कृषि फसलों में अंतरवर्ती क्रियाएं (Intercultural Operations) : प्रकार, विधियाँ एवं महत्व
डॉ. प्रज्ञा पांडेय, सहायक प्राध्यापक


कृषि उत्पादन में अंतरवर्ती क्रियाओं (Intercultural Operations) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। फसल की बुवाई के बाद से लेकर कटाई तक की सभी क्रियाएं, जो फसल की वृद्धि-विकास, भूमि की गुणवत्ता सुधार, खरपतवार नियंत्रण एवं कीट-व्याधि प्रबंधन हेतु की जाती हैं, उन्हें अंतरवर्ती क्रियाएं कहा जाता है। खरीफ मौसम में जब वर्षा एवं तापमान दोनों उच्च होते हैं, तो फसल प्रबंधन हेतु अंतरवर्ती क्रियाओं का महत्व और भी बढ़ जाता है।
अंतरवर्ती क्रियाओं के प्रकार (Types of Intercultural Operations):
- गुड़ाई (Hoeing): गुड़ाई वह प्रक्रिया है जिसमें फसलों की पंक्तियों के बीच की भूमि को ढीला किया जाता है, जिससे मिट्टी में वायु संचार एवं जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है। यह क्रिया खरपतवारों उखाड़ने में भी सहायक होती है। गुड़ाई करने से मृदा की सतह पर पपड़ी बनने से रोकथाम होती है और पौधों की जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है। गुड़ाई के लिए खुरपी, कोनोवीडर, फावड़ा इत्यादि हल्के यंत्रों का उपयोग किया जाता है। कपास, मक्का, गन्ना जैसी पंक्तिबद्ध फसलों में गुड़ाई का विशेष महत्व है।

- निराई (Weeding): निराई वह प्रक्रिया है जिसमें फसल क्षेत्र से अवांछित खरपतवारों को हटाया जाता है। निराई हाथों से अथवा यांत्रिक उपकरणों जैसे कोनोवीडर, ड्रॉ बार वीडर आदि की सहायता से की जाती है। खरपतवारों की सही पहचान एवं उनके जीवन चक्र को ध्यान में रखकर समय-समय पर निराई करना आवश्यक होता है। प्रारंभिक 30-45 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इसी अवधि में खरपतवारों का प्रभाव फसल पर सर्वाधिक होता है। निराई से फसल को जल, पोषक तत्व, स्थान एवं प्रकाश में प्रतिस्पर्धा से मुक्ति मिलती है।

- मिट्टी चढ़ाना (Earthing Up): मिट्टी चढ़ाना वह प्रक्रिया है जिसमें फसल के पौधों के आधार (तनों) के चारों ओर मिट्टी चढ़ाकर पौधे को सहारा दिया जाता है। इससे पौधे की जड़ें मजबूत होती हैं एवं पौधा गिरने से बचता है। साथ ही इससे खरपतवारों को दबाकर उनके विकास को रोका जाता है। कपास, मक्का, गन्ना, अरहर जैसी फसलों में मिट्टी चढ़ाने की प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यह क्रिया वर्षा के बाद अथवा दूसरी गुड़ाई के समय की जाती है। मिट्टी चढ़ाने से जल संरक्षण एवं नमी प्रबंधन में भी सहायता मिलती है।
- मल्चिंग (Mulching): मल्चिंग वह प्रक्रिया है जिसमें फसल पंक्तियों के मध्य सूखी घास, पुआल, गन्ने की खोई या प्लास्टिक शीट का आवरण बिछाया जाता है। इससे भूमि में नमी संरक्षण, खरपतवारों का अंकुरण रोकना एवं मृदा क्षरण से बचाव होता है। मल्चिंग खरपतवारों के प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को बाधित कर उनके विकास को नियंत्रित करता है। खरीफ मौसम में जब वाष्पीकरण अधिक होता है, तब मल्चिंग अत्यंत प्रभावी होती है। यह जैविक एवं अजैविक दोनों रूपों में अपनाई जाती है।
- अंतरवर्ती जुताई (Intercultural Ploughing): अंतरवर्ती जुताई वह प्रक्रिया है जिसमें फसल पंक्तियों के मध्य क्षेत्र की जुताई की जाती है। यह प्रक्रिया विशेष रूप से गहरी जड़ों वाली खरपतवारों जैसे मथा (Cyperus spp.), दूब (Cynodon dactylon) इत्यादि के नियंत्रण हेतु की जाती है। अंतरवर्ती जुताई से मिट्टी में वायु संचरण, जल निकास एवं पोषक तत्वों का पुनः वितरण होता है। यह क्रिया मुख्यतः ट्रैक्टर चालित उपकरणों अथवा बैल चालित हल की सहायता से की जाती है।

- जल निकास (Drainage Management): खरीफ मौसम में अत्यधिक वर्षा के कारण खेतों में जल जमाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जल जमाव से फसल की जड़ों में सड़न, ऑक्सीजन की कमी एवं कीट-व्याधियों का प्रकोप बढ़ता है। अतः जल निकास प्रबंधन के अंतर्गत खेत की समतलीकरण, मेड़बंधी, नालियों की सफाई एवं उचित जल निकासी मार्ग बनाना आवश्यक होता है। खरीफ फसलों में जल निकास प्रबंधन से फसल को जल भराव के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है और उपज में वृद्धि की जा सकती है।
अंतरवर्ती क्रियाओं का महत्व (Importance of Intercultural Operations):
- खरपतवार नियंत्रण: अंतरवर्ती क्रियाएं खरपतवार प्रबंधन में अत्यंत प्रभावशाली होती हैं। फसल के प्रारंभिक वृद्धि अवस्था में खरपतवारों से होने वाली प्रतिस्पर्धा फसल की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। अंतरवर्ती क्रियाओं जैसे समय पर निराई-गुड़ाई, मल्चिंग एवं यांत्रिक उपकरणों के उपयोग से खरपतवारों को नियंत्रित किया जाता है, जिससे फसल को पर्याप्त पोषण, जल एवं प्रकाश मिलता है। यांत्रिक विधियों के अंतर्गत कोनोवीडर, ड्रॉ बार वीडर, ट्रैक्टर चालित वीडर जैसे उपकरणों का उपयोग कर खरपतवारों को जड़ सहित उखाड़ा जाता है। इससे फसल की जड़ों को पर्याप्त वायु एवं पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं। खरपतवार नियंत्रण से पौधों की वृद्धि में तीव्रता आती है और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
- मिट्टी की भौतिक दशा में सुधार: निरंतर गुड़ाई एवं जुताई से मिट्टी में हवा का आवागमन सुगम होता है तथा सतह पर बनने वाली कठोर परतें टूटती हैं। इससे जलधारण क्षमता बढ़ती है, मिट्टी में जल का रिसाव नियंत्रित होता है तथा पौधों की जड़ें अधिक गहराई तक विकसित होती हैं। यह मृदा संरचना को स्थिर एवं उर्वरता को बनाए रखने में सहायक होता है।
- पोषक तत्वों का दक्ष उपयोग: अंतरवर्ती क्रियाओं के माध्यम से खरपतवारों की प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करने पर फसल को आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। निराई-गुड़ाई से मिट्टी में पोषक तत्वों का पुनः वितरण (Redistribution) होता है, जिससे फसल की जड़ों को आवश्यक पोषण प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अवरोधक फसलों के प्रयोग एवं जैविक विधियों के कारण भूमि में सूक्ष्मजीव गतिविधि बढ़ती है, जो पोषक तत्वों की घुलनशीलता को बढ़ाकर फसलों के पोषण दक्षता में वृद्धि करती है।
- जल संरक्षण एवं जल निकास: खरीफ मौसम में अधिक वर्षा के कारण जल संरक्षण एवं जल निकास प्रबंधन दोनों का अत्यंत महत्व है। अंतरवर्ती क्रियाओं के माध्यम से मल्चिंग करने पर मृदा में नमी संरक्षण बना रहता है, जिससे सूखे की स्थिति में भी फसल को जल की आपूर्ति होती है। दूसरी ओर, जल जमाव की स्थिति में खेतों की समतलीकरण, नालियों की सफाई, एवं जल निकास की उचित व्यवस्था कर अतिरिक्त जल को बाहर निकाला जाता है, जिससे जड़ों में सड़न की समस्या नहीं आती। इससे फसल की वृद्धि प्रभावित नहीं होती और भूमि की जलधारण क्षमता में संतुलन बना रहता है।
- कीट-व्याधि नियंत्रण: अंतरवर्ती क्रियाएं कीट एवं रोग प्रबंधन में भी अत्यंत सहायक होती हैं। फसल अवशेषों, खरपतवारों और अन्य कचरे को हटाने से कीटों के लिए शीतकालीन आश्रय स्थलों को समाप्त किया जा सकता है और रोगों के लिए संक्रमण स्रोतों को कम किया जा सकता है।
अवरोधक फसलों (trap crops) का उपयोग कर प्रमुख कीटों को मुख्य फसल से दूर रखा जा सकता है। उदाहरण स्वरूप, कपास फसल के साथ गेंदा (Marigold) अथवा मक्का (Maize) की अवरोधक फसल लगाने से रसचूसक कीटों का प्रभाव कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मिश्रित फसल प्रणाली (mixed cropping) एवं अंतरवर्ती फसल प्रणाली (intercropping) अपनाने से कीटों का जीवन चक्र बाधित होता है, जिससे उनकी संख्या में प्राकृतिक रूप से कमी आती है। निराई-गुड़ाई एवं मिट्टी चढ़ाने जैसी अंतरवर्ती क्रियाओं के माध्यम से कीटों के अंडे, प्यूपा आदि नष्ट होते हैं तथा खेत में परजीवी एवं परभक्षी कीटों के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित होता है। इससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम हो जाती है एवं टिकाऊ (sustainable) कीट प्रबंधन संभव होता है।
- उपज में वृद्धि: उचित समय पर एवं वैज्ञानिक ढंग से की गई अंतरवर्ती क्रियाएं फसल की वृद्धि-विकास में तेजी लाती हैं। खरपतवारों की प्रतिस्पर्धा समाप्त होने, मृदा की भौतिक दशा में सुधार, पोषक तत्वों का दक्ष उपयोग एवं कीट-व्याधि नियंत्रण से फसल को अनुकूल वातावरण प्राप्त होता है। इससे पौधों में पुष्पन एवं फलन की प्रक्रिया सुचारु रूप से होती है, जिससे उत्पादन क्षमता में 20-30% तक की वृद्धि देखी जाती है। यह प्रक्रिया उत्पादन लागत को भी कम करती है, जिससे किसानों को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
निष्कर्ष (Conclusion):
कृषि फसलों में अंतरवर्ती क्रियाएं न केवल खरपतवार एवं कीट-व्याधि नियंत्रण के लिए प्रभावी हैं, अपितु फसल की वृद्धि, भूमि की गुणवत्ता एवं उत्पादन लागत में कमी हेतु भी आवश्यक हैं। खरीफ मौसम में इन क्रियाओं का समयबद्ध एवं वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन कर उपज में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। किसान भाइयों को स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) एवं विश्वविद्यालयों से तकनीकी सलाह लेकर उपयुक्त अंतरवर्ती क्रियाओं को अपनाना चाहिए।
लेखक:
डॉ. प्रज्ञा पांडेय,
सहायक प्राध्यापक,
सस्य विज्ञान विभाग,
कृषि महाविद्यालय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)










