कृषि

पहले जानकारी – फिर बुवाई: टिकाऊ और लाभकारी कृषि की ओर कदम

 डॉ. ईशांत कुमार सुकदेवे, कृषि विस्तार विभाग, इं. गां. कृ. वि. रायपुर

भारत में कृषि पूरी तरह मौसम और जलवायु पर निर्भर है। वर्षा का समय, तापमान, आर्द्रता और हवाओं का स्वरूप सीधे-सीधे फसल की वृद्धि और उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। बदलते जलवायु परिदृश्य में बाढ़, सूखा, असमय वर्षा, ओलावृष्टि और तापमान की चरम सीमाएँ अब सामान्य होती जा रही हैं। ऐसे हालात में किसानों के लिए यह समझना आवश्यक है कि “पहले योजना, फिर बुवाई” ही सही रणनीति है। (First information, then sowing: A step towards sustainable and profitable agriculture)

मौसम पूर्वानुमान और कृषि योजना

  • आधुनिक मौसम विज्ञान और उपग्रह आधारित पूर्वानुमान अब किसानों को अल्पकालिक (शॉर्ट टर्म) और दीर्घकालिक (लॉन्ग टर्म) मौसम जानकारी उपलब्ध कराते हैं।
  • समय पर मिली सही सूचना से किसान फसल चयन, बुवाई का समय और सिंचाई की रणनीति तय कर सकते हैं।
  • उदाहरण: यदि मानसून देर से आने की संभावना हो, तो किसान अल्पावधि वाली किस्मों का चयन कर सकता है।

फसल और किस्मों का चयन

  • जलवायु जोखिम को देखते हुए किसान को ऐसी फसलें और किस्में चुननी चाहिए जो स्थानीय मौसम के उतार-चढ़ाव सहन कर सकें।
  • सूखा-रोधी, अधिक तापमान सहनशील और अल्पावधि वाली किस्में जलवायु अनिश्चितताओं में सहायक होती हैं।
  • विविधीकरण भी जोखिम कम करने का प्रभावी तरीका है – जैसे दलहनी, तिलहनी और नगदी फसलों का मिश्रण।

मृदा और जल प्रबंधन

  • मौसम जोखिम का सबसे बड़ा असर मिट्टी की नमी और जल उपलब्धता पर पड़ता है।
  • खेत में नमी संरक्षण के लिए मल्चिंग, शून्य जुताई, फसल अवशेष प्रबंधन और नालियों की व्यवस्था उपयोगी है।
  • वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर) से पानी का कुशल उपयोग कर जोखिम घटाया जा सकता है।

कृषि बीमा और सरकारी योजनाएँ

  • मौसम और जलवायु जोखिम को पूरी तरह टालना संभव नहीं है, लेकिन नुकसान की भरपाई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसी योजनाओं से संभव हो सकता है।
  • बीमा के माध्यम से बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि और असमय वर्षा से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई किसानों को मिलती है।
  • इसके साथ ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड, मौसम आधारित परामर्श सेवाएँ और कृषि तकनीकी मिशन भी किसानों को सुरक्षित खेती में मदद करते हैं।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) की शुरुआत वर्ष 2016 में किसानों को प्राकृतिक आपदाओं, कीट और रोगों से होने वाले नुकसान से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। यह योजना किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है, जिससे उनकी मेहनत और निवेश सुरक्षित रहता है। इस योजना के अंतर्गत किसानों को खरीफ फसलों के लिए मात्र 2% प्रीमियम, रबी फसलों के लिए 1.5% प्रीमियम और बागवानी/वार्षिक वाणिज्यिक फसलों के लिए 5% प्रीमियम का ही भुगतान करना होता है। शेष राशि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा वहन की जाती है। इसका सीधा लाभ यह है कि किसान कम प्रीमियम देकर प्राकृतिक आपदाओं, सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, कीट और बीमारियों जैसी परिस्थितियों में भी अपनी फसल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।
  • इसके साथ ही योजना की विशेषता यह है कि इसमें फसल कटाई के बाद के नुकसान और स्थानीय आपदाओं से होने वाली हानि को भी शामिल किया गया है। दावों का निपटारा रिमोट सेंसिंग, ड्रोन और स्मार्ट तकनीकों की मदद से तेजी से किया जा रहा है, जिससे किसानों को मुआवजा समय पर मिल सके। यह योजना न केवल किसानों को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करती है बल्कि उन्हें जोखिम लेने और आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए भी प्रेरित करती है। PMFBY के माध्यम से किसान आत्मनिर्भर बनते हैं, उनकी आजीविका सुरक्षित रहती है और कृषि क्षेत्र में स्थिरता तथा टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलता है।

तकनीकी और सामुदायिक रणनीतियाँ

  • मोबाइल ऐप्स, रेडियो, टीवी और किसान कॉल सेंटरों से मौसम संबंधी जानकारी तुरंत प्राप्त की जा सकती है।
  • किसान उत्पादक संगठन (FPOs) और सहकारी समितियाँ सामूहिक रूप से मौसम आधारित योजना बनाकर खेती को अधिक सुरक्षित और लाभकारी बना सकती हैं। मौसम पूर्वानुमान के आधार पर बीज, उर्वरक और अन्य कृषि आदान की सामूहिक खरीद कर समय पर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। स्थानीय वर्षा-पैटर्न और तापमान प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए फसल कैलेंडर तैयार कर बुवाई, निराई और कटाई की साझा योजना बनाई जा सकती है।
  • जोखिम प्रबंधन के लिए सामूहिक फसल या मौसम बीमा, आपदा कोष और वैकल्पिक फसल प्रणालियाँ अपनाना प्रभावी होगा साथ ही, डिजिटल सूचना तंत्र जैसे SMS, व्हाट्सऐप और सामुदायिक रेडियो के माध्यम से समय पर चेतावनी और सलाह किसानों तक पहुँचाई जा सकती है। इन पहलों के साथ ही बाजार समन्वय स्थापित कर अनुकूल मौसम खिड़कियों में उत्पादन की एकरूपता बढ़ाकर थोक बिक्री, बेहतर मूल्य और लॉजिस्टिक लागत में कमी संभव है।
  • आपदा की स्थिति में सामुदायिक भंडारण, बीज बैंक और साझा सिंचाई संसाधन किसानों की मदद करते हैं।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन और मौसम की अनिश्चितता अब कृषि की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। किसान यदि केवल परंपरागत तरीकों पर निर्भर रहेंगे, तो नुकसान की संभावना अधिक होगी। लेकिन यदि वे समय पर मौसम की जानकारी लेकर योजना बनाकर बुवाई करें, तो उत्पादन बढ़ेगा और जोखिम घटेगा।

 References

  • ICAR (Indian Council of Agricultural Research). 2021. Climate Resilient Agriculture in India. ICAR-National Innovations on Climate Resilient Agriculture (NICRA).
  • IMD (India Meteorological Department). 2023. Agro-Meteorological Advisory Services. Ministry of Earth Sciences, Govt. of India.
  • FAO (Food and Agriculture Organization). 2016. Climate-Smart Agriculture: Sourcebook. FAO, Rome.
  • Ministry of Agriculture & Farmers Welfare, Govt. of India. 2022. Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana – Operational Guidelines.
  • World Bank. 2021. Transforming Agriculture through Climate Resilience. Washington, DC.
  • NAAS (National Academy of Agricultural Sciences). 2019. Mitigating Climate Risks in Indian Agriculture. Policy Paper.
  • Aggarwal, P. K., et al. (2019). Climate Change and Agriculture in India: Adaptation Strategies. Current Science, 116(6): 882–890.

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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