शीत ऋतु (सर्दियों के मौसम) में बकरी के बच्चों का प्रबंधन- पशुपालकों के लिए विशेष संदेश
देवेश कुमार गिरी, दीपक कुमार कश्यप, गोविना देवांगन, शैलेश विशाल एवं मो. काशिफ रज़ा


वर्तमान परिवेश में स्वरोजगार हेतु बकरी पालन छोटे और बड़े, सभी किसानों के लिए एक उपयोगी और लाभदायक व्यवसाय माना जाता है। बकरी पालन से नियमित आय मिलती है और कम खर्च में ज्यादा मुनाफा भी होता है। लेकिन सर्दियों का मौसम बकरी पालन के लिए विशेष ध्यान देने का समय होता है, खासकर तब जब बकरी के बच्चे (किड्स) जन्म लेते हैं। नवजात बच्चे बहुत नाजुक होते हैं और ठंड, नमी, हवा और संक्रमण का सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ता है। यदि किसान थोड़ा-सा भी लापरवाह हो जाए, तो बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है। इसलिए सर्दियों के मौसम में बकरी के बच्चों का सही प्रबंधन ही उनका जीवन बचाता है और उन्हें स्वस्थ बनाता है। इस लेख में किसान भाइयों के लिए सर्दियों में बकरी के बच्चों की देखभाल से लेकर पोषण, रोग प्रबंधन, बाड़े की व्यवस्था, घरेलू उपाय और गर्भवती बकरियों की देखभाल तक सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को विस्तार से बताया गया है।
जन्म के बाद तुरंत देखभाल – बच्चे के जीवन की सबसे जरूरी शुरुआत
सर्दियों में जन्म लेने वाले बकरी बच्चों की पहली देखभाल बहुत सावधानी से करनी चाहिए। जन्म के तुरंत बाद बच्चे का शरीर गीला होता है और गीली हालत ही ठंड का सबसे बड़ा कारण बनती है। इसलिए बच्चे को साफ, सूखे और गर्म कपड़े से अच्छी तरह पोंछकर सुखाना चाहिए। यदि बच्चा ठंडा हो जाए तो उसकी सांस धीमी होने लगती है और वह चलने-फिरने में सुस्ती दिखाता है। साफ सूखाने से उसका शरीर गर्म रहता है और वह सक्रिय बना रहता है।
जन्म के बाद बच्चा अक्सर गंदगी में गिर जाता है, इसलिए नाभि को कटने के बाद 5% आयोडीन घोल से साफ करना बेहद जरूरी है। इससे बैक्टीरिया का खतरा कम होता है और नाभि से संक्रमण नहीं फैलता। बच्चा जन्म के पहले 30 मिनट में ठंडी हवा से बचाकर गर्म स्थान पर रखें। बिछावन में मोटा भूसा या सूखी घास डालें ताकि बच्चे को ठंडी जमीन न लगे। शुरुआती दो-तीन घंटे बच्चे के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए किसान भाइयों को इस समय पूरा ध्यान देना चाहिए।
पहला दूध (कोलोस्ट्रम) – जीवनरक्षक अमृत
बकरी के बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य का सबसे बड़ा आधार है—पहला दूध यानी कोलोस्ट्रम। इसे प्रकृति का बनाया हुआ टीका कहा जाता है, क्योंकि इसमें विशेष प्रकार के संरक्षण तत्व होते हैं जो बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं। बच्चा जितनी जल्दी यह दूध पी ले, उतना ही अच्छा होता है। जन्म के एक घंटे के अंदर पहला दूध पिलाना सबसे बेहतर है।
कोलोस्ट्रम बच्चे के पेट की गंदगी साफ करता है, उसे गर्मी देता है और उसे संक्रमण से बचाता है। यदि बच्चे को यह दूध समय पर न मिले तो वह जल्दी बीमार पड़ जाता है, उसका विकास धीमा हो जाता है और कई बार तो उसकी मौत तक हो सकती है। इसलिए किसान भाई कभी भी पहला दूध पिलाने में लापरवाही न करें। यदि बच्चा कमजोर हो या खड़ा नहीं हो पा रहा हो, तो कप या बोतल की सहायता से भी यह दूध पिलाया जा सकता है।
पहले 24 घंटों में बच्चे को कम से कम 3–4 बार कोलोस्ट्रम अवश्य पिलाएँ। इससे बच्चे की रोगों से लड़ने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
बाड़े को गर्म, सूखा और सुरक्षित बनाना – सर्दियों में सबसे जरूरी काम
सर्दियों में बकरी बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण ठंड और नमी है। इसलिए बाड़ा हमेशा साफ, सूखा और गर्म होना चाहिए। सीधे जमीन पर बच्चे को न बैठाएँ, क्योंकि ठंडी जमीन शरीर से गर्मी खींच लेती है। फर्श पर भूसा, पुआल, लकड़ी का बुरादा या सूखी पत्तियाँ डालकर मोटा बिछावन बनाएँ। यह बिछावन बच्चे को गर्म रखता है और उसे आराम भी देता है।
बाड़े के दरवाजों और खिड़कियों पर बोरा, प्लास्टिक या तिरपाल लगा दें ताकि तेज हवा अंदर न आए। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि थोड़ा वेंटिलेशन रहे, ताकि बदबू या नमी अंदर जमा न हो। रात में तापमान अधिक गिरता है, इसलिए बाड़े में अतिरिक्त सुरक्षित परतें डालना अच्छा होता है।
कोहरा होने पर बाड़ा बंद रखें। धूप निकलने पर बाड़े को कुछ देर खोल दें ताकि धूप अंदर आए और वातावरण सुखा हो जाए। पानी की बूंदें, मूत्र या मल की नमी बाड़े में न रहने दें। इससे कीटाणु पनपते हैं और बच्चे बीमार होते हैं।
बच्चे के भोजन और दूध प्रबंधन – धीरे-धीरे मजबूत बनाना
सर्दियों में बच्चे की भूख और पाचन दोनों का ध्यान रखना पड़ता है। जन्म के बाद पहले 2–3 सप्ताह तक बच्चे का मुख्य भोजन मां का दूध ही होता है। दूध हमेशा हल्का गुनगुना देना बेहतर होता है, क्योंकि ठंडा दूध बच्चे को दस्त और पेट दर्द दे सकता है। दिन में 3–4 बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दूध देना चाहिए।
जब बच्चा 15–20 दिन का हो जाए, तब उसे हल्का सूखा दाना, मुलायम हरा चारा और साफ पानी देना शुरू करें। शुरुआत में बच्चे कम खाएगा, लेकिन धीरे-धीरे वह चारे की आदत डाल लेता है। इसके लिए बाजार में मिलने वाला किड-स्टार्टर भी उपयोग कर सकते हैं। साफ पानी हमेशा उपलब्ध होना चाहिए, लेकिन बेहद ठंडा पानी न दें।
दूध पिलाने वाले बर्तन की सफाई बहुत महत्वपूर्ण है। बर्तन गंदा रहेगा तो बच्चा दस्त और संक्रमण का शिकार हो सकता है। यदि बच्चा कमजोर है या उसकी भूख कम है, तो दाना और दूध की मात्रा डॉक्टर की सलाह के अनुसार बढ़ाएँ।
सर्दियों में रोगों से बचाव – सावधानी ही सुरक्षा
सर्दियों में बकरी बच्चों में सबसे ज्यादा निमोनिया और दस्त का खतरा होता है। ठंडी हवा से सीधे बच्चे को बचाना अत्यंत जरूरी है। यदि बच्चा ठंड खा जाए तो उसकी नाक बहने लगती है, खाँसी आती है और वह सुस्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में तुरंत ध्यान देना चाहिए। पशुपालक शाम के समय अजवाइन की धूम कर सकते हैं।
दस्त होने की स्थिति में बच्चे का शरीर जल्दी कमजोर हो जाता है। इसलिए दूध पिलाने के बर्तन हमेशा साफ रखें। गंदा पानी या ठंडा दूध दस्त का कारण बनता है। साफ-सफ़ाई रोग नियंत्रण की पहली शर्त है। बाड़ा रोज साफ करें और नमी खत्म करें।
सामान्य लक्षण जैसे खाँसी, तेज सांस, नाक से पानी आना, पेट फूलना, कमजोरी या बुखार को नजरअंदाज न करें। सही समय पर डॉक्टर को दिखाने से बच्चा बच जाता है। सर्दियों में बचाव इलाज से बेहतर है।
बच्चों को अलग और सुरक्षित पेन में रखना – दुर्घटना से बचाव
छोटे बकरी बच्चों को बड़े बकरों के साथ रखना सुरक्षित नहीं होता, क्योंकि बड़े बकरे उन्हें चोट पहुँचा सकते हैं। इसलिए बच्चों के लिए अलग पेन (किड पेन) बनाना सबसे अच्छा उपाय है। यह पेन छोटा, गर्म, साफ और आरामदायक होना चाहिए।
पेन में भूसा या पुआल डालकर मुलायम बिछावन बनाएँ। बच्चे इस पेन में सुरक्षित रहते हैं और उन्हें दूध पिलाना भी आसान हो जाता है। समूह प्रबंधन भी अच्छा रहता है—समान उम्र के बच्चों को साथ रखें ताकि वे एक-दूसरे के साथ गर्मी साझा कर सकें।
दिन में 1–2 घंटे बच्चों को धूप में रखना बहुत फायदेमंद होता है। धूप शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। रात में पेन को पूरी तरह ढँक दें ताकि हवा अंदर न आए।
ठंड से बचाव के घरेलू उपाय – कम खर्च में बड़े परिणाम
गांव में उपलब्ध चीजों से भी बकरी बच्चों की ठंड से रक्षा की जा सकती है। पुराने ऊनी कपड़ों, जूट के बोरे या कंबल की मदद से बच्चों को ढककर रखा जा सकता है। मोटे कपड़े शरीर की गर्मी को बाहर नहीं जाने देते।
कार्डबोर्ड बॉक्स में पुआल भरकर तैयार किया ‘गर्म घर’ भी बच्चों को ठंड से बचाता है। रात में बाड़े में चूल्हे की ठंडी राख एक कोने में रख दें। यह हल्की गर्मी देती है और पूरी रात तापमान कुछ स्थिर रहता है। ध्यान रखें कि आग या अंगारे कभी भी बाड़े के पास न रखें।
फर्श पर प्लास्टिक की चादर बिछाने से नमी ऊपर नहीं आती। खिड़कियों के छेद बोरी से बंद कर दें। बारिश और कोहरा होने पर बाड़ा बिल्कुल बंद रखें।
गर्भवती बकरियों की देखभाल – बच्चे के भविष्य की नींव
गर्भवती बकरी की देखभाल बकरी बच्चे की सेहत का आधार है। गर्भावस्था के अंतिम दो महीनों में बकरी को खास ध्यान देना चाहिए। उसे पौष्टिक दाना, हरा चारा और साफ पानी पर्याप्त मात्रा में दें। ठंड के मौसम में वह जल्दी कमजोर हो सकती है, इसलिए उसे आराम और गर्म माहौल दें।
गर्भवती बकरी पर ज्यादा काम न डालें। जैसे-तैसे चलने या उछलने की स्थिति में बच्चा समय से पहले जन्म ले सकता है। प्रसव से पहले जगह साफ-सुथरी और गर्म होनी चाहिए। डॉक्टर की सलाह पर गर्भावस्था में जरूरी टीका भी लगवाएँ।
अच्छी देखभाल करने से बकरी स्वस्थ बच्चा जन्म देती है, जिसका स्वास्थ्य बेहतर होता है और वह तेजी से बढ़ता है।
टीकाकरण और दवाएँ – रोग रोकथाम का मजबूत हथियार
टीकाकरण बकरियों और बच्चों दोनों को बड़ी बीमारियों से बचाता है। सर्दियों में रोग फैलने की संभावना अधिक होती है, इसलिए पीपीआर/बकरी प्लेग, फड़किया रोग/ एंटरोटॉक्सिमिया, खुरपका और मुंहपका रोग के टीके समय पर लगवाना चाहिए। टीकाकरण का रिकॉर्ड रखना अच्छा होता है, ताकि समय पर अगला टीका लग सके।
समय-समय पर (1–2 महीने में) कृमिनाशक दवा देना जरूरी है। कृमिनाशक दवा आंतरिक परजीवियों को मारने में मदद करती है और इस प्रकार बच्चे की बढ़वार अच्छी होती है।
सही समय पर दवा और टीका देने से बीमारी फैलने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है और बकरी पालन सुरक्षित रहता है।
निष्कर्ष
सर्दियों में बकरी के बच्चों की देखभाल थोड़ी मेहनत और ध्यान मांगती है, लेकिन इससे बड़ा लाभ मिलता है। बच्चे को गर्म, सूखा और आरामदायक वातावरण दें। समय पर पहला दूध, संतुलित आहार और साफ पानी उनकी सेहत की कुंजी है। रोज बाड़ा साफ रखें और बच्चों को सुबह की धूप दिखाएँ। किसी भी बीमारी के संकेत को हल्के में न लें। बच्चे तेज़ी से बढ़ें, इसके लिए नियमित टीकाकरण और दवाओं का उपयोग करें। सही प्रबंधन अपनाने से बच्चे स्वस्थ, मजबूत और तेजी से बढ़ते हैं। आगे चलकर यही बच्चे अच्छी बकरियाँ बनकर किसान भाइयों की आय बढ़ाते हैं।
लेखक :
देवेश कुमार गिरी, दीपक कुमार कश्यप, गोविना देवांगन, शैलेश विशाल एवं मो. काशिफ रज़ा
वेटनरी पॉलिटेक्निक
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग छत्तीसगढ़










