

स्ट्राबेरी का वानस्पतिक नाम (फ्रेगेरिया अनानासा) है तथा यह गुलाब रोजेसी वंश से है। इसकी पत्तियों के निचले हिस्से से कोमल शाखाएं निकलती हैं, जिन्हें रन्नरज (भूस्तारी) कहते हैं। इस रन्नरज (भूस्तारी) पर कुछ अंतराल पर कलियां फटती हैं. जिनसे पत्ते और जडें उभरने पर यह नए पौधों में परिवर्तित हो जाती हैं। स्टाबेरी एक अत्यंत लोकप्रिय फल है, जो अपनी आकर्षक लाल रंगत, सुगंधित स्वाद और पौष्टिक गुणों के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह फल विटामिन, आयरन, कैल्शियम तथा एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। इसमें विटामिन विटामिन सी लगभग 58.60 मिलीग्राम विटामिन ए 1.2 माइक्रोग्राम विटामिन के 2.3 माइक्रोग्राम विटामिन बी9 (फोलेट): 24 माइक्रोग्राम विटामिन बी6: 0.05 मिलीग्राम विटामिन बी1: 0.02 मिलीग्राम विटामिन बी2: 0.02 मिलीग्राम विटामिन बी3: 0.4 मिलीग्राम तथा खनिजों में पोटेशियम 150.160 मिलीग्राम, कैल्शियम 15.16 मिलीग्राम और फास्फोरस 24 मिलीग्राम पाये जाते जो कि स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते है।
भूमि
स्ट्राबेरी की बागवानी सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है परन्तु अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है। मिट्टी का पी० एच० मान 5.8 से 6.5 होना चाहिए। जिसमें जल निकास का उचित प्रबंध हो तथा भूमि में जीवांश उपयुक्त मात्रा में 2.3% हो ।
जलवायु
स्ट्रॉबेरी ठंडी और समशीतोष्ण जलवायु में सबसे अच्छी होती है, लेकिन मैदानी इलाकों में भी नवंबर से फरवरी तक ठंडे मौसम में इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
तापमानः
उपयुक्त सीमाः 15.250 सेल्सियस 300 सेल्सियस से अधिक तापमान पर पौधों की वृद्धि धीमी हो जाती है और फल की गुणवत्ता घटती है। पौधों को 6.8 घंटे की हल्की धूप चाहिए। बहुत तेज धूप में पौधा झुलस सकते हैं, इसलिए छायादार नेट या मल्च का उपयोग लाभकारी होता है।
किस्मेंः
छोटी: ट्योगा, टोरे, एन आर राऊन हैड, रैडकोट, कटरांई स्वीट आदि ।
बड़ी: चांडलर कन्फ्यूचरा, डागलस, गौरेला, पजारों, फर्न, ऐडी, सेलवा, ब्राईटन, बेलरूबी।
पौध रोपण:
छत्तीसगढ़ में स्ट्रॉबेरी का रोपण अक्टूबर.नवंबर में किया जाता है, क्योंकि इस समय तापमान 15.250 के बीच रहता है जो पौधों की जड़ जमने और शुरुआती वृद्धि के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। रोपण से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करना आवश्यक है, जिसके लिए दो.तीन गहरी जुताइयाँ कर मिट्टी को भुरभुरी बनाया जाता है और 20.25 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर खाद मिलाई जाती है। इसके बाद खेत में 25.30 सेमी लंबी और 1 से 1.2 मीटर चौड़ी मेड़ें तैयार की जाती हैं। छत्तीसगढ़ जैसे गर्म और नमी वाले क्षेत्रों में मल्चिंग के लिए सूखी घास-पत्तों से भी करने से लाभ मिलता है प्लास्टिक मल्चिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है । इसके लिए काली-सफेद मल्च शीट बिछाई जाती है जो नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण और फलों की गुणवत्ता सुधारने में मदद करती है।
रोपण के समय मल्च शीट पर 25-30 सेमी दूरी रखते हुए छोटे-छोटे छेद बनाकर स्वस्थ और रोग-मुक्त रनर पौधे लगाए जाते हैं। पौधे को इस प्रकार लगाना चाहिए कि उसकी जड़ें सीधी मिट्टी में जाएँ और पौधे का तना जड़ संगम (क्राउन) भाग मिट्टी की सतह के बराबर रहे इस हिस्से को अधिक दबाने या मिट्टी के भीतर दँसाने से पौधे की वृद्धि रुक सकती है और सड़न बढ़ सकती है। पौधे से पौधे की दूरी 25.30 सेमी और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30.45 सेमी रखी जाती है, जिससे एक हेक्टेयर में लगभग 35,000.40,000 पौधे सुगमता से लगाए जा सकते हैं। रोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई दी जाती है और शुरुआती 10.12 दिनों तक नमी बनाए रखना आवश्यक होता है ताकि जड़ें तेजी से स्थापित हो सकें। सही दूरी, उपयुक्त जल-निकासी, मल्चिंग और स्वास्थ्यपूर्ण पौध उपयोग के साथ किया गया रोपण स्ट्रॉबेरी उत्पादन की नींव मजबूत बनाता है और आगे चलकर अधिक फलन और बेहतर गुणवत्ता का आधार तैयार करता है।
सिंचाई:
हल्की सिंचाई बार-बार करनी चाहिए। सामान्यतः ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिन व शीत ऋतु में 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते हैं। ड्रिप विधि से लाभ होता है व मल्चिंग के लिए सूखी घास-पत्तों से भी करने से लाभ मिलता है। इससे नमी बनी रहती है, खरपतवार भी कम होते हैं व पाले से भी कम नुकसान होता है। फल भी मिट्टी से सीधे संपर्क में नहीं आते व खराब होने से बच जाते हैं।
खाद व उर्वरक:
भूमि की तैयारी के समय 250-300 कु० अच्छी सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर देना चाहिये। अच्छी फसल लेने के उद्देश्य से 75-100 किग्रा. नत्रजन 80-120 किग्रा. फॉस्फोरस 50-75 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की आधी मात्रा पौध रोपण के समय 15-20 सेमी गहराई पर देना चाहिये। नत्रजन की आधी मात्रा रोपण के एक माह बाद तथा शेष नत्रजन एवं पोटाश को फूल जाने के समय देना चाहिये।
फल तोड़ना एवं उपज
मैदानी क्षेत्रों में स्ट्राबेरी की फसल फरवरी से अप्रैल तक रहती है। पर्वती भागों में फल मार्च से जून के प्रथम सप्ताह तक पकते रहते हैं। फल जब पूर्णरूप से लाल हो जाएँ तभी तोड़ना चाहिये। दूर बाजार में भेजने के लिये फलों को पकने से थोड़ा पहले तोड़ना चाहिये। पके फलों को प्रातः काल तोड़कर छाया में रखना चाहिये।
तोड़ते समय फलों के साथ कुछ डंठल रखना आवश्यक होता है। थोड़ी असावधानी से फल शेष खराब होने लगते हैं। रंग को बचाने हेतु डलियों में फलों के नीचे पत्तियों बिछा लेनी चाहिए।
सामान्यतः अच्छी फसल से 175-200 कु० फल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होते हैं।
कीट रोग एवं रोकथाम
एफिड
ये छोटे हरे या काले कीट पौधों की कोमल पत्तियों और कलियों का रस चूसते हैं, जिससे पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं और पौधे कमजोर हो जाते हैं। नीम तेल 5 मिली/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे। गंभीर स्थिति में इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिली/ ली या थायोमेथोक्साम का छिड़काव करें।
थ्रिप्स
पत्तियों और फूलों को नुकसान पहुँचाते हैं, फल विकृत हो जाते हैं। नीम आधारित कीटनाशक 1500 पी. पी. एम .का छिड़काव करें। खेत में पीले चिपचिपे कार्ड लगाएँ।
माइट्स
ये पत्तियों के नीचे जाल बनाते हैं, जिससे पत्तियाँ पीली होकर सूख जाती हैं। गंधक 2 ग्राम / ली. का छिड़काव करें। अधिक नमी बनाए रखें क्योंकि सूखे में माइट्स बढ़ते हैं।
कटवर्म
रात में पौधों को जड़ के पास से काट देते हैं। फसल से पहले नीम खली मिट्टी में मिलाएँ। क्लोरपाइरीफॉस 2 मिली / ली. का छिड़काव करें।
व्हाइटफ्लाई
पत्तियों का रस चूसती है और ‘सोटी मोल्ड’ फैलाती है।
ट्राइकोग्रामा कीट (जैविक नियंत्रण) नीम तेल 5 मिली/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
रोग
पाउडरी मिल्ड्यू पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसा आवरण, फल सिकुड़ जाते हैं। सल्फर 2 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
लीफ स्पॉट पत्तियों पर भूरे-लाल धब्बे बनते हैं। मैन्कोजेब 2.5 ग्राम/ ली. का छिड़काव करें।
रूट रॉट जड़ें काली होकर गल जाती हैं, पौधा मुरझा जाता है। खेत में अच्छी जल निकासी रखें। ट्राइकोडर्मा 5 केजी /
है. का प्रयोग करें।
एन्थ्रेक्नोज फलों पर काले धब्बे बनते हैं। कार्बेन्डाजिम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्राम /ली का छिड़काव करें।
भंडारण, विपणन एवं उपयोग
स्ट्रॉबेरी एक नाज़ुक और जल्दी खराब होने वाला फल है, इसलिए इसकी तुड़ाई के तुरंत बाद छँटाई, ग्रेडिंग तथा पैकिंग करना आवश्यक होता है। फलों को भंडारण के लिए 0 से 4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ठंडा रखने से उनकी ताज़गी 3.4 दिन तक सुरक्षित रहती है। बाजार में भेजने के लिए स्ट्रॉबेरी को छोटे प्लास्टिक बॉक्स, ट्रे या क्रेट में पैक किया जाता है ताकि फलों को चोट न लगे। विपणन के लिए इसे स्थानीय मंडी, सुपरमार्केट, बड़े शहरों के फल बाजार तथा प्रसंस्करण उद्योगों तक पहुँचाया जाता है। उपयोग की दृष्टि से स्ट्रॉबेरी अत्यंत महत्वपूर्ण फल है, क्योंकि इसे ताज़ा खाने के साथ-साथ जैम, जैली, जूस, शेक, आइसक्रीम, स्क्वॉश, सिरप, कैंडी और बेकरी उत्पादों में खूब इस्तेमाल किया जाता है। प्रसंस्करण उद्योग में इसकी माँग अधिक रहती है, जिससे किसानों को अच्छी आय प्राप्त होती है। उचित भंडारण और समय पर विपणन करने से स्ट्रॉबेरी किसानों के लिए अत्यधिक लाभदायक फसल सिद्ध होती है।
लाभः
छत्तीसगढ़ की जलवायु में स्ट्रॉबेरी से औसतन 60 से 90 क्विंटल प्रति एकड़ उपज प्राप्त होती है, जिसे स्थानीय बाजारों में 80 से 150 रुपये प्रति किलो के औसत भाव पर आसानी से बेचा जा सकता है। इस आधार पर प्रति एकड़ कुल आय लगभग 6 से 8 लाख रुपये तक पहुँच जाती है।
लेखक :
आरती मंडावी एवं डॉ. संगीता
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र , राजनांदगांव
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय , सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)









