पशुपालन

भारत में देशी मुर्गी की प्रमुख नस्लें

डॉ अरविंद कुमार नंदनवार एवं डॉ सेवक अमृत ढ़ेंगे,

भारत विश्व के उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जहाँ पोल्ट्री आनुवंशिक संसाधनों की अत्यधिक समृद्धता पाई जाती है। एशिया में उपलब्ध 72 नस्लों में से 18 स्वदेशी नस्लें और उनके विविध उपप्रकार भारत में मौजूद हैं। भारत में पोल्ट्री आनुवंशिक संसाधनों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. पहली श्रेणी में 18 स्वदेशी शुद्ध नस्लें आती हैं, जिनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है। इनमें अधिकांश नस्लें ग्रामीण क्षेत्रों में पाए जाने वाले अज्ञात पक्षियों की हैं, जो स्थानीय रूप से विकसित हुई हैं और स्कैवेंजर प्रणाली में पनपती हैं। ये देश की कुल पोल्ट्री आबादी का लगभग 14प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं।
  2. दूसरी श्रेणी में निजी क्षेत्र और संस्थागत प्रयासों से आयात किए गए विदेशी शुद्ध नस्ले/लाइनें और ग्रैंडपेरेंट्स (जीपी) शामिल हैं, जिनका उपयोग शुद्ध नस्लों या क्रॉसब्रीड्स के रूप में किया जाता है।
  3. तीसरी श्रेणी में वाणिज्यिक ब्रॉयलर और लेयर क्रॉस आते हैं, जिन्हें संस्थानों और निजी क्षेत्र के प्रजनकों द्वारा शुद्ध नस्लों और जीपी लाइनों से विकसित किया गया है।

लाल जंगली मुर्गी
यह दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत के पूर्वी अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के वनों में पाया जाता है। यह पक्षी उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मिलता है, जहाँ इनकेे आवास में मैंग्रोव, झाड़ीदार क्षेत्र और वृक्षारोपण शामिल हैं। लाल जंगली मुर्गा तीतर परिवार का एक सदस्य है और इसे व्यापक रूप से घरेलू मुर्गी का प्रत्यक्ष पूर्वज माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसे हजारों वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप में पालतू बनाया गया था, और इसके पालतू रूप को आज भी विश्वभर में मांस और अंडों के उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है। प्रजनन काल को छोड़कर, ये पक्षी आमतौर पर छोटे, मिश्रित झुंडों में रहते हैं। ये मुर्गे भूमि पर रहकर बीज, फल और कीड़ों की खोज करते हैं और भोजन के लिए अपने पैरों से पत्तियों को खुरचते हैं। लाल जंगली मुर्गे का उपयोग चिकित्सा अनुसंधान में व्यापक रूप से हुआ है, जिससे मानव समाज को महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त हुए हैं। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 0.6-1.4 किलोग्राम और 0.4-1 किलोग्राम होता है।

नर लाल जंगली मुर्गे की विशेषताए
मुर्गे अत्यंत आकर्षक रंगों से युक्त होता है। उसके सिर और गर्दन पर पंख सुनहरे-नारंगी से लेकर गहरे लाल रंग तक फैले होते हैं। इसकी पूँछ गहरे धात्विक हरे रंग की होती है, जिसके आधार पर सफेद रंग का एक छोटा गुच्छा होता है। इसके शरीर का निचला भाग हल्के काले रंग का होता है, जबकि ऊपरी भाग में चमकदार नीला-हरा, गहरा लाल, मैरून, गहरा नारंगी और काले-भूरे रंग का मिश्रण होता है। इसके सिर के दोनों ओर लाल या सफेद रंग के कानों जैसे धब्बे भी दिखाई देते हैं।

मादा लाल जंगली मुर्गी की विशेषताए
इनका शरीर हल्के भूरे-सुनहरे रंग का होता है, और चेहरा व गला आंशिक रूप से नग्न तथा हल्के लाल रंग के होते हैं। प्रत्येक समूह की मुर्गियाँ आमतौर पर चार से सात अंडे देती हैं। इन अंडों को केवल मादा मुर्गी 18 से 20 दिनों तक सेती है। जब बच्चे बारह सप्ताह की आयु प्राप्त कर लेते हैं, तो मादा उन्हें सामाजिक समूह से बाहर निकाल देती है। इसके बाद वे या तो किसी नए समूह में शामिल हो जाते हैं या अपना अलग समूह बना लेते हैं।

मान्यता प्राप्त देशी मुर्गी नस्लेंः

01. अंकलेश्वर
इन पक्षियों का पालन मुख्यतः दक्षिण गुजरात के आदिवासी समुदायों द्वारा बैकयार्ड में किया जाता है। गुजरात के भरूच और नर्मदा जिलों में इनकी अनुमानित संख्या लगभग 4,500 है। इनकी प्रजनन क्षमता भी अत्यंत बेहतर होती है। इनके झुंड में औसतन 5 से 10 पक्षी होते हैं। इनके कंघी एकल व गुलाबी रंग के, अंडा उत्पादन औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 81 होता है। यह 181 दिन में प्रथम अंडे देती है।

02. असील
यह पक्षी मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी, विशाखापटनम, विजयनगरम जिलों तथा छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में पाया जाता है। इसकी प्रमुख लोकप्रिय प्रजातियों जिसमें पीला, यार्किन, नूरी, कगार, चित्ता, रेजा शामिल हैं। असील मुर्गा सामान्यतः बैकयार्ड पालन प्रणाली के तहत पाला जाता है और यह छोटे किसानों के लिए मांस एवं अतिरिक्त आय का एक अहम स्रोत है। इनका वजन 5 महीने में 1.2 किलोग्राम हो जाता है। मुर्गे और मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 3 से 4 एवं 2 से 3 किलोग्राम होता है। 196 दिन में यह पक्षी यौन परिपक्व हो जाते हैं। अंडा उत्पादन औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 92 अंडे होते हैं। एक श्रेष्ठ असील मुर्गे की लंबाई लगभग 28 इंच होती है जो मुर्गों की लड़ाई में अहम भूमिका निभाता है।

03. बुसरा
यह पक्षी महाराष्ट्र के नंदुरबार एवं धुले जिले तथा गुजरात के सूरत जिले में पाए जाते हैं। इन पक्षियों को खुले वातावरण में पाला जाता है, जहाँ इनका उपयोग घरेलू उपभोग के साथ-साथ जीवित पक्षियों और अंडों की बिक्री हेतु किया जाता है। अंडा उत्पादन कम होने के कारण इन्हें मुख्यतः मांस के लिए पसंद किया जाता है। इनके झुंड में औसतन 9 से 10 पक्षी होते हैं। इन पक्षी के पंखों के रंगों का अधिकतर भाग सफेद रंग लिए होता है। इनकी कंघी लाल रंग, एकल एवं सीधी, मध्यम आकार की होती है। इनकी चोच व पैर पीले रंग के होते हैं। इस पक्षी का औसतन वजन 0.8 से 1.2 किलोग्राम होता है। पक्षी 5 से 7 महीने में प्रथम अंडा देती है एवं औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 40 से 55 अंडे उत्पादन करती है। अंडों का आकार छोटा व रंग हल्का भूरा होता है।

04. डंकी
यह नस्ल आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले और उड़ीसा की सीमा से सटे श्रीकाकुलम जिले के आस-पास के क्षेत्रों में पाई जाती है एवं पारंपरिक रूप से इस लड़ाकू पक्षी के रूप में पाला जाता है। इनकी मुख्य विशेषताएं जैसे शरीर में पंखों का रंग भूरा, गर्दन का रंग शरीर के अन्य भागों की तुलना में गहरा होता है। वॉटल्स अनुपस्थित, कंघी लाल रंग की, मटर के आकार के और संकुचित होते हैं। स्पर मुर्गों में लंबे और नुकील जबकि मुर्गियों में छोटे होते हैं। मुर्गे और मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 3.52 किलोग्राम एवं 2.2 किलोग्राम होता है। यह पक्षी 6 से 8 माह की आयु में प्रथम अंडा देती है एवं औसतन प्रति मुर्गी प्रतिवर्ष 25 से 35 अंडे उत्पादन करती है।

05. दाओथिगिर
यह पक्षी असम राज्य के कोकराझार, चिरांग, उदलगुरी और बास्का जिलों में पाए जाते हैं। इन पक्षियों का पालन असम के बोडो जनजातीय समुदाय द्वारा पारंपरिक रूप से घर के पिछवाड़े या खुले में किया जाता है। इन पक्षियों के शरीर में पंखों का रंग मुख्यतः काला के साथ बीच-बीच में सफेद रंग के पंख भी होते हैं। कंघी लाल रंग, एकल, सीधी एवं आकार में बड़ी होती है। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 1.8 किलोग्राम एवं 1.6 किलोग्राम होता है एवं प्रतिवर्ष प्रति मुर्गी 60 से 70 अंडे उत्पादन करती हैं।

06. घागस
यह नस्ल मुख्यतः कर्नाटक के कोलार जिले और कर्नाटक से सटे आंध्र प्रदेश की सीमावर्ती क्षेत्रों में पाई जाती है। इन पक्षियों को प्रायः बैकयार्ड प्रणाली के अंतर्गत पाला जाता है। इनका उपयोग अंडा उत्पादन तथा शिकार के उद्देश्य से किया जाता है। इनकी मुर्गियाँ अच्छा अंडा देने वाली होती हैं। पंखों का रंग मुख्यतः भूरा रंग और काला होता है। रंग का पैटर्न सामान्यतः स्पॉटेड होता है। नर और मादा दोनों में धब्बेदार रंग पाए जाते हैं। मुर्गों की छाती, पूँछ और जांघों पर चमकदार नीले-काले पंख, गर्दन पर सुनहरे रंग के पंख, वॉटल्स अनुपस्थित, कंघी एकल, मटर के आकार जैसी एवं लाल रंग की होती है। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 2 किलोग्राम एवं 1.3 किलोग्राम होता है। यह पक्षी 5 से 7 माह में प्रथम अंडा देती है एवं औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 45 से 60 अंडे उत्पादन करती है।

07. हेरिंगघाटा ब्लैक
यह नस्ल पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में पाई जाती है। यह एक छोटा, काले रंग का पक्षी है। यह नस्ल अत्यंत सतर्क, सक्रिय और शिकारियों के हमलों से स्वयं को बचाने में सक्षम होती है। किसान इसे फसल अवशेषों और रसोई के कचरे जैसी न्यूनतम पोषण सामग्री पर भी आसानी से पाल सकते हैं। इस नस्ल की प्रमुख विशेषता इसकी उच्च प्रजनन क्षमता और उत्तम मातृत्व गुण हैं, जिसके कारण किसान इसका उपयोग अन्य मुर्गियों एवं बत्तखों के अंडों को सेने और चूजों की देखभाल के लिए भी करते हैं। यह पक्षी सामान्य रोगों के प्रति अच्छी प्रतिरोधकता भी रखते हैैं। इनके शरीर के पंखों का रंग गहरा काला, कंघी लाल, पैर सफेद होते हैं। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 1.5 किलोग्राम एवं 1.2 किलोग्राम होता है। इसका उपयोग मुख्यतः अंडे उत्पादन के लिए किया जाता है।

08. कड़कनाथ
यह पक्षी मुख्यतः मध्य प्रदेश के झाबुआ और धार जिलों में पाई जाती है। पक्षी का रंग काला होता है इसलिए इसे कालामासी के नाम से भी जाना जाता है। इसका मांस स्वाद में उत्कृष्ट माना जाता है। कड़कनाथ नस्ल प्राकृतिक वातावरण में रोग प्रतिरोधक क्षमता रखती है, इसे उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, आवश्यक अमीनो अम्लों और विटामिनों का समृद्ध स्रोत माना जाता है। चूजे का रंग काला होता है। वयस्क के पंखों का रंग चांदी और सोने की चमक से लेकर बिना चमक वाले नीले-काले रंग तक विविधता पाई जाती है। त्वचा, चोंच, पिंडलियाँ, पंजे और तलवे का रंग स्लेटी, कंघी, वॉटल्स और जीभ का रंग बैंगनी है। रक्त का रंग सामान्य से अधिक गहरा, जो मेलेनिन के जमाव के कारण होता है। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 1.5 किलोग्राम एवं 1 किलोग्राम होता है। औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 45 से 60 अंडे उत्पादन करती है। अंडों का रंग हल्का भूरा एवं औसत अंडे का वजन 46.8 ग्राम होता है।

09. कालास्थी
यह नस्ल आंध्र प्रदेश के चित्तूर और नेल्लोर जिलों में पाई जाती है। पंखों का रंग नीला-काला, परंतु कुछ पक्षियों में भूरा रंग भी पाया जाता है। नर और मादा दोनों में धब्बेदार पैटर्न के रंग दिखाई देते है। मुर्गों की गर्दन और पंखों पर चमकदार सुनहरे रंग के पंख पाए जाते हैं। टांगें लंबी, वॉटल्स अनुपस्थित, कंघी लाल रंग, मटर के आकार, स्पर छोटा होता है। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 2.48 किलोग्राम एवं 1.85 किलोग्राम होता है। यह पक्षी 6 से 8 माह में प्रथम अंडा देती है एवं औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 30 से 40 अंडे उत्पादन करती है।

10. कश्मीर फेवरेला
यह देशी मुर्गी नस्ल कश्मीर क्षेत्र के ठंडी जलवायु और पहाड़ी इलाकों के लिए अनुकूल मानी जाती है। इनकी मुख्य विशेषताएँ जैसे आकार में छोटे होते हैं। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 1.72 किलोग्राम एवं 1.25 किलोग्राम होता है।

11. मिरी
मिरी नस्ल का नाम आदिवासी समुदाय मिरी या मिसिंग के नाम पर रखा गया है। यह नस्ल असम के उत्तरी लखीमपुर, डिब्रूगढ़ और मझौली जिलों में पाए जाते हैं। मिरी नस्ल आदिवासी समुदायों की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्थानीय भाषा में इन्हें ‘‘पोरोग‘‘ कहा जाता है। इन पक्षियों को मुख्यतः अंडा और मांस उत्पादन के लिए पाला जाता है, और इनका मांस स्थानीय समुदायों द्वारा स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में पसंद किया जाता है। इनकी मुख्य विशेषताएँ जैसे पंखों का रंग सफेद, भूरे और काले और धब्बेदार या धारीदार पैटर्न भी मिलते हैं। त्वचा का रंग सफेद से पीला, कान के लोब लाल, कंघी एकल प्रकार और आँखों का रंग भूरा होता है। औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 60 से 70 अंडे उत्पादन करती है।

12. निकोबारी
यह नस्ल अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, के उष्णकटिबंधीय जलवायु परिस्थितियों के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित है और स्थानीय मुर्गी नस्लों में एक उत्कृष्ट अंडा देने वाली मानी जाती है। यह नस्ल रोगों के प्रति तुलनात्मक रूप से उच्च प्रतिरोधक क्षमता के कारण जनक पक्षी के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। इनकी मुख्य विशेषताएँ जैसे शरीर का रंग भूरा, छोटा आकार, मोटी गर्दन, वॉटल्स और कान के लोब गुलाबी रंग एवं काले रंग के पंख पाए जाते हैं।

13. पंजाब ब्राउन
यह देशी मुर्गी नस्ल मुख्यतः पंजाब के गुरदासपुर और हरियाणा के अंबाला क्षेत्रों में पाई जाती है। यह एक बहुउद्देश्यीय नस्ल है, जो उच्च गुणवत्ता का मांस और अंडे दोनों प्रदान करती है। इनकी मुख्य विशेषताएँ जैसे पंखों का रंग भूरा, समान पैटर्न, गर्दन, पंख और पूँछ पर काले रंग के धारियाँ, कंघी लाल रंग की, एकल प्रकार की और सीधी होती है। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 2 किलोग्राम एवं 1.5 किलोग्राम होता है। यह पक्षी 5 से 6 माह में प्रथम अंडा देती है एवं औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 60 से 80 अंडे उत्पादन करती है। अंडहल्के भूरे रंग का होता है।

14. तेल्लीचेरी
यह नस्ल मुख्यतः केरल के कालीकट जिले में पाई जाती है। इनकी मुख्य विशेषताएँ जैसे पंखों का रंग गहरा काला, और पूँछ पर चमकदार नीली आभा दिखाई देती है। कंघी लाल रंग की, एकल और आकार में बड़ी होती है। मुर्गे एवं मुर्गी का औसतन वजन क्रमशः 1.62 किलोग्राम एवं 1.24 किलोग्राम होता है। औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 60 से 80 अंडे उत्पादन करती है।

15. हंसली
हंसली मुर्गी ओडिशा राज्य के मयूरभंज और क्योंझर जिलों में पाई जाती है। यह नस्ल शिकार (मुर्गा लड़ाई) और मांस उत्पादन के लिए लोकप्रिय है। यह नस्ल आकार में लंबी, पतली और देखने में अत्यंत आकर्षक प्रतीत होती है। पंखों का रंग काला, कंघी मटर के आकार, नर में विकसित स्पर पाया जाता है। चोंच छोटी, मजबूत और मोटी, वॉटल्स छोटे होते है। औसतन प्रति मुर्गी प्रति वर्ष 67 अंडे उत्पादन करती है।

स्रोतः उपयोग में लाये गए फोटोग्राफ्स ऑनलाइन प्रकाशन से लिए गए

लेखक :
डॉ अरविंद कुमार नंदनवार एवं डॉ सेवक अमृत ढ़ेंगे,
सहायक प्राध्यापक,
रानी अवंती बाई लोधी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, छुईखदान

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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