₹2 लाख प्रति हेक्टेयर तक की आय प्राप्त होती है।

विपणनः
काजू की विपणन व्यवस्था भी काफी आसान है क्योंकि इसका बाजार स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ है। छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग, धमतरी, जगदलपुर और कांकेर जैसे जिलों में काजू स्थानीय मंडियों में बेचा जा सकता है। इसके अलावा किसान सीधे काजू प्रोसेसिंग यूनिटों को भी उत्पाद बेच सकते हैं, जिससे उन्हें अधिक दाम प्राप्त होते हैं। राज्य में सहकारी समितियाँ और किसान उत्पादक संगठन भी किसानों से काजू खरीदकर सामूहिक रूप से विपणन करते हैं। यदि किसान प्रसंस्करण (भुनाई, छिलाई, पैकिंग) का कार्य स्वयं करें, तो मूल्यवर्धन के माध्यम से उन्हें दुगना लाभ प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार काजू की खेती छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए दीर्घकालिक आय का एक उत्कृष्ट स्रोत बन सकती है।

लेखक :
आरती मंडावी, डॉ. संगीता एवं लिशा तंबोली
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र , राजनांदगांव
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय , सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)

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