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छत्तीसगढ़ में नियंत्रित कृषि बाजार (Regulated Market) और ई–नाम (e-NAM): किसानों की समृद्धि की दिशा में एक कदम

नीलम सिन्हा एवं डॉ. हेम प्रकाश वर्मा,

छत्तीसगढ़ में रेगुलेटेड मार्केट (नियंत्रित बाजार) की अवधारणा राज्य की कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कृषि उपज विपणन समितियों (APMCs) के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य प्राप्त करने, पारदर्शिता बढ़ाने और विपणन को संगठित रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था, सी-मार्ट जैसी पहल तथा भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (IIFT) के साथ किए गए समझौते राज्य सरकार के दूरदर्शी दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। इन कदमों से न केवल किसानों की आय में स्थिरता आई है, बल्कि स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार से भी जोड़ा जा रहा है। हालांकि, डिजिटल प्लेटफॉर्म की कमी, भौगोलिक दूरी और मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता की सीमाएँ जैसी चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं, जिनके समाधान से यह व्यवस्था और अधिक प्रभावी बन सकती है।

प्रस्तावना

भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ लगभग 58 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं। किसानों की मेहनत से देश अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बना है, लेकिन जब बात फसल बेचने की आती है तो अक्सर उन्हें उचित दाम नहीं मिल पाता।
इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने “नियंत्रित बाजार प्रणाली (Regulated Market System)” लागू की, जिससे किसानों को संगठित और पारदर्शी मंच मिल सके। छत्तीसगढ़ जैसे कृषि–प्रधान राज्य में यह व्यवस्था किसानों की आर्थिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम है।

 नियंत्रित बाजार की अवधारणा

नियंत्रित बाजार का अर्थ है ऐसा मंडी तंत्र जो सरकार द्वारा स्थापित कृषि उपज विपणन समितियों (APMCs) के नियंत्रण में संचालित होता है।
इस प्रणाली का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना, अनावश्यक बिचौलियों की भूमिका कम करना और बाजार में पारदर्शिता बनाए रखना है।

अर्थशास्त्री डॉ. आर. एस. देशपांडे के अनुसार,
“APMC मंडियाँ किसानों को सुरक्षा का ढाँचा देती हैं, लेकिन अब उन्हें आधुनिक तकनीक और डिजिटल साधनों से सशक्त करना समय की माँग है।

छत्तीसगढ़ में नियंत्रित बाजार की भूमिका

छत्तीसगढ़ में कृषि उपज विपणन समितियाँ (APMCs) किसानों को संगठित मंच प्रदान करती हैं। राज्य में कुल 69 APMC मंडियाँ कार्यरत हैं जो किसानों को प्रतिस्पर्धी वातावरण में उपज बेचने की सुविधा देती हैं।

  • MSP प्रणाली: राज्य सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदी की व्यवस्था से किसानों को मूल्य सुरक्षा मिली है। इससे बाजार भाव गिरने पर भी उन्हें नुकसान नहीं होता।
  • सीमार्ट (C–Mart): इस योजना से महिला स्व–सहायता समूहों और ग्रामीण उत्पादकों को सीधे बाजार से जोड़ा गया है। इससे स्थानीय उत्पादों को पहचान मिली है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है।
  • निर्यात सुविधा केंद्र: छत्तीसगढ़ सरकार ने भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (IIFT), कोलकाता के साथ समझौते के तहत निर्यात सुविधा केंद्र स्थापित किया है। इससे राज्य के उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसर मिले हैं।

 नाम (e-NAM): डिजिटल भारत की ओर एक पहल

2016 में केंद्र सरकार ने नाम (Electronic National Agricultural Market) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य है – “एक राष्ट्रएक बाजार (One Nation, One Market)।”
यह ऑनलाइन मंच देशभर की मंडियों को जोड़ता है और किसानों को अपनी उपज की नीलामी (e-Auction) की सुविधा देता है।

नाम के मुख्य लाभ:

  • पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया
  • अधिक खरीदार और प्रतिस्पर्धा
  • तुरंत ऑनलाइन भुगतान
  • गुणवत्ता आधारित मूल्य निर्धारण

अर्थशास्त्री डॉ. रमेश चंद (नीति आयोग) कहते हैं —
नाम भारतीय कृषि विपणन में डिजिटल क्रांति लाने वाला कदम है, जो किसानों को राष्ट्रीय बाजार से जोड़ता है।

  1. छत्तीसगढ़ में नाम की स्थिति

राज्य की पाँच प्रमुख मंडियाँ — भाटापारा, राजनांदगांव, कुरूद, कवर्धा और नवापारा — ई–नाम से जुड़ी हैं।
यहाँ किसान मोबाइल ऐप या कंप्यूटर के माध्यम से अपनी उपज बेच सकते हैं।

उदाहरण:
भाटापारा मंडी में गेहूँ का औसत मूल्य ₹2869 प्रति क्विंटल था, जबकि राजनांदगांव में ₹2680 प्रति क्विंटल।
यह दर्शाता है कि जहाँ ई–नाम प्रणाली सुचारू रूप से चल रही है, वहाँ किसानों को अधिक दाम और पारदर्शी भुगतान का लाभ मिल रहा है।

  1. अर्थशास्त्रियों का दृष्टिकोण (Economists’ Note)

प्रमुख कृषि अर्थशास्त्रियों का मत है कि नियंत्रित बाजार और ई–नाम जैसी व्यवस्थाएँ तभी प्रभावी होंगी जब इन्हें संरचनात्मक, तकनीकी और नीतिगत सुधारों के साथ लागू किया जाए।

प्रो. महेंद्र देव (पूर्व अध्यक्ष, कृषि मूल्य आयोग) का कहना है —
“MSP किसानों के लिए सुरक्षा कवच है, लेकिन जब तक बाजार में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी, इसका लाभ सीमित रहेगा। हमें किसानों को मूल्य तय करने की ताकत देनी होगी।

डॉ. आर. आर. रेड्डी (IIM कोझिकोड) लिखते हैं —
नाम ने पारदर्शिता बढ़ाई है, पर इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि राज्य अपने कानूनों को एकरूप बनाएं और किसान डिजिटल रूप से सशक्त हों।

डॉ. एन. चंद्रशेखर (ICAR-NAARM) का कहना है —
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कृषि बाजार को स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग और मूल्य संवर्धन से जोड़ने की आवश्यकता है, ताकि किसानों को स्थायी आय मिल सके।

इन विचारों से स्पष्ट है कि कृषि विपणन सुधार केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन की माँग करते हैं जहाँ किसान बाजार का केंद्र बने।

  1. किसानों के लिए फायदे
  • ई–नाम से बेहतर दाम और समय पर भुगतान।
  • बिचौलियों की भूमिका कम हुई।
  • गुणवत्ता के आधार पर मूल्य निर्धारण।
  • मोबाइल ऐप से मंडियों के दामों की जानकारी।
  • बिक्री प्रक्रिया में पारदर्शिता।
  1. चुनौतियाँ और सुधार की दिशा
  • कई जगह डिजिटल अवसंरचना और इंटरनेट की कमी।
  • किसानों में तकनीकी ज्ञान का अभाव।
  • गुणवत्ता जांच केंद्रों की सीमित संख्या।
  • कुछ मंडियों में अब भी मैन्युअल नीलामी प्रक्रिया।

सुधार के सुझाव:

  1. किसानों को डिजिटल प्रशिक्षण देना।
  2. मंडियों में भंडारण और अस्सेइंग केंद्र बढ़ाना।
  3. एफपीओ (Farmer Producer Organization) को ई–नाम से जोड़ना।
  4. सी–मार्ट और ई–नाम का एकीकरण ताकि स्थानीय उत्पाद ऑनलाइन बिक सकें।
  5. राज्य और केंद्र की नीतियों में समन्वय, जिससे व्यापार सुगम हो।

नीतिनिर्माताओं हेतु आलोचनात्मक विश्लेषण (Critical Analysis for Policy Makers)

छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में नियंत्रित बाजार तथा ई–नाम जैसे सुधार कृषि क्षेत्र को नई दिशा दे रहे हैं, परंतु इनका प्रभाव समान रूप से सभी किसानों तक नहीं पहुँच पाया है। नीति–निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस प्रणाली को केवल संरचना या प्लेटफ़ॉर्म के रूप में न देखें, बल्कि इसे कृषिअर्थव्यवस्था सुधार का उपकरण मानें।

  1. संरचनात्मक असमानता: अधिकांश छोटे और सीमांत किसान अब भी स्थानीय व्यापारियों पर निर्भर हैं। उन्हें डिजिटल शिक्षा, मूल्य जानकारी और परिवहन सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  2. बाजार एकीकरण की सीमाएँ: राज्यों के अलग–अलग APMC कानून और शुल्क ढाँचे एक समान बाजार के मार्ग में बाधा हैं। साझा राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है।
  3. पारदर्शिता और जवाबदेही: मंडियों में डिजिटल नीलामी के बावजूद मानव हस्तक्षेप मौजूद है। ब्लॉकचेन तकनीक और पेमेंट मॉनिटरिंग सिस्टम अपनाए जाने चाहिए।
  4. MSP और बाजार मूल्य का संतुलन: MSP की नीति को बाजार मूल्य निर्धारण के साथ जोड़ा जाए ताकि किसान प्रतिस्पर्धी वातावरण में बेहतर लाभ कमा सकें।
  5. बाजार अवसंरचना: गोदाम, परीक्षण प्रयोगशालाएँ, सड़कों और डिजिटल कनेक्टिविटी में सुधार लाना अनिवार्य है।
  6. स्थानीय ब्रांडिंग और मूल्य संवर्धन: छत्तीसगढ़ को अपनी विशेष फसलों- मिलेट्स, कोदो-कुटकी, वनोपज आदि  की ब्रांडिंग और निर्यात नीति को मजबूत बनाना चाहिए।

नीति–निर्माताओं के लिए चुनौती केवल बाजार को जोड़ने की नहीं, बल्कि किसानों को उसमें सक्रिय भागीदार बनाने की है।
यदि तकनीक, पारदर्शिता और स्थानीय मूल्य संवर्धन को नीति का हिस्सा बनाया जाए, तो नियंत्रित बाजार और ई–नाम मिलकर भारत के कृषि क्षेत्र को “आयकेन्द्रित, नहीं तोलकेन्द्रित” बना सकते हैं।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ का रेगुलेटेड मार्केट मॉडल राज्य की कृषि को नई दिशा दे रहा है। APMC मंडियों, MSP नीति, सी–मार्ट और ई–नाम के संयोजन ने किसानों को आर्थिक स्थिरता और तकनीकी सशक्तिकरण प्रदान किया है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब पारदर्शी बाजार व्यवस्था, डिजिटल तकनीक और नीति–समन्वय एक साथ आएंगे, तभी किसान सशक्त बन पाएगा।
भविष्य में जब हर किसान अपने गाँव से ही मोबाइल के माध्यम से फसल बेच सकेगा, तब “एक भारतएक बाजार” का सपना साकार होगा और भारत का किसान आत्मनिर्भर भारत का सच्चा प्रतीक बनेगा।

लेखक :
नीलम सिन्हा, पीएचडी शोधार्थी, कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर
डॉ. हेम प्रकाश वर्मा, सीनियर रिसर्च फेलो, एफएफपी परियोजना, भाकृअनुप- राष्ट्रिय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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