

परिचय – नारियल (कोकोस न्यूसीफेरा एल.) एक बहुपयोगी और आर्थिक रूप से लाभकारी पौधा है, जिसे कल्पवृक्ष भी कहा जाता है। यह मुख्यत उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है जहां नारियल का फल पेय, खाद्य एवं तेल के लिए उपयोग किया जाता है, वही फल का छिलका, पने एवं लकड़ी विभिन्न औद्योगिक कार्यों में उपयोगी होता है। नारियल में पोषक तत्व भी प्रचुर मात्रा में होता है, नारियल की गिरी सुखाकर प्राप्त किये जाने वाले खोपरे में वानस्पतिक तेल की सर्वाधिक मात्रा 65 से 70 प्रतिशत तक पाया जाता है। इन्हीं उपयोगिताओं के कारण नारियल को कल्पवृक्ष (स्वर्ग का वृक्ष) भी कहा गया है। पारंपरिक रूप से इसे 7.5 मीटर 7.5 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है, जिससे प्रति हेक्टेयर लगभग 175 पौधे लगाए जा सकते हैं। किंतु आधुनिक कृषि पद्धतियों के विकास के साथ, भूमि का अधिकतम उपयोग, प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादन वृद्धि और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से सघन खेती प्रणाली को अपनाया जा रहा।
नारियल की खेती से न केवल किसानों की आय में वृद्धि संभव है, बल्कि इससे कृषि आधारित उद्योगों को भी बढ़ावा मिलता है। उचित योजना और तकनीकी मार्गदर्शन के साथ की गई नारियल की खेती, सतत कृषि विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पोषक तत्व
| पोषक तत्व | विटामिन | खनिज |
| प्रोटीनः 7.8 ग्राम कार्बोहाइड्रेटः 35.40 ग्राम वसा (फैट): 80.85 ग्राम रेशा (फाइबर): 20.22 ग्राम ऊर्जा (कैलोरी): 850.900 किलो-कैलोरी विटामिन सीः 8.10 मिलीग्राम |
विटामिन बी1 (थायमिन): 0.15 मिलीग्राम विटामिन बी2 (राइबोफ्लेविन): 0.05 मिलीग्राम विटामिन बी3 (नायसिन): 1.3 मिलीग्राम विटामिन बी6: 0.7 मिलीग्राम फोलेट (विटामिन बी9): 60 माइक्रोग्राम कैल्शियमः 40.50 मिलीग्राम |
मैग्नीशियमः 70.75 मिलीग्राम फॉस्फोरसः 250.270 मिलीग्राम पोटैशियमः 850.900 मिलीग्राम सोडियमः 50.60 मिलीग्राम आयरन (लोहा): 5.6 मिलीग्राम जिंकः 2.2.5 मिलीग्राम |
जलवायु –
नारियल एक बहुवर्षीय और लाभकारी उष्णकटिबंधीय वृक्ष है। उपयुक्त तापमान 25 से 35 के बीच होता है, जबकि 40 से अधिक या 10 से कम तापमान पर इसकी वृद्धि और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। नारियल की सफल खेती के लिए समशीतोष्ण और नमीयुक्त जलवायु उपयुक्त होती है। इसकी खेती समुद्र तल से 1000-1200 मीटर की ऊंचाई तक संभव है। वार्षिक वर्षा 200-300 सेमी के बीच और समान रूप से वितरित होनी चाहिए, लेकिन यदि वर्षा कम हो तो सिंचाई की सहायता से भी इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
मृदा –
नारियल की सघन खेती के लिए ऐसी मिट्टी सबसे अच्छी रहती है जिसमें पानी जल्दी न रुके और हवा आसानी से चल सके। बलुई-दोमट या सामान्य दोमट मिट्टी नारियल के पौधों को तेजी से बढ़ने में मदद करती है। मिट्टी का PH5 से 8 के बीच ठीक माना जाता है।
उन्नत नारियल की किस्मों को तीन वर्गों में बांटा गया है जिसमें लम्बी, बौनी एवं संकर किस्में होती है।
(क) लम्बी किस्में– केरा बस्तर, वेस्ट कोस्ट टॉल (WCT), ईस्ट कोस्ट टॉल (ECT), लक्ष्यद्वीप ऑर्डनरी, फिलीपिन्स ऑर्डनरी, अंडमान ऑर्डनरी, तिप्तर टॉल, फिलीपिन्स टॉल, सैन रेमोन आदि।
(ख) बौनी किस्में– गौतमी गंगा, चैघाट ऑरेंज ड्वार्फ (COD), चैधाट ग्रीन ड्वार्फ (CGD), चैधाट यलो ड्वार्फ (CYD), गंगाबोंडम (GBGD), मलायन ग्रीन ड्वार्फ (MGD), मलयन यलो ड्वार्फ (MYD) आदि।
(ग) संकर किस्में- केरा संकरा (WWCT X CODWWW), चन्द्रसंकरा (COD X WCT), कल्प श्रेष्ठ (MYD X TPT). केरा गंगा (CT X GBGD), लक्ष्यगंगा (LCT X GBGD), केराश्री (CT X MYD), केरा सौभाग्य (CT X SSAT), कल्पसमृद्धि (MYD X WCT), कल्पसंकरा (CGD X WCT) आदि।
नारियल की प्रमुख किस्में
केरा बस्तरः छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख किस्म है। यह किस्म अखिल भारतीय ताड़ समविन्त अनुसंधान परियोजना जगदलपुर द्वारा विकसित किया गया है। भारत के चार राज्यों के लिए जारी की गई है। इस किस्म को केंद्रीय किस्म विमोचन समिति, द्वारा वर्ष 2010 में अधिसूचित किया गया है। इस किस्म में कोपरा 142 ग्राम एवं डाब जल 3.30 मि.लि. पाया जाता है।
गौतमी गंगाः इस किस्म को गंगा बोडम किस्म से चयन विधि द्वारा 2007 में विकसित किया गया। यह एक बौनी किस्म है। जो जल्दी फलन में आने वाली तथा डाब पानी के लिए उपयुक्त है। औसत उपज 80 फल/वृक्ष/वर्ष तथा कोपरा-156 ग्राम प्रति फल और तेल 68 प्रतिशत पाया जाता है।
केरा करेलमः इस किस्म का विकास प्छक् 069 किस्म के सदन से किया गया है। जो 58 महीने में फलन में आ जाता है। उत्पादन 147 फल प्रति वक्ष प्रति वर्ष कोपरा उत्पादन 3.58 टन प्रति हेक्टेयर तथा तेल 67.8 प्रतिशत पाया जाता है। यह किस्म सूखा के लिए मध्यम सहनशील तथा विभिन्न प्रकार के मिट्टियों के लिए उपयुक्त है।
चन्द्रशंकराः यह एक संकर किस्म है जिसे चैघाट ऑरेज ड्वार्फ एवं पश्चिमी तटीय लम्बा किस्म के संकरण द्वारा तैयार किय गया है। इसे नारियल पानी के लिए उपयोग किया जाता है। इस किस्म का नारियल फल आकर्षक गोलाकार एवं औसतन पानी की मात्रा 220 से 260 मिली तक रहता है। प्रति वृक्ष फल उत्पादन 69 फल/वर्ष होता है।
लक्ष्यद्वीप आर्डनरीः यह एक लम्बी किस्म है जिसमें प्रति वृक्ष औसत उत्पादन 69 फल/वृक्ष/वर्ष है। लेकिन इस किस्म के कुछ वृक्षों में 150-160 फल तक उत्पादन प्राप्त हो रहा है। फल का गिरी एवं पानी स्वादिष्ट होता है। इस किस्म की बस्तर में अच्छी संभावना है, अधिक उत्पादन होने पर फल का आकार छोटा हो जाता है।
पौध रोपण
नारियल में अत्यधिक अनुवांशिक विविधताएँ पाई जाती हैं और इनका उत्पादन केवल बीजों के माध्यम से ही संभव होता है। गुणवत्तापूर्ण पौधों के चयन के समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि बीजू पौधे की आयु 12 से 18 माह के मध्य हो तथा उनमें कम से कम 5-7 हरे पत्ते हों। चयनित जगह पर अप्रैल-मई माह में 6.5 ग 6.5 मीटर (25 ग 25 फीट) की दूरी पर 1ग1ग1 मीटर आकार के गढ्डे बनाए जाते हैं। प्रथम वर्षा होने तक गड्डा खुला रखा जाता है जिसमें 30 किलो गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट एवं सतही मिट्टी को मिलाकर इस तरह भर दिया जाता है कि ऊपर से 20 से.मी. गड्डा खाली रहे। शेष बची हुई मिट्टी से पौधा लगाने के बाद गढ्डा के चारों ओर मेढ़ बना दिया जाता है ताकि गढ्डे में वर्षा का पानी इकट्ठा न हो।
रोपण की दूरी
| रोपण की विधि | दूरी | पौध संख्या प्रति हेक्टेयर |
| पारंपरिक खेती | 7.5-7.5 मी. | 175 |
| सघन खेती | 6.5-6.5 मी. | 235 |
| अतिसघन खेती | 5.0-5.0 मी. | 400 |
नर्सरी
नर्सरी के लिए उचित जल निकास वाले छायादार स्थान का चयन करना चाहिए। इसके लिए 1.5 मीटर चैड़ी एवं पर्याप्त लंबाई की क्यारियां बनानी चाहिए। क्यारियों के बीच कम से कम 7.5 से.मी. तथा कतारों के बीच 30 से.मी. का अंतराल होना चाहिए। गर्मियों में दो दिनों के अंतराल में एक बार सिंचाई करनी चाहिए। दीमक का प्रकोप होने पर कीटनाशक दवा इमीडाक्लोप्रिड का प्रयोग करें। नारियल लगाने का उपयुक्त समय मई-जून से सितम्बर तक होता है।
खाद एवं उर्वरक
लंबी अवधि तक अधिक उत्पादन के लिए अनुशंसित मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का नियमित योग आवश्यक है। वयस्क नारियल पौधों में प्रतिवर्ष प्रथम वर्षा के समय जून में 30-40 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग करें प्रति पौधा प्रतिवर्ष 500 ग्राम नाइट्रोजन, 320 ग्राम फॉस्फोरस और 1200 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है।
उपरोक्त उर्वरकों के अलावा जिन क्षेत्रों में बोरोन नामक सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी हो उन क्षेत्रों में 50 ग्राम प्रति वयस्क पेड़ प्रति वर्ष बोरोक्स के प्रयोग करने से क्राउन चोकिंग रोग की समस्या नहीं रहती है। इसके अलावा मैग्नीशियम नामक सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी वाले क्षेत्रों में मैग्नीशियम सल्फेट 500 ग्राम प्रति वयस्क पेड़ प्रति वर्ष देना लाभदायक पाया गया है।
सिंचाई
पौध रोपण के बाद दो वर्ष गर्मियों में प्रति पौध 45 लीटर पानी से सिंचाई करें और पर्याप्त छाया दें। नारियल के उत्पादन बढ़ाने के लिए गर्मियों में सिंचाई करें। नारियल पेड़ के लिए चार दिनों में एक बार 200 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। पेड़ के नीचे भाग से 1.8 मीटर की दूरी पर 10-20 सेंटीमीटर गहराई में थाला खोदकर सिंचाई करें।
ड्रिप सिंचाई
पानी की कमी वाले इलाकों में ड्रिप सिंचाई अधिक लाभदायक है। ड्रिप सिंचाई से प्रत्येक नारियल पेड़ को प्रति दिन 30-32 लीटर पानी देना चाहिए। ड्रिप सिंचाई द्वारा उर्वरक का प्रयोग भी किया जा सकता है।
सहभान फसलें
सघन नारियल बागान में उपलब्ध खुली जगह और शुरुआती वर्षों में छाया कम होने के कारण निम्नलिखित फसलें भी उगाई जा सकती हैं। अनानास, हल्दी, अदरक, केला, मिर्च, लोबिया, मूंगफली, और मूंग जैसी फसलें। ये फसलें अतिरिक्त आय के साथ मिट्टी की उर्वरता भी बनाए रखती हैं।
निंदाई-गुड़ाई
नारियल में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए नियमित निदाई गुड़ाई एवं जुताई की आवश्यकता होती है। इन क्रियाओं से खरपतवार नियंत्रण के साथ ही जड़ों में वायु का संचालन पर्याप्त रूप में होता है। मिट्टी की नमी संरक्षित रहती है तथा मृदाक्षरण नहीं होता है।
नारियल की तोड़ाई
नारियल की तोड़ाई पौध की उम्र और उपयोग के उद्देश्य पर निर्भर करती है। सामान्यतः नारियल के पेड़ में फूल आने के लगभग 6 से 7 महीने बाद जल नारियल की तोड़ाई की जाती है, जब फल हरे और अंदर का पानी भरपूर होता है। यदि सूखा नारियल तैयार करना हो, तो फूल आने के 11 से 12 महीने बाद तोड़ाई की जाती है, जब फल का छिलका भूरा हो जाता है और अंदर की गिरी सख्त हो जाती है। नारियल की तोड़ाई लगभग हर 45 से 60 दिन में की जाती है, जिससे एक पेड़ से साल में 5 से 6 बार फल तोड़े जा सकते हैं। उचित देखभाल और प्रबंधन से एक स्वस्थ पेड़ से प्रति वर्ष 70 से 100 नारियल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
उपज
नारियल की उपज विभिन्न किस्मों एवं उत्पादन क्षेत्रों पर निर्भर करती है। इसकी औसत उपज लगभग 3500-6000 फल/हे/वर्ष होती है। इसके अतिरिक्त अन्तरवती फसलों एवं बेल वाली फसलों को उगाकर भी बाग से आमदनी की जा सकती है,
नारियल के मुख्य कीट एवं व्याधियाँ
कीट व्याधियां एवं उनका नियंत्रण
1. रूगोज सफेद मक्खी रूगोज स्पाईरिलिंग व्हाईट फ्लाई
सफेद मक्खी की शिशु एवं वयस्क अवस्था पौधों से लगातार रस चूसते है तथा पत्तियों के ऊपरी सतह पर मीठा द्रव स्त्रावित करने के कारण काले फफूंद का प्रकोप भी हो जाता है। नियंत्रण के लिए डिटर्जेंट मिश्रित पानी को पौधों पर अच्छी प्रकार से छिड़काव करें। नीम आधारित दवाईयों का प्रयोग करें। पीला चिपचिपा प्रपंच (येलो स्टिकी ट्रेप) का प्रयोग करें। आईसेरिया फ्यूमोसोरोसिया नामक कीटानाशी फफूंद का छिड़काव करें। रासायनिक कीटनाशकों का इस पर प्रभाव नहीं होता है अतः उपयोग न करे।
2. गेंडा भृंग (राईनोसिरस बीटल)
इस कीट के आक्रमण से पर्ण कोपल (केंद्रस्थ पत्ती) पूर्णरूप से खुलने पर पत्ते ज्यामितीय रूप से त्रिभुजाकार कटे हुए दिखाई देते हैं। इन कीटों को लोहे के हुकनुमा रॉड से फंसाकर बाहर निकाल देना चाहिए। प्रभावित वृक्ष की ऊपरी तीन पत्तियों के पर्णकक्ष में 25 ग्राम क्लोरपाड़रीफॉस धूल को 200 ग्राम महीन बालू में मिश्रित कर मई, सितम्बर व दिसम्बर के महीनों में रख दें। साथ ही उद्यान को साफ-सुथरा रखें।
3. लाल ताड़ घुन (रेड पाम वीविल)
यह कीट तने पर छिद्र कर देता है। इन छिद्रों से भूरे रंग का चिपचिपा स्त्राव निकलता है साथ ही कीट द्वारा चबाये हुए पेड़ के रेशे भी बाहर निकलते हैं। नियंत्रण हेतु तने को किसी भी प्रकार की क्षति या घाव होने से रोके। फेरूजिनोल नामक फिरोमोन प्रपंच का प्रयोग प्रभावी होता है।
इसके प्रभाव यदि पौधे के शीर्ष भाग पर होने से यह नए कलिका को खा जाती है जिसका यदि उपचार ना किया जाए तो अग्रस्थ कलिका पर सड़न होने लगती है व पौधे का विकास रूक जाता है और पौधा धीरे-धीरे विकास रूक जाने से मर जाता है, इस प्रकार की समस्या सामान्य तौर पर बरसात के मौसम में देखी जाती है।
4. नारियल माइट
इसका प्रभाव विकसित हो रहे फलों पर ज्यादा देखा गया है जिसके कारण फल पीले पड़ के सुख जाते है और उसका आकार छोटा रह जाता है। इसके नियंत्रण के लिए नीम आधारित या सल्फर दवाओं का छिड़काव करें।
रोग एवं उनका नियंत्रण
- फल सड़न एवं फल गिराव (नट फॉल) इस बीमारी के कारण मादा फूल एवं अपरिपक्व फल गिरते है। इसके नियंत्रण के लिए नारियल के शीर्ष पर एक प्रतिशत बोडों मिश्रण या 0.5 प्रतिशत कार्बेडाजिम नामक दवा का छिड़काव एक बार वर्षा प्रारंभ होने के पूर्व और पुनः दो माह के अंतराल पर करना चाहिए।
- कली सड़न (बडरॉट) इस बीमारी में कोपले (केंद्रस्थ पत्ती) झुकी हुई दिखाई देती है। नारियल का सम्पूर्ण शीर्ष नीचे गिर जाता है तथा सड़ने जैसी दुर्गध आती है। शीर्ष के मरे हुये ऊतकों को निकाल कर 10 प्रतिशत बोडोपेस्ट का लेप करें जब तक की नये प्ररोह नहीं निकल जाते।
- शिखर अवरोधन (क्राउन चोकिंग) इस रोग के कारण केन्द्रिय शिखर का वृद्धि रूक जाता है तथा पत्तियों में गुच्छन होकर उसकी आकृति विकृत हो जाती है। यह रोग मृदा में बोरान पोषक तत्व की कमी से होता है। इस रोग से बचाव के लिए उर्वरक एवं खाद की अनुशंसित मात्रा के साथ 50 ग्राम बोरेक्स प्रतिवर्ष प्रति पौधा मिला दें।
लागत आमदनी
नारियल की खेती की शुरुआती लागत पहले वर्ष में अधिक होती है, जिसमें खेत की तैयारी, पौध, खाद और सिंचाई पर लगभग ₹25,000 से ₹30,000 प्रति एकड़ खर्च आता है। बाद के वर्षों में रख-रखाव पर ₹15,000 से ₹20,000 तक खर्च होता है। एक पेड़ से साल में 70 से 100 नारियल मिलते हैं और एक एकड़ में 70 से 80 पेड़ लगाकर 5000 से 8000 नारियल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। जल नारियल बेचने पर 25₹ 35₹ प्रति नारियल और सूखा नारियल बेचने पर 12₹12 18₹ प्रति नारियल की दर से सालाना ₹80,000 से ₹2 लाख तक की आमदनी होती है। औसतन ₹60,000 से ₹1.5 लाख तक शुद्ध मुनाफा मिलता है। नारियल के पेड़ 60 70 वर्ष तक फल देते हैं, जिससे यह लंबी अवधि की लाभकारी फसल बनती है।
लेखक:
आरती मंडावी एवं डॉ. संगीता
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र , राजनांदगांव
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय , सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)










